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परनिंदा पतन की पहली सीढ़ी

परनिंदा पतन की पहली सीढ़ी नई दिल्ली: मनुष्य के आंतरिक शत्रु अरिषड् वर्ग हैं, किंतु बाह्य शत्रु सप्त व्यसन हैं- नारी व्यामोह, द्यूतक्रीड़ा, सुरापान, आखेट, परनिंदा, अधिकार का दर्प और अपव्यय। समाज को स्वस्थ, सुखी, संपन्न, सुदृढ़ तथा सुचरित्र बनाने के के लिए मनीषियों एवं आचार्यो ने मानव के लिए एक नैतिक आचार-संहिता का विधान किया है। समाज के निर्माण और विकास में इन मूल्यों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। पौराणिक युग से लेकर आज तक ये मूल्य आचरण योग्य बने हुए हैं। इनके अतिक्रमण से किस प्रकार के अनर्थ होते हैं, इसका भी साक्षी-पुराण, इतिहास और आज का समाज है। इसके प्रमाणस्वरूप महाभारत की एक कथा प्रस्तुत है।

निंदा और स्तुति दो ऐसे मानवीय गुण हैं, जो उसके उत्थान और पतन के कारणभूत बनते हैं। स्तुति से देवता प्रसन्न हो वरदान देते हैं, निंदा मृत्यु का द्वार खोल देती है। एक सुभाषित है- निंदा करने वाले व्यक्ति द्वारा उपार्जित पुण्य निंदित व्यक्ति को प्राप्त हो जाता है, वैसे ही तिंदित व्यक्ति के द्वारा किए गए पापों का भागी निंदा करने वाला व्यक्ति बन जाता है, जैसे कुल्हाड़ी से काटे गए वृक्ष में पुन: कोंपलें उग आती हैं।

धर्मनंदन युधिष्ठिर ने अपने चारों शूर, वीर व पराक्रमी भ्राताओं के बल पर अनेक देशों पर अधिकार कर लिया। सम्पूर्ण राज्य गो-धन, पशु-धन और धान्य राशि से संपन्न हो गया। राज्य को धन-धान्य से समृद्ध पाकर लोकहित के लिए उन्होंने राजसूय यज्ञ संपन्न कराने का संकल्प किया। ऋषि, मुनि, तपस्वी, मनीषी, हितैषी एवं शिष्टजनों से मंत्रणा करके यज्ञ के लिए आवश्यक संसाधन जुटाए। तदनंतर पांडव श्रेयोभिलाषी वृष्टि-कुल श्रेष्ठ कृष्ण को आमंत्रित पाकर श्रीकृष्ण द्वारका की सुरक्षा का भार अपने ज्येष्ठ भ्राता को सौंपकर पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ में आ पहुंचे। पांडवों ने यदुकुलनंदन श्रीकृष्ण का समुचित स्वागत-सत्कार किया।

तदनंतर धर्मराज युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर विनीत भाव से निवेदन किया, "देवकीनंदन श्रीकृष्ण। अपका आदेश पाकर मैं यह यज्ञ निर्विघ्न संपन्न करना चाहता हूं।" युधिष्ठिर की प्रार्थना स्वीकार करके वासुदेव कृष्ण ने प्रसन्नतापूर्वक यज्ञ की तैयारी करने की स्वीकृति प्रदान की।

यज्ञ की तैयारियां शुरू हुईं। सहदेव के नेतृत्व में दंद्रसेन, विशोक, रुक्म (अर्ज़ुन का रथ सारथी), शमीक व ध्वजसेन -इन पांचों रथ सारथियों ने अन्य आवश्यक प्रबंधों के साथ भोज के लिए भक्ष्य, भोज्य, लेहा, चोष्य एवं सुगंधित पेय पदार्थो का संपादन किया।

महर्षि व्यास ने यज्ञ-विधियों का निर्वाह करने के लिए ऋत्विकों को आमंत्रित कर स्वयं ब्रह्मत्व याने पुरोहिताई स्वीकार कर जी।

सामगात का स्थान सुसास तथा अध्वर्य के स्थान याज्ञवल्क्य ने ग्रहण किए। तब वेदज्ञ महर्षियों ने यज्ञारंभ के लिए तिथि, नक्षत्र, वार, राहुकाल, वर्जित घड़ी इत्यादि की गणना करके अमावस्या के दिन ज्येष्ठ राशि क मूल नक्षत्र का मुहूर्त निर्धारित किया और भूपालक युधिष्ठिर को यज्ञ-दीक्षा दिलाई।

नकुल द्वार निमंत्रण पाकर उस यज्ञ में भीष्म, द्रोण, कृप इत्यादि समेत कौरव तथा अन्य अनेक राज्यों के अधिपति पधारे। चेदि राजा शिशुपाल भी अपने दल-बल सहित यथासमय इंद्रप्रस्थ में पहुंचे। वेदमंत्रों के साथ दवेताओं को यज्ञ की आहुतियां प्रदान की गईं। ब्राह्मणों को बहुविध दान- दक्षिणाएं समर्पित की गईं। यज्ञ में उपस्थित समस्त भूपतियों को यथोचित सत्कार के साथ उपहार दिए गए। यज्ञ में उपस्थित समस्त भूपतियों को यथोचित सत्कार के साथ उपहार दिए गए। राज्य की जनता को यज्ञ की मर्यादा के अनुरूप उचित उपहारों से संतुष्ट किया गया।

