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साहित्यिक सम्मान और संशय

सुजाता शिवेन , Oct 22, 2018, 10:10 am IST
Keywords: Literary awards  Nobel dispute  नोबेल पुरस्कार  साहित्यिक सम्मान  
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साहित्यिक सम्मान और संशय
कुछ साल पहले की बात है. भारतीय भाषा की एक साहित्यकार ने, जिन्हें तब तक ज्ञानपीठ पुरस्कार भी नहीं मिला था, दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में निजी बातचीत में यह दावा किया था कि वह ज्ञानपीठ न्यास में अपने संबंधों को लेकर इतनी आश्वस्त हैं कि उन्हें न केवल यह पुरस्कार मिल जाएगा, बल्कि वह नोबेल पुरस्कारों को भी प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं, और उम्मीद है एक न एक दिन वह ज्ञानपीठ, और उसके बाद नोबेल पुरस्कार जीत ही लेंगी. उस समय उनकी बात पर बड़ा अचरज हुआ था, और लगा था कि वह अपने प्रभाव का दंभ जताने के लिए दूर की हांक रही हैं. पर उनका दावा इतना बड़ा था कि जिज्ञासा हुई कि यह कैसे संभव है? ज्ञानपीठ और नोबेल, दोनों ही काफी बड़े, लंबी प्रक्रियाओं वाले, कमोवेश तब तक के निर्विवादित पुरस्कार थे. मेरा तर्क और जहां तक मेरी जानकारी थी, मुझे लगता था इन सम्मानित पुरस्कारों की चयन समिति को प्रभावित करना असंभव है. पर उनका दावा था, यह हमारी गलतफहमी है. उनका कहना था कि वह पहले से ही ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता और उस समय के एक ऐसे प्रभावशाली न्यासी के संपर्क में हैं, जिस पर इस पुरस्कार के चयन पर मुहर लगाने की जिम्मेदारी है. वह उस महानुभाव की महत्त्वाकांक्षा को अंतर्राष्ट्रीय उड़ान दे इस बात का भरोसा दिला चुकी हैं, कि अगर उन्हें ज्ञानपीठ मिल गया, तो वे उस न्यासी लेखक के साथ संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कारों के लिए लॉबिंग करेंगी, और सब कुछ ठीक रहा तो एक दिन संयुक्त रूप से ही सही दोनों उसे पा लेंगे. यह पूछे जाने पर कि ज्ञानपीठ तक तो समझ आ गया पर स्वीडिश अकादमी को वह कैसे प्रभावित कर पाएंगी, उन्होंने खुलासा किया कि वह अपने प्रांत के एक ऐसे व्यक्ति के संपर्क में हैं, जिसने स्वीडन के नोबेल पुरस्कार के न्यासियों वाले 'ब्लू-ब्लड' खानदान की लड़की से शादी की है और सांस्कृतिक प्रतिनिधि की हैसियत में वह स्वीडिश अकादमी के चयन समिति के सदस्यों को प्रभावित कर सकने की हैसियत रखता है. तब बात आई, गई हो गई. यहां तक कि जब कुछ ही साल पहले उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिले, और कालांतर में वह ज्ञानपीठ न्यास में स्वयं प्रभावशाली पद पर पहुंच गईं, तब भी उनकी यह बात दिमाग में नहीं आई कि देश और दुनिया के इतने प्रतिष्ठित पुरस्कारों को प्रभाव, संबंधों, लॉबिंग और लक्ष्य बनाकर साधा जा सकता है.
 
