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आज मिस्र की जनता खुद चुनेगी अपनी हुकूमत

आज मिस्र की जनता खुद चुनेगी अपनी हुकूमत काहिरा: 60 साल बाद मिस्र के इतिहास में ऐसा पहला मौका आया है जब सैन्य तानाशाही से मुक्त होकर यहां की आवाम खुद अपना राष्ट्रपति चुनेगी। मिस्र में आज पहली बार लोग अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। मुबारक की तानाशाही के खिलाफ बगावत के बाद यहां राष्ट्रपति का चुनाव हो रहा है। राष्ट्रपति चुनाव के लिए आज और कल यहां वोटिंग होगी, इसके बाद भी जरूरी हुआ तो 16 और 17 जून को फिर से मतदान होगा। जबकि राष्ट्रपति के नाम की घोषणा 21 जून तक होनी है।

वोटिंग के बाद ही तय होगा कि पुराने हुकूमत से जुड़े धर्मनिरपेक्ष खासमखास के पास ही सत्ता की कमान रहेगी या फिर लंबे समय से सियासत से दूर रहे इस्लामिक पार्टियों को सरकार बनाने का मौका मिलेगा। इस्लामी ताकतें सत्ता में आईं तो इसका सीधा असर अमेरिका और मध्य पूर्व की शांति कोशिशों पर पड़ेगा।

मिस्र में हो रहे इस चुनाव में राष्ट्रपति पद के लिए कुल 13 उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं। हालांकि इसमें सबसे ज्यादा दावेदारी धर्म निरपेक्ष चेहरों की है जिसमें- पूर्व विदेश मंत्री अम्र मूसा और पूर्व प्रधानमंत्री अहमद शफीक शामिल हैं। वहीं मुस्लिम ब्रदरहुड के मोहम्मद मुरसी और ब्रदरहुड से अलग हो चुके इस्लामी उदारवादी अब्दुल मुनीम अबुल फतह और वाम-राष्ट्रवादी हामदीन सबाही भी मैदान में है।

राष्ट्रपति चुनाव के पहले चरण का मतदान बुधवार यानि आज और गुरुवार को होगा। मिस्र में सिर्फ उन्हीं राजनेताओं को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने की अनुमति दी गई है, जो यहां के मूल निवासी हैं और जिन्होंने किसी विदेशी से शादी नहीं की है।

यदि किसी के पास किसी अन्य देश की दोहरी नागरिकता है तो वो भी चुनाव नहीं लड़ सकता। हालांकि देश के 5 करोड़ मतदाता की यही उम्मीद है कि सत्ता में जो भी आए, वो कम से कम हिंसा से ग्रस्त और आर्थिक रूप से चरमरा चुके मिस्र में शांति और स्थायित्व लाए

मिस्र के राष्ट्रपति चुनाव में भारतीय अधिकारी भी अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक दल में शामिल हो रहे हैं। अरब क्रांति के बाद भी यहां असमंजस की स्थिति बरकरार है क्योंकि मुबारक की गद्दी जाने के बाद हुए हिंसा में 100 लोग मारे जा चुके हैं। यही नहीं अब भी मुबारक के कार्यकाल के दौरान के बदनाम पुलिसवाले और सैन्य ताकतों का ही नियंत्रण है।

अब तक सरकारी संगठनों में भ्रष्टचार से लोगों को निजात नहीं मिली है इसलिए नए नेता के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी देश का नया संविधान लिखा जाना जिसमें सेना और आम नागरिकों के बीच सत्ता का विभाजन एक बड़ा मुद्दा होगा।
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