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नफरत भरी यह हिंसा अमेरिका को कहां ले जाएगी

नफरत भरी यह हिंसा अमेरिका को कहां ले जाएगी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एशिया के अपने दौरे के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मिलकर एशिया पर राज करने की बात कह रहे हैं, पर उनका विकसित देश खुद नफरत और आतंकी हिंसा का शिकार है. हथियारों की होड़ और नफरत से भरी हिंसा ने वहां अक्तूबर और नवंबर के शुरुआती हफ्ते तक कम से कम 98 लोगों की जान ले ली है. इन हमलों में परंपरागत हथियारों से गोलीबारी के अलावा जिस खतरनाक नए हथियार का इस्तेमाल किया गया, वह है सड़क पर चलने वाले वाहन को हथियार बना कर कहीं भी भीड़भाड़ वाले इलाके में घुसा देना और निर्दोष लोगों को मार देना. पिछले कुछ सालों में योरोप में इस तरह के हिंसा की घटनाओं की बाढ़ सी आ गई है, पर अब अमेरिका और उसके सबसे बड़े शहरों में से एक न्यूयॉर्क इसका निशाना बना है.

चर्च, होटल और भीड़भाड़ वाली जगहें नफरत फैलाने वालों का आसान निशाना बन रही हैं. अभी पांच नवंबर को सदरलैंड स्प्रिंग्स स्थित चर्च में रविवार की प्रार्थना सभा के दौरान सुबह लगभग 11:30 बजे एक बंदूकधारी ने गोलीबारी कर 27 लोगों को मार डाला. पुलिस की काररवाई में मारे गए हमलावर की पहचान 26 वर्षीय केविन पैट्रिक केली के रूप में हुई है, जिसे 2014 अमेरिकी एयरफोर्स से निकाल दिया गया था. शुरुआती जांच में इसे नफरत से उपजी हिंसा का नतीजा माना जा रहा है. टेक्‍सास में हुआ यह हमला लॉस वेगास में हुए हमले के महीने भर बाद हुआ है. वेगास में एक बंदूकधारी ने होटल के कमरे से फायरिंग शुरू कर दी थी जिसमें 58 लोग मारे गए थे और सैकड़ों घायल हुए थे.

इस से ठीक पहले जिस वक्त पूरा अमेरिका हैलोविन के जश्न में डुबा हुआ था, न्यूयॉर्क के मैनहट्टन में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से महज कुछ दूरी पर एक हमलावर ने साइकिल ट्रैक पर चल रहे लोगों को ट्रक से रौंद दिया. इस हमले में 8 लोगों की मौत हो गई, जबकि 12 लोग घायल हो गए थे, घटना व्यस्त और भीड़भाड़ वाले मैनहट्टन के वेस्ट साइड हाइवे पर हुई. मैनहट्टन न्यूयॉर्क शहर का बेहद घनी आबादी वाला इलाका है. इससे कुछ ही दूरी पर ग्राउंड जीरो स्मारक स्थल है जो 2001 में अलकायदा द्वारा ट्विन टॉवर पर हुए 9/11 हमले की याद दिलाता है.

हमलावर ने जैसे ही साइकिल ट्रैक पर ट्रक को चढ़ाया पुलिस को यह समझने में अधिक देर नहीं लगी कि न्यूयॉर्क शहर एक बार फिर आतंकवादी हमले का शिकार हुआ है, 29 साल के संदिग्ध हमलावर ने लगभग आधा किमी के इलाके में भारी तबाही मचाई. इस हमले के संदिग्ध का नाम सैफुल्लो साइपोव है. उसका जन्म उज्बेकिस्तान में हुआ था और वह साल 2010 में अमेरिका में शरणार्थी के रूप में आया था. साइपोव ने इस हमले के लिए ट्रक कुछ ही घंटे पहले ही किराए पर लिया था. मैनहट्टन साफ्टवेयर इंजीनियरिंग का गढ़ है, जिसमें भारतीयों की भरमार है.

