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मथुरा एक सबक, पर सीखे कौन?

मथुरा एक सबक, पर सीखे कौन? मथुरा में लाशों के मिलने का सिलसिला थम गया है. जून 2016 के पहले गुरूवार को जवाहरबाग में अवैध कब्जेदारों और पुलिस के बीच हुई गोलीबारी के बाद शुक्रवार को भी लाशें खोजने का दौर जारी रहा. एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी और एसओ फरह संतोष यादव की शहादत से पुलिस की आंखें नम थीं . मथुरा में इन दो आला अधिकारियों सहित अब तक करीब 29 लोगों के मरने की खबर है.

पर इस घटना का जिम्मेदार किसे माना जाए. सरकार को, कथित सत्याग्रहियों को, अराजक तत्वों को, भ्रष्ट पुलिस अफसरों को या उस व्यवस्था को, जिससे इस तरह के हालात पैदा होते हैं, या फिर उन नेताओं को जो जाति-पांति के नाम पर जब कभी भी सत्ता में होते है तो अपनी वोट बैंक की राजनीति के चलते सरकारी जमीनों की बंदरबांट को अपना हक समझते हैं. फिर उस मीडिया को कैसे बख्श दिया जाए हर छोटी बात पर तो चीखने-चिल्लाने लगता है, पर सामाजिक समस्याओं पर अपनी जिम्मेदारी नहीं समझता.

अगर समय रहते प्रशासनिक लापरवाही नहीं बरती गई होती, तो आज इतना बड़ा हादसा नहीं होता. मथुरा में उद्यान विभाग की संपत्ति है जवाहर बाग. सैकड़ों एकड़ में फैले इस बाग पर साल 2014 के अप्रैल में मध्यप्रदेश के सागर जिले से चला लगभग पांच हजार कथित सत्याग्रहियों का दस्ता पहुंचा, और दो दिन तक रुकने की इजाजत मांग कर वहीं टिक गया. कुछ समय बीतने के बाद जब पासपड़ोस के लोग इनकी हरकतों से तंग आ गए, तब मामला हाईकोर्ट पहुंचा. जमीन को खाली कराने के हाईकोर्ट के आदेश थे.

पुलिस प्रशासन लंबे समय से प्लानिंग में जुटा हुआ था कि जमीन कैसे खाली कराई जाए. चार जून को जवाहरबाग पर चढ़ाई की योजना थी. पुलिस अंदर कैसे प्रवेश करेगी, इस पर भी विचार हुआ था और इसी के रिहर्सल के लिए जब एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी लोकल पुलिस और पीएसी के साथ जवाहरबाग गए तब उनका स्वागत बमों और बंदूकों से किया गया. पुलिस जहां प्लानिंग में जुटी थी वहीं कब्जेदार पूरी तैयारी से थे. पुलिस और प्रशासन की कई जगह से दीवार तोड़ने की योजना थी, ताकि जब चढ़ाई हो तो रास्ता खोजना न पड़े. पर उपद्रवी पहले से तैयारी में थे.

उन्होंने पुलिस के पहुंचते ही फायरिंग शुरू कर दी. बम फोड़ने लगे. आग लगा दी. पेडों पर से गोलिया दागी जाने लगीं. उपर से गैस सिलेंडर और बारूद के विस्फोट से जवाहर बाग दहलने लगा तो पुलिस उल्टे पांव दौड़ ली. एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी जब घिर गए तो एसओ फरह संतोष उन्हें बचाने पहुंचे, पर दोनों शहीद हो गए. इसके बाद पुलिस को मजबूरन फायरिंग करनी पड़ी. कब्जाधारियों का नेता रामवृक्ष भी गायब है, वह मर गया या कहां गया पता नहीं. प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि बच्चे, बूढ़े, जवान और महिलायें आत्मघाती दस्तों की तरह पुलिस से लड़ रहे थे. सबके पास हथियार थे और पुलिस-प्रशासन के अफसरों व कर्मचारियों को सीधा निशाना बना रहे थे. सीधी लड़ाई में बड़ी संख्या में जनहानि हुई.

इस घटना में कई लोग आग में जिंदा जल गए, तमाम लोगों के शवों का पता नहीं. खबर है कि कुछ सिपाही गायब हैं. पुलिस को तलाशी अभियान में अब तक पांच दर्जन तमंचे, कई राइफलें, सैकड़ों कारतूस और बारूद आदि बरामद हुआ है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मथुरा के जवाहरबाग में अतिक्रमणकारियों और पुलिस बल के बीच हुए खूनी संघर्ष के लिए सूबे के प्रशासन और खुफिया तंत्र की ‘चूक’ स्वीकार करते हुए माना है कि पुलिस को हमलावरों की तैयारियों के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं थी.

