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धर्म-अध्यात्म
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गोवर्धन पूजा 2017: जानिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि जनता जनार्दन डेस्क ,  Oct 20, 2017
दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पर्व मनाया जाता है। इस पर्व के दिन शाम के समय खास पूजा रखी जाती है। बता दें कि इसी दिन श्रीकृष्ण ने आज ही के दिन इंद्र का मानमर्दन कर गिरिराज की पूजा की थी। इस दिन मंदिरों में ....  समाचार पढ़ें
 दीवाली में अद्भुत संयोग से बरसेगी लक्ष्मी कृपा जनता जनार्दन संवाददाता ,  Oct 19, 2017
दीपावली की शाम देव मंदिरों के साथ ही गृह द्वार, कूप, बावड़ी, गोशाला, इत्यादि में दीपदान करना चाहिए। रात्रि के अंतिम प्रहर में लक्ष्मी की बड़ी बहन दरिद्रा का निस्तारण किया जाता है। व्यापारी वर्ग को इस रात शुभ तथा स्थिर लग्न में अपने प्रतिष्ठान की उन्नति के लिए कुबेर लक्ष्मी का पूजन करना चाहिए। ....  समाचार पढ़ें
 करवा चौथ और 'महत्व' भूलकर भी ना करें ये गलतियां कृष्णा तिवारी ,  Oct 08, 2017
हिंदू पंचाग के अनुसार कार्तिक माह के चौथे दिन होता है। पंरपराओं के अनुसार इस दिन शादीशुदा महिलाएं या जिनकी शादी होने वाली हैं वो अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत करती हैं। ये व्रत सुबह सूरज उगने से पहले से लेकर और रात्रि में चंद्रमा निकलने तक रहता है। ये एकदिवसीय त्योहार अधिकतर उत्तरी भारत के राज्यों में मनाया जाता है। हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश, पंजाब, राज्यस्थान ....  समाचार पढ़ें
नित्य मानस चर्चाः धर्म परायन सोइ कुल त्राता, राम चरन जा कर मन राता दिनेश्वर मिश्र ,  Sep 20, 2017
वही गुणी है, वही ज्ञानी है, वही पृथ्वी का भूषण है, वही पंडित है, वही दानी है, वही धर्म परायण है, वही कुल का रक्षक है, वही नीतिज्ञ है, वही परम बुद्धिमान है, वही वेदज्ञ है, वही कवि है, वही विद्वान है तथा वही रणधीर है जो निश्छल-भाव से श्रीरघुबीर का भजन करता है। वह देश धन्य है, जहाँ श्रीगंगाजी हैं, वह स्त्री धन्य है जो पातिब्रत-धर्म का पालन करती है, वह राजा धन्य है, जो न्याय करता है और वह ब्राह्मण धन्य है, जो अपने धर्म पर अडिग रहता है। ....  समाचार पढ़ें
नित्य मानस चर्चाः जहँ लगि साधन बेद बखानी, सब कर फल हरि भगति भवानी दिनेश्वर मिश्र ,  Sep 19, 2017
श्रीमद्भागवत् में वर्णन आता है कि जब ब्रज में मक्खन चुराते हुए भगवान को एक गोपी पकड़ लेती है, तो भगवान बड़े भोलेपन से कहते हैं--गोपी! क्या यह तुम्हारा घर है? मैं इसे अपना घर समझकर भीतर आ गया था। इसका अर्थ है कि वस्तुतः स्वामी तो एकमात्र ईश्वर ही है, पर जीव ऐसा स्वामी बन बैठा है कि जिसने भगवान को ही चोर की उपाधि दे दी है। वस्तुतः ईश्वर की वस्तु पर हम अपना ही अधिकार मानते हैं। ....  समाचार पढ़ें
नित्य मानस कथाः संत हृदय नवनीत समाना, कहा कबिन्ह परी कहइ न जाना राकेश उपाध्याय ,  Sep 18, 2017
