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'60 सालों में बदल गई है अपनी संसद'

जनता जनार्दन संवाददाता , May 13, 2012, 10:39 am IST
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'60 सालों में बदल गई है अपनी संसद' नई दिल्ली: साठ साल पहले और आज की संसद में जमीन आसमान का फर्क आ गया है। उन दिनों एक से बढ़कर एक विद्वान और दिग्गज संसद पहुंचे थे और बहस ऐसी होती थी कि सुनने और देखने वाले दांतों तले उंगलियां दबा लेते थे लेकिन अब देश की सबसे बड़ी इस पंचायत का नजारा ही बदल गया है।

विश्लेषकों और वरिष्ठ सांसदों का भी यही मानना है कि अब वैसे सांसद और वैसी बहस तो कल्पना मात्र रह गई है। यही नहीं व्यापक संवैधानिक मुद्दों के बदले राज्यों और वर्गीय हितों से सम्बंधित मुद्दे अक्सर इसके एजेंडे में आ रहे हैं।

रविवार को लोकसभा और राज्यसभा की पहली बैठक की 60वीं वर्षगांठ है। वरिष्ठ राजनीतिज्ञ उन दिनों को याद करते हैं, जब संसद की कार्यवाही में व्यवधान नहीं पैदा होते थे और शोरशराबा, नारेबाजी व विद्वेष देखने-सुनने को नहीं मिलते थे।

संसद का नजारा और माहौल अब कितना बदल गया है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पहली लोकसभा में कांग्रेस के सदस्यों की बड़ी संख्या थी और मार्क्‍सवादी विपक्ष में थे। आज जबकि कांग्रेस सहयोगी दलों की बैसाखी की सहारे है तो वामपंथियों की जगह दक्षिपंथियों ने ले ली है। वामपंथी आज कमजोर और अकेले पड़ गए हैं।

पहली लोकसभा में अधिकतर प्रशिक्षित वकील थे तो अब कृषि से जुड़े लोगों की तादाद अधिक हो गई है। यही नहीं उम्र के लिहाज से भी इसमें काफी तब्दीलियां आई हैं। 1952 में सिर्फ 20 फीसदी सांसद 56 या उससे अधिक उम्र के थे जबकि 2009 में यह संख्या 43 फीसदी हो गई।

पहली लोकसभा में सत्ता पक्ष और विपक्ष की ओर से जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, वल्लभ भाई पटेल, बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर, अब्दुल कलाम आजाद, ए. के. गोपालन, सुचेता कृपलानी, जगजीवन राम, सरदार हुकुम सिंह, अशोक मेहता और रफी अहमद किदवई जैसे दिग्गज थे।

उन दिनों बड़ी जीवंत बहस हुआ करती थी। पहली लोकसभा में कुल 677 बैठकें हुईं जो लगभग 3,784 घंटे चलीं। इसका लगभग 48.8 फीसदी समय का उपयोग विधायी कार्यों में किया गया। लेकिन इसके 60 वर्षों के बाद स्थितियां पूरी तरह बदल गई है। अब बिरले ही ऐसे मौके आते हैं जब बहस दमदार हो। आज तो अधिकांश समय हंगामे में जाया हो जाया करता है।

पहली लोकसभा में प्रत्येक वर्ष औसतन 72 विधेयक पारित हुए। 15वीं लोकसभा में यह संख्या घटकर 40 हो गई।

केंद्रीय सूक्ष्म, लघु एवं मझौले उद्यम मंत्री वीरभद्र सिंह कहते हैं कि आज संसद में बहुत ज्यादा व्यवधान पैदा होने लगे हैं। सिंह ने कहा कि पहले छोटे मुद्दों पर व्यवधान नहीं पैदा होते थे। वे (सदस्य) अपने मतभेद जोरदार तरीके से जाहिर करते थे, लेकिन संसद की कार्यवाही में शायद ही कभी व्यवधान पैदा होता था। आज संसद में व्यवधान, अपवाद के बदले नियम बन गया है।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सांसद सुमित्रा महाजन ने कहा कि पहले सांसदों की सोच में राष्ट्रीय दृष्टिकोण जाहिर होता था। महाजन ने कहा, "मुद्दों के प्रति उनका एक राष्ट्रीय दृष्टिकोण होता था। आज राज्य के संदर्भ ज्यादा हावी हो गए हैं।"

लोकसभा में अपना सातवां कार्यकाल पूरा कर रहीं महाजन कहती हैं कि पहले वरिष्ठ नेताओं के प्रति सम्मान होता था। यदि कोई वरिष्ठ नेता खड़ा होकर बोलता था तो बाकी सदस्य बगैर कोई व्यवधान पैदा किए उसे सुनते थे। इनमें अटल बिहारी वाजपेयी और चंद्रशेखर जैसे लोग शामिल थे। "बाद के दिनों में तो अटलजी को भी व्यवधानों का सामना करना पड़ा था।"

राजनीतिक विश्लेषक एस. निहाल सिंह ने कहा कि पहले संसद में बहस का स्तर बहुत ऊंचा होता था। उन्होंने कहा, "आज तो बहस बहुत कम, और शोरशराबा व व्यवधान सबसे ज्यादा है।"

लोकसभा के पूर्व सचिव सुभाष सी. कश्यप ने कहा कि संसद की संरचना सामाजिक स्थिति का भी प्रतिबिम्ब है। उन्होंने कहा, "वे सांसद जनता के प्रतिनिधि हैं..हमारी कमजोरियों के, हमारी संस्कृति, मूल्यों की समझ, हमारी अनुशासनहीनता के.. यदि समाज में अनुशासनहीनता है, तो उसे तो जाहिर होना ही है।"

कश्यप ने कहा कि पहले लोकसभा में सदस्यों का बड़ा हिस्सा वकीलों का होता था। लेकिन कुछ समय से अब सबसे बड़ा समूह किसानों का है। इस मामले में यह एक बड़ा बुनियादी बदलाव है।

कश्यप ने कहा कि जब जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे तो उस समय अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर संसद में अधिक चर्चा होती थी। "आज स्थानीय और क्षेत्रीय मुद्दे संसद में उठाए जाते हैं, जबकि उन पर राज्य की विधानसभाओं में चर्चा होनी चाहिए।"

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