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धर्म-अध्यात्म
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मोरान मारवाड़ी महिला सम्मेलन के सौजन्य से श्रीराणी सती दादीजी का मंगल पाठ सम्पन्न राजु मिश्रा ,  Aug 22, 2017
गत वर्षों की भांति इस वर्ष भी एक दिवसीय कार्यक्रमों के साथ श्रीराणी सती दादीजी का भदवा आमावश्या महोत्सव का भव्य आयोजन मोरान में किया गया । अखिल भारतिय मारवाड़ी महिला सम्मेलन की मोरानहाट शाखा के सौजन्य से श्रीराधाकृष्ण विवाह भवन में दोपहर को पारंपरिक पुजा अर्चना के पश्चात भजन गाईका मीरा पसारी एवं सहयोगियों द्वारा संगीतमय नारायणी पाठ एवं भजनों ने लोगों को भक्ति ....  समाचार पढ़ें
मोरान में मारवाड़ी महिला सम्मलेन के तत्वाधान में दादी जी का मंगल पाठ,पढ़े रिपोर्ट राजु मिश्रा ,  Aug 19, 2017
गत वर्षों की भांति इस वर्ष भी आगामी 21 अगस्त को एक दिवसीय कार्यक्रमों के साथ श्रीराणी सती दादीजी का भदवा आमावश्या महोत्सव के भव्य आयोजन की तैयारियां की जा रही है । अखिल भारतिय मारवाड़ी महिला सम्मेलन की मोरानहाट शाखा के सौजन्य से श्री राधाकृष्ण विवाह भवन में दोपहर 2.30 बजे से पारंपरिक पुजा अर्चना, 3 बजे से भजन गाईका ....  समाचार पढ़ें
नित्य मानस चर्चा, उत्तर कांड: कलयुग का पाखंड पूर्व व्याख्यायित जगदीश प्रसाद दुबे ,  Aug 19, 2017
कलियुग में बिना कारण के अभिमान बढा रहेगा. थोडा सा कुछ भी मिल गया अहंकार हो जाता है. मनुष्य यह नहीं सोचता कि यह जो कुछ भी है, प्रभु की कृपा से ही प्राप्त है और प्रलय तक तो जीवित रहना नहीं है. मनुष्य व्यर्थ का अहंकार पाले रहता है किसी को धन, किसी को पद , किसी को बल का किसी को ज्ञान का अहंकार है. सभी कुछ न कुछ अहंकार से ग्रसित जरूर हैं. ....  समाचार पढ़ें
नित्य मानस चर्चा, उत्तर कांड: पर त्रिय लंपट कपट सयाने, मोह द्रोह ममता लपटाने रामवीर सिंह ,  Aug 17, 2017
तर्क के बल पर ईजाद किया हुआ कोई भी पथ समता नहीं ला सकता। इसलिए कहा है कि अंत में कल्पित मार्ग पर चलने से "पावहिं दुख भय रुज सोक वियोग"। शंकराचार्य जी ने तो वैदिक मार्ग से हट कर अन्य कुछ स्वीकार ही नहीं किया। सांख्य मत को भी निरीश्वरवादी होने के कारण त्याज्य माना है। बौद्ध धर्म भी सांख्य मत का समर्थक है। ....  समाचार पढ़ें
नित्य मानस चर्चा, उत्तर कांड: बरन धर्म नहिं आश्रम चारी रामवीर सिंह ,  Aug 13, 2017
वेदों में वर्ण व्यवस्था जीव के कारण शरीर में तीन गुणों के अनुपात पर आधारित है। इसी प्रकार आश्रम व्यवस्था आयु के अनुसार होती है। वेदों ने वर्णाश्रम के अनुसार कर्तव्य निर्धारित कर रखे हैं। सनातन धर्म का आधार वेद ही हैं। अविदित परमात्मा को जो विदित करा दे वह वेद है। कलियुग में लोग वेद के विरुद्ध आचरण करते हैं क्यों कि वे परमात्मा -को -नहीं चाहते, वे तो परमात्मा -से- चाहते हैं इसलिए वह धर्म विरुद्ध आचरण हुआ। ....  समाचार पढ़ें