पर अब, न जब साहित्य के नोबेल पुरस्कार इस साल विवादों के चलते नहीं दिए जा रहे हैं, और उसमें व्याप्त अराजकता का खुलासा हो चुका है, तब उनकी यह बात अचानक से याद आ गई. ऐसे में यह सवाल उठता है कि योग्यता पर खेमेबंदी क्या इस तरह हाबी है कि वह साहित्यिक पुरस्कारों की मर्यादा को तार-तार कर उन्हें गर्त में डूबा रही है. वाकई कभी निर्विवाद,  और सर्वश्रेष्ठ लगने वाले इन पुरस्कारों की चयप्रक्रिया अपने दुरूह दिखने वाले रूप में भी कितनी खोखली हो चुकी है. साहित्य के नोबेल पुरस्कार इस साल तो नहीं ही दिए जा रहे, ये अगले साल भी दिए जाएंगे या नहीं, अभी तक तय नहीं है. हालांकि अकादमी के इतिहास में पहले भी ये पुरस्कार टाले गए थे, पर इस बार का कारण ज्यादा गंभीर है. इस बार पुरस्कारों पर यौन शोषण से जुड़े भ्रष्टाचार और विवाद की छाया है. पुरस्कार देने वाली समिति में भगदड़ मची है और स्वीडिश अकादमी के संविधान के मुताबिक निर्धारित संख्या में इतने सदस्य बचे ही नहीं हैं कि पुरस्कारों की घोषणा की जा सके. इससे इस पुरस्कार के गरिमामयी इतिहास, 232 साल पुराने सांस्कृतिक संगठन के अस्तित्व और इसके प्रतिष्ठाता अल्फ्रेड नोबेल की 'आदर्शवादी' सोच पर भी खतरा पैदा हो गया है. हालांकि स्वीडिश अकादमी ने मई में ही इस बात की घोषणा कर दी थी कि इस साल 2018 के साहित्य के नोबेल पुरस्कार नहीं दिए जाएंगे, पर इसे साल 2019 में एक साथ दिया जा सकता है. अकादमी के स्थायी सचिव एंडर्स ओल्सन ने तब कहा था, ‘हमने पाया है कि अगले साहित्यकार के नाम की घोषणा से पहले जनता का विश्वास जीतने के लिए समय देने की जरूरत है.’ बाद में संस्था के निदेशक लार्स हीकेंस्टन ने एक रेडियो को दिए साक्षात्कार में खुलासा किया कि साहित्य के नोबेल पुरस्कारों के लिए 2019 तक कि कोई समय सीमा नहीं है. अकादमी यदि अपनी समस्याएं नहीं सुलझा पाई तो नोबेल संस्था इसकी देख रेख के लिए एक नई संस्था की भी नियुक्त कर सकती है. इसके बाद यदि इसके कानून में किसी प्रकार के संशोधन की आवश्यकता हुई तो वह संस्था इसमें संशोधन भी करेगी. जाहिर है इस प्रक्रिया में वक्त लगेगा. 
 
दरअसल साल 1786 में स्थापित स्वीडन की साहित्यिक नोबेल पुरस्कार अकादमी के नियम सदियों पुराने तो हैं ही, इतने कठोर, लोकतांत्रिक और अनुशासित दिखते रहे हैं कि इनमें घपले की गुंजाइश नहीं के बराबर लगती थी. यह 18 उम्रदराज़ लोगों का एक बहुत ही सम्मानित समिति थी. 1901 से हर साल अक्टूबर में यही समिति साहित्य जगत के किसी एक, या कभी-कभी एक से अधिक नोबेल पुरस्कार विजेता की घोषणा करती थी. पुरुष और महिलाएं दोनों इसके सदस्य थे, और यह सदस्यता आजीवन थी. न तो कोई अपनी सदस्यता त्याग सकता था और न ही किसी की सदस्यता छीनी जा सकती थी. यहां तक कि उस सदस्य की मृत्यु के बाद उसका घोषित उत्तराधिकारी स्वतः इसका सदस्य बन जाता रहा. स्वीडन के राजा इसके संरक्षक रहते रहे. इस समय राजा कार्ल 16 गुस्ताफ़ इसके संरक्षक हैं. हर सदस्य को उसके नाम के बदले उसके बैठने की कुर्सी के नंबर से जाना जाता है. अकादमी से नाराज कोई सदस्य अधिक से अधिक यही कर सकता रहा कि उसकी बैठकों में भाग लेना बंद कर दे. तब भी उसके जीते-जी उसकी खाली कुर्सी किसी और को नहीं दी जा सकती थी. फैसला लेने की प्रक्रिया इतनी लोकतांत्रिक थी कि किसी भी फैसले के लिए 18 में से कम से कम 12 सदस्यों की उपस्थिति आवश्यक रही. इसी अकादमी की कुर्सी नंबर 18 पर लेखिका और कवियत्री कतरीना फ्रोस्तेन्सोन  बैठती रहीं, जो फ्रांसीसी मूल के फोटोग्राफर और स्वीडन में सांस्कृतिक माफिया की हैसियत हासिल कर चुके जौं-क्लूद अर्नौ की पत्नी हैं. 
 
