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कहीं ट्रंप न हो जाए अमेरिका

कहीं ट्रंप न हो जाए अमेरिका अमेरिका की पहचान विविधता है. इसे विचारधारा का संशय कहें या ऐतिहासिक बदलाव की घड़ी, पर बीस जनवरी को अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रंप के शपथ लेने के साथ ही दुनिया सहम सी गई है. खुद अमेरिकी भी सत्ता परिवर्तन के इस असर को देखने के लिए सांसे थामे खड़े हैं, जिसका असर आने वाले दिनों में दिखेगा. ट्रंप की ताजपोशी केवल डेमोक्रेट बराक ओबामा की जगह रिपब्लिकन डोनाल्ड ट्रंप की ताजपोशी भर नहीं है, बल्कि यह अमेरिकी इतिहास में अब तक का वह सबसे बड़ा बदलाव है, जिससे अमेरिकी पहचान तक दाव पर लगी है.   

डोनाल्ड ट्रंप 70 साल की उम्र में राष्ट्रपति बनने वाले अमेरिका के पहले व्यक्ति हैं. ट्रंप का जन्म 14 जून, 1946 को न्यूयार्क सिटी के क्वींस में हुआ था. उनके माता-पिता का नाम मरियम ऐनी और फ्रेड ट्रम्‍प है. वे ईसाई धर्म के प्रेस्बिटेरियन पंथ को मानते हैं, जो प्रोटेस्टेंट होते हुए भी रूढ़ीवादी होते हैं .डोनाल्ड ट्रंप ने अर्थशास्त्र में डिग्री ली और साल 1975 में अपने पिता से करीब 1 करोड़ डॉलर उधार लेकर अपनी कंपनी शुरू की.

यह कम कमाल की बात नहीं है कि चाहे बिजनेस हो या सियासत शुरुआती दिनों में ट्रंप बुरी तरह से फेल हुए. साल 1990 में ट्रंप पर 97 करोड़ डॉलर का कर्जा था. घाटे की वजह से उन्होंने 3 बार दीवालिया होने की अर्जी दी. मगर हर बार बच गए, और आज उनकी कंपनी की कुल कीमत न केवल तकरीबन 1000 करोड़ डॉलर है, बल्कि उन्हे अमेरिका के 200 सबसे अमीर लोगों में शुमार किया जाता है. 'अमेरिका फर्स्ट' का नारा देने वाले ट्रंप का कपड़ों का भी कारोबार है. मगर, सस्ते लेबर के कारण इनका उत्पादन वे सिर्फ चीन और बांग्लादेश में ही करवाते हैं.

इसी तरह सियासत का उनका सफर भी अजीबोगरीब था. ट्रंप से पहले अमेरिका का कोई भी राष्ट्रपति ऐसा नही रहा, जो कसीनो या होटल का मालिक रहा हो. साल 1999 में उन्होंने 'रिफॉर्म पार्टी' बनाई थी, लेकिन पार्टी के आंतरिक झगड़ों से तंग आकर वह फरवरी 2000 में उससे अलग हो गए. साल 2001 से 2008 तक वह डेमोक्रेटिक पार्टी में और साल 2009 से रिपब्लिकन पार्टी में रह कर राजनीतिक गतिविधियों इस कदर सक्रिय हुए कि छलांग मारते हुए 2016 में रिपब्लिकन पार्टी से न केवल राष्ट्रपति के पद के उम्मीदवार बने, बल्कि हिलेरी क्लिंटन जैसी ताकतवर महिला को हराकर अब अमेरिका के राष्ट्रपति हैं.

डोनाल्ड ट्रंप विरोधाभासी शैली के व्यक्ति हैं, जो अपनी ही कही पुरानी बातों को काटते हैं. इसके चलते कुछ लोग उन्हें मुंहफट तो कुछ बेबाक कहते हैं. उनके बयानों में इसकी झलक साफ-साफ नजर आती है. चाहे महिलाओं पर दिए गए बयान हों या फिर अल्पसंख्यक समुदाय पर कही बातें. वह अपने बयान से हमेशा ही सुर्खियां बटोरते रहे हैं. ट्रंप एकलौते राष्टपति हैं, जिनका 'ट्रंप: द गेम' नाम से खुद का 'बोर्ड गेम' है.

वे चर्च में विश्वास रखते हैं, लेकिन पोप के साथ विवादों में रहे हैं. पोप फ्रांसिस ने उनके रियल स्टेट बिजनेस को लेकर कभी कहा था कि जो शख्स चारों तरफ पुल बनाने की बजाय बड़ी-बड़ी दीवारें खड़ा करने में विश्वास रखता हो, वह सच्चा ईसाई नहीं हो सकता. ट्रंप ने कभी सिगरेट, शराब या ड्रग्स को हाथ नहीं लगाया है. दरअसल, उनके बड़े भाई की कभी खूब शराब पीने के कारण मौत हो गई थी और वह चाहते थे कि ट्रंप हमेशा इस बुराई से दूर रहें और इसीलिए उन्होंने कभी इसे हाथ नहीं लगाया.

