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कोहरे में गणतंत्र

जय प्रकाश पाण्डेय , Jan 26, 2016, 2:07 am IST
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कोहरे में गणतंत्र हर साल छब्बीस जनवरी आती है, और इसके साथ ही देश को अवसर मिलता है, उन लोगों को, स्वतंत्रता सेनानियों को, कर्णधारों को याद करने का, जिनकी बदौलत न केवल हमें आजादी मिली, बल्कि जिनके चलते हमें दुनिया का सर्वोत्तम 'संविधान', सबसे बड़ा 'प्रजातंत्र' और उसकी प्रतिनिधि सभा 'संसद' मिली. भारत आज एक ऐसा संप्रभू राष्ट्र है, जिसे अपनी सेना, अपनी अर्थनीति, अपनी लोकतांत्रिक प्रणाली,ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में हासिल उपलब्धियों पर गर्व है. भारतीय आज दुनिया भर में अपना परचम फहरा रहे हैं, और इस समस्त धरा पर कोई ऐसा देश अब नहीं, जो हमारी अनदेखी कर दे.

इस लिहाज से देखें, तो हमें हमारी तरक्की बेमिसाल है, और इस पर हमें इतराने का हक भी. पर क्या वाकई हमारे संविधान निर्माताओं ने बस यही चाहा था, क्या उन्होंने विकास के इसी स्वरूप की कल्पना की थी, जिसकी सबसे ऊंची पायदान पर खड़ा आदमी भी अंदर से खोखला और अकेला है? जिसकी दृष्टि अपनी पार्टी, अपने राज्य या फिर अपनी कोटरी से ऊपर उठती ही नहीं? क्या आजादी के दीवानों ने इतने भर के लिए जंगे आजादी में अपनी, अपने 'तात्कालिक' हितों की कुर्बानी दी थी? 'तात्कालिक' का यहां अपना बड़ा अर्थ है. उनके तात्कालिक हित तो थे कि वे अंग्रेजों से मिले रहते, अंग्रेजी साम्राज्य के हितों की रक्षा करते, उनके तलवे चाटते, और आम जनता भले ही पिसती, लुटती, भाड़ में जाती, पर वे मलाइयां खाते रहते.

पर उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वे सही मायनों में देश और समाज के लिए जी रहे थे. जिन्होंने हमारे कल के लिए अपना आज कुर्बान कर दिया था, उनका उद्देश्य एक ऐसे देश की संरचना का था, जिसमें सामाजिक विसंगति न हो, आर्थिक खाई इतनी गहरी न हो, सामाजिक समरसता हो, विकास के समान अवसर हों, उपलब्ध संसाधनों पर सबका समान अधिकार हो, किसी भी वजह से छूआछूत, ऊंच-नीच, गैर-बराबरी का भाव न हो. ऐसा न हो कि कोई रायबहादुर, सर, लाट साहेब बना रहे, और अपने साम, दाम, दंड, भेद से इस धरती के असली राजा 'आम जन' को दबाए रखे.

यही वजह था कि जब हमें आजादी मिली, तब शासन व्यवस्था को सुचारू रूप देने के लिए हमारे राष्ट्र निर्माताओं को एक लंबा वक्त लगा. हमारे संविधान में सबके लिए समानता के मूल उद्देश्य को सर्वोपरि रखा गया. संविधान की पहली पंक्ति, जिसे हम प्रस्तावना कहते हैं, को शब्दशः रखें तो, उसमें कहा गया है- " हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को : सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढाने के लिए दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई.(मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं."

कितने उत्तम विचार, कितनी अच्छी पंक्तियां, कितना मौलिक, मानवीय उद्देश्य....पर हुआ क्या? हमारी घटिया सियासत और स्वार्थी नेताओं के हुजूम ने संविधान के मूल उद्देश्य की ही बैंड बजा दी. नेता या तो जातियों के हैं, या पार्टियों के, सरकारें या तो दलों की बन रही, या फिर गठबंधनों की, नेता या तो किसी कुनबे से बंधा है, या फिर विचार विशेष से...पक्ष-विपक्ष, सत्ता पक्ष, विरोधी दल...जनता किससे करे फरियाद? समन्वित तरक्की, मानवीय आदर और गरिमा की जगह, उसे जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा और वर्ग के खांचे में बांटा जा रहा है, ताकि मौकापरस्त, धनलोलुप, सत्तालोभी नेताओं की अपनी 'सर्वोच्चता' बरकरार रह सके.

