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दांव पर फिर कश्मीर की शांति

दांव पर फिर कश्मीर की शांति मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद जम्मू-कश्मीर के हालात एक बार फिर तेजी से बदले हैं. आम कश्मीरियों के साथ-साथ दिल्ली में भी सियासी पारा चढ़ने लगा है.  दिल्ली की गद्दी पर प्रधानमंत्री बनने के बाद  नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से जम्मू-कश्मीर राज्य में रूचि ली थी और विधानसभा चुनावों के बाद काफी तोल-मोल कर भाजपा और पीडीपी ने मिलकर सरकार बनाई थी, उससे कश्मीरियों को धीरे-धीरे ही सही यह लगने लगा था कि पड़ोसी मुल्क की नापाक कोशिशों से पनपी मजहबी कट्टरता, और उससे उपजा उग्रवादी कहर शायद अब खत्म हो जाएगा, और आने वाले दिनों में धरती के इस जन्नत का नूर लौट आएगा.

पर जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद, जिस तरह से सरकार को लेकर अभी तक भ्रम जारी है, और पीडीपी- भाजपा के बीच कशमकश जारी है,  उस से उम्मीदें टूटती सी लग रहीं. मुफ्ती के निधन के दिन ही खबरें आ रही थीं कि उनकी बेटी और पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती जल्द ही जम्मू-कश्मीर की सीएम के तौर पर शपथ ले सकती हैं. इसके लिए राज्यपाल को चिट्ठी भी लिखी गई थी, लेकिन महबूबा ने शपथ लेने से इंकार कर दिया था.

पीडीपी ने संकेत दिए थे कि मुफ्ती के निधन पर चार दिनों के शोक के बाद ही सरकार के गठन पर कोई फैसला किया जाएगा. वह समय भी बीत गया. इस बीच महबूबा मुफ्ती के भाजपा के केंद्रीय नेता नितिन गडकरी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से अलग-अलग मिलने के बाद राज्य में सरकार बनाने को लेकर नया सस्पेंस शुरू हो गया है. कहते हैं इसके बाद हुई पीडीपी विधायकों की बैठक में महबूबा मुफ्ती रो पड़ीं और उस बैठक में सरकार के गठन पर कोई चर्चा नहीं हुई.

महबूबा को सरकार बनाने की जल्दबाजी नहीं है, उसकी कुछ वजहें हैं. राज्य और पार्टी को लेकर उनकी सोच अपने पिता से अलग है. कट्टरपंथ, आतंकवाद, भारत, पाकिस्तान और कश्मीरियों पर भी महबूबा की सोच थोड़ी साफ है. सहयोगी पार्टी को उसकी हदों में रखने के लिए ही शायद महबूबा ने अपने पत्ते अभी नहीं खोले हैं. जैसा कि बीजेपी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा, 'अगर मुफ्ती साहब गुजर गए हैं, तो ये जरूरी नहीं कि उनकी बेटी ही अगली मुख्यमंत्री बनें. दोनों पार्टियों को बैठकर इस पर फैसला करना चाहिए.'

साफ है कि बीजेपी जहां मौके की नजाकत समझ कई विकल्पों पर विचार कर रही है, वहीं महबूबा बदले हुए हालातों में कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहतीं. सूत्रों के मुताबिक पीडीपी लीडर महबूबा ने बीजेपी के सामने सीएम पद की शपथ लेने से पहले 4 शर्तें रखी हैं. ये शर्तें हैं- सरकार में डिप्टी सीएम जैसी कोई पोस्ट नहीं होगी, बड़े पोर्टफोलियो पीडीपी के पास रहेंगे,  सेंसिटिव इश्यू को अवॉइड किया जाए और राज्य को केंद्र से ज्यादा मदद मिले.

बदले में बीजेपी ने भी पीडीपी के सामने शर्तें रखी हैं. उसका कहना है कि अगर पीडीपी के कहने पर डिप्टी सीएम का पद खत्म किया जाएगा तो, सीएम पद बारी-बारी से दोनों पार्टियों के पास रहेगा. बाकी की शर्तों पर बीजीपी को एतराज नहीं है. कहते हैं. महबूबा इस शर्त को मामने के लिए राजी नहीं हैं. सरकार बनाने में हो रही देरी के चलते राज्य में फिर से गवर्नर रूल लागू हो गया है.

गवर्नर एनएन वोहरा ने दोनों दलों को लेटर लिखकर सरकार बनाने के बारे में स्थिति क्लियर करने को कहा है. 87 सदस्यों वाली असेंबली में पीडीपी के 28 और बीजेपी के 25 विधायक हैं. बहुमत के लिए किसी भी गुट को 44 सीटों की जरूरत होगी. बाकी पार्टियों में सीपीआई (एम)-1, कांग्रेस-12, एनसी-15, जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ्रेंस (जेकेपीसी)-2, जम्मू-कश्मीरपीपुल ड्रेमोक्रेटिक (सेकुलर)-1 और इंडिपेंडेंट सदस्यों की गिनती 3 है.

जाहिर है कि बीजेपी अगर महबूबा का साथ न दे और वह चाहें तो कांग्रेस के साथ भी पीडीपी की सरकार बन सकती है. पर उसके लिए पीडीपी और कांग्रेस के साथ एनसी को भी मिलना होगा. यह गिनती तब  28+12+15 =55 बैठेगी. अगर एनसी महबूबा का साथ न दे और पीडीपी, कांग्रेस और इंडिपेंडेंट हाथ मिला लें, तब भी यह गिनती बहुमत तक नहीं पहुंचेगी. तब यह आंकड़ा 28+12+3 = 43 ही होगा और मेजॉरिटी के लिए 1 और विधायक चाहिए होगा. यही वजह है कि 22 मई, 1959 को जम्मू कश्मीर के अनन्तनाग जिले में मुफ्ती परिवार में जन्मी महबूबा फूंक-फूंक कर कदम रख रही हैं.