जो भी लोग भागवत धर्म का पालन करने वाले है, चाहे वे बहुत ज्ञानी हों, महापंडित हों, सन्यासी हों, तपस्वी हों, सिद्ध महापुरुष हों, विरक्ति हों और चाहे बहुत बड़े विज्ञानी ही क्यों न हों पर श्री राम के भजन के बिना वे भी भव सागर से पार नहीं हो सकते क्यों की वे तारण हार हैं, उन्होंने बहुतों को तारा है। ....  समाचार पढ़ें
नित्य मानस कथाः श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं, रघुपति भगति बिना सुख नाहीं रामवीर सिंह ,  Sep 16, 2017
भुशुण्डिजी कह रहे हैं कि गरुड़जी! भगवान शिव (जो जगद्गुरू हैं), ब्रह्माजी (सृष्टि के रचयिता), शुकदेवजी (भगवान व्यास के गर्भज्ञानी पुत्र ), सनकादिक मुनि (जो आदिज्ञानी हैं और ब्रह्माजी के पुत्र हैं), देवर्षि नारद (जो भगवान के मन कहे जाते हैं) तथा अन्य ब्रह्मतत्व में लीन निपुण मुनिजन, सभी एक मत से स्वीकार करते हैं कि संसार सागर को पार करने के लिए और आनन्द सिंधु में डुबकी लगाने के लिए "करिअ राम पद पंकज नेहा"। ....  समाचार पढ़ें
नित्य मानस कथाः एहि बिधि सकल जीव जग रोगी, सोक हरष भय प्रीति बियोगी रामवीर सिंह ,  Sep 15, 2017
व्यक्ति में सही सही आत्मावलोकन की शक्ति पैदा करने की सामर्थ्य केवल सनातन वैदिक धर्म के पास है। जब व्यक्ति अपनी आंतरिक वृत्तियों का अवलोकन दृढ़ता से निष्पक्ष होकर करेगा तो संभव है कि समझ पड़े कि मुझे जो भौतिक उपलब्धि हुई है,उसमें मेरी इच्छा और यत्न का कारण कुछ और ही है। मेरी इतनी क्षमता नहीं थी। जिस परिवेश में जन्म मिला,जीवन में जैसे लोग मिले ,जो कार्यक्षेत्र मिला ,वह सब मेरे स्वयं के प्रयत्न से नहीं वल्कि मेरी जन्मजन्मांतर की पोषित वृत्ति के अनुरूप ही मिला है।मेरी पात्रता पहले ही आकलित की जा चुकी है। मैं कुछ मानसिक रोग साथ लाया हूँ। ....  समाचार पढ़ें
नित्य मानस कथाः मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला, तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला रामवीर सिंह ,  Sep 14, 2017
गरुड़जी ने सात प्रश्न किए थे। छ: प्रश्नों के उत्तर देने के बाद अब मानस रोग संबंधित सातवें प्रश्न का उत्तर भुशुण्डिजी दे रहे. भुशुण्डिजी कह रहे हैं कि व्यक्ति के दुख का कारण कोई अन्य व्यक्ति या वस्तु नहीं है। मानस रोग ही दुख के कारण हैं। फिर ये रोग अथवा ब्याधि क्या हैं ? तो कहते हैं "मोह सकल ब्याधिन कर मूला"। अर्थात मोह (अज्ञान ) से ही सारे मानस रोग उत्पन्न होते हैं। ....  समाचार पढ़ें
नित्य मानस चर्चा: पर उपकार बचन मन काया, संत सहज सुभाउ खगराया रामवीर सिंह ,  Sep 13, 2017
दूसरों की निंदा करने से बड़ा पाप नहीं है। जब हम किसी की बुराई देखते या सुनते हैं तो वे बुराइयॉं हमारे नेत्रों या कानों से हमारे मन वुद्धि में पहुँच कर अपने कलुष की छाप छोड़ जाती हैं। हम अगर बाहर कीचड़ से होकर आऐं और घर में घुसें तो कीचड़ के निशान घर में भी पहुँच जाऐंगे ही। हम सब कोई इतने जागरूक तो सदा रहते नहीं हैं कि बाहर की सुनी बात का हम पर कुछ असर नहीं हो। बुराई तो समाज में चारौ तरफ भरी पड़ी है। कहीं से भी घुस पड़ेगी। ....  समाचार पढ़ें