नित्य मानस चर्चा, उत्तर कांड: तेहिं कलिजुग कोसलपुर जाई रामवीर सिंह ,  Aug 12, 2017
हमारे शास्त्रों में बहुत से विज्ञान के सिद्धांतों का दर्शन है। कम्प्यूटर में या किसी चिप पर अगर कोई फ़ाइल सुरक्षित करके रख ली जाती है तो उसकी आयु तब तक की हो गई जब तक वह धातुनिर्मित चिप काल के प्रभाव से बिघटित नहीं होती। लेकिन यहॉं ऐसे अदृश्य कम्प्यूटर चिप का दर्शन है जिसका कोई भौतिक स्वरूप नहीं है और जो शरीर छोड़ देने के बाद भी जीव के पास रहता है। जीव अपने जन्म जन्मांतर का लेखाजोखा इस चिप में सुरक्षित रखता है। यूँ भी कह सकते हैं कि वह जीव से चिपकी रहती है इसलिए हम इसे चिप कह रहे हैं। ....  समाचार पढ़ें
नित्य मानस चर्चा, उत्तर कांड: भौतिकता और आध्यात्मिकता का अंतर तथा ब्राह्य आकर्षण रामवीर सिंह ,  Aug 10, 2017
भुशुण्डिजी इतिहास बता रहे हैं कि यह शरीर छोड़ने या न छोड़ने की शक्ति कैसे प्राप्त हुई। कहते हैं कि जब तक हमारी आध्यात्मिक चेतना जागृत नहीं हुई थी, हमें बहुत दुख क्लेश उठाने पड़े। मोह में पड़ा जीव यह सोचता है कि शारीरिक स्तर के भोग ही सब कुछ हैं। इन्हें पाने के लिए नानाप्रकार के पाखंड करता है, भटकता रहता है। जब आध्यात्मिक विकास होता है तब जीव को भौतिक और आध्यात्मिक अंतर समझ आता है। फिर सारे ब्राह्य आकर्षण समाप्त हो जाते हैं। ....  समाचार पढ़ें
नित्य मानस चर्चा, उत्तर कांड: अध्यात्म ज्ञान ही सर्वोत्तम रामवीर सिंह ,  Aug 09, 2017
भुशुण्डि जी के वक्तव्य का भी यही सार है। मानव का शरीर लेकर बस माया की ही चिंता रही,कभी इतना ग़ौर किया ही नहीं कि हर क्रिया के पीछे कारण होता है। सृष्टि में अनावश्यक कुछ भी नहीं है। घास भी नहीं। तो हमारे शरीर धरने का मुख्य कारण क्या है ? इस पर कभी विचार ही नहीं किया तो हम तो पशुओं से भी गए बीते हैं। "सुबह होती है शाम होती है, ज़िन्दगी इस तरह तमाम होती है। " ....  समाचार पढ़ें
नित्य मानस चर्चा, उत्तर कांड: परमात्मा के प्रचंड प्रताप की चर्चा रामवीर सिंह, जगदीश प्रसाद दुबे ,  Aug 08, 2017
गरुड़जी कहते हैं कि मुझे संशय रूपी सर्प ने डस लिया था। जैसे सर्प के विष के चढ़ने से लहरें आती हैं,(कभी थोड़ा होश कभी बेहोश) इसी प्रकार से मैं कुतर्क के कारण अज्ञान में पड़ा था। आपने निवारण कर दिया। अब मुझे अपार शांति मिली है। मेरा मोह दूर हो गया। भगवान राम का परम रहस्य मैं जान गया हूँ। वे परब्रह्म परमात्मा हैं,समस्त सृष्टि के मालिक हैं। ....  समाचार पढ़ें
'रामु काम सत कोटि सुभग तन से..भार धरन सत कोटि अहीसा' तक एक चिंतन डॉ पं रामगोपाल तिवारी 'मानस मधुप' ,  Aug 07, 2017
ब्यक्ति संसार में विशिष्ट पदार्थ, वस्तु, पद, अधिकार, शक्ति प्राप्त करने की स्पर्धा में अपने से उच्च-उच्चतर से लेकर उच्चतम तक की उपलब्धि को हस्तगत करना चाहता है। इसीलिए संतोषरहित स्थिति में कामना पूर्ति के लिए जीवन भर दौड़ लगाता है। ....  समाचार पढ़ें