यह एक संयोग ही है कि इस हमले में सारे भारतीय सुरक्षित रहे. ब्यूनर्स आयर्स में विदेश मंत्रालय ने एक बयान में बताया है कि इस घटना में मारे गए आठ लोगों में पांच अर्जेटीना के निवासी हैं. न्यूयॉर्क के हमले से अभी अमेरिका सांस भी नहीं ले पाया था कि उसके दूसरे शहर कोलोराडो के वॉलमार्ट स्टोर में फायरिंग की खबर आने लगी. इस फायरिंग में भी 3 लोगों की मौत हो गई है.

न्यूयॉर्क हमले के तुरंत बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे कायरतापूर्ण कार्रवाई करार देते हुए विविधता वाले वीजा कार्यक्रम को खत्म करने का आह्वान कर ‘मेरिट आधारित' कड़े उपाय वाले वीजा कार्यक्रम को अपनाने पर बल दिया. ट्रंप ने कहा कि हमलावर को एक स्टेट डिपार्टमेंट प्रोगाम के तहत अमेरिका में घुसने की इजाजत दी गई थी जिसे ‘विविधता लॉटरी कार्यक्रम’ कहा जाता है.

गौरतलब है कि इस वीजा कार्यक्रम के तहत उन देशों के लोगों को ग्रीन कार्ड दिया जाता है जहां आमतौर पर मेरिट आधारित उम्मीदवार नहीं होते. उन्होंने कहा कि इस हमले को एक बीमार और मानसिक संतुलन खो चुके शख्स ने अंजाम दिया है. कानून का पालन करने वाली संस्थाएं इस पर नजर रख रही हैं. ट्रंप ने कहा कि हम आइएस को मध्य पूर्व और दूसरे जगहों पर मात देने के बाद अपने देश में कतई वापस नहीं होने देंगे.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बिना देर किए इस आतंकी हमले की निंदा की और भारत से हर संभव मदद का भरोसा दिलाया. याद रहे कि मोदी के हालिया अमेरिका दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आंतकवाद और उसके सुरक्षित ठिकानों को मिलकर खत्म करने का संकल्प लिया था. दोनों देशों की ओर से जारी साझा बयान में कट्टर इस्लामिक आतंकवाद को लोकतंत्र के लिए खतरा बताते हुए इससे मिलकर निपटने की बात कही गई थी, पर दोनों नेता आतंक के इस हथियार से हतप्रभ हैं.

यह ठीक है कि अमेरिका इस्लामिक स्टेट या बाहर के आतंकियों से निबटने में सक्षम है, पर वह घरेलू हथियार लॉबी के हाथों पड़ गए लोगों की सनक का शिकार होने से कैसे बचेगा. रंगभेदी हिंसा या कहीं भी अचानक गोलीबारी की घटनाएं वहां चरम पर हैं, जो किसी भी तरह से आतंकवाद से कम घिनौनी नहीं.
जाहिर है अमेरिका इस नए तरह के हमले का आदी नहीं है, इसलिए उसके पास इससे निपटने की रणनीति का भी अभाव है. यह भी एक संयोग ही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संकेत ही संकेत में ट्रंप को आने वाली चुनौतियों से आगाह कर दिया था. उन्होंने कहा था, 20 साल पहले जब भारत आतंकवाद की बात करता था तो दुनिया इसे समझती नहीं थी और लॉ एंड ऑर्डर की समस्या कहकर नकार देती थी. लेकिन अब आतंकियों ने दुनिया को आतंकवाद का मतलब समझा दिया है, तो अब हमें समझाने की जरूरत नहीं है.

मोदी ने तब कहा था, भारत आतंकवाद से पीड़ित रहा है लेकिन भारत रुका नहीं. हमने दुनिया को दिखा दिया कि आतंकवाद को बढ़ावा देने का नतीजा क्या हो सकता है! हम अपने देश में भी विवादों का हल बंदूक से नहीं बातचीत से करते हैं. अमेरिका को भी यही राह अपनानी होगी. वाकई, दुनिया एक नई तरह की कट्टरता और नफरत से उपजी हिंसा से दोचार हो रही है, जिसका मुकाबला हमें मिलजुलकर और प्रेम से ही तलाशना होगा.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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