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तो ब्राह्मण बनाएंगे यूपी की सरकार!

तो ब्राह्मण बनाएंगे यूपी की सरकार! दिल्ली के अखबारों, टेलीविजन चैनलों और मेट्रो ट्रेन में उत्तर प्रदेश सरकार के विज्ञापनों को देखकर यह अंदाज लगाना कोई मुश्किल नहीं कि वहां चुनाव दहलीज पर हैं. पर जाति के बिना क्या उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनावों की कल्पना की जा सकती है? यह सवाल जो लोग उत्तर प्रदेश को जानते हैं, उनके लिए एक मजाक की तरह है? यूपी में राजनीति में जाति है, या जाति में राजनीति, इसका भी उत्तर शायद ही कोई बिरला राजनीति शास्त्री दे पाए. यही वजह है कि यूपी में जातियों की खेमेबंदी को लेकर राजनीति गरमाई हुई है. क्या सपा, क्या बसपा, इनका तो वजूद ही जातियों से है, पर भाजपा और कांग्रेस भी इस गंगा में अब गोते लगा रही हैं.

हालांकि उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनाव 2017 में होने हैं, पर इस में नौ माह से भी कम का समय है, और जनता का जोर जिस तरह से बहुमत की सरकारें चुनने में है, उसे देखते हुए, सत्ता पर दांव खेलने वाला कोई भी दल रिस्क लेने के मूड में नहीं है. यही वजह है कि यूपी की सियासत में प्रभावी भूमिका रखने वाले चारों महत्त्वपूर्ण दल-  समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस कोई कोर-कसर नहीं रखना चाहते. इसीलिए सभी ने अपने घोषित वोट बैंक के साथ-साथ ब्राहमणों को साधने जुगत शुरू कर दी है.

उत्तर प्रदेश में अति पिछड़ा वर्ग आख़िरी पंक्ति के वोटर माने जाते हैं, तो ब्राह्मण पहली पंक्ति के. अति पिछड़ा वर्ग के लोगों की संख्या  ब्राह्मणों की तुलना में काफी कम और वे एकजुट भी नहीं है. उनकी तुलना में ब्राह्मण काफी प्रभावी हैं. हालांकि सक्षम वर्ग होने, और नौकरी पेशा, शिक्षा, व्यापार आदि के लिए प्रदेश से बाहर रहने के चलते राज्य में  ब्राह्मणों की निश्चित आबादी को लेकर कई तरह के आंकड़े हैं, पर कोई भी आंकड़ा उनकी आबादी को 10 फ़ीसदी से कम नहीं बताता. प्रदेश के तमाम विधानसभा क्षेत्र में तो ये 20 प्रतिशत के ऊपर हैं. यही वजह है कि ब्राह्मण सभी के निशाने पर हैं.

2007 के विधानसभा चुनाव में कहते हैं कि मायावती को केवल 17 फ़ीसदी ब्राह्मणों ने ही वोट दिया था और इसमें से भी ब्राह्मणों के अधिकतर वोट बसपा को वहां मिले थे,  जहां उसने ब्राह्मण उम्मीदवार खड़ा किए हुए थे. फिर भी मायावती की सरकार बहुमत से बनी. जाहिर है राज्य में ब्राह्मण, न केवल एक मतदाता है, बल्कि 'मोटिवेटर' भी. 2009 के लोक सभा चुनाव में ब्राह्मणों ने इसे साबित भी कर दिया. इस बार ब्राह्मणों ने मायावती का साथ नहीं दिया और कांग्रेस को अपना समर्थन दे दिया. नतीजा यह हुआ कि  2004 के लोक सभा चुनाव में केवल चार सीटों वाली कांग्रेस को 2009 के लोक सभा चुनाव में यूपी में 80 में से 21 सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब रही.

