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देश बचेगा, तभी मिलेगा आपको अपना हक

देश बचेगा, तभी मिलेगा आपको अपना हक सोशल मीडिया पर एक संदेश घूम रहा है कि आरक्षण के विरोध में भारत बंद हो. इससे पहले दलित समाज ने सर्वोच्च न्यायालय के एससी-एसटी एक्ट में बिना जांच के गिरफ्तारी पर रोक को लेकर भारत बंद किया था. इस दौरान हिंसा में कई बेगुनाह लोग मारे गए. इसी तरह कावेरी नदी जल बंटवारे को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु की राजनीति भी गरम हो गई है. कर्नाटक में चुनाव होने वाले हैं और लोकसभा के आम चुनाव में भी कोई बहुत वक्त नहीं. ऐसे में सवाल उठता है कि कहीं इन सारे विवादों की जड़ में वोट की राजनीति तो नहीं.

...और अगर ऐसा है तो विरोध का यह संस्थागत रूप राष्ट्र के रूप में हमारी पहचान को लेकर बेहद खतरनाक है. संसद का यह पूरा सत्र बिना कामकाज के खत्म हुआ. 'विशेष राज्य का दर्जा' के लिए संसद भवन के अंदर और बाहर आंध्र प्रदेश के सांसदों ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर अभियान सा छेड़ रखा था. आंध्र प्रदेश में सत्तारूढ़ और केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार में सहयोगी एन चंद्रबाबू नायडु की अगुआई वाली तेलुगु देशम पार्टी ने इस मसले पर एनडीए से गठबंधन तोड़ लिया. उसके दो केंद्रीय मंत्रियों ने सरकार से इस्तिफा दे दिया, तो सांसदों और राज्य के विधायकों ने सामूहिक इस्तीफे की धमकी दे दी.

विभाजन की इस होड़ में अगर हम केवल इसी एक मांग पर आज की बात को केंद्रित करें तो हमें यह जानना होगा  कि आखिर इस विशेष राज्य के दर्जे में ऐसा क्या है, कि कोई भी राज्य जब-तब इस मांग को उठा कर सियासत करने लगता है? और फिर आंध्र प्रदेश के लिए अभी यह इतना महत्त्वपूर्ण क्यों बन गया है?

दरअसल देश जब आजाद हुआ तो सभी इलाकों के त्वरित विकास के लिये पंचवर्षीय योजना बनाई गई. केंद्र और राज्य की भागीदारी तय की गई, पर हकीकत यह थी कि तीसरी और चौथी पंचवर्षीय योजना यानी 1961-66 और 1966-1969 तक केंद्र के पास राज्यों को अनुदान देने का कोई निश्चित फॉर्मूला नहीं था. उस समय तक सिर्फ केंद्रीय योजना आधारित अनुदान ही दिए जाते थे, पर इससे राज्यों के विकास को वह गति नहीं मिल रही थी, जिसकी उन्हें जरूरत थी. कुछ राज्यों में तेजी से विकास होने लगा, तो कुछ पिछड़ने से लगे. 'विशेष श्रेणी के राज्य' का मुद्दा सबसे पहले राष्ट्रीय विकास परिषद की अप्रैल 1969 की बैठक में गाडगिल फार्मूला के अनुमोदन के समय सामने आया. पांचवें वित्त आयोग ने इसे मान लिया और इसके तहत सबसे पहले जिन तीन राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा दिया गया, वे थे असम, नागालैंड और जम्मू-कश्मीर. इसका आधार था इन राज्यों का पिछड़ापन, दुरूह भौगोलिक स्थिति और वहां व्याप्त सामाजिक समस्याएं.

उस समय गाडगिल फार्मूले के तहत विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने के लिए जो मानक तय किये गये, उनमें संबंधित राज्य में पहाड़ी इलाका और दुर्गम क्षेत्र, आबादी का कम घनत्व एवं आदिवासी आबादी की बहुलता, पड़ोसी देशों से लगी सामरिक सीमा, आर्थिक एवं आधारभूत संरचना में पिछड़ापन, प्रति व्यक्ति आय और गैर कर राजस्व का कम होना और राज्य में आय की प्रकृति का निधारित नहीं होना शामिल है. इसी के आधार पर बाद के वर्षों में पूर्वोत्तर के बाकी पांच राज्यों के साथ कुल मिलाकर अब तक ग्यारह राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा दिया गया है. ये राज्य हैं-  अरूणाचल प्रदेश, असम, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, सिक्किम, मणिपुर, मेघालय, नगालैण्ड, त्रिपुरा, उत्तराखंड और मिजोरम. पर धीरे-धीरे विशेष राज्य की मांग प्रांत और उसके नागरिकों की जरूरत से ज्यादा, सियासी लाभ लेने की हो गई और बिहार, उड़ीसा, राजस्थान और गोवा जैसे राज्य बाकायदा समय-समय पर अपने राज्यों को विशेष श्रेणी के राज्य का दर्जा दिये जाने का अनुरोध करने लगे. तेलंगाना के रूप में राज्य के एक हिस्से के अलग हो जाने के बाद आंध्र प्रदेश भी विशेष दर्जा मांगने वाले समूह में शामिल हो गया, और अब तो आलम यह है कि पंजाब जैसा समृद्ध राज्य भी खुद के लिए विशेष दर्जा मांग रहा है.

