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गलती आप से भी हो सकती है मी लॉर्ड!

गलती आप से भी हो सकती है मी लॉर्ड! मध्य प्रदेश में देश के उच्चतम न्यायालय के माननीय न्यायाधीश लोग एक मंथन शिविर कर रहे हैं, जिसमें समाज के दूसरे हिस्से के लोग भी शिरकत करेंगे. दरअसल, हमारे न्यायिक ढांचे में यह एक नए तरह की पहल है, जिसमें देश के दिग्गज कानूनविद इस बात पर विचार करेंगे कि न्याय देने की दिशा को कैसे समुन्नत बनाया जाए. यह पहल सराहनीय है, पर इसे निचले स्तर तक, जिला और सत्र न्यायालयों, मुंसिफ अदालतों तक लाया जाना चाहिए. चूंकि विद्वान न्यायाधीश भी इसी समाज का हिस्सा हैं, इसलिए उनसे मानवीय भूल होना कोई बड़ी बात नहीं. हालांकि हम कह सकते हैं कि इसीलिए बड़ी अदालतों में अपील की व्यवस्था है, पर महंगी न्यायप्रक्रिया को अफोर्ड कर पाना हर किसी के बस का नहीं.
 
कहते हैं कानून की देवी की आंखों पर पट्टी इसलिए बंधी होती है कि न्याय के तराजू पर फैसला करते समय वह विचलित न हों. न तो वादी-प्रतिवादी के आकार-प्रकार, रंग-रूप, मान-मर्यादा, पद-प्रभाव, उम्र-लिंग या धन संपत्ति से...इसके पीछे सोच तो यह भी है कि कानून की देवी, अपनी खुद की संवेदना से भी प्रभावित न हों, और बिना किसी प्रभाव में आए, वह भेद-भाव रहित 'न्याय' कर सकें, इसीलिए उनके हाथों में तराजू है.

पर तब क्या करें, जब किसी केस की सुनवाई करते वक्त न्यायाधीश खुद कानून सम्मत मर्यादा को भूल कर भावनाओं की रौ में बह जाएं और उनके फैसले में तथ्यों, कनून की धाराओं, संविधान के उपबंधों और पूर्व की बड़ी अदालत दी गई व्याख्याओं की जगह, अपनी संवेदनाओं के प्रभाव में आ जाएं, और जमानत देने जैसे मामले में ऐसी टिप्पणियां दें, जो न केवल गैर-जरूरी हों, बल्कि उनसे एक नए तरह का संकट उत्पन्न होने का खतरा हो? जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अध्यक्ष कन्हैया कुमार की जमानत पर फैसला करते वक्त दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की टिप्पणियां इसी श्रेणी में आती हैं.

अफसोस तो यह की अदालत की अवमानना के भय से सोशल मीडिया को छोड़ इसकी कोई चर्चा तक नहीं हुई. न्यायाधीश ने अपनी टिप्पणियों से जो एक माहौल बनाने की कोशिश की थी, उसे भी कन्हैया के जमीन और देश की बेसिक समस्याओं से जुड़े भाषण ने धो डाला. पर बात यहां केवल जनमत की नहीं, बल्कि 'राष्ट्रवाद', राज द्रोह', 'मानवता', 'पुलिस राज' और प्रजातंत्र के बेसिक मूल्यों की है. यह सभी जानते हैं कि गांधी का  'राष्ट्रवाद', सावरकर के 'राष्ट्रवाद' से अलग था, और अपने धर्मनिरपेक्ष विचारों और सत्य के साथ संसर्ग के चलते ही गांधी जी को 78 साल की उम्र में सावरकर समर्थक एक हत्यारे के हाथों जान गंवानी पड़ी.
 
तो क्या गांधी हत्यारों के राष्ट्रवाद का विरोध करना राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में आता है? क्योंकि 'राज द्रोह' तो यह हो ही नहीं सकता, क्योंकि जनतंत्र में जनता का ही राज है, दलों और नेताओं की मार्फत. कन्हैया की जमानत के दौरान न्यायाधीश की टिप्पणियां इस खामी की तरफ ध्यान दिलातीं हैं,  जिसपर समय रहते ही कानून के जानकारों और बड़े पदों पर बैठे न्यायविदों, या फिर उच्चतम न्यायालय को विचार करना चाहिए. कन्हैया को जमानत गैर-जमानती धाराओं में मिली है. पर अगर बिना नाटकीय लफ्जों के यह फैसला आता, तो ज्यादा ठीक होता. न्यायाधीश की टिप्पणियों से 'न्यायिक' मूल्यों और विश्वास की स्थापना की बजाय न्याय पर 'भावुकता' के हावी होते जाने का खतरा पैदा हो गया है, जिससे आने वाले कल में एक गलत नजीर पेश हो सकती है.

अपने देश में दिक्कत यह है कि हम ताकतवर लोगों के खिलाफ खुल कर बोल भी नहीं सकते, और जेएनयू में इसी बात की बहस जारी है. ' रंग हरा हरी सिंह नलवे से, रंग लाल है लाल बहादुर से, रंग बना बसंती भगत सिंह'....जैसे फिल्मी गीत के उद्धरण से शुरू कर न्यायाधीश ने सीधे-सीधे जेएनयू जैसी प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी पर निशाना साधा कि इस बसंत में शांति का ये रंग जेएनयू से खत्म क्यों हो रहा है, इसका जवाब वहां के छात्रों, शिक्षकों और जेएनयू का कार्यभार संभालने वाले लोगों को देना पड़ेगा.