...और उनके इस कुकृत्य में भागीदार हैं स्वार्थी व्यापारी, भ्रष्ट नौकरशाह, ठेकेदार और वे धनपशु, सत्ता जिनकी चेरी और वह दुधारू गाय हो गई है, जिसके सामने आम जन की हालत भिखारी से ज्यादा कुछ नहीं. जिधर हाथ डालिए, जिधर देखिए...अंधेरा ही अंधेरा..समूचे समाज को एक ऐसी रेस का हिस्सा बना दिया गया है, जिसकी अंधी भेड़-चाल में, उसे अपना, अपने आसपास का भी न दिखे...मेड इन इंडिया, मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, स्वच्छ भारत...चल क्या रहा है यह? पार्टी विशेष के लोग भी नहीं बता सकते कि इस योजना विषेष का लाभ, इस इलाके, इस जमात, इस व्यक्ति और इस शहर पर पड़ा.

कांग्रेस के दलालों ने दस सालों में जितनी कमाई नहीं की, भाजपा राज में जुमा-जुमा आठ दिन में ही उससे कई गुना का लाभ या तो अमीरो को हुआ, या फिर दलालों को, या फिर सेवकों को... कहां से शुरू करें और कहां खत्म, समझ में ही नहीं आता. लोग लिखने में डरते हैं. एक हालिया रिपोर्ट ने बताया की भारत दुनिया भर में काम कर रहे पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक देशों में से एक है. दूसरी रिपोर्ट बताती है कि साल-दर साल अमीरी और गरीबी के बीच खाई बढ़ती जा रही है. अमीर और अमीर, गरीब और गरीब होता जा रहा है. आलम यह है कि दुनिया की कुल आधी आबादी के पास जितनी संपत्ति है, उतनी केवल बासठ लोगों के पास है, जिनमें कुछ भारतीय भी शामिल हैं.

और शर्मनाक तो यह कि वह रिपोर्ट विभिन्न देशों में बढ़ती आय असमानता का जिक्र करते हुए यह भी बताती है कि भारत की शीर्ष आईटी कंपनी के सीईओ का वेतन वहां के एक सामान्य कर्मचारी की तुलना में 416 गुना अधिक है.इसी तरह सबसे बड़े सिगरेट विनिर्माता का वेतन मध्यम स्तर के कर्मचारी से 439 गुना अधिक है. वेतन असमानता के अलावा रिपोर्ट में जो सबसे चौंकाने वाली बात है, वह यह है कि भारत में 46 अरबपतियों ने अपनी तमाम धन संपदा उन क्षेत्रों के जरिए जुटाई है, जो बाजार की ताकत, प्रभाव और लाइसेंसिंग में तरजीही पहुंच पर निर्भर करती है. इशारा साफ है, जिसने सरकार को, या वहां काम कर रहे व्यक्ति और नेता जी को जितना साधा, उसकी उतनी ही अधिक इनकम...

उसी रिपोर्ट में भारत की जिस एक बात के लिए सराहना की गई है, वह है कि यहां खुलासे को अधिक अनिवार्य किया गय है. इशारा साफ आरटीआई की तरफ है, पर उसमें 'अच्छे दिनों' के वादे वाली इस सरकार की क्या भूमिका? आर्थिक क्षेत्र की अनदेखी कर भी दें, तो समाज का क्या करें. दादरी में गोमांस की अफवाह के नाम पर एक इनसान की हत्या का पाप धुला भी नहीं था कि हैदराबाद के एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोध छात्र ने आत्महत्या कर ली, क्योंकि उसे, उसके दूसरे और चार साथियों के साथ, विश्वविद्यालय के हास्टल से निलंबित कर दिया गया था. ये लड़के आंदोलन पर थे, और जब दबाव बर्दाश्त नहीं हुआ, तो एक ने जान दे दी. पर हमारी केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री को किसी की जान जाने से ज्यादा चिंता इस बात को साबित करने की थी कि वह लड़का दलित नहीं पिछड़ा था, और मीडिया के लिए भी वह एक शोध छात्र नहीं, एक 'दलित छात्र' था.

शर्मनाक! उद्धरण ढेरों हैं, पर जिस तरह केवल आलोचना से काम नहीं चल सकता, उसी तरह केवल गाल बजा देने भर से देश नहीं बदल जाते..यह देश उतना ही इसके अपने नागरिकों का भी है, जितना कि सियासतबाजों का. ये सुधर जाएं, अवसरवादिता से उठ कर समाज और गण के लिए करें. तंत्र का इस्तेमाल 'गण' के लिए हो तभी ये सियासतबाज से अलग  'नेता'  कहलाएंगे, वरना इन्हें 'नेता' कहना, इस शब्द की तौहीन है...इसमें,हमारी आप की भूमिका अलख जगाने की है, जागरूक रहने की है. आने वाले सालों में हम इस अलख को जगाए रख सकें, ताकि ' गणतंत्र' का असली मकसद हल हो सके, इन्हीं कामनाओं के साथ गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं. जय हिन्द , जय भारत.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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