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फिर से होगा खादी का फैशन

फिर से होगा खादी का फैशन नई दिल्ली: फैशन डिजायनर गौरांग शाह ने ऐसे समय में जब शिफॉन,जार्जेट की कढ़ाईदार साड़ियों के जमाने में पारम्परिक हस्तनिर्मित वस्त्र गुमनामी के अंधेरे में कहीं खो गए हैं, हस्तशिल्प, खास कर खादी को पुनर्जीवित करने का फैसला किया है। गौरांग इस काम के लिए देशभर के 250 बुनकरों की मदद ले रहे हैं।

गौरांग इस साल बर्लिन फैशन वीक में 'द लावेरा शो फ्लोर' पर भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। इस शो में वह अंतर्राष्ट्रीय मंच पर हथकरघे से बने वस्त्रों की चमक बिखेरने की कोशिश करेंगे।

गौरांग ने आईएएनएस को बताया, "2001 में जब सिफॉन और जार्जेट की साड़ी के प्रचलन होने से हस्तनिर्मित वस्त्रों की मांग कम हो गई और बुनकर समुदाय कर्ज के तले दब गए, तो मैंने परम्परागत हथकरघा को पुनर्जीवित करने और उन्हें लोकप्रिय बनाने के काम को एक चुनौती के रूप में लिया। इसे लोकप्रिय होने में सालों लगे हैं।"

उन्होंने कहा, "मैं व्यक्तिगत तौर पर खादी को पसंद करता हूं। मैंने देखा कि इसका महत्व लगभग खत्म हो गया था। इसलिए मैंने इसे संरक्षित किया क्योंकि यह असली भारत का अंग है। इसलिए मैं अपनी सारी ऊर्जा और संसाधन इसमें लगा रहा हूं।"

वर्ष 2012 लैक्मे फैशन वीक में हिस्सा ले चुके गौरव ने परम्परागत खादी में बदलाव किया है ताकि आज की पीढ़ी को यह पसंद आए।

इसके साथ-साथ वह आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र से आए ढाई सौ बुनकरों की मदद भी कर रहे हैं। इसके लिए वह उन्हें मौजूदा दौर की मांग से अवगत करा रहे हैं।

बर्लिन में होने वाले शो के लिए गौरांग काफी उत्साहित हैं। उन्हें उम्मीद है कि विश्वभर के फैशनप्रेमी हस्तनिर्मित इन वस्त्रों को पसंद करेंगे।

उन्होंने कहा कि बर्लिन फैशन शो के आयोजकों को उनका काम काफी पसंद आया खास कर खादी उन्हें पसंद आई। शाह का काम उन्हें पर्यावरण के अनुकुल लगा और उन्होंने शाह को 'द लावेरा शो फ्लोर' पर चलने का मौका दिया।
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