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बधाई मिस्टर ट्रंप! आपका निर्वाचन शुभ हो

बधाई मिस्टर ट्रंप! आपका निर्वाचन शुभ हो डोनाल्ड ट्रंप अब अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति हैं. वह ट्रंप, जो अमेरिका के सबसे रईस लोगों में से एक हैं, पर जिनकी तुनकमिजाजी को मीडिया में इस तरह प्रचारित किया गया कि उनकी छवि एक खलनायक की सी दिखने लगी. पर अब जब वह निर्वाचित हो चुके हैं, और आने वाली जनवरी से अगले चार सालों के लिए बतौर अमेरिकी राष्ट्रपति, उनके पास समूची दुनिया को अपने फैसलों से हिलाने की ताकत होगी, तब यह जानना मौजूं होगा कि सभ्यता और प्रजातंत्र के नाम पर हम किस कदर नकारात्मकता, रूढ़ीवादिता और कट्टरपंथिता के साथ-साथ पूंजी और नफरत के प्रभाव में बढ़ रहे हैं.

अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनावों में पूंजी का प्रभाव तो जगजाहिर था, पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का दावा करने वाले देश में चुनावी घमासान के दौरान जिस तरह की बदजुबानी हुई, वह चौंकाने वाली है. अमेरिकी जनता को आठ नवंबर को अपनी दो दलीय चुनावी व्यवस्था के घोषित उम्मीदवारों, डेमोक्रेटिक पार्टी की हिलेरी क्लिंटन और रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्‍ड ट्रंप के बीच से ही किसी एक को चुनना था. यह लोग एक प्रक्रिया के तहत पिछले पांच सौ दिनों से अपनी पार्टी में चुन कर इस पद पर चुनाव लड़ने के दावेदार बने थे. इन चुनावों पर पूरी दुनिया की नजर लगी थी.
 
वजह, अमेरिकी चुनावों का सबसे दिलचस्प पहलू आखिरी मतदान से कहीं अधिक राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों और उनके समर्थकों के लटके-झटके हैं. अपनी-अपनी पार्टी के उम्मीदवारों के पक्ष में अमेरिकी जनता की सक्रियता यहां के चुनावों का सबसे बड़ा आकर्षण है. चुनावों के शुरुआती दौर से ही नागरिक अपने-अपने दलों के पसंदीदा प्रत्याशी के पक्ष में माहौल बनाने में जुट जाते हैं, और जब दल किसी एक की उम्मीदवारी घोषित कर देता है, तब पार्टी के सारे समर्थक घोषित उम्मीदवार के पक्ष में इसे अपना चुनाव मानते हुए जुट जाते हैं. इस क्रम में यह चुनाव शीर्ष से हर गली, हर नुक्कड़ तक उतर जाता है.

पार्टी समर्थक न केवल जलसा आयोजित करते हैं, बल्कि अपने दल के उम्मीदवार के समर्थन में रात्रि भोज, चंदा उगाही, रैलियां, सांस्कृतिक कार्यक्रम और बहस जैसे कार्यक्रम आयोजित करते हैं. इसीलिए इन चुनावों में माहौल बनाने में काफी धन खर्च होता है. यही वजह है कि पूंजी और मीडिया, जिसमें अखबार, टेलीविजन और रेडियो के साथ अब सोशल मीडिया भी शामिल हो गया है, की अमेरिकी चुनावों में बहुत बड़ी भूमिका रह रही है.

इस बार के चुनाव में भी यही हुआ. यह चुनाव इसलिए भी महत्त्वपूर्ण था क्योंकि सबको बराबरी और 'महान लोकतंत्र' के कथित नारों के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति प्रणाली में अब तक किसी महिला का राष्ट्रपति के शीर्ष पद पर पहुंचना तो दूर, उसे किसी बड़े दल का उम्मीदवार तक घोषित नहीं किया गया था. वर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा, बिल क्लिंटन के सहयोग से इस बार हिलेरी क्लिंटन को यह मौका मिला था.

