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मैं हिंदुस्तान हूं, मैं शर्मसार हूं!

मैं हिंदुस्तान हूं, मैं शर्मसार हूं! एक देश और उसके नागरिक के रूप में यह देखना कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि बलात्कार जैसे घातक अपराध का भी जातीय-धार्मिक विभाजन हो रहा. उन्नाव हो या कठुआ, दिल्ली हो या पटना, निर्भया हो या आसिफा, बेटियां कब, कैसे और क्यों इस दायरे में बंट गईं समझ नहीं आ रहा. अगर यह सियासत से आया, तो और भी गलत है. फिर तो हमें इस व्यवस्था की जरूरत भी क्या? 'मैं हिंदुस्तान हूं, मैं शर्मसार हूं!' यह कोई नारा ही नहीं बल्कि वह हकीकत है जिससे हर रोज संवेदनशील भारतीय मन आहत है. आखिर क्यों है ऐसा कि हम अब भी पाशविक प्रवृत्ति से बंधे हैं?

'पिछले दो दिनों से जो घटनाएं चर्चा में हैं वह किसी भी सभ्य समाज में शोभा नहीं देती हैं, ये शर्मनाक हैं. एक समाज के रूप में, एक देश के रूप में हम सब इसके लिए शर्मसार हैं.' कठुआ और बलात्कार कांड पर उठे बवाल के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंततः इन शब्दों के साथ अपनी चुप्पी तोड़ी. इसके बाद उद्वेलित लोगों को आश्वस्त करते हुए उनके शब्द थे, 'देश के किसी भी राज्य में, किसी भी क्षेत्र में होने वाली ऐसी वारदातें, हमारी मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देती हैं. पर मैं देश को विश्वास दिलाना चाहता हूं कि कोई अपराधी नहीं बचेगा, न्याय होगा और पूरा होगा. हमारी बेटियों को न्याय मिलकर रहेगा...    गुनहगारों को सख़्त से सख़्त सज़ा हो ये हम सबकी ज़िम्मेदारी है और भारत सरकार इस ज़िम्मेदारी को पूरा करने में कोई कोताही नहीं होने देगी, ये मैं देशवासियों को विश्वास दिलाता हूं.' प्रधानमंत्री का यह बयान उनकी भारतीय जनता पार्टी की बड़बोली प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी के ठीक एक दिन पहले दिए गए बयान से ठीक उलट था, जिसमें उन्होंने जम्मू-कश्मीर के कठुआ में आठ साल की एक बच्ची के साथ हुए पाशविक बलात्कार और उसकी हत्या, तथा उत्तर प्रदेश के उन्नाव में उन्हीं की पार्टी के एक विधायक के बलात्कार कांड पर मचे बवाल के लिए मीडिया और विपक्ष को दोषी ठहराया था.

अफसोस की उन्नाव और कठुआ बलात्कार मामलों को लेकर पूरा देश उबल रहा था. सोशल मीडिया पर सेलिब्रिटी सितारों से लेकर सड़क पर विरोध हो रहा था. कांग्रेस ने पीड़ितों के लिये न्याय की मांग को लेकर कैंडल मार्च निकाला था, जिसमें उसके अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी भी शरीक हुए थे. संभवतः इसीलिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री की देर से की गई टिप्पणी पर ट्विटर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से चुटकी लेते हुए पूछा कि, ‘‘प्रिय प्रधानमंत्री जी. आपकी लंबी चुप्पी तोड़ने के लिए शुक्रिया. आपने कहा कि हमारी बेटियों को न्याय मिलेगा. भारत जानना चाहता है कि कब?’’  कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक सिंघवी ने इससे ठीक पहले कहा था कि ‘‘मैं उस पार्टी की कड़ी निंदा करता हूं जो बलात्कार को धर्म और वर्ग के आधार पर देखती है. बलात्कार को धर्म के चश्मे से देखने वाले व्यक्ति, पार्टी और सरकार की आलोचना होनी चाहिए.’’ कांग्रेस ने भी ट्विटर पर कहा था, ‘‘ भाजपा की सांसद मीनाक्षी लेखी की संवेदनहीन टिप्पणी अपने अधिकारों के लिए खड़े होने वाले भारतीय नागरिकों का अपमान है. उनका बयान उनकी पार्टी की प्रतिगामी विचारधारा का द्योतक है. उनको अपने शब्द वापस लेने चाहिए और माफी मांगनी चाहिए.’’