ट्रंप को मुसलमानों से नफरत है, पर हिंदुओं को लेकर वह नरम रुख रखते हैं. उन्होंने कहा था कि यदि वे राष्ट्रपति बने, तो मुस्लिमों के अमेरिका आने पर बैन लगा देगें और अमेरिका की हर मस्जि़द की निगरानी करवाएंगे. वहीं, एक रैली में उन्होंने कहा था कि वो हिंदू प्रशंसक हैं और यदि वो अमेरिका के राष्ट्रपति बनते है तो भारत और हिंदुओं को एक अच्छा दोस्त मिल जाएगा.

ट्रंप ने तीन शादियां की. पहली शादी पूर्व ओलिंपिक खिलाड़ी इवाना से की थी. 1977 में हुई यह शादी 1991 तक चली. इसके बाद 1993 में अभिनेत्री मार्ला को जीवनसाथी बनाकर 1999 में उन्होंने उनसे तलाक ले लिया था, इसके बाद 2005 में उन्होंने मॉडल मेलानिया से शादी की.

अमेरिका के लिए डोनाल्ड ट्रंप की जीत के मायने बिल्कुल स्पष्ट हैं. एक तरफ बौद्धिकवर्ग, मीडिया और मध्यमवर्ग है तो दूसरी तरफ कट्टरपंथी अमेरिकी आमजन. मजे कि बात यह है कि 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' के नारे के साथ आम जनों की बात करने वाले ट्रंप खुद खरबपति हैं. उनका यह उभार कुछ-कुछ चालीस के दशक में जिन्ना के उभार जैसा है, जिन्होंने इस्लाम की सारी रिवायतों से दूर रहकर भी अलग मजहब के नाम पर मुसलमानों के लिए अलग देश की न केवल मांग की, बल्कि पाकिस्तान के रूप में उसे पा भी लिया.

अमेरिका इस समय दो हिस्सों में बंटा हुआ है. एक हिस्सा पढ़े-लिखे, उदारवादी और सेक्युलर लोगों का है, तो दूसरा हिस्सा रूढ़िवादी, धार्मिक, श्रम वर्ग और शहर से दूर ग्रामीण क्षेत्रों में कम पढ़े-लिखे लोगों का है. दूसरे हिस्से की तादाद वहां ज्यादा है. रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रंप ने इन्हीं के बीच अपने चुनाव प्रचार के जरिये अमेरिका को दोबारा से एक ‘ग्रेट नेशन’ बनाने का 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' नाम से आंदोलन चलाया अौर दुनिया में ‘अमेरिका फर्स्ट’ होगा के नारे के साथ जीत हासिल की थी.. इस आंदोलन का तमाम रूढ़िवादियों, धार्मिकों, श्रम वर्गों और कम पढ़े-लिखे अमेरिकियों ने समर्थन किया था.
 
ट्रंप का यह आंदोलन कामयाब रहा और वे जीत की तरफ बढ़े. अमेरिकी लोगों को यह यकीन हो चला था कि वहां जॉब्स आयेंगे, बाहरी लोगों को निकाला जायेगा, विकास और वैश्विक व्यापार का नया आयाम स्थापित होगा, सड़कें और पुल बनेंगे, वगैरह-वगैरह. ‘ग्रेट नेशन’ के लिए ये सारे वादे ट्रंप ने किये थे. अमेरिका को ‘ग्रेट नेशन’ बनाने का ट्रंप का यही सपना अमेरिका के लिए बहुत मायने रखता है, क्योंकि ट्रंप के वायदे बड़े हैं और अब उन्हें पूरा करके दिखाना होगा.

व्हाइट हाउस तक की ट्रंप की यात्रा स्त्री-विरोधी, नस्लभेदी और नफरत के अभियान से पूरी हुई है, परंतु सफल शासन का रास्ता यह नहीं है. निर्वाचित राष्ट्रपति ट्रंप को इस तरीके से शासन करना चाहिए जिसमें सबके मानवाधिकारों के लिए पूरा आदर हो और उन्हें आगे बढ़ाये. अगर आपकी सरकार ही कभी कभी इन अधिकारों का उल्लंघन करे, तो आप दूसरे देशों पर इस मुद्दे पर दबाव नहीं बना सकते हैं. ट्रंप को न्याय तंत्र और आप्रवासन सुधार पर ध्यान देना चाहिए और गहरे नस्लवादी भेदभाव रोकने पर विशेष जोर देना चाहिए. अब तो यह वक्त ही बताएगा कि वह एक जिम्मेदार अमेरिकी राष्ट्रपति की भूमिका में अपनी छाप छोड़ते हैं, या एक बेलगाम शासक की तरह इतिहास में दर्ज होते हैं.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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