हिलेरी कोई साधारण उम्मीदवार नहीं थीं. आठ साल पहले भी उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी में राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी का दावा किया था, पर तब पार्टी चुनावों में वह वर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा से हार गईं थीं. हालांकि वह चुनाव भी पहले अफ्रिकन-अमेरिकन मूल के काले व्यक्ति के इस शीर्ष पद पर पहुंचने के चलते महत्त्वपूर्ण हो गया था. उसके अगले चुनाव में क्लिंटन ने ओबामा से समझौता हो जाने के चलते दावेदारी नहीं की और दूसरी बार चुने जाने के लिए ओबामा का समर्थन किया. तय यही हुआ था कि 2016 में हिलेरी को ओबामा का समर्थन मिलेगा. ओबामा ने अपनी पूरी ताकत से हिलेरी का समर्थन भी किया, पर वह उन्हें इस पद तक पहुंचाने में असफल रहे.

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों की एक और खासियत इस बार दांव पर लगी, वह थी तमाम बड़े मुद्दों पर प्रत्याशियों के बीच खुली बहस. बड़े मीडिया घराने और एंकर कम से कम तीन बहसों का आयोजन करते हैं और प्रत्याशियों को आमने -सामने बैठा कर सवाल जवाब के साथ विभिन्न मुद्दों और अगले चार सालों के लिए उनकी कार्ययोजना पर उनका पक्ष जानते हैं. कहते हैं कि जागरूक अमेरिकी जनता इन्हीं बहसों से अपना मन बनाती है और चुनाव के दिन वोट देती है.

इन बहसों की जीत पर जनता का नजरिया तय होता है. मजेदार तो यह कि अमेरिकी मीडिया ने डोनाल्ड ट्रंप और हिलेरी क्लिंटन के बीच हुई तीनों बहसों के बाद कथित सर्वे में हिलेरी क्लिंटन के पक्ष में सीधी बढ़त बताई थी. बीस अक्टूबर को हुई आखिरी बहस के बाद तो सीएनएन/ओआरसी मत सर्वेक्षण ने दावा किया था कि बहस में हिलेरी को 52 फीसदी लोगों ने जबकि ट्रंप को 39 फीसदी लोगों के ही मत मिले थे. पर जब नतीजा आया तो पूरी दुनिया दंग रह गई.

पर तमाम विरोधी सर्वे नतीजों के बावजूद ट्रंप को अपनी स्थिति का आभास था. उन्होंने हार नहीं मानी. इसीलिए जब आखिरी बहस और उसके बाद भी वोटिंग के दौरान संभावित धांधली के उनके दावों और हार की स्थिति में, उनके रुख के बारे में पूछा गया था, तो उन्होंने कहा था कि मैं नतीजों के बाद ही इसके बारे में कुछ बताऊंगा. वैसे भी अगर मैं जीता, तभी नतीजों को मानूंगा, वरना विरोध करने का मेरा अधिकार और कानूनी हक बरकरार है.

राष्ट्रपति ओबामा तक ने ट्रंप के इस बयान को लोकतंत्र पर प्रहार बताया था. हिलेरी की प्रतिक्रिया थी, ट्रंप की टिप्पणी डराने वाली है. हिलेरी का कहना था कि हमारे लोकतंत्र में इस तरह काम नहीं होता. हमारा लगभग 240 वर्षों का इतिहास है. हमारे देश में उचित एवं निष्पक्ष चुनाव होते रहे हैं, फिर चाहे इसके परिणाम हमें पसंद हों या नहीं और यही उम्मीद बहस के दौरान खड़े उम्मीदवार से की जाती है. हिलेरी का आरोप था कि, ट्रंप हमेशा निंदा करते हैं. वह हमारे लोकतंत्र को गर्त में ले जा रहे हैं.