जानकारी के अनुसार रामवृक्ष यादव नामक शख्स ने 15 मार्च, 2014 को केवल 200 लोगों के लिए दो दिन के लिए मथुरा के जवाहरबाग में रुकने की अनुमति प्रशासन से ली थी. चूंकि मथुरा में दुनिया भर से लोग आते हैं, ठहरते हैं और चले जाते हैं, इसलिए प्रशासन ने उसे भी अनुमति दे दी. लेकिन रामवृक्ष यादव और उसके साथ आये लोग वहां झोपड़ी बना कर रहने लगे और धीरे-धीरे झोपड़ियों को बढ़ाने लगे और इस तरह जवाहर बाग की करीब 270 एकड़ जमीन पर इन कथित सत्याग्रहियों या कहें उपद्रवियों का कब्जा हो गया.

प्रशासन ने इस जमीन खाली कराने के लिए रामवृक्ष यादव के खिलाफ तमाम धाराओं के तहत दस से ज्यादा मुकदमे दर्ज कराए, जिनमें सरकारी संपत्ति पर अवैध कब्जा करने, अफसरों पर हमला करने, सरकारी कार्य में बाधा डालने, लोगों को डराने-धमकाने की धाराएं लगाई गईं, लेकिन संख्या बल और राजनीतिक संरक्षण के चलते रामवृक्ष यादव के गिरोह का कुछ भी उखड़ नहीं सका. आखिरकार विजयपाल तोमर नाम के एक शख्स ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर कर जमीन को कब्जा मुक्त कराने की गुहार लगाई.

बाबा जय गुरुदेव का कथित शिष्य रामवृक्ष यादव उनके निधन के बाद उनकी संपत्ति कब्जाने की नीयत से मथुरा आया था और इसने उनकी विरासत के लिए दावेदारी भी की थी, लेकिन पंकज यादव के सामने यह बौना साबित हुआ. मथुरा- दिल्ली राजमार्ग के किनारे लगभग डेढ़ सौ एकड़ भूमि पर जय गुरुदेव का भव्य आश्रम बना है. बाबा जय गुरुदेव का वास्तविक नाम तुलसीदास था, उनके गुरु श्री घूरेलाल जी थे, जो अलीगढ़ जिले की इगलास तहसील क्षेत्र के गाँव चिरौली के मूल निवासी थे. बाबा ने अपने गुरु स्थान चिरौली के नाम पर सन् 1953 में मथुरा के कृष्णा नगर में चिरौली संत आश्रम की स्थापना की.

बाद में जय गुरुदेव ने साल 1962 में मथुरा में ही दिल्ली राजमार्ग के किनारे मधुवन क्षेत्र में डेढ़ सौ एकड़ भूमि खरीदी, जहां आज विशाल आश्रम बन चुका है. बाबा के अंदर भी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा थी और उन्होंने एक समय तो देश की सभी संसदीय सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे. उनके निधन के बाद जब पंकज यादव उनका उत्तराधिकारी बना, तो इस आश्रम के एक और दावेदार रामवृक्ष यादव ने अपना गैंग बना लिया और सत्याग्रही नाम से उसे संचालित करने लगा.

रामवृक्ष यादव मूल रूप से उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिले के थाना मुरगढ़ के गाँव रामपुर बाग का रहने वाला था, जो बाबा जय गुरुदेव के संरक्षण में उनकी संपत्ति हड़पने की नीयत से मध्य प्रदेश के सागर में रह रहा था, वहाँ से पहले वह दिल्ली आया और फिर बाबा के निधन के बाद मथुरा आ गया. बाबा की संपत्ति कब्जाने में जब उसे पंकज से मात मिली, तो मथुरा में उद्यान विभाग की जमीन पर कब्जा कर लिया.  सवाल यह है कि कहीं जातिवादी राजनीति करने वाले दल के सत्तारूढ़ होने से तो रामवृक्ष जैसे लोगों को ताकत नहीं मिली?

अगर समय रहते ही ऐसी हरकतों पर कबू पा लिया गया होता तो आज देश को अपने अफसर इस तरह नहीं खोने पड़ते. आज कानून व्यवस्था के मसले पर उत्तरप्रदेश का हाल बिहार से भी बदतर है.बिजली गायब रहती है. अफसर सुनते नहीं. ईमानदार अफसर राज्य छोड़ कर दूसरी जगहों में भाग रहे हैं और चाटुकार और भ्रष्ट सचिवालय में बैठ पैसा बनाने में लगे हैं.

ऐसे में दिल्ली की मेट्रो ट्रेन में और टीवी पर विज्ञापन दे देने भर से तो सत्ता के काठ की हाड़ी इस बार चढ़ने वाली नहीं लगती. उत्तर प्रदेश की सरकार और प्रशासन को चाहिए कि इस घटना के बाद समूचे राज्य पर सरकारी जमीनों से अवैध कब्जा हटाए. ताकि दूसरे भी सबक ले सकें और ऐसे हादसे दोबारा न हों. युवा मुख्यमंत्री की सोच और व्यवहार में अब वह तेजी दिखनी ही चाहिए, जिससे यूपी हकीकत में तरक्की की राह पर दौड़ेगा, वरना तो भेंड़्चाल है ही.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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