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संसद को नकारा तो न बनाएं माननीय

संसद को नकारा तो न बनाएं माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सियासत का मैदान मारने में माहिर हो गए हैं, इसीलिए रूस और अफगानिस्तान के दो दिवसीय दौरे से भारत लौटते हुए जब वह अचानक से पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के आमंत्रण के चलते लगभग ढाई घंटों के लिए लाहौर उतर गए, तो समूचे देश में इस पर चर्चा शुरू हो गई, और इसके साथ ही लोग संसद के शीतकालीन सत्र की सूखी और निराशाजनक ढंग से विदाई को भूल गए. लोग यह भी भूल गए कि संसद सत्र के दौरान कायदे से भारत-पाकिस्तान संबंधों विदेशमंत्री सुषमा स्वराज के प्रयासों के बाद भी कोई सकारात्मक बहस नहीं हो सकी थी.

हमारी संसद न केवल जनआकांक्षाओं का प्रतीक है, बल्कि वहां बने नीति-नियम देश की दशा और दिशा तय करते हैं. संविधान दिवस के नाम पर जब संसद के शीतकालीन सत्र की शुरुआत हुई थी, तब सभी पक्षों ने सदन की गरिमा पर जोर दिया था. 26 नवंबर को डॉ बीआर अम्बेडकर की 125वीं जन्मशताब्दी पर संविधान के प्रति प्रतिबद्धता का वचन दोहराया गया था और विचार विमर्श के लिए जो दो दिवसीय विशेष सत्र आयोजित हुआ, उसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष ने खुले दिल से असहिष्णुता, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में बाढ़, देश में सूखे की स्थिति और मूल्य वृद्धि जैसे मसलों पर चर्चा की थी.

एक बारगी तब यह लगा था कि इस सत्र में हमारे जनप्रतिनिधि राजनीतिक भेदभाव भूलाकर जनता के हित में फैसले करेंगे. उन शुरुआती दिनों  की सफलता से खुश प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तब कहा था, "वाद-विवाद और संवाद ही संसद की आत्मा है, बाकी बातों के लिए पूरे देश का मैदान है. मुझे आशा है कि देश संसद से जो अपेक्षा कर रहा है, हम सब मिलकर उसे पूरा करेंगे. हमारा संविधान उम्मीद की किरण है. मुझे विश्वास है कि इस सत्र के दौरान उत्तम चर्चा से सदन भी उतना ही चमकेगा." पर हुआ क्या? लोकसभा ने जैसे-तैसे करके आनन-फानन में बमुश्किल दर्जन भर विधेयक पास किए, उनमें भी ज्यादातर पर कोई खास चर्चा नहीं हुई. ऊपरी सदन राज्यसभा, जहां विपक्ष का दबदबा ज्यादा है, का हाल तो और भी बुरा था. आखिरी के दो-तीन दिनों को छोड़ दें राज्यसभा में मुश्किल से ही कोई विधायी कार्यवाही हो पाई.

आलम यह था कि राज्यसभा की कार्यकलाप सलाहकार समिति ने शीतकालीन सत्र में रखे जाने वाले कुल 18 विधेयकों पर सदन में चर्चा के लिए आखिरी दिनों में केवल 43.50 घंटे चर्चा के लिए आवंटित किए थे. यानी एक विधेयक पर चर्चा के लिए तीन घंटे भी नहीं. हमारे माननीय सांसदों ने इस समय का भी सदुपयोग नहीं किया और  ज्यादातर हिस्सा बेकार के शोरशराबे की भेंट चढ़ गया. जबकि इन विधेयकों में वाणिज्यिक अदालतें, वाणिज्यिक प्रभाग और उच्च न्यायालयों के वाणिज्यिक अपीलीय प्रभाग विधेयक, 2015, मध्यस्थता और सुलह (संशोधन) विधेयक, 2015, परमाणु ऊर्जा (संशोधन) विधेयक, 2015-16 के लिए अनुदान (सामान्य) के लिए अनुपूरक मांगों से संबंधित विधेयक और वर्ष 2012-13 के लिए अनुदानों (सामान्य) के लिए अतिरिक्त मांग, सत्र के दौरान लोकसभा द्वारा पारित सभी विधेयक और व्हिसिल ब्लोअर सुरक्षा (संशोधन) विधेयक, 2015, बाल श्रम (संरक्षण और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2012, जिस पर स्थायी समिति ने दिसंबर, 2013 में अपनी रिपोर्ट पेश की थी, शामिल थे.

