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रूस की दोस्ती को सियासत से बख्श दें

रूस की दोस्ती को सियासत से बख्श दें बारामूला में भारत के सैन्य ठिकानों पर पाकिस्तान समर्थित आतंकी हमलों के बीच भारत द्वारा सीमारेखा पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक जो कि पठानकोट और उरी हमलों के बाद जरूरी हो गई थी, के बावजूद देश पर आतंकी हमला रुका नहीं है. कश्मीर में हर दिन कहीं न कहीं आतंकी घुस जा रहे हैं और जन-धन के साथ सैन्य नुकसान हो रहा है.

ऐसे में भारत को बहुत सावधानी से सेना और अपने आजमाए हुए दोस्तों के पीछे खड़ा होने की जरूरत है. पर लगता है हमारा वर्तमान नेतृत्व सियासी लाभ के लिए दूरगामी संदेशों को न समझ पाने की भूल कर रहा है. सेना को सियासी बयानबाजी में ढकेलना गलत है और अफसोस की इसकी शुरुआत खुद सत्ता पक्ष ने की और बाद में विपक्ष भी उसमें कूद पड़ा. आज आलम यह है कि सैनिकों का सम्मान तो दाव पर लगा ही है, उनके सियासी रूप से इस्तेमाल होने का भी खतरा है.

 यही आलम हमें अपने दोस्तों को पहचानने में हो रहा है. भारत की अमेरिकापरस्त और पाकिस्तान की रूसोन्मुख नीति कहीं हमें हमारे पुरातन और विश्वसनीय साथी से दूर तो नहीं कर रही, यह पहचानने की जरूरत है. दक्षिण एशियाई देशों में मची सियासी उथल-पुथल के बीच हाल ही में जब रूसी थलसेना ने पाकिस्तान के साथ ‘फ्रेंडशिप-2016’ सैन्य युद्धाभ्यास शुरू किया तो अंगरेजी अखबारों ने यह माहौल बनाना शुरू किया कि अमेरिका से बढ़ती नजदीकियों के चलते भारत ने रूस जैसा अपना सर्वाधिक 'विश्वस्त दोस्त' खो दिया है. शीतयुद्ध काल के दो पूर्व विरोधियों रूस और पाकिस्तान के बीच यह पहला युद्धाभ्यास था. इससे मीडिया का यह कयास उचित था, पर हकीकत यह नहीं था.

रूस पिछले आठ सालों से आतंक विरोधी अभियान में भारत के साथ है. यह सच है कि उसकी अर्थव्यवस्था अभी उतनी मजबूत नहीं और पश्चिमी देशों की हथियार कंपनियों के मुकाबले उसके पास बाजार की कमी भी है. इधर दिल्ली में बनी नई सरकार भी पूंजीपतियों की कारोबारी मदद की कोशिश में पश्चिमी देशों के साथ हथियार के बड़े -बड़े सौदे कर रही है, ऐसे में रूस का भी पाकिस्तान को रक्षा सौदों के एक खरीददार के रूप में देखना, सहज है. हाल ही में पाकिस्तान ने एम-17 चॉपर की डील भी रूस से की है.

पर इससे भारत और रूस के रिश्तों पर कोई असर पड़े यह रूस भी नहीं चाहता. रूस ने यह स्पष्ट किया है कि वह भारत की दोस्ती की कीमत पर पाकिस्तान से दोस्ती नहीं करेगा. जिसकी पुष्टि उसके राजनयिकों ने नई दिल्ली और संयुक्त राष्ट्रसंघ में अपने बयानों से कर भी दी. नई दिल्ली में तैनात रूस के राजदूत एलेक्जेंडर एम कदाकिन के शब्दों में, 'भारत में सैन्य प्रतिष्ठानों और नागरिकों पर जब आतंकी हमले होते हैं, तो यह सबसे बड़ा मानवाधिकार उल्लंघन है. हम सर्जिकल स्ट्राइक का स्वागत करते हैं. सभी देशों को अपनी रक्षा करने का पूरा अधिकार है.'

रूस के राजदूत ने भारत को भरोसा दिलाते हुए कहा कि उसे रूस-पाकिस्तान संयुक्त सैन्य अभ्यास से चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है.यह अभ्यास भारत के पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में नहीं किया गया है. उनका कहना था कि उनका देश हमेशा से सीमापार आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत के साथ रहा है.

पिछले हफ्ते ही रूस के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में साफ कर दिया था कि, 'रूस आतंकवाद के सभी रूपों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई के पक्ष में है. भारत-पाकिस्तान सीमा रेखा के पास जो ताजा स्थिति बनी है, उसे लेकर हम चिंतित हैं. हम दोनों पक्षों से यह कहना चाहते हैं कि वह आपस में तनाव को और ना बढ़ने दें. साथ ही, समस्या का राजनीतिक और कूटनीतिक तरीके से आपसी बातचीत के जरिए समाधान करें.'

