क्षमा करना बापू! ये विज्ञापनों भर से आंकते हैं आपको

क्षमा करना बापू! ये विज्ञापनों भर से आंकते हैं आपको पंद्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी और दो अक्टूबर को राष्ट्रीय पर्व की तरह मनाने की बचपन से ही मेरे हम उम्र लोगों की आदत सी रही है, जो अभी तक कायम है. उस लिहाज से हमारे जैसे लोगों के लिए आज 'राष्ट्रीय पर्व' है. दो अक्टूबर, यानी बापू की जयंती. बापू यानी महात्मा, यानी राष्ट्रपिता, यानी साबरमति के संत, यानी वह शख्सियत, जिसके सम्मान में आइंस्टीन से लेकर मार्टिन लूथर किंग और बराक ओबामा तक ने क्या कुछ नहीं कहा.

उसी बापू की जयंती पर केंद्र की भाजपा की नरेन्द्र मोदी की अगुआई वाली सरकार ने अखबारों से 'राष्ट्रपिता' को श्रद्धांजलि स्वरूप दिए जाने वाले सम्मान सूचक विज्ञापन गायब करा दिए हैं. इन विज्ञापनों से 'गांधी जयंती' पर बापू के संदेश जनमानस तक पहुंचते थे. यह परंपरा आजादी के बाद से ही कायम थी. एक कृतज्ञ राष्ट्र, जिसमें बापू की हत्या उनके सिद्धांतों और आदर्शों के चलते हो गई थी, इससे ज्यादा उनके लिए कर भी क्या सकता था.

पर अभी की सत्तारूढ़ सरकार के निगहबानों ने, तर्क चाहे वह जो दें,  इस मुगालते में 'गांधी जयंती' के विज्ञापनों को हटवाया कि इससे वह बापू की अहमियत को कम कर पाएंगे. बापू की अहमियत, मतलब उनके सिद्धांतों की अहमियत. वह सिद्धांत जो हिंदू धर्म के वह पक्ष हैं, जिनसे सनातन धर्म जिंदा है. जो समूचे विश्व को ' वसुधैव कुटुंबकम ' की तर्ज पर अपना मानता है. जिसमें एक शख्स ' रघुपति राघव राजाराम, पतित पावन सीताराम' के साथ-साथ ' वैष्णव जन जे तेने कहिए, जे पीर पराई जाणे रे' की भावना से ओत-प्रोत हो यह गुनगुना सकता है कि ' अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान.'

निश्चित रूप से यह सोच उस कट्टर हिंदू विचारधारा के विपरीत है, जिसकी नुमाइंदगी और महिमामंडन आज की सत्तारूढ़ सरकार कर रही है. यह सरकार एक और ओछा खेल खेल रही है वह है गांधी बनाम शास्त्री का माहौल बनाना...अरे भाई, अखबारों के विज्ञापन हटा लेने, या बापू के साथ शास्त्री जी का चित्र लगा देने से बापू का सम्मान और जनमानस पर उनका प्रभाव कम हो पाएगा क्या? ऐसी ओछी हरकत और मुगालता आज ही नहीं बापू के जीवन काल के शुरुआती सियासी दौर में ब्रिटीश सत्ता को भी था. वह जब तब बापू को जेल में बंद कर उनकी लोक सत्ता, लोकप्रियता को आजमाती और थक हार कर उन्हें छोड़ देती.

पर शायद बापू के जिन सबल के सिद्धांतों आगे सर्वशक्तिमान ब्रिटीश साम्राज्य तक ने घुटने टेक दिए थे, उन्हीं के विरोध में सत्ता पाते ही भगवा मंडली ने अपना खेल शुरू कर दिया है. आज हर उस चीज को तरजीह दी जा रही, जो गांधी जी के संदेशों के प्रतिकूल है. भज-भज मंडली हमेशा ही गांधी जी को और उनके विचारों को अपना अंगरेजों से भी बड़ा शत्रु मानती रही है. वह गांधी ही थे, जिनके चलते संकीर्ण हिंदू मानसिकता कभी इस देश में परवान नहीं चढ़ सकी. शायद सत्ता पाने के बाद यह सरकार सोचती है कि अखबारों से विज्ञापन हटाकर, या गांधी बनाम शास्त्री जैसा माहौल खड़ा कर ये लोग बापू का कद छोटा कर देंगे, या बापू अप्रासंगिक हो जाएंगे..

तो इस रुग्ण मानसिकता के लोगों को केवल कुछ छोटी बातें बताना काफी होगा. जैसे गांधी जी जैसा जनप्रिय नेता धरती के इतिहास में अपने जीवनकाल में कोई दूसरा नहीं हुआ. यहां तक कि न ईसा, न बुद्ध. मानवीय समाज और राजनीति को अपने जीवनकाल में ही गांधी जी ने इस कदर प्रभावित कर दिया था, कि समूचा इतिहास और भूगोल बदल गया. 'अहिंसा', 'सत्य' और 'भाईचारा' के उनके विचारों की अहमियत इस एक बात से समझिए कि साल 1933 में भारत की दो महान संतान गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और डा राधाकृष्णन ने लंबी आलोचना के बाद यह निष्कर्ष निकाला था कि पिछले दो सौ सालों में महात्मा की तरह 'स्वर्गीय अग्नि' को वहन करने वाले व्यक्तित्व ने भारत में जन्म नहीं लिया.

मार्टिन लूथर किंग के शब्द थे, ईसा मसीह ने हमें विचार दिए पर गांधी जी ने हमें उन विचारों पर चलने के लिए मार्ग सुझाया. गांधी जी वह शख्सियत थे, जिनका भारतीय परंपरा में अटूट विश्वास था. अहिंसा परमो धर्मः का संदेश पतंजलि ने दिया था और गांधी जी से पहले तक लोग यह तो मानते थे कि अहिंसा और सत्य से लोगों के निज का, व्यक्तित्व का विकास होता है, पर 'अहिंसा' एक अमोघ शक्ति है, जो सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं का निदान भी कर सकती है, यह केवल गांधी जी ने न केवल बताया, करके दिखाया. इसी तरह 'सत्य' को निजहित से ऊपर 'सत्याग्रह' में परिवर्तित कर गांधी जी ने वह कर दिखाया, जिसे तोपें व बंदूकें भी नहीं कर सकीं.

वह बापू ही थे जिनके सत्याग्रह के आगे अंगरेज, हिंदू, मुसलमान सभी नतमस्तक थे. जिन दिनों देश हिंदू-मुसलिम दंगों की आंच में जूझ रहा था, और समूची राजसत्ता पंजाब और बंगाल के दंगों को शांत कराने में असफल साबित हो रही थी, तब अकेले गांधी जी ने नोआखोली को न केवल शांत करा दिया था, बल्कि वहां के लोग दूसरी जगहों पर शांति स्थापित कराने भी जाने लगे थे. तब ब्रिटीश वायसराय के शब्द थे, एक अकेले गांधी सर्वसत्तासंपन्न ब्रिटीश साम्राज्य की समूची हथियार बंद फौज से ज्यादा ताकतवर हैं.

जाहिर है बापू बनाम.....कोई भी संभव नहीं. बापू न होते तो कैसे शास्त्री जी प्रधानमंत्री होते और कैसे मोदीजी! स्वच्छ भारत और ग्राम प्रधानों की मीटिंग के बहाने भला बापू छोटे हो सकते हैं क्या? ऐसे दौर में  युद्धोन्माद के मुहाने पर खड़ा देश, बापू के सत्य अहिंसा को समझ सके. यह कामना. नमन बापू!
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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