जज ने फैसले में कहा है कि छात्र संघ अध्यक्ष होने के नाते कैंपस में होने वाले किसी भी राष्ट्रविरोधी कार्यक्रम की जिम्मेदारी कन्हैया की समझी जाती है. वह जिस अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात कर रहे हैं, वह भारत की सीमा की रक्षा करने वाले सैनिकों की वजह से है. फ़ैसले में कहा गया है कि ये मामला देशविरोधी नारों का है, जिससे राष्ट्रीय एकता को खतरा होता है. नारे लगाने वाले ये भूल जाते हैं कि वो यूनिवर्सिटी के सुरक्षित वातावरण में इसलिए सांस ले पा रहे हैं क्योंकि भारतीय सेना दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्र में है, जहां ऑक्सीजन भी इतनी मुश्किल से मिलती है कि नारे लगाने वाले एक घंटे भी न रह पाएं.

अदालत ने यह भी कहा कि अभिव्यक्ति की आज़ादी पर भी अनुच्छेद 19 (2) के तहत बंदिशें लगाई गई हैं. नारों में जिन भावनाओं का ज़िक्र है उन पर उन छात्रों को विचार करने की ज़रूरत है. जज ने कहा कि छात्रों में एक तरह का इंफेक्शन फैल रहा है, इसे बीमारी बनने से पहले रोकना होगा. इस तरह के इंफेक्शन के फैलने पर उसे रोकने के लिए एंटी बायोटिक का प्रयोग किया जाता है. उसके बाद भी इंफेक्शन कंट्रोल नहीं होता तो दूसरे चरण का इलाज शुरू होता है. ऐसे में कई बार ऑपरेशन की जरूरत होती है. न्यायिक हिरासत के दौरान याचिकाकर्ता यानि कन्हैया कुमार ने उस घटना के बारे में सोचा होगा कि आखिर ऐसी घटना हुई क्यों. हद है, यह किस तरह के फैसले की भाषा है?

अगर जेएनयू में लगने वाले नारों  की जिम्मेदारी छात्रसंघ अध्यक्ष होने के नाते कन्हैया की है, तो देश के दूसरे हिस्सों में लगने वाले नारों का जिम्मेदार किसे माना जाएगा? फिर तो 1984, 1992, 2002 के दंगों की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की होनी चाहिए. तो क्या अब इन लोगों पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए? फिर पटेल आंदोलन, गूजर आंदोलन और जाट आंदोलन की ज़िम्मेदारी किस पर डाली जाएगी? यही नहीं दिल्ली के पटियाला कोर्ट में सुप्रीमकोर्ट के निर्देशों के खिलफ जाकर वकीलों का उत्पात किस श्रेणी में आएगा?

अब यह तथ्य है कि जेएनयू में नारे लगाने वाले वीडियो से छेड़छाड़ हुई थी. कन्हैया के खिलाफ राष्ट्रविरोधी नारे लगाने के अरोप सिद्ध नहीं हुए हैं. उसने जो तब कहा था, वह जमानत पाने के बाद फिर से कहा. विचारधारा के लेवल पर करोड़ो लोग कन्हैया की बात से सहमत व असहमत हो सकते हैं. पर असहमति का अर्थ 'राष्ट्रद्रोह' नहीं होता. यही प्रजातंत्र की खूबी भी है जहां असहमति को भी स्थान मिलता है...वरना तो अफगानिस्तान में तालिबानी अदालतें और पाकिस्तान में तानाशाही सत्तानशीनों के इशारों पर अदालतों द्वारा दिए गए फैसलों से सभी वाकिफ हैं.

यह एक अच्छी बात है कि कन्हैया के बहाने एक इसे विषय पर चर्चा हो रही है, जिसका एजेंडा अब तक ढंका-छिपा था. इस बहस में अब छात्र, युवा, नेता, अध्यापक, वकील, मीडिया, बौद्धिक और सियासी दलों के बाद अब अदालतें भी शामिल हो गईं हैं. पर जैसा कि कांग्रेस नेता गु़लाम नबी आज़ाद ने राज्यसभा में कहा कि सत्ताधारी भाजपा देश में दोहरा खेल खेल रही है, सरकार और पार्टी दो अलग-अलग भाषाएं बोल रही हैं. एक केंद्रीय मंत्री ने लगभग 5000 लोगों की भीड़ से कहा तुम्हें गोली चलाना होगी, तु्म्हें बंदूके उठाने होंगी, तुम्हें चाकू चलाने होंगे. क्या यह भाषण  भारत को बांटने वाला नहीं है?

आजाद का कहना था, 'आपने निर्दोष छात्र कन्हैया कुमार पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया, क्या ये वो मामले नहीं हैं, जिनमें इन लोगों पर देशद्रोह का मामला चलाना चाहिए, चाहे दक्षिण की पार्टी हो, हिंदू हो या मुसलमान हो, क्षेत्रीय दल हो या भाजपा हो, उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाएं.' कन्हैया ने भी किसानों और जवानों के बीच विभाजक रेखा खींचने की कोशिशों की तरफ इशारा किया है. वाकई देश कई तरह की मुश्किलों से गुजर रहा है. ऐसे समय में सबका साथ- सबका विकास केवल नारा भर न रह जाए, इसकी कोशिश हम सबको करनी होगी. खासकर उनको जो सत्ता और न्याय की कुर्सियों पर बैठे हैं. सर्वोच्च न्यायालय की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि उसने अपने स्तर से इस बात की पहल की.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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