मानस मीमांसाः बाल्मीकि रामायण व रामचरित मानस में मूल अन्तर दिनेश्वर मिश्र ,  Sep 16, 2017
बाल्मीकिजी राम के समकालीन थे। उन्हें कहीं- कहीं दशरथ के मंत्रियों के समूह में सम्मिलित होना भी बताया गया है। अतः वे सर्वश्रेष्ठ राजा के रूप में राम को सर्व सद्गुण-संपन्नता के साथ अधिष्ठापित करते हैं। किन्तु गोस्वामीजी का मुख्य उद्देश्य राम की ईश्वरता की ओर श्रोता का ध्यान आकृष्ट करना रहा है। बाल्मीकि के राम अनुकरणीयता की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ हैं । ....  लेख पढ़ें
मानस मीमांसाः तुलसीदास के राम ब्यक्ति नहीं ब्रह्म, पूज्य व आराध्य, ऐतिहासिक दृष्टि दिनेश्वर मिश्र ,  Sep 15, 2017
दक्षिण तो दक्षिण, उत्तर में भी राम निर्विवाद नहीं हैं । यहाँ भी उन्हें एक ओर वर्ण-ब्यवस्था के आधार पर आलोचना का विषय बनाया जा रहा है। राम शुद्र बिरोधी और ब्राह्मणवादी हैं. कोई आश्चर्य नहीं होगा कि कुछ दिनों के बाद ब्राह्मणों को क्षत्रिय राम से विरत रहने की प्रेरणा दी जाय। श्रीराम को ब्राह्मण द्वेषी सिद्ध किया जाय ,क्योंकि उन्होंने महा विद्वान रावण का बध किया था। तब राम किसके पूज्य व आराध्य रह जायेंगे?यह सब ऐतिहासिक दृष्टि की देन है। ....  लेख पढ़ें
मानस मीमांसाः श्री राम और श्री कृष्ण लीला उतनी सत्य जितना यह जगत दिनेश्वर मिश्र ,  Sep 14, 2017
महाभारत के मुख्य नायक पांडव हैं और प्रतिद्वंद्वी उनके ही बन्धु कौरव हैं। दोनों राज्य के लिए संघर्ष करते हुए, करोड़ों ब्यक्तियों को कट जाने देते हैं। रामचरितमानस में बन्धुत्व के आदर्श राम और भरत हैं, जो एक दूसरे के लिए राज्य का परित्याग करने में संतोष का अनुभव करते हैं। स्वभावतः संघर्ष -प्रिय मानव मन, कौरवों-पांडवों के चरित्र को अपना आदर्श मान लेता है। ....  लेख पढ़ें
मानस मीमांसाः निज अनुभव अब कहौं खगेसा, बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा दिनेश्वर मिश्र ,  Sep 12, 2017
भक्ति में भगवान के दर्शन भी हो सकते हैं--यह भक्ति की विशेषता है, जबकि ज्ञान की परानिष्ठा होने पर भी भगवान के दर्शन नहीं होते। रामायण में भी भक्ति को मणि की तरह बताया है किन्तु ज्ञान को तो दीपक की तरह बताया है। दीपक को तो जलाने में घी, बत्ती आदि की जरूरत होती है और हवा लगने से वह बुझ भी जाता है, पर मणि को न तो घी, बत्ती की जरूरत है और न ही वह हवा से बुझती ही है ....  लेख पढ़ें
मानस मीमांसाः निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहिं कपट छल छिद्र न भावा दिनेश्वर मिश्र ,  Sep 11, 2017
एक तो ज्ञान का, पुरुषार्थ का मार्ग है, जिससे हम बुद्धि को निर्मल बनायें। पर तुलसीदासजी तो नन्हें बालक की तरह हैं। वे मानते हैं कि अगर बड़ा बालक हो, तो उसे अपनी गन्दगी तो धोना ही पड़ेगा, क्योंकि ब्यक्ति तो मल का ही बना है- गंदगी दूर करने के लिए पहले कपड़े को साबुन से धोएँ और बाद में स्वच्छ जल से कपड़े में लगे साबुन को धोएँ। इसी तरह से साधना और सत्कर्म से मलिनता को धोने के उपरान्त फिर साधन को भी धो डालिए। और वह भी शुद्ध जल से । ....  लेख पढ़ें