राज्यसभा द्वारा पारित सबसे चर्चित विधेयक था 'किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2015. इसे लोकसभा द्वारा पूर्व में ही पारित कर दिया गया था. राज्यसभा ने इसे ध्वनिमत से पारित किया. जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के राज्यसभा में भी पास हो जाने के बाद अब बलात्कार सहित संगीन अपराधों के मामले में कुछ शर्तों के साथ किशोर माने जाने की आयु को 18 से घटाकर 16 वर्ष कर दिया गया है. इस बिल के लागू होने के बाद अगर जुर्म 'जघन्य' हो, यानी आईपीसी में उसकी सज़ा सात साल से अधिक हो तो, 16 से 18 साल की उम्र के नाबालिग को वयस्क माना जाएगा. हालांकि भारत समेत दुनियाभर के करीब 190 देशों ने ‘यूएन कन्वेंशन ऑन चाइल्ड राइट्स’ पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें किसी बच्चे को 'वयस्क' मानने के लिए उम्र सीमा को 18 साल रखने की सलाह दी गई है.

संसद की महिला सशक्तिकरण मामलों पर गठित समिति ने भी महिलाओं के प्रति यौन अपराधों में 16 से 18 साल की उम्र के किशोरों की भूमिका के मद्देनजर पुरूष किशोर की आयु 18 साल से घटाकर 16 साल करने की सिफारिश की थी.  इस कानून के जरिए नाबालिग़ को अदालत में पेश करने के एक महीने के अंदर 'जुवेनाइल जस्टीस बोर्ड' यह जांच करेगा कि अपराध के आरोपी को 'बच्चा' माना जाए या 'वयस्क'. अगर उसे वयस्क मान लिया जाएगा, तो उस पर अपराध की गंभीरता के मुताबिक फैसला भी सुनाया जा सकेगा.

हालांकि शीतकालीन सत्र के दौरान कैरिएज बाई एयर (संशोधन) विधेयक, 2015, भारतीय मानक विधेयक, 2015, उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश (वेतन और सेवा शर्तें) संशोधन विधेयक, 2015, भारतीय ट्रस्टी (संशोधन) विधेयक, 2015, उद्योग (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2015 परक्राम्य दस्तावेज (संशोधन) विधेयक, 2015, परमाणु ऊर्जा (संशोधन) विधेयक, 2015, अनुदानों के लिए अतिरिक्त मांग और अनुपूरक मांगों पर चर्चा और मतदान एवं इससे संबंधित विधेयक, चीनी उपकर (संशोधन) विधेयक, 2015, वाणिज्यिक अदालतें, वाणिज्यिक प्रभाग और उच्च न्यायालयों के वाणिज्यिक अपीलीय प्रभाग विधेयक, 2015, मध्यस्थता और सुलह (संशोधन) विधेयक, 2015 जैसे  विधेयकों को पारित कर दिया गया. पर ये आम जन से ज्यादा संबंधित विभागों, सुविधाओं और प्रशासनिक कार्यों से जुड़े कानून थे.

राज्यसभा ने संविधान के प्रति प्रतिबद्धता, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में बाढ़ और भारत-नेपाल संबंधों पर भी विचार विमर्श किया . कहने के लिए तो सदन में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की इस्लामाबाद यात्रा, जलवायु परिवर्तन और पूर्वोत्तर पर केन्द्रित क्षेत्रीय संपर्क के लिए सड़क परिवहन और राजमार्गों से जुड़ी पहलों के संदर्भ में संबंधित मंत्रियों द्वारा स्वतः संज्ञान से वक्तव्य भी दिए गए, पर जनता से सीधे जुड़े मामले बट्टेखाते में ही रह गए. सरकार विपक्ष पर साथ न देने का आरोप लगाती रही, वहीं विपक्ष भ्रष्टाचार और सीबीआई दुरुपयोग वाले आरोपों के साथ सरकार पर निशाना साधता रहा.  हंगामे के इस माहौल के चलते ही इस बार भी संसद में जीएसटी बिल पास नहीं हो सका. संसद कानून बनाने से ज्यादा विचारों के आदान-प्रदान की जगह है. तभी इसे लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है. इसे चलाने में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की ही भूमिका है.

प्रधानमंत्री ने शीतकालीन सत्र की शुरुआत में सदन के कामकाज को लेकर HOPE शब्द का उपयोग किया था.  HOPE का मतलब बताते हुए उन्होंने कहा था, H- Harmony (सद्भाव), O- Opportunity (मौका), P- People participation (लोगों का योगदान) और E- Equality (समानता). अफसोस शीतकालीन सत्र बीत गया और ये चारों नदारद ही रहे. इस बीच सांसदों के वेतन-भत्ते से जुड़ी समिति उनका वेतन दोगुना करने और भारत सरकार के सचिवों से एक हजार रुपए ज्यादा करने की सिफारिश का संकेत दे चुकि है, पर उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि नौकरशाहों  को यह तनख्वाह उम्र भर की नौकरी करने के बाद आखिरी पड़ाव पर मिलती है, और नौकरशाही को जानने वाला हर शख्स यह जानता है कि कोई भी सचिव एवरेज दस-बारह घंटे  काम करता ही है. क्या हमारे सांसद भी अपनी जिम्मेदारी इसी गंभीरता से उठाने को तैयार हैं.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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