तीनों बहसों में उम्मीदवारों ने लोकलुभावन विषयों, जैसे गर्भपात, गन कंट्रोल, इमीग्रेशन पर अपनी राय रखी थी, पर कुछ मसलों पर उनकी राय साफ बंटी थी. जैसे गर्भपात के मुद्दे पर हिलेरी क्लिंटन ने कहा था कि वह इस मुद्दे पर महिलाओं के हेल्‍थकेयर निर्णय की समर्थक हैं. इस संबंध में महिला को अपना निर्णय करने का हक है.

इमीग्रेंट्स के मसले पर डोनाल्‍ड ट्रंप का तर्क था कि यदि हमारी सीमाएं नहीं होंगी तो हम एक देश के रूप में अपनी पहचान खो देंगे. हिलेरी का जवाब था कि वह ओपेन बॉर्डर की पक्षधर हैं.

डोनाल्‍ड ट्रंप ने अमेरिका की बदतर अर्थव्‍यवस्‍था के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी की नीतियों को जिम्‍मेदार ठहराते हुए भारत की तेज विकास दर का हवाला दिया था और कहा था कि भारत जहां आठ प्रतिशत की जीडीपी की दर से आगे बढ़ रहा है, वहीं अमेरिका एक प्रतिशत की दर के साथ मर रहा है. जवाब में हिलेरी ने कहा कि अमेरिकी अर्थव्‍यवस्‍था मजबूती के साथ आगे बढ़ रही है.

एक दूसरे के खिलाफ आरोपों-प्रत्‍यारोपों के बीच बहस का रुख क्लिंटन और ट्रंप फाउंडेशन की ओर भी मुड़ा था. हिलेरी क्लिंटन ने कहा कि मैंने जो भी किया है, वो देश के हित में किया है. इस पर डोनाल्‍ड ने प्रतिवाद करते हुए कहा था कि आपका क्लिंटन फाउंडेशन एक क्रिमिनल इंटरप्राइजेज है. आपको सऊदी अरब से फंड मिलता है.
महिलाओं के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्‍पणी के वीडियो चलाकर भी ट्रंप के चुनाव अभियान को प्रभावित करने की कोशिश की गई.

हिलेरी का कांफिडेंस, शासन तंत्र पर उनकी पकड़ और बहस में उन्हें मिल रही बढ़त ने उन्हें एरोगेंट बना दिया था. शायद इसीलिए वह विश्वसनीय नहीं हो पाईं और ऐतिहासिक मौका गंवा बैठीं. वैसे भी इन चुनावों में जिस तरह से दोनों उम्मीदवारों ने केवल बड़े मुद्दों पर ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे के निजी चरित्र पर हमला कर बढ़त लेने की कोशिश की थी, वह किसी भी तरह से अमेरिकी लोकतंत्र के लंबे हित में नहीं है.

बहस के दौरान ट्रंप ने हिलेरी को नैस्टी वूमन यानी ‘घृणित महिला’ कहा था, तो हिलेरी ने ट्रंप को अमेरिकी आधुनिक इतिहास का सबसे 'गिरा हुआ' उम्मीदवार बताया था. सभ्य और आधुनिक समाज की यह कौन सी भाषा है, इसके लिए धनबल पर भले ही कोई नया 'शब्दकोष' गढ़ लिया जाए, पर इससे चमकीले कपड़ों के पीछे छिपे चेहरे और विचार तो नहीं बदल जाएंगे. अब अमेरिकी जनता ने ट्रंप के पक्ष में फैसला सुना दिया है, और वह उस महान अमेरिकी लोकतंत्र के अगुआ हैं, जिसकी नींव  जार्ज वाशिंगटन, अब्राहम लिंकन और मार्टिन लूथर किंग जैसे महान नेताओं की विचारधारा से सिंचित है.

बधाई मिस्टर डोनाल्ड ट्रंप! एक शक्तिमान देश के नए शासक के रूप में आप का निर्वाचन समूची दुनिया के लिए शुभ हो.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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