हर युग के अपने धर्मः तुलसी सठ की को सुनै, कलि कुचालि पर प्रीति दिनेश्वर मिश्र ,  Aug 19, 2017
द्वापर युग का व्यक्ति किंकर्तव्यविमूढ़ है। वह अनिश्चय की ऐसी स्थिति में पहुँच चुका है कि जटिल से जटिल परिस्थितियों में भी वह औचित्य का निर्णय नहीं ले पाता। इसका सर्वाधिक दुखद दृष्टांत था -द्रोपदी का चीरहरण, जिस सभा में भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य जैसे महापुरुष विद्यमान हों, वहाँ इतना बड़ा अन्याय हो पाना तो अभूतपूर्व था ही, किन्तु द्रोपदी द्वारा प्रश्न किए जाने पर भी पितामह भीष्म जैसे धर्मज्ञ, जब निर्णय देने में असमर्थता प्रगट करते हैं, तब इस युग की किंकर्तव्यविमूढ़ता का इससे बड़ा दृष्टांत क्या हो सकता है? ....  लेख पढ़ें
विप्र निरच्छर लोलुप कामीः वर्णाश्रम धर्म व्यवस्था का अवमूल्यित स्वरूप, विघटन दिनेश्वर मिश्र ,  Aug 17, 2017
यदि ब्राह्मण बेदज्ञान के द्वारा भी विषय की उपलब्धि को लक्ष्य बना ले, तब उन्हें उसमें ब्राह्मण में वे ही गुण अपेक्षित है, जिसका उल्लेख गीता में किया गया है। शम, दम, तप आदि से ही ब्यक्ति विषयाभिमुख बृत्ति से मुक्त हो सकता है।इस तरह मनुस्मृति और गीतोक्त दोनों ही लक्षणों को मानस की एक पंक्ति में समेट लिया गया है। ....  लेख पढ़ें
'सर्वज्ञ-शिव' के सिद्धान्त-दर्शन पर मानस-व्याख्या, वरेण्य, प्रतिपाद्य दिनेश्वर मिश्र ,  Aug 13, 2017
कोई भी ब्यक्ति ज्ञानी अथवा मूर्ख नहीं है।रघुपति जब भी जिसे जैसा बना देते हैं,वह उस समय वैसा ही प्रतीत होने लगता है। बड़ा ही विलक्षण है वह सिद्धांत, जिसमें ज्ञानी और मूर्ख के भेद को ही अस्वीकार कर दिया गया है।यह मान्यता इस संदर्भ में और भी आश्चर्यजनक जान पड़ती है कि-इसका प्रतिपादन,उस भगवान शिव के द्वारा किया जाय, जिन्होंने सर्वप्रथम देवर्षि नारद को सावधान करने की चेष्टा की थी। ....  लेख पढ़ें
ऐतिहासिक दृष्टि बनाम ईश्वर मूलक दृष्टि, संग्रहालय बनाम मंदिर दिनेश्वर मिश्र ,  Aug 12, 2017
जो मनुष्य भगवान की लीला को छोड़कर अन्य कुछ कहने की इच्छा करता है,वह उस इच्छा से ही निर्मित अनेक नाम और रूपों के चक्कर में पड़ जाता है।उसकी बुद्धि भेदभाव से भर जाती है।जैसे हवा के झकोरों सेडगमगाती हुई नौका को कहीभी ठहरने का ठौर नहीं मिलता, वैसे ही उनकी चंचल बुद्धि कहीं भी स्थिर नहीं हो पाती ....  लेख पढ़ें
मानस मीमांसाः सृष्टि ब्रह्मा की कृति नहीं माया की रचना, पर माया भी मिथ्या दिनेश्वर मिश्र ,  Aug 10, 2017
एक अर्थ में सृष्टि का निर्माण, उसके द्वारा हुआ है, जो स्वतः है ही नहीं, माया है ही नहीं, पर वह संसार का निर्माण करती है, बन्धन की सृष्टि करती है। अद्भभुत पहेली है। पर इसका सीधा सा तात्पर्य है कि जिसकी सत्ता है ही नहीं, वह बंधन और सृष्टि का निर्माण कर भी कैसे सकता है। अतः इस माया की सत्ता केवल ब्यक्ति की भ्रांति में है। अनादिकाल से अगणित ब्यक्तियों के हृदय में यह भ्रम बद्धमूल है। ....  लेख पढ़ें