56 वर्षीय महबूबा मुफ्ती फिलहाल लोकसभा की सदस्य हैं. वह विधायक भी रही हैं.1999 का लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने विधानसभा से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन उमर अब्दुल्ला से चुनाव हार गईं थीं. 2002 में वे पहलगाम से चुनाव जीतीं. 2004 में कांग्रेस की अलायंस सरकार का हिस्सा बनीं और लोकसभा चुनाव भी जीत गईं. वे अभी जम्मू-कश्मीर की अनंतनाग सीट से सांसद हैं. अपने पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद अगर उन्होंने सत्ता संभाली, तो वह राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री होंगी. पर पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती के हालिया रूख को देखकर ऐसा लगता नहीं है कि वे भाजपा से बिना कोई तोलमोल किए सत्ता संभालने को तैयार हैं.

पिछली बैठकों में उन्होंने प्रदेश प्रशासन का शुक्रिया अदा किया और साफ कहा कि वे जम्मू-कश्मीर के सामने आई चुनौतियों का सामना करने के लिए मुफ्ती मोहम्मद सईद के विचारों का ही अनुसरण करेंगी. महबूबा का दावा था कि मुफ्ती साहब को पूरा विश्वास था कि अगर सरकार के विकास और कल्याण के एजेंडे को लागू करने में प्रशासन जोश और सक्रियता से शामिल न होता, तो इतना कुछ हासिल नहीं किया जा सकता था. उन्होंने कहा, 'खुशकिस्मती से 2002 और 2015 में प्रशासन, नेताओं के साथ तेजी से जुड़ा और जम्मू-कश्मीर की खुशहाली के लिए मुफ्ती साहब के सपने को साकार करने में अथक मेहनत की.'

महबूबा के इस बयान को वहां के प्रशासन पर अपनी पकड़ बनाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है, साथ ही वह सहानुभूति के पत्ते भी खेल रही हैं. महबूबा ने कहा कि उनके पिता प्रदेश प्रशासन को हमेशा से देश का सबसे बेहतरीन प्रशासन बताते थे. महबूबा के शब्दों में, 'मुफ्ती साहब का मानना था कि 2002 और 2015 में उनकी सरकार जो कुछ भी अच्छा कर पाई है, वो प्रदेश प्रशासन की आवश्यक क्षमता और सहयोग के बिना संभव नहीं था.' महबूबा कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की निजी दोस्त हैं और दोनों के जीवन में कई समानताएं भी हैं. राजनीतिक परिवार में पैदा होने के बावजूद महबूबा कई सालों तक राजनीति से दूर रहीं

कश्मीर यूनिवर्सिटी से वकालत की डिग्री लेने के बाद महबूबा का बिजनेसमैन जावेद इकबाल के साथ निकाह हो गया. हालांकि, दो बेटियों के जन्म के बाद महबूबा और जावेद में तलाक हो गया. महबूबा ने अपनी दो छोटी बेटियों इल्तिजा और इर्तिका की परवरिश अकेले ही की. 1980 के बाद पिता के कहने पर राजनीति में आईं और उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर बिजबेहरा नामक सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा. ये वो दौर था जब मुफ्ती कांग्रेस में वापस आए थे और इसी दौर में महबूबा का सितारा बुलंद हुआ.

महबूबा जम्मू कश्मीर की गिनी चुनी महिला राजनीतिज्ञों में से एक हैं, जो अपने कामकाज और उन्नत सोच के चलते ऊंचाई तक पहुंच पाई हैं.1999 में जब मुफ्ती मोहम्मद सईद ने कांग्रेस से अलग होकर पीडीपी की स्थापना की तो महबूबा ने हर कदम पर पिता का साथ दिया. महबूबा ने पार्टी को राज्य की एक महत्त्वपूर्ण धुरी बनाने में जुझारूपन का परिचय दिया. मुफ्ती पीडीपी के अध्यक्ष बने और महबूबा उपाध्यक्ष. हालांकि, उनके पिता तभी चाहते थे कि महबूबा ही पार्टी की अध्यक्ष बनें पर उस समय उन्होंने उपाध्यक्ष बनना ही स्वीकार किया.

महबूबा मुफ्ती को राजनीतिक अनुभव तो है, लेकिन प्रशासनिक अनुभव बिलकुल भी नहीं है. अभी तक उनकी भूमिका पार्टी को मजबूत करने की थी, राजनीतिक सहयोगियों को साथ लेकर चलने और विरोधियों को शिकस्त देने की भूमिका उनके पिता मुफ्ती मुहम्मद सईद निभा रहे थे.  मुफ्ती मुहम्मद सईद के पिछले कार्यकाल में अच्छे विकास कार्य हुए थे, पर मार्च 2015 से अब तक का कार्यकाल इस दृष्टि से कोई बहुत उल्लेखनीय नहीं था. नए मुख्यमंत्री के लिए राज्य के युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करना भी एक बहुत बड़ी चुनौती है, क्योंकि आज भी सरकार ही वहां रोजगार देने वाली लगभग एकमात्र एजेंसी है. राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना न केवल जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक नेतृत्व की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है, बल्कि समूचे देश और दुनिया की नजर भी इसी ओर लगी है.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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