राजपुरोहितों, तपस्वियों, यज्ञ के संचालकों तथा राजाओं ने युधिष्ठिर को द्रौपदी समेत सादर उच्च आसन पर अधिष्ठित कराया। यज्ञ विधि के अनुसार सर्वप्रथम यज्ञकर्ता को सर्वगुण संपन्न महात्मा को अघ्र्य प्रदान करना था।

पितामह भीष्म ने कौंतेय युधिष्ठिर को संबोधित कर कहा, "पांडुनंदन, यज्ञ के नियमानुसार प्रथम पूजा के लिए स्नातक, ऋत्विक, आचार्य, इष्ट व्यक्ति, संयमी तथा भूपति अर्हता रखते हैं। इनमें से किसी पूज्य व्यक्ति का आप स्वयं चयन कर लीजिए।"

भीष्म के वचन सुनकर युधिष्ठिर ने निवेदन किया, "पूज्य पितामह! कृपया आप ही ऐसे योग्य महात्मा का नाम बताइए।"

गंगापुत्र भीष्म ने कहा, "सर्वजन प्रिय वासुदेव कृष्ण से बढ़कर पूजा पाने का योग्य व्यक्ति और कौन है? तुम उन्हीं को अघ्र्य समर्पित करो। तुम्हें यज्ञ का संपूर्ण फल प्राप्त होगा।" भीष्म का आदेश पाकर युधिष्ठिर ने शास्त्रोक्त विधि से कृष्ण को अघ्र्य प्रदान किया। समस्त राजाओं के हर्षोल्लास से यज्ञमंडप गूंज उठा। यह निर्णय चेदि राजा शिशुपाल से सहा नहीं गया। उसने क्रोधावेश में आकर भीष्म, कृष्ण और युधिष्ठिर की निंदा की, अपने वाग्बाणों से उनके ह्रदयों पर आघात करने लगा।

यज्ञ के मंडप के मध्य भाग में प्रवेश कर तीव्र शब्दों में युधिष्ठिर की भर्त्सना की, "युधिष्ठिर, तुमने धर्म का चोगा पहनकर अधर्म का आचरण किया है। भला! धर्म तत्व तुम क्या जाने? भीष्म की दुष्ट मंत्रणा से प्रेरित होकर तुमने यह जघन्य कार्य किया है। भीष्म तो वृद्ध हो चुके हैं। उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है। वे पक्षपानी हैं। कौरवों का नमक खाते हुए वे कृतघ्न हो गए हैं।"

"उनकी सलाह पाकर तुमने एक यादव की अर्चना की। यह धर्म क्षत्रिय नहीं। यहां पर आचार्य द्रोण, कृपाचार्य, भीष्म, सुयोधन, राजा विराट, कर्ण इत्यादि एक से बढ़कर एक अतिरथी, महारथी हैं। यदि वृद्धों की ही पूजा करनी थी, तो साक्षात् वसुदेव इस यज्ञमंडप में उपस्थित हैं। अगर ऋत्विकों की ही पूजा करनी थी, महर्षि व्यास जी विरामान हैं।"

"इन सबके होते तुमने एक कपटी यादव को यज्ञ का अघ्र्य समर्पित किया। मान भी लो कि तुमने अज्ञान के वशीभूत हो यज्ञाघ्र्य कृष्ण को समर्पित भी किया, तो इसके योग्य मानकर अविवेकी कृष्ण ने इसे कैसे स्वीकार किया?" यहां तक शिशुपाल चुप न रहे, वे परुष शब्दों में भीष्म, युधिष्ठिर और कृष्ण की निंदा करते ही जा रहे थे।

श्रीकृष्ण शिशुपाल के निंदावाक्य सुनकर भी देर तक सहन करते रहे, आखिर उनकी सहनशीलता जाती रही। वे युद्ध के लिए सन्नद्ध हो गए। शिशुपाल वाक्दूषण के साथ कृष्ण पर बाणों का प्रहार करने लगे। ऐसा लगता था, मानो दो शार्दूलों, हाथियों तथा सिंहों के बीच भयंकर संग्राम हो रहा है।

अंत में चेदिराजा शिशुपाल ने कृष्ण पर आग्नेयास्त्र का प्रयोग किया। कृष्ण ने वारुणास्त्र से उसे निस्तेज कर दिया। फिर क्या था, दोनों के बीच विविध अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग होता रहा। शिशुपाल के पापों का घड़ा भर चुका था। अब उसके सौ पाप पूरे हो चुके थे। विजय की आशा न देख छल-कपट से विजय साधने के लिए शिशुपाल ने माया युद्ध प्रारंभ किया। दीर्घकाल तक युद्ध को खींचना उचित न समझकर श्रीकृष्ण ने अपने अंतिम अस्त्र सुदर्शन चक्र का प्रयोग किया।

सुदर्शन चक्र ने शिशुपाल का पीछा करते हुए उनका सिरच्छेद किया। यज्ञमंडप में हाहाकार मच गया। उसी समय शिशुपाल की देह से एक तेज आविर्भूत हुआ। वह तेज चक्रपाणि श्रीकृष्ण की परिक्रमा करके उनके भीतर विलीन हो गया। यज्ञमंडप में उपस्थित समस्त भूपाल विस्मय में आ गए और कृष्ण के जयनादों से यज्ञशाला प्रतिध्वनित हो उठी। देव दुंदुंभियां निनादित हुईं। आकाश से पुष्प वृष्टि हुई। इस प्रकार युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ निर्विघ्न समाप्त हुआ। परनिंदा का फल शिशुपाल को प्राप्त हुआ।

(सस्ता साहित्य मंडल, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'पौराणिक कथाएं' से साभार)
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