याद रहे कि कठुआ और उन्‍नाव रेप केस को लेकर विपक्ष के लगातार हमलों का जवाब देते हुए भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने शुक्रवार को प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में कहा था कि उन्‍नाव की घटना 10 महीने पहले की है. पुलिस ने मजिस्‍ट्रेट के सामने बयान लिया. इसमें पीड़िता ने विधायक का नाम नहीं लिया था. मीनाक्षी लेखी ने कहा था कि पीड़ित महिला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सीएम योगी आदित्‍यनाथ को चिट्ठी लिखी और इसमें विधायक पर आरोप लगाए, फिर कार्रवाई हुई. कठुआ रेप केस पर उनका कहना था कि निष्‍पक्ष जांच हुई है. एसआईटी ने छह से सात लोगों को गिरफ्तार किया है. अब आइए देखते हैं कि दोनों मामले थे क्या? और प्रशासन ने किस तरह इसे शुरुआत में काफी हलके से लिया था. शुरुआत उन्नाव की घटना से ही करते हैं, क्योंकि वह पुराना वाकिया है. हुआ यह था कि 4 जून 2017 को पीड़िता ने आरोप लगाया कि कि इस दिन भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर और उनके लोगों ने उसके साथ गैंगरेप किया. इस हादसे के बाद 11 जून को पीड़िता अपने घर से गायब हो गई. 12 जून को उसकी मां ने गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई. पुलिस ने कार्रवाई करते हुए पीड़िता को औरेया से बरामद किया. इसके बाद उसे कोर्ट में पेश किया गया. जज के सामने धारा 164 के तहत उसका बयान दर्ज कराया गया.

30 जून को पीड़िता के चाचा उसे लेकर दिल्ली गए. वहां पीड़िता ने अपनी चाची को इस घटना के बारे में बताया. इसी बीच 1 अगस्त को उन्नाव पुलिस ने इस मामले में कोर्ट में चार्जशीट फाइल कर दी. इसके बाद पुलिस ने दो लोगों को गिरफ्तार किया. 17 अगस्त को दिल्ली से उन्नाव वापस आकर पीड़िता ने पहली बार गैंगरेप से संबंधित तहरीर थाने में दी. पुलिस ने जांच के बाद जज के सामने धारा 164 के तहत उसका बयान दर्ज कराया. कहा जा रहा है कि इस बयान में पीड़िता ने आरोपी विधायक का नाम नहीं लिया था. पर वह लगातार प्रशासन से विधायक की गिरफ्तारी की मांग कर रही थी. 3 अप्रैल 2018 को पीड़िता के पिता से साथ मारपीट की गई. जेल में पेट दर्द की शिकायत और खून की उल्टियां करने के बाद उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनकी मौत हो गई. आठ अप्रैल को जब पीड़िता ने मुख्यमंत्री कार्यालय के सामने आत्मदाह की कोशिश की और मामला मीडिया में उछला इसके बाद डीआईजी जेल लव कुमार और डीएम उन्नाव के इस मामले की जांच सौंपी गई. पर इस जांच की गंभीरता इसी से आंकी जा सकती है कि 12 अप्रैल को यूपी के डीजीपी ओपी सिंह ने कहा कि विधायकजी के खिलाफ दोष साबित नहीं हुआ है. उनके खिलाफ सिर्फ आरोप लगा है. पीड़िता की मां की तहरीर के आधार पर उन पर आईपीसी की धारा 363, 366, 376, 506 और पॉक्सो कानून के तहत केस दर्ज किया गया है. पर उनको सिर्फ इस आधार पर गिरफ्तार नहीं किया जा सकता. वैसे भी केस की जांच की सिफारिश सीबीआई से कर दी गई है. वह तो 13 अप्रैल को उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट ने सीबीआई को सीधे-सीधे आरोपी विधायक को गिरफ्तार करने का आदेश देना पड़ा तब जाकर उसकी गिरफ्तारी हो सकी.