71 वर्षीय जौं-क्लूद अर्नौ का ‘कल्चरल फ़ोरम’ साहित्यिक संध्याएं और महोत्सव आयोजित करता था और स्वीडिश अकादमी उसे अनुदान भी देती रही है. नवंबर 2017 में यौन शोषण का खुलासा करने वाले '#मी टू' कैंपेन के तहत स्वीडन की 18 महिलाओं ने अर्नो पर यौनदुराचार के गंभीर आरोप लगाते हुए खुलासा किया कि उनके साथ दुराचारों का क्रम 1996 से चल रहा था. इन महिलाओं का आरोप था कि उनका यौन शोषण अर्नो के ‘कल्चरल फ़ोरम’ परिसर, स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम और पेरिस स्थित ऐसे फ्लैटों में हुआ, जिसे स्वीडिश अकादमी ने ही अर्नो को उपलब्ध कराए थे. यही नहीं जौं-क्लूद अर्नौ ने सात बार साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेताओं के नाम औपचारिक घोषणा से पहले ही लीक कर दिए, पर उसका कोई बाल बांका नहीं हुआ. इन आरोपों के बाद अकादमी ने 23 नवंबर 2017 को बैठक बुलाकर जौं-क्लूद अर्नौ के साथ सारे संबंध तोड़ने की घोषणा के साथ एक जांच समिति बना दी कि अकादमी द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कारों, अनुदानों और छात्रवृत्त्तियों पर इस व्यक्ति का कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव तो नहीं रहा था. इस बैठक में अकादमी दो गुटों में बंट गई. एक गुट 18 नंबर की कुर्सी पर बैठने वाली जौं-क्लूद अर्नौ की पत्नी कतरीना फ्रोस्तेन्सोन का पक्षधर हो गया, तो दूसरा विरोधी गुट अकादमी की मुखिया सारा दानियुस का समर्थन करने लगा. इसके बाद से अकादमी की बैठकों के विवाद का आलम यह है कि कभी कोरम पास कराने भर सदस्य भी नहीं जुटे. अकादमी के आधा दर्जन सदस्य एक ही सप्ताह के भीतर अपनी-अपनी कुर्सियां खाली कर चुके हैं. दो कुर्सियां पहले से ही ख़ाली थीं. यानी ख़ाली कुर्सियों की कुल संख्या बढ़ कर आठ हो गई और अकादमी के सदस्यों की कुल संख्या 18 से घटकर मात्र 10 रह गई. इस असाधारण स्थिति के कारण ही शेष बचे 10 सदस्यों ने चार मई की अपनी बैठक में यह निर्णय लिया था कि साल 2018 में साहित्य का नोबेल पुस्कार नहीं दिया जा सकता. 1901 में नोबेल पुरस्कारों की परंपरा शुरू होने के बाद से कुल सात बार साहित्य के नोबेल पुरस्कार नहीं दिये जा सके थे. ये साल थे 1914, 1918, 1935, 1940, 1941, 1942 और 1943 में. 1914 और 1918 में प्रथम विश्वयुद्ध चल रहा था. 1940 से 1943 के बीच द्वितीय विश्वयुद्ध अपने चरम पर था. योग्यता, पक्षपात, लोकप्रियता, प्रभाव के विवाद पहले भी उठे थे, पर पहली बार सेक्स स्कैंडल साहित्य को प्रभावित कर रहा. यह दुखद स्थिति है. हालांकि स्वीडन के राजा ने जल्द ही इस समस्या के समाधान की उम्मीद जताई है, पर वह उस साख को कहां से बचाएंगे, जो डूब चुकी? फिर स्वीडिश अकादमी तो यह कोशिश कर भी रही, क्योंकि उसे वहां के राजा का संरक्षण प्राप्त है. भारतीय ज्ञानपीठ में तो भाई-भतीजावाद चरम पर है, ऐसे में हालफिलहाल वहां ऐसा होगा कहना मुश्किल है. शायद इस प्रतिष्ठित संस्था को भी किसी #मी टू जैसे कंपेन के झटके की जरूरत है. तब तक इंतजार करिए.
सुजाता शिवेन
सुजाता शिवेन Writer, Translator and feature coordinator JantaJanardan and FacenFacts

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