इसी बीच संयुक्त राष्ट्र में रूस के स्थाई दूत और अक्तूबर माह के लिए सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष विताली चर्किन ने भी पाकिस्तान को कश्मीर और सर्जिकल स्ट्राइक का मसला उठाने पर झिड़क सा दिया. चर्किन ने साफ कर दिया कि सुरक्षा परिषद भारत एवं पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनावों पर चर्चा नहीं कर रहा. संयुक्त राष्ट्र में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान जब चर्किन से पूछा गया कि वह इस मुद्दे पर टिप्पणी क्यों नहीं करेंगे, तो उन्होंने कहा, क्योंकि मैं सुरक्षा परिषद का अध्यक्ष हूं. सुरक्षा परिषद इस (भारत-पाकिस्तान की स्थिति) पर चर्चा नहीं कर रहा. क्षमा करें श्रीमान, मैं इसमें नहीं पड़ना चाहता. कोई टिप्पणी नहीं. कृपया क्षमा करें.

साफ है कि अपने आर्थिक हितों के बावजूद रूस को भारत से अपनी दोस्ती पर अभी भी काफी भरोसा है.  इसकी कई ठोस वजहें हैं. भारत व रूस की दोस्ती तब शुरू हुई थी, जब भारत एक गरीब देश था और हथियारों, तकनीक तथा औद्योगिक निवेश के लिए रूस पर पूरी तरह से निर्भर था. पाकिस्तान के साथ हुए 1965 व 1971 के युद्ध के दौरान भारत को रूस से राजनयिक तथा सैन्य सहायता भी प्राप्त हुई थी.

1979 में जब सोवियत संघ ने अफ़ग़ानिस्तान में घुसपैठ की, तो भारत ने सोवियत संघ के इस काम की आलोचना नहीं की. भारत तब 1971 के युद्ध के दौरान सोवियत संघ द्वारा दिए गए समर्थन का बदला चुका रहा था, जिसमें अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, जार्डन, संयुक्त अरब अमीरात, तुर्की, इंडोनेशिया, चीन और दूसरे कई पश्चिमी व मुस्लिम देशों ने पाकिस्तान का पक्ष लिया था.

पाकिस्तानियों ने जब 1971 में अपने ही 30 लाख बंगाली नागरिकों का नरसंहार कर भारत पर यह युद्ध थोपा था. जहां एक ओर पश्चिम के तथाकथित लोकतांत्रिक देशों ने पाकिस्तान का समर्थन किया, वहीं दूसरी ओर रूस ने संयुक्त राष्ट्र में भारत की निंदा करने वाले अमरीका-प्रायोजित प्रस्तावों को वीटो कर दिया. यही नहीं, सोवियत संघ ने अपना प्रशांत महासागरीय नौसैनिक बेड़ा भी हिन्द महासागर में उतारकर अमरीका और ब्रिटेन की संयुक्त रूप से भारतीय शहरों पर आक्रमण करने की योजना को भी विफल कर दिया था.

रूस और भारत के बीच कई दशकों से रक्षा सौदे होते रहे हैं. पश्चिमी देशों ने जहां भारत को केवल अपना बाजार समझ या तो अपने पुराने हो चुके माल को खपाया है या फिर उस पर अनेक प्रतिबन्ध थोप रखे हैं, वहीं दूसरी ओर रूस भारत के लिए उच्च-तकनीकी हथियारों का एक विश्वसनीय सप्लायर है. रूस भारत को नवीनतम मिसाइल तकनीक भी प्रदान करता रहा है. रूस की शुरुआती और बड़ी मदद से ही इस क्षेत्र में आज हम बड़ी ताकतों में शुमार होते हैं.

हथियारों का उत्पादन करने वाले अधिकांश देश जहां अपने नवीनतम हथियारों स्तर घटा कर दूसरे देशों को निर्यात करते हैं, वहीं रूस ने भारत को ऐसे सुखोई एसयू-30 एमकेआई जेट लड़ाकू विमान दिए हैं, जो उसके अपने एसयू-27 लड़ाकू विमानों से भी कहीं अधिक उन्नत हैं. अभी गोवा में ब्रिक्स सम्मेलन से ठीक पहले भारत और रूस के बीच डिफेंस, एनर्जी, इन्फ्रास्ट्रक्चर, स्पेस, साइंस और रिसर्च से जुड़े विभिन्न सेक्टरों में 16 समझौते और विभिन्न क्षेत्रों में तीन अहम ऐलान हुए हैं.

यूक्रेन और सीरिया के संकट के दौरान भारत ने रूस का लगातार समर्थन किया है और अमरीका तथा यूरोसंघ द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का समर्थन करने से इनकार किया है. भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने साफ़ तौर पर कहा कि यूक्रेन में रूस के ’जायज’  हित निहित हैं. टेलीविजन समाचार चैनल सीएनएन पर प्रधानमंत्री मोदी से जब पूछा गया कि क्रीमिया में की गई रूसी कार्रवाई को आप कैसे देखते हैं, तो उन्होंने उत्तर दिया था, आज की दुनिया में अनेक लोग सलाह देने को तैयार हैं, लेकिन ज़रा उनके कर्मों को तो देखिए.