विशेष राज्य का दर्जा हासिल होने के साथ ही राज्य को मोटे तौर पर चार बड़े फ़ायदे होते हैं, जिनमें कर या शुल्क संबंधी रियायतें और क़र्ज मुक्त केंद्रीय सहायता की वृद्धि सबसे प्रमुख हैं. जैसे विशेष दर्जा प्राप्त राज्य में निजी पूंजी निवेश के तहत अगर कोई उद्योग या कल-कारखाना लगाना चाहे, तो उसे उत्पाद शुल्क, सीमा शुल्क, आय कर, बिक्री कर और कॉरपोरेट टैक्स जैसे केन्द्रीय करों में विशेष छूट मिलती है. हाल के समय में जीएसटी में भी इसका प्रावधान है. ज़ाहिर है कि करों में ऐसी रियायतों से उस राज्य में पूंजी निवेश का आकर्षण बढ़ जाता है. इस कारण रोज़गार के अवसर वहां ज़्यादा पैदा होते हैं. इसी तरह केंद्र अपनी विभिन्न योजनाओं के मद में राज्यों को जो वित्तीय मदद देता है, उसमें 70 प्रतिशत ऋण के रूप में और 30 प्रतिशत मदद के रूप में होता है. लेकिन विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों के मामले में यह मदद बदल जाती है. केंद्र तब राज्य को दी जाने वाली कुल राशि  का केवल 10 प्रतिशत हिस्सा ही ऋण मानती है और बाक़ी 90 प्रतिशत बतौर अनुदान देती है. स्पष्ट है कि विशेष दर्जा प्राप्त राज्य को मिलने वाली केंद्रीय सहायता में सीधे 60 प्रतिशत की वृद्धि हो जाती है.

साल 2014 में 'आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014' के तहत जब राज्य का बंटवारा किया गया, तब प्रावधान किया गया कि केंद्र राज्य के बंदरगाहों, औद्योगिक परिसरों, नए राजधानी शहर, सिंचाई परियोजनाओं, रेलवे क्षेत्र और शैक्षिक संस्थानों के लिए बुनियादी ढांचे की स्थापना में राज्य का सहयोग करेगा. इसकी वजह यह थी कि आंध्र प्रदेश की संपत्ति का लगभग 95% हिस्सा हैदराबाद में स्थित था, जो कि राज्य के विभाजन के बाद तेलंगाना राज्य का हिस्सा हो गया. नवगठित आंध्र प्रदेश सरकार के मुताबिक जून 2014 से मार्च 2015 तक राज्य को कुल  16078 करोड़ रुपए का राजस्व घाटा हुआ था. जब विभाजन प्रक्रिया चल रही थी, तो तत्कालीन यूपीए सरकार ने नवगठित आंध्र प्रदेश राज्य को विशेष राज्य का दर्जा या श्रेणी प्रदान करने का फैसला किया था. पर बाद में 14 वें वित्त आयोग ने राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए कुछ नए प्रावधान शामिल कर दिए. जिस कसौटी पर आंध्र प्रदेश बाहर हो गया. आंध्र ने विरोध किया तो केंद्र सरकार ने राज्य को 2016 से 2020 तक 'विशेष पैकेज' देने का वादा किया, पर बात इससे बनी नहीं. चंद्रबाबू नायडू ने आंध्र प्रदेश के लिए विशेष पैकेज और पोलावरम परियोजना के लिए 58,000 करोड़ रुपए को तत्काल मंजूरी की मांग की है. यही नहीं नायडू ने नए राज्य की राजधानी अमरावती के विकास के लिए केंद्रीय बजट में पर्याप्त राशि सुनिश्चित किये जाने और राज्य विधानसभा की सीटें 175 से बढ़ाकर 225 कर दिए जाने की मांग भी कर रहे हैं.

संभव है आंध्र प्रदेश की मांग जायज हो, पर चुनाव से पहले उनके इस तरह से दबाव बनाने का मायने समझना मुश्किल नहीं. यह कुछ-कुछ वैसे ही है, जैसे आरक्षण पाकर सक्षम हो जाने के बाद भी सक्षम हो चुके लोग भी अपने ही समाज के दबे कुचले साथियों के लिए आरक्षण की लाभ छोड़ नहीं रहे. क्या हमारे दलित करोड़पति-अरबपति साथियों, सांसदों-विधायकों, आईएएस-पीसीएस अफसरों को अपने ही जरूरतमंद भाई-बहनों के लिए राह नहीं छोड़ना चाहिए. इन सबके बीच हम सबको यह समझने की जरूरत है कि देश बचेगा, बचा रहेगा, तभी मिलेगा किसी को भी उसका हक, चाहे वह पानी हो, आरक्षण हो, या विशेष राज्य!
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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