हमारा कहना है कि एक छोटी सी पर्ची पर लिखी तहरीर पर आम लोगों को तंग करने वाली पुलिस ने बलात्कार के आरोपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के खिलाफ इतनी नरमी क्यों बरती? बलात्कार पीड़ितों के हक की मांग करने वाले इसमें जातिगत पहलू देखते हैं. मुख्यमंत्री, पुलिस प्रमुख और विधायक एक ही जाति के हैं. फिर विधायक दबंग भी है. आजादी के बाद से ही अपने गांव की राजनीति पर उसके परिवार का कब्जा रहा है. विरोधियों को पटखनी देने के लिए कुलदीप ने तमाम मोहरे तैयार किए थे. पीड़ित परिवार के लोग भी कभी उसके मोहरे थे. कुलदीप सिंह सेंगर ने 2007 में चुनावी घोषणा पत्र में संपत्ति 36 लाख बताई थी, पर 2012 में उसकी संपत्ति एक करोड़ 27 लाख और 2017 के चुनावी घोषणा पत्र के मुताबिक, 2 करोड़ 14 लाख तक पहुंच गई. भाजपा का यह आरोपी विधायक राजा भैया गुट का अहम सदस्य है. उसके ऊपर अवैध खनन और अवैध तरीके से टोल लगाकर वसूली करने का भी आरोप लग चुका है. उन्नाव में एक चैनल के रिपोर्टर ने आरोपी विधायक के खिलाफ अवैध खनन की खबर दिखा दिया तो रिपोर्टर के खिलाफ ही दो मुकदमे दर्ज करा दिये गए. कहते हैं उन्नाव का कोई भी ठेका बिना कुलदीप सेंगर की मर्जी के किसी को नहीं मिल सकता है. साइकिल के ठेके से लेकर अवैध होटल चलाने और ऑटो स्टैंड से लेकर गाड़ियों से अवैध वसूली तक के कारोबार में विधायक का परिवार शामिल है. भले ही सीबीआई ने उसे अपनी हिरासत में ले लिया हो पर सत्ता, जाति और धन के मद में वह जमीन पर आएगा इसकी संभावना कम है.

कठुआ की घटना तो और भी शर्मनाक है. आठ साल की एक मासूम बच्ची जो दायां हाथ और बायां हाथ न पहचानती हो, उसके बर्बर बलात्कार और हत्या को हिंदू-मुस्लिम करार दिया गया. जबकि हुआ यह था कि जम्मू कश्मीर के कठुआ ज़िले में एक शर्मनाक घटना घटी. आठ साल की एक बच्ची के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया और फिर उसकी जघन्य तरीके से हत्या कर दी गई. पर बात सिर्फ यहीं ख़त्म नहीं हुई. इस मामले को लेकर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं पुलिस, राजनेताओं, कुछ संगठनों और वकीलों की ओर से दी गईं उसने संवेदनहीनता के नए प्रतिमान स्थापित किए. इस जघन्य हत्याकांड की शुरुआत 10 जनवरी को हुई थी. इस दिन कठुआ ज़िले की हीरानगर तहसील के रसाना गांव की एक लड़की गायब हो गई. यह लड़की बकरवाल समुदाय की थी जो एक ख़ानाबदोश समुदाय है. इसका ताल्लुक मुस्लिम धर्म से है. परिवार के मुताबिक यह बच्ची 10 जनवरी को दोपहर क़रीब 12:30 बजे घर से घोड़ों को चराने के लिए निकली थी और उसके बाद घर वापस नहीं लौट पाई. घरवालों ने जब हीरानगर पुलिस से लड़की के ग़ायब होने की शिकायत दर्ज करवाई तो पुलिस ने लड़की को खोजने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. फिर क़रीब एक सप्ताह बाद 17 जनवरी को जंगल में उस मासूम की लाश मिली. मेडिकल रिपोर्ट में पता चला कि लड़की के साथ कई बार कई दिनों तक सामूहिक दुष्कर्म हुआ था और पत्थरों से मारकर उसकी हत्या की गई थी. मासूम की लाश मिलने के बाद परिजनों ने इलाके में प्रदर्शन किया और आरोपियों को गिरफ़्तार करने की मांग की. बदले में उन्हें पुलिस की लाठियां खानी पड़ीं.