आज भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और रूसी अर्थव्यवस्था की तुलना में तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन दोनों देश मिलकर बराबर के सहयोगी के रूप में परस्पर भरोसे के साथ काम कर रहे हैं. भारत और रूस के सामरिक हित यूरेशिया में स्थिरता बनाए रखने के सवाल पर भी समान हैं. अफ़ग़ानिस्तान, सीरिया और यूक्रेन में हमारे हित समान हैं.

यूक्रेन रक्षा उद्योगों का भी एक बड़ा केंद्र है और हमारी सेना द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले एन-32 परिवहन विमान सहित दूसरे भारतीय रक्षा उपकरणों की सर्विसिंग के लिए यूक्रेन का बड़ा महत्त्व है. चूंकि भारत और रूस पड़ोसी देश नहीं हैं, इसलिए हमारे बीच सीमा विवाद और पानी के बंटवारे जैसे विवादास्पद मुद्दे भी नहीं हैं. हमारी सीधी झड़प हो ही नहीं सकती.

रूस ऊर्जा का सबसे बड़ा उत्पादक देश है, वहीं अमरीका और चीन के बाद भारत ऊर्जा का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता. वैश्विक मंदी के बावजूद भारत के ऊर्जा उपभोग में कोई कमी नहीं आई है, और देश में पहले की तरह तेल, गैस व एटमी बिजली की असीमित मांग बनी हुई है. यूरोप के कई देशों और चीन, जापान के लिए रूस तेल व गैस का एक विश्वसनीय स्रोत है. इसलिए उसकी रणनीति भारत द्वारा ऊर्जा सुरक्षा प्राप्त करने के लिए किए जा रहे प्रयासों का पूरक बनने की है.

भारत और रूस के बीच सदाबहार दोस्ती की कई दूसरी वजहें भी हैं. भारत और रूस, दोनों ही देशों के लोग निजी तौर पर बेहद जीवंत व भावुक होते हैं. स्वभाव से संकोची, पर दोस्ती पर जान छिड़कने वाले दोनों ही देशों के लोगों के जीवन में परिवार का बड़ा महत्त्व है. रूस तथा भारत के बीच छोटे से छोटे और बड़े से बड़े स्तर पर जो नाते मौजूद हैं, उनकी जड़ें प्राचीन सम्पर्कों में खोजी जा सकती हैं. 'संस्कृत' और 'रसियन' भाषा के बीच काफी साम्य है. संस्कृत विश्व की प्राचीनतम भाषा है. प्राचीन भारत के निवासी अपनी भाषा-संस्कृति को सरस्वती नदी के तट से उराल पर्वतमाला तक ले गए और उसके फलस्वरूप ही रूसी भाषा का भी विकास हुआ. मध्य एशिया तथा रूस में शिव की प्रतिमाएं भी मिली हैं.

पश्चिमी देश खास तौर से अमेरिकी मानते हैं कि उनकी सोच ’ईश्वरीय’ है. भारत और रूस ऐसा नहीं सोचते. सोवियत युग के दौरान भी रूस ने किसी भी गणराज्य पर सनातन ईसाई या रूसी मूल्य कभी नहीं थोपे. रूसीकरण राज्य की आधिकारिक नीति जरूर था, लेकिन इसके चलते यूक्रेनी या कजाख पहचान को कभी कोई खतरा नहीं पैदा हुआ. इसी प्रकार भारत भी विश्व पर हिन्दू धर्म को नहीं थोपता. भारत के लोग स्वभाव से ही सहिष्णु हैं. इसके विपरीत तथाकथित अमरीकी विशिष्टतावाद इस सोच पर आधारित है कि अमेरिकी संस्कृति के सामने दूसरी संस्कृतियां हेय हैं.

भारतीय सदियों तक विदेशी आक्रमण और अंग्रेज़ी उपनिवेशवाद का शिकार रहा है, इसलिए विशिष्टता की सोच वालों से हम अभी भी कतराते हैं. हमारी सोच 'वसुधैव कुटुंबकम' वाली है. रूस ने भी अपनी तमाम विस्तारवादी नीतियों के बावजूद आतंकवाद के मसले पर किसी से समझौता नहीं किया है. भारत भी जीयो और जीने दो की नीति में भरोसा करता है. ऐसे वक्त में जब भारत ने वार्षिक सम्मेलन में रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन की मेजबानी कर तमाम समझौतों पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, तब हम यह गुनगुना सकते हैं,' रूसी हिंदी भाई-भाई'. ठीक इसी तरह हमें सैनिकों की शान में लगने वाले नारे, 'जय जवान, जय किसान' को फिर से धार देने की जरूरत है, पर वर्तमान हुक्मरान सुनें तब न!
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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