पर 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने ब्राह्मणों को बड़े पैमाने पर रिझाने की कोशिश की और यह छवि बनाई कि ब्राह्मण मायावती का साथ छोड़कर अखिलेश यादव के पास आ रहे हैं. उन्हें इसका लाभ भी मिला और उसकी सरकार बन गई. 2014 के लोकसभा चुनाव में राज्य के ब्राह्मणों ने खुलकर बीजेपी का साथ दिया और  ब्राह्मणों के समर्थन और मोदी लहर ने मिलकर बीजेपी को 80 में से 71 सीटें जीता दीं.

यह एक शोध का विषय हो सकता है कि ब्राह्मण वोट का सबसे बड़ा शेयर काफी समय से बीजेपी के पास है, पर विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण-बीजेपी साझेदारी में हमेशा कमी आती रही है. लोकनीति सर्वे के अनुसार विधानसभा चुनावों में भाजपा का ब्राह्मण वोट बैंक कम हो रहा है. 2002 (50 प्रतिशत) और 2007 (44प्रतिशत) के बीच इसमें छह प्रतिशत की कमी रही. वहीं 2007 से 2012 (38 प्रतिशत) के बीच छह प्रतिशत की कमी और दर्ज की गई. समाजवादी पार्टी ने 2012 विधानसभा चुनाव जीतकर जब सरकार बनार्इ,  तब उसे ब्राह्मणों के 19 प्रतिशत मत मिले थे.

उत्तर प्रदेश में बीजेपी को लेकर ब्राह्मणों की एक ही शिकायत है. अटल बिहारी वाजपेयी और मुरली मनोहर जोशी के बाद राज्य से उनके कद का कोई भी ब्राह्मण नेता नहीं है. उत्तर प्रदेश में बीजेपी का सबसे कद्दावर चेहरा राजनाथ सिंह हैं, पर वे ठाकुर हैं. केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ रमापतिराम त्रिपाठी और विधानपरिषद में बीजेपी नेता ह्रदय नारायण दीक्षित जैसे कुछ नाम हैं जरूर, पर उनका जनाधार व लोकप्रियता वह नहीं कि उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए प्रोजेक्ट किया जाए.

बीजेपी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले लक्ष्मीकांत बाजपेयी को प्रांत अध्यक्ष बनाकर आजमा भी लिया, पर पार्टी को इसका लाभ नहीं मिला. सच तो यह है कि ब्राह्मणों के लिए विधानसभा में ख़ुद का प्रतिनिधित्व हिंदुत्व की राजनीति से ज्यादा महत्व रखता है. इसीलिए बीजेपी के युवा नेतृत्व ने गौतमबुद्धनगर से सांसद डॉ. महेश शर्मा पर दांव लगाने का मन बना सा लिया है. डॉ. महेश शर्मा यूपी में युवा ब्राह्मण चेहरा माने जाते हैं. उनका केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह पाना इस बात का संकेत था कि मोदी सरकार यूपी में ब्राह्मण वोटों को रिझाने की हर संभव कोशिश करेगी.

बाद के दिनों में डॉ शर्मा ने जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नजदीकियां हासिल कीं, उससे भी उनकी दावेदारी और मान्यता को बल मिला है. डॉ. महेश शर्मा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पसंद होने के साथ-साथ बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के भी खासमखास हैं. कैलाश ग्रुप अस्पतालों के मालिक डॉ शर्मा इलाके में जनसेवा और पार्टी पोलिटिक्स ऊपर उठकर अपनी व्यवहारकुशलता के लिए भी जाने जाते हैं. संघ के एजेंडॅ को आगे बढ़ाने और अपने स्पष्ट विचारों के चलते राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के शीर्ष पदाधिकारियों का समर्थन और आशीर्वाद भी उन्हें हासिल है.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की अपनी हर बड़ी रैली में डॉ. महेश शर्मा को अपने साथ रखते हैं. हाल ही में गांधी जी के पौत्र के जब दिल्ली के वृद्धाश्रम में रहने की खबर आई, तो प्रधानमंत्री ने शर्मा पर ही भरोसा किया और उन्हें अपने प्रतिनिधि के रूप में उनके पास भेजा. मोदी और शाह को अभी काफी लंबी पारी खेलनी है, इसलिए उन्हें उत्तरप्रदेश से दिग्गज नहीं समर्थक नेता चाहे, जिस पर भरोसा किया जा सके. राजस्थान के मूल निवासी तथा यूपी में बीजेपी के संगठन महामंत्री सुनील बंसल और राजस्थान के ही दिग्गज नेता तथा यूपी में बीजेपी प्रभारी ओम माथुर का साथ भी डॉ शर्मा के पक्ष में है. डॉ महेश शर्मा भी राजस्थान के मूल निवासी हैं, पर उनकी कर्मभूमि यूपी है.