ईश्वर असीम, तो बुद्धि से उसके रूप की व्याख्या सहज कहां दिनेश्वर मिश्र ,  Aug 09, 2017
क्या कोई ब्यक्ति यह दावा कर सकता है कि कि ईश्वर के विषय में मैंने पूरी तरह से जान लिया है, ठीक-ठीक जान लिया है? क्योंकि जिसके विषय में पूरी तरह से जान लिया गया, जो बुद्धि की सीमा में आ गया, वह असीम नहीं रह गया, ससीम हो गया। वह तो कोई बुद्धिजन्य पदार्थ ही होगा, ईश्वर तो नहीं होगा। और जब वह जाना नहीं जा सकता, तब तो फिर उसके विषय में केवल संकेत ही करना है, और तब यह संकेत करने वाले पर निर्भर करता है कि किस रूप में संकेत करे, तथा सामने वाला उसका क्या अर्थ ले। ....  लेख पढ़ें
मानस मीमांसा, सुंदर कांडः सिन्धु तीर एक भूधर सुन्दर, कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर दिनेश्वर मिश्र ,  Aug 07, 2017
पर्वत काअभिप्राय है, नीचे से ऊपर की ओर जाना। जब तक हम लोग नीचे से ऊपर की ओर उठने की चेष्टा नहीं करेंगे,तब तक जीवन मे भक्ति देवी का साक्षात्कार नहीं कर पायेंगे। वैसे प्रत्येक ब्यक्ति जीवन में ऊपर उठने की चेष्टा ही तो कर रहा है।पर क्या उसे अपने कार्य में सफलता मिल रही है?। ....  लेख पढ़ें
मानस मीमांसा, सुंदर कांडः देहाभिमान चिंतन दिनेश्वर मिश्र ,  Aug 06, 2017
लंका यात्रा के समय सबने अपनी अपनी असमर्थता ब्यक्त की। अंत में अंगद एक सीमा तक समुद्र लाँघने का बचन देते हुए भी लौट कर आने में कुछ संदेह ब्यक्त करते हैं, और इस संदेह के कारण वे बन्दरों को निराश कर देते हैं। इसके पीछे एक अत्यंत गहरा संकेत सूत्र छिपा हुआ है। ....  लेख पढ़ें
मानस मीमांसा, सुंदर कांडः सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा, जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा दिनेश्वर मिश्र ,  Aug 05, 2017
वही शरीर पवित्र तथा सुन्दर है, जिसके द्वारा हम भगवान का भजन कर सकें । सुन्दर कांड के मूल केन्द्र में उन सीताजी का पता लगाना है, जो भक्ति रूपा हैं, जिनमें सौन्दर्य की समग्रता है, जो प्रकाश मयी हैं, तथा जो लंका में बन्दिनी के रूप में दिखाई दे रही हैं। पहुँचना किसको है, बन्दर को। यह बिचित्र ब्यंग्य है। बन्दर संसार में कुरूपता का प्रतीक है।लेकिन हनुमान जी ने सीताजी को पा लिया, जबकि न तो उनका जन्म उत्कृष्ट कुल में हुआ है और न आकृति सुन्दर है, वह पशु शरीरधारी हैं। ....  लेख पढ़ें
मानस मीमांसा, सुंदर कांडः सावधान मन करि पुनि संकर, लागे कहन कथा अति सुंदर दिनेश्वर मिश्र ,  Aug 04, 2017
इस प्रसंग में आध्यात्मिक साधना का एक बड़ा अद्भुत क्रम है। इसलिये पूरी रामायण में यही एक ऐसा प्रसंग है, जहाँ पर कथा कहते कहते, भगवान शंकर कुछ देर के लिए कथा-रस में डूब जाते हैं। श्रोता का कथा रस में डूब जाना तो गुण है, पर वक्ता अगर कथा के मध्य डूब गया, तो ठीक नहीं है, क्योंकि वह बोलेगा कैसे? बिना बहिर्मुखी हुए, तो बोला नहीं जा सकता। ....  लेख पढ़ें
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