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गरीबी हटे, करचोरी बंद हो

जय प्रकाश पाण्डेय , Feb 20, 2017, 3:49 am IST
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गरीबी हटे, करचोरी बंद हो आम बजट पर संसद में अभी बहस पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. बजट सत्र काफी लंबा चलता है. फिर इस साल तो उसमें रेल बजट भी शामिल है. हालांकि बजट हर साल आता है, पर क्या वाकई आम बजट का आम नागरिकों से कोई मतलब होता है? कहने को यह अगले एक साल में देश को चलाने का वह लेखा-जोखा है, जिसमें रुपए के आने-जाने का सारा हिसाब होता है. मतलब कि सरकार कहां से कमाएगी और कहां-कहां किस रूप में खर्चेगी.

चूंकि सरकारी इनकम का सबसे बड़ा जरीया टैक्स है, और वह टैक्स, डायरेक्ट और इनडायरेक्ट रूप में हमारी, आपकी जेब से ही जाना है, इसलिए हम चाहें, या न चाहें, आम बजट का हम पर असर पड़ता ही पड़ता है. फिर इस बार तो मोदी सरकार के इस बजट में रेल बजट भी शामिल था. इसलिए जनसरोकारों से इसका मतलब और भी बढ़ जाता है.

बजट से पहले आने वाली आर्थिक समीक्षा वह खाका भी खींच देती है कि पिछले बजट के चलते देश, और उसमें लागू योजनाएं कहां तक पहुंची, और उनका आने वाले साल में क्या हाल है. इसी तरह हमें या करना चाहिए का एक सुझाव सा भी इसमें होता है.

 इसीलिए इस साल जब आर्थिक समीक्षा में विभिन्न सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं के विकल्प के रूप में गरीबों को एक न्यूनतम आय उपलब्ध कराने की पुरजोर वकालत की गयी तो बेहद खुशी ही कि शायद अब गरीबों के हालात सुधरें.

अध्याय सर्वजनीन न्यूनतम आय, महात्मा के साथ और महात्मा के भीतर संवाद शीर्षक वाले अध्याय में कहा गया है, ‘महात्मा ने सभी मार्क्सवादियों, बाजार मसीहाओं, भौतिकवादियों और व्यवहारवादियों से कहीं पहले और गहन तरीके से इसे समझा. इसमें कहा गया है कि इसकी भारत में आवश्यकता है, क्योंकि मौजूदा कल्याणकारी योजनाओं में गलत आबंटन, चोरी और गरीबों के शामिल नहीं होने जैसी खामियां हैं. समीक्षा में कहा गया है कि केंद्र सरकार अकेले 950 केंद्रीय और केंद्र प्रायोजित उप-योजनाओं को चला रही है, जिस पर जीडीपी का करीब पांच प्रतिशत खर्च हो रहा है,

समीक्षा में कहा गया कि ऐसी योजना की सफलता के लिये दो पूर्व शर्तें पहले से काम कर रही हैं. इसमें एक जनाधारम (जनधन, आधार और मोबाइल प्रणाली) और दूसरा ऐसे कार्यक्रम की लागत में साझेदारी पर केंद्र-राज्य बातचीत है. इसमें अनुमान लगाया गया है कि यूबीआई के जरिये गरीबी को कम कर 0.5 प्रतिशत तक लाने के कार्यक्रम में जीडीपी के 4-5 प्रतिशत के बराबर लागत आएगी. लेकिन इसके लिये शर्त यह है कि ऊंची आबादी वाले 25 प्रतिशत लोग इसके दायरे में न रखे जाएं.

समीक्षा के अनुसार, ‘ मौजूदा मध्यम वर्ग को मिलने वाली सब्सिडी तथा खाद्यान्न, पेट्रोलियम और उर्वरक सब्सिडी की लागत जीडीपी का करीब तीन प्रतिशत है. इसमें रेखांकित किया गया है कि गरीबी उन्मूलन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है. आजादी के समय यह जहां करीब 70 प्रतिशत थी, वहीं 2011-12 में (तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट के अनुसार) लगभग 22 प्रतिशत पर आ गयी.

