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हामिद अंसारी ही क्यों बने सोनिया की पसंद

हामिद अंसारी ही क्यों बने सोनिया की पसंद  नई दिल्ली: हामिद अंसारी भले ही राष्ट्रपति भवन जाने से वंचित रह गए हों लेकिन यूपीए ने उन्हें एक बार फिर उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना दिया है। अंसारी दूसरे ऐसे उपराष्ट्रपति हैं जिन्हें दूसरी दफा इस पद पर आसिन होने का मौका मिलने जा रहा है। इससे पहले प्रख्यात शिक्षाविद सर्वपल्ली राधाकृष्णन को 1952-1962 तक उपराष्ट्रपति बनने का अवसर मिला था। उपराष्ट्रपति का चुनाव 7 अगस्त को होगा।

उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार पर विचार करने के लिए यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता में शनिवार को हुई बैठक में अंसारी को पुनः उपराष्ट्रपति बनाने का फैसला किया गया। बैठक में तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी खुद शामिल न होकर अपने सहयोगी रेल मंत्री मुकुल राय को भेजा था। अंसारी को समर्थन देने के बारे में पूछे जाने पर मुकुल राय ने कहा कि इस बारे में उचित समय पर पार्टी के फैसले की जानकारी दे दी जायेगी...।

दरअसल ममता बनर्जी को इस बात पर एतराज है कि प्रधानमंत्री ने उनसे पहले प्रकाश करात से बात क्यों की। पीएम ने करात को फोन कर अंसारी के लिए समर्थन मांगा था। ममता बनर्जी ने न केवल अंसारी के नाम पर रेड सिग्नल दिखा दिया बल्कि अपनी पसंद भी बता दी है। ममता बनर्जी चाहती हैं कि गाँधी जी के पोते गोपाल कृष्ण गाँधी को उपराष्ट्रपति बनाया जाए।

75 वर्षीय राजनयिक रहे हामिद अंसारी के नाम की घोषणा शनिवार को यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने की। हालांकि उन्हें पुनः उपराष्ट्रपति बनाये जाने को लेकर कांग्रेस और यूपीए के अंदर आम राय नहीं थी। 2007 में उपराष्ट्रपति बनाये जाने से पहले अंसारी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति और अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष रह चुके हैं।

अँसारी भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी भी रह चुके हैं। अँसारी का नाम राष्ट्रपति के लिए लिया जा रहा था लेकिन बनते बिगड़ते राजनीतिक समीकरणों के कारण यूपीए ने प्रणव मुखर्जी को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाने का फैसला किया।

गौरतलब है कि 2007 में अंसारी को उपराष्ट्रपति बनाये जाने का प्रस्ताव मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने किया था जिसे आश्चर्यजनक तौर पर युपीए ने स्वीकार लिया था। तब माकपा केंद्र की यूपीए सरकार का बाहर से समर्थन कर रही थी। एनडीए ने नजमा हेपतुल्ला को अपना उम्मीदवार बनाया था। अंसारी को 788 वोट मिले थे जबकि नजमा को 455 वोट मिले थे।

राज्य सभा के सभापति के तौर पर बरबस सदन स्थगित करने की उनकी प्रवृति और सदन के संचालन को लेकर अनेक राजनीतिक दल उनकी शैली से संतुष्ठ नहीं बताये जाते है। खास कर पिछले सदन में लोकपाल विधेयक पर राज्य सभा में देर रात तक चली चर्चा के दौरान मतदान से ठीक पहले अंसारी ने जिस तरह से सदन की कार्रवाई स्थगित की थी , उसके कारण उन्हें राजनीतिक दलों की खासा आलोचना झेलनी पड़ी थी। तब भाजपा ने सभापित की यह कहते हुए आलोचना की थी कि सदन में सरकार की फजीहत के भय से अंसारी ने सत्तारुढ़ दल के प्रभाव में आकर सदन की कार्रवाई स्थगित करने का विकल्प चुना।  

हालांकि अंसारी के नाम पर प्रणव मुखर्जी के विपरीत यूपीए के सहयोगियों सहित विपक्षी दलों के समर्थन को लेकर आम सहमति कायम करने में कांग्रेस को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। खास कर तृणमूल कांग्रेस अंसारी के नाम पर सहमत नहीं है। उधर, अंसारी के नाम पर विपक्षी भाजपा-नित एनडीए ने फिलहाल अपनी तरफ से किसी उम्मीदवार के नाम की घोषणा नहीं की।
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