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चर्चित रचना
विश्वास का महत्व काशीनाथ त्रिवेदी ,  Dec 05, 2012
हज़रत मुहम्मद अपने साथी अबूबकर को लेकर मक्का से रवाना हुए। उन्हें पकड़ने के लिए कुरैशों ने उनका पीछा किया। यह देखकर मुहम्मद साहब और अबूबकर रास्ते में एक गुफा में छिप गये। कुरैशों को गुफा के आसपास चक्कर लगाते और खोजते देखकर अबूबकर बोले, "हजरत, हम सिर्फ दो लोग यहां घुसे हैं और दुश्मन तो बहुत हैं। ....  समाचार पढ़ें
मुस्कुराहट बड़े काम की चीज जनता जनार्दन डेस्क ,  Nov 25, 2012
खुरासान का एक राजकुमार था। नाम था अमर। खूब ठाट-बाट की जिंदगी थी। एक बार जब वह लड़ाई में गया तो उसके रसोईघर के समान को लेकर तीन सौ ऊंट भी उसके साथ गये। दुर्भाग्य से एक दिन वह खलीफा इस्माइल द्वारा बंदी बना लिया गया, पर दुर्भाग्य भूख को तो नहीं टाल सकता। उसने पास खड़े अपने मुख्य रसोइये से, जो एक भला आदमी था, कहा, "भाई, कुछ खाने को तैयार कर दे।" ....  समाचार पढ़ें
..और कौशिकी के हाथों मारे गए शुंभ-निशुंभ वसीम अख्तर ,  Nov 01, 2012
प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु के वंश में सुंद और उपसुंद नामक दो दानव हुए थे। उनके शुंभ और निशुंभ नामधारी दो पुत्र पैदा हुए। उनके मन में बचपन से ही मधु और कैटभ दैत्यों की भांति इंद्र पर विजय पाने की प्रबल इच्छा थी। उनमें अहंकार के साथ हिंसा की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी। वह अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए पुष्कर क्षेत्र में गए और अन्न-जल त्याग दस हजार वर्ष र्पयत ब्रह्मा की घोर तपस्या की। प्रसन्न होकर ब्रह्मा प्रत्यक्ष हुए। ....  समाचार पढ़ें
जब शिव ने शुक्राचार्य को निगल लिया बालशौरि रेड्डी ,  Sep 25, 2012
दानव गुरु शुक्राचार्य के संबंध में काशी खंड महाभारत जैसे ग्रंथों में कई कथाएं वर्णित हैं। शुक्राचार्य भृगु महर्षि के पुत्र थे। देवताओं के गुरु बृहस्पति अंगीरस के पुत्र थे। इन दोनों बालकों ने बाल्यकाल में कुछ समय तक अंगीरस के यहां विद्या प्राप्त की। आचार्य अंगीरस ने विद्या सिखाने में शुक्र के प्रति विशेष रुचि नहीं दिखाई। असंतुष्ट होकर शुक्र ने अंगीरस का आश्रम छोड़ दिया और गौतम ऋषि के यहां जाकर विद्यादान करने की प्रार्थना की। ....  समाचार पढ़ें
.और किरात बन गया वाल्मीकि बालशौरि रेड्डी ,  Sep 17, 2012
ब्रह्मा के मानस-पुत्रों में प्रचेतस भी एक हैं। एक बार समस्त लोकों का संचार करते हुए सुरपुरी अमरावती की शोभा को निहारते हुए उन्होंने इंद्र सभा में प्रवेश किया। इंद्र ने दिक्पालकों के समेत आगे बढ़कर आदरपूर्वक प्रचेतस का स्वागत किया, 'अघ्र्य' पाद्य आदि से उनका उपचार किया। उनको प्रसन्न करने के लिए रंभा, ऊर्वशी, मेनका इत्यादि अप्सराओं के नृत्य-गान का प्रबंध किया। ....  समाचार पढ़ें
जब अप्सरा को गरुड़ बनना पड़ा बालशौरि रेड्डी ,  Sep 16, 2012
प्राचीन काल में महामुनि मरक डेय अपने अनुपम तपोबल के कारण तपस्वी श्रेष्ठ कहलाए। मुनि जैमिनी धर्मतत्वों के जिज्ञासु थे। एक बार उन्होंने मरक डेय के आश्रम में जाकर निवेदन किया, "मुनिवर, मैंने महर्षि व्यास के मुंह से समस्त पुराण, महाभारत, भागवत आदि इतिहास, समस्त श्रुति, स्मृति तथा धर्मशास्त्रों का श्रवण किया है। इस समय मेरे मन में जो शंकाएं हैं, ....  समाचार पढ़ें
जनता जनार्दन डेस्क ,  Sep 13, 2012
दक्षिण के एक कवि ने अपने गीत में बताया है- सभ्यता की अनेक सीढ़ियों को पार करने के बावजूद मनुष्य की उद्दाम कामनाओं में परिवर्तन नहीं आया है। उसने वेष बदला, भाषाएं सीखीं, ज्ञान का खजाना खोला, पर उसकी आकांक्षा बनी रही। दरअसल मनुष्य सदा से सुविधा भोगी बनना चाहता रहा है। श्रम, साधना और पुरुषार्थ से वह घबराने लगता है। प्रस्तुत है एक ऐसी ही पुराण कथा, जिसमें मानव की चित्तवृत्ति की सही झांकी दर्शाई गई है : ....  समाचार पढ़ें
जब व्यास को छोड़नी पड़ी काशी बालशौरि रेड्डी ,  Sep 12, 2012
प्रत्येक व्यक्ति के कुछ सिद्धांत होते हैं, उसकी अपनी कुछ मान्यताएं होती हैं। वैचारिक स्वतंत्रता मानव का जन्मसिद्ध अधिकार है। व्यक्ति-व्यक्ति की विचारधारा भिन्न होती है। समाज में शांति और सद्भाव बनाए रखना है, तो एक-दूसरे की मान्यताओं का आदर करना होगा। अपने विश्वासों, सिद्धांतों, आदर्शो तथा मान्यताओं को जब कोई अन्य लोगों पर थोपने का प्रयास करता है, ....  समाचार पढ़ें
.. जब विंध्या ने सूर्य का मार्ग रोका बालशौरि रेड्डी ,  Sep 10, 2012
स्कंद महापुराण के काशी खंड में एक कथा वर्णित है कि त्रैलोक्य संचारी महर्षि नारद एक बार महादेव के दर्शन करने के लिए गगन मार्ग से जा रहे थे। मार्ग मध्य में उनकी दृष्टि उत्तुंग विंध्याद्रि पर केंद्रित हुई। ब्रह्मा के मानस पुत्र देवर्षि नारद को देखकर विंध्या देवी अति प्रसन्न हुई। तत्काल उनका स्वागत कर विंध्या ने देवर्षि को श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया। दवेमुति नारद ने आह्लादित होकर विंध्या को आशीर्वाद दिया। ....  समाचार पढ़ें
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