मानस मीमांसाः अस संजोग ईस जब करई, तबहुँ कदाचित सो निरुअरई दिनेश्वर मिश्र ,  Sep 09, 2017
विचार तो मथानी है। मथानी चलाइए, यह तो बिल्कुल ठीक है, लेकिन यह तो देख लीजिए कि आप मथानी चला कहाँ रहे हैं? आप पानी में मथानी चलाते रहिए,दिन रात परिश्रम करते रहिए तो भी उस पानी से मक्खन निकलेगा क्या? इसलिए अंतःकरण में यदि केवल पानी भरा हो, तो फिर विचार मंथन से क्या निकलेगा। और अगर वह पानी गंदा हो तो मंथन से उभर कर गंदगी ही तो ऊपर आयेगी। ....  लेख पढ़ें
मानस मीमांसा, सुंदर कांडः तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहु नहिं विश्राम दिनेश्वर मिश्र ,  Sep 08, 2017
तथ्य तो यह है कि जीव सबसे बड़ा है पर जीवन की सच्चाई में ऐसा दिखाई दे रहा है कि जीव जो है अपने शरीर के साथ, अपनी इन्द्रियों के साथ विषयों का गुलाम हो गया है। ऐसा षड़यंत्र विचित्र हो गया कि जो स्वामी था, वह बेचारा सेवक हो गया है। और बेचारा निरंतर दुःख अनुभव कर रहा है, वासना और अतृप्ति का अनुभव कर रहा है। जीव के अंतःकरण में फिर मोह, अहंकार आदि की प्रबृत्तियाँ आ जाती हैं। ....  लेख पढ़ें
मानस मीमांसा: पुनि रघुबीरहिं भगति पियारी, माया खलु नर्त्तकी बिचारी दिनेश्वर मिश्र ,  Sep 07, 2017
अंतःकरण में संसारिक "भय” के संस्कार इतने प्रबल होते हैं कि उनसे ऊपर उठकर भगवान तक जाना, जीव के लिए संभव नहीं। किन्तु भगवान, रुष्ट नहीं हो जाते हैं। अपितु उन्होंने अनुभव किया कि, मुझे उनको अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए भय के उन निमित्त कारणों को भी समाप्त करना होगा, जो जीव और ईश्वर के बीच ब्यवधान बने हुए हैं। ....  लेख पढ़ें
मानस मीमांसा: कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं, चारु चरित नाना बिधि करहीं दिनेश्वर मिश्र ,  Sep 06, 2017
भगवान शिव में परम तत्त्वज्ञ के रूप में ब्रह्म के निर्गुण-निराकार स्वरूप का बोध है। अचानक उनके अंतःकरण में एक संकल्प जाग्रत हुआ--”कितना अच्छा हो कि यह निर्गुण निराकार ब्रह्म, सगुण साकार बनकर विश्व में अवतरित हो और ऐसा चरित्र प्रस्तुत करे जो लोक-मंगल के लिए आदर्श बन जाए!! ”वह आदर्श लीला कौन सी हो सकती है,इसकी एक रूप-रेखा उनके अन्तर्मन में बनी। यह स्फुरणा ही राम-चरित्र का मूलसूत्र बन गयी। ....  लेख पढ़ें
मानस मीमांसा- कहु खगेस अस कवन अभागी, खरी सेव सुरधेनुहिं त्यागी दिनेश्वर मिश्र ,  Sep 05, 2017
ऐसा कौन अभागा ब्यक्ति होगा जो कामधेनु को छोड़कर गधी का सेवन करे? इसका अभिप्राय यह है कि उन्होंने विद्या के दो रूप दिए। इसमें एक विद्या तो कामधेनु की तरह है तथा दूसरी गधी की तरह। गधे पर अगर चंदन की लकड़ी लाद दिया जाय तो ढो देगा और कूड़ा-कर्कट लाद दिया जाय तो वह भी ढो देगा। ....  लेख पढ़ें
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