यूपी का शायद ही कोई ऐसा नौकरशाह हो, जो डॉ शर्मा को न जानता हो. तय है, अगर बीजेपी को अखिलेश यादव, मायावती और पीके की अगुआई में आगे बढने की कोशिश में लगी कांग्रेस का तोड़ निकालना है और लोकसभा चुनाव में राज्य से मिली अपनी सफलता को बरकरार रखना है तो उसे  डॉ महेश शर्मा जैसे किसी साफ-सुथरी, तेज-तर्रार छवि वाले नेता  पर ही दांव लगाना होगा. असम में विधानसभा चुनाव से पहले सर्बानंद सोनेवाल का नाम चलाकर बीजेपी ने वहां जो कामयाबी हासिल की थी, अब यूपी में उसे दोहराने की बारी है.

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सूत्रों के अनुसार उत्तर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष के पद पर डॉ लक्ष्मीकांत बाजपेयी के स्थान पर केन्द्रीय रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा का नाम केन्द्रीय नेत्रित्व ने तय कर दिया था, लेकिन ऐन वक्त पर शर्मा के विरोध के कारण संघ के एक केन्द्रीय अधिकारी ने यह कह कर विरोध कर दिया कि ब्राहमण (सवर्ण) हटा कर भूमिहार (सवर्ण) को प्रदेश अध्यक्ष बनाना ठीक नहीं है

कांग्रेस को दलित, मुसलमान और ब्राह्मणों का समर्थन मिलता रहा है, लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समाजवादियों के साथ रहे हैं. कांग्रेस के इस समीकरण के अंदर ब्राह्मणों का वर्चस्व रहा है. ठाकुर भी कांग्रेस के इस समीकरण का हिस्सा रहे हैं. राहुल गांधी ने काफी कोशिशें की हैं, लेकिन लगता है कि मायावती के दलित वोट बैंक में सेंध लगाना नामुमकिन है. 

जाहिर है इस सचाई से कांग्रेस भी वाकिफ है, इसीलिए सक्रिय है. शीला दीक्षित का नाम उछाले जाने से लेकर गुलामनबी आजाद तक को प्रभारी बनाकर राज्य में अगुआई का अर्थ बस इतना कि कैसे ब्राह्मणों को साधा जाए. पंडित कमलापति त्रिपाठी के पौत्र और पंडित लोकपति त्रिपाठी के बेटे पंडित राजेशपति त्रिपाठी समूचे उत्तरप्रदेश में घूम-घूम कर ब्राहमण वोटों को कांग्रेस के लिए मजबूत करने में लगे हैं. कांग्रेस विरोधी लहर में अपने बेटे ललितेश पति त्रिपाठी को विधायक बनवाकर राजेशपति ने अपना लोहा पहले ही मनवा लिया है. पर उत्तर प्रदेश में उनके सहयोगी युवा नेता शैलेन्द्र किशोर पाण्डेय 'मधुकर' की मानें, तो पार्टी को इन तैयारियों का लाभ तभी मिलेगा, जब वह दूसरे विपक्षी दलों की तरह स्पष्ट रणनीति बनाएगी और राज्य में जिस किसी को भी चाहे लीडर बनाकर पेश करेगी.  मतलब साफ है, जो भी दल ब्राह्मणों को अपनी ओर करने में कामयाब होगा,  2017 में उत्तर प्रदेश में उसी की सरकार बनेगी. सच है, भले ही जंग अभी दूर है, पर हथियारों पर धार देने और अपने सिपहसालारों को उसके लिए तैयार करने में तो कोई बुराई नहीं.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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