शायद यही वजह है कि इस बार के आम बजट 2017 में मध्यवर्ग से ज्यादा गरीबों की बात की गई, भले ही शेरोशायरी में. मध्यवर्ग को टैक्स पर ज्यादा छूट भी नहीं मिली और यह साफ कर दिया गया कि चिदंबरम के दौर से चले आ रहे आर्थिक कड़ाई के दौर का पालन धीमी गति से ही सही किया जरूर जाएगा. सरकार ने इशारों इशारों में ही कर चोरी करने वालों का आंकड़ा देकर उन्हें चेताया भी.

बजट भाषण में वित्त मंत्री ने ये सब कहते हुए कई लोगों की दुखती रग पर हाथ रख दिया कि 'हमारा समाज मुख्यतः टैक्स को न मानने वाला समाज है' सरकारी आंकड़े ख़ुद इसकी गवाही देते हैं. सवा अरब से ज्यादा की आबादी वाले देश में सिर्फ 76 लाख लोग ऐसे हैं जिनकी आमदनी 5 लाख से ज्यादा है और उनमें से 56 लाख सैलरी पाने वाले हैं यानी नौकरी करते हैं.

सरकार ने माना कि यह कमाल ही है कि पिछले 5 सालों में देश में 1.25 करोड़ से ज्यादा कारें बिकीं और 2015 में 2 करोड़ लोगों ने विदेश यात्राएं कीं, पर आंकड़ों में देश में सिर्फ 20 लाख लोग ऐसे मिले, जो नौकरी नहीं करते पर 5 लाख से ज्यादा कमाते हैं. आंकड़ों के मुताबिक देश में आयकर रिटर्न भरने वालों की कुल संख्या 3.7 करोड़ और टैक्स देने वालों की संख्या 2.7 करोड़ ही है.

वित्त मंत्री अरुण जेटली की मानें तो एक तरह से 2.7 करोड़ आय करदाताओं के कंधों पर देश की सवा अरब से ज्यादा आबादी का बोझ है. विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकार को आयकर देने वालों का दायरा बढ़ाने का रास्ता तलाशना चाहिए. सरकार टैक्स के दायरे में ज्यादा से ज्यादा लोगों को लाने की बात तो करती है, लेकिन हक़ीक़त में ज़्यादा कुछ करती हुई नहीं दिखती.

अर्थशास्त्री आलोक पुराणिक की राय में सरकार के पास एक्सपेंडिचर टैक्स या खर्चे पर लगाया जाने वाले कर का एक विकल्प है. वे कहते हैं, 'क्योंकि किसी की आमदनी को अदालतों में साबित करना सरकार के लिए मुश्किल है. पकड़ा गया आदमी कहेगा कि मुझे ये पैसा रिश्तेदारों से मिला है. लेकिन महंगी कार ख़रीद रहे व्यक्ति पर सरकार अलग से टैक्स लगा सकती है.'

नोटबंदी के बाद 1.48 लाख ऐसे बैंक खातों की पहचान की गई है, जिनमें 80 लाख रुपए से ज्यादा जमा किए गए.  ये आंकड़े वित्त मंत्री के इस बयान की तस्दीक करते हैं कि 'अर्थव्यवस्था में जब नकदी बहुत ज्यादा होती है, तो कुछ लोगों के लिए टैक्स चोरी का रास्ता खुल जाता है. जब बहुत से लोग टैक्स चोरी करने लगते हैं, तो उनकी हिस्सेदारी का बोझ दूसरे ईमानदार लोगों पर पड़ जाता है.'

सच तो यह है कि पांच लाख में बुक होने वाले शादियों के हाल धड़ल्ले से पचास हजार कह कर बुक किए गए. हर शादी में लाखों बिना हिसाब खर्च होता है. चुनावी मौसम में गाड़ी-घोड़ों का भी हिसाब नही है. सरकार अगर कर सुधार और कड़ाई नहीं कर सकती तो शब्दों और आंकड़ों की बाजीगरी से अलग इस सरकारी बजट का कोई अर्थ नहीं. सरकार ने रेल बजट खत्म कर दिया कोई पहाड़ नहीं टूटा, तो अगर यह आयोजन भी सीमित कर दिया जाए, तो किसी को फर्क नहीं पड़ेगा.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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