इसके बाद पूरे जम्मू कश्मीर में हंगामा हो गया. लोग हज़ारों की संख्या में सड़क पर निकलकर प्रदर्शन करने लगे. जम्मू कश्मीर विधानसभा में इस मासूम की हत्या और बलात्कार की गूंज कई दिनों तक सुनाई देती रही. विपक्ष के हंगामे के बाद सरकार ने सदन में बताया कि इस सिलसिले में पंद्रह साल के एक किशोर को गिरफ़्तार किया गया है. सदन में सरकार के बयान और पंद्रह वर्ष के किशोर की गिरफ़्तारी के दावे के बावजूद आठ साल की मासूम के असल गुनहगार की गिरफ़्तारी का मामला ज़ोर पकड़ता गया. 20 जनवरी को सरकार की ओर से थाने के एसएचओ को सस्पेंड कर दिया गया और मामले की मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए गए. फिर भी हंगामा नहीं थमा. इसके बाद जम्मू कश्मीर की महबूबा मुफ़्ती सरकार ने 23 जनवरी को मामले को राज्य पुलिस की अपराध शाखा को सौंप दिया था जिसने विशेष जांच दल का गठन किया और मामले की जांच शुरू हो गई.

जांच के दौरान अपराध शाखा ने इस पूरे मामले के जांच अधिकारी रहे सब इंस्पेक्टर आनंद दत्ता को गिरफ़्तार कर लिया. जांच आगे बढ़ी तो पता चला कि इस सामूहिक बलात्कार मामले में जम्मू कश्मीर का एक स्पेशल पुलिस अधिकारी दीपक खजुरिया भी शामिल है. 10 फरवरी को अपराध शाखा ने दीपक खजुरिया को भी गिरफ़्तार किया. धीरे-धीरे इस मामले में पुलिस ने कुल सात लोगों को गिरफ़्तार किया, जिनमें से एक के नाबालिग होने की बात कही गई. हालांकि बाद में अपराध शाखा के अधिकारियों के मुताबिक मेडिकल परीक्षण से यह पता चला कि जिस आरोपी को किशोर समझा गया था वह 19 साल का है.

पर इस मामले में संवेदनहीनता का एक बड़ा नमूना तब सामने आया जब 10 फरवरी को दीपक खजुरिया की गिरफ़्तारी के ठीक सात दिन बाद कठुआ में हिंदू एकता मोर्चा ने उनके समर्थन में रैली का आयोजन किया. प्रदर्शन में कथित तौर पर भाजपा के कुछ लोग भी शामिल थे. प्रदर्शनकारी हाथों में तिरंगा लेकर आरोपी की रिहाई की मांग कर रहे थे.इससे संबंधित कुछ वीडियो वायरल हुए थे, जिसमें कथित तौर पर भाजपा नेताओं ने कहा था कि क्राइम ब्रांच को किसी की गिरफ़्तारी से पहले सोचना होगा और यहां जंगल राज नहीं होगा. वीडियो में भाजपा नेता आंदोलन की धमकी देते भी सुनाई दिए.जब ये मुद्दा उछला तो सियासत इस क़दर हावी हुई कि सत्तारूढ़ पीडीपी और सहयोगी भाजपा के बीच तल्ख़ी बढ़ती गई. हालांकि भाजपा ने अपने विधायकों के स्टैंड से ख़ुद को अलग कर लिया और मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने भी किसी तरह से झुकने से इनकार कर दिया.कठुआ में रैली के बाद मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने ट्वीट किया, ‘मुझे इस बात का दुख है कि पकड़े गए आरोपी के समर्थन में कठुआ में एक रैली निकाली गई. रैली में तिरंगे भी लहराए गए. यह तिरंगे का अपमान है. क़ानून अपना काम करेगा.’हालांकि इसके बाद सारे आरोपियों को गिरफ़्तार करके पुलिस ने इसी महीने यानी 9 अप्रैल को आरोपपत्र दायर करना चाहा तो वकीलों के एक बड़े समूह ने इतना हंगामा किया कि 9 अप्रैल को आरोप पत्र दाख़िल नहीं हो पाया. फिर क्राइम ब्रांच ने क़ानून मंत्री के दख़ल के बाद 10 अप्रैल को आरोप पत्र दाख़िल किया. जम्मू के कठुआ की उस अभागी बच्ची का कसूर शायद लड़की होना भर था. उसके बलात्कार की घटना अब जम्मू-कश्मीर ही नहीं पूरे देश का एक बड़ा मसला बन गया है. पर क्या इसीदिन के लिए भारत आजाद हुआ था. क्या यही हमारी तरक्की है.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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