...तो दिल्ली से लड़ी जा रही पाटलीपुत्र की जंग

...तो दिल्ली से लड़ी जा रही पाटलीपुत्र की जंग बिहार में विधान सभा चुनाव की सरगर्मी अपने शबाब पर है. वैसे तो किसी भी राज्य में विधानसभा का चुनाव उस राज्य के निवासियों के भविष्य से जुड़ा स्थानीय चुनाव होता है, पर जब से नरेन्द्र मोदी की अगुआई में भाजपा ने दिल्ली में केंद्र की सत्ता हथियाई है, हर स्तर का चुनाव 'राष्ट्रीय महत्त्व' का करार देकर एक 'जंग' की मानिंद लड़ा जा रहा. अब ऐसा चाहे महंगाई से ध्यान भटकाने की गरज से जानबूझ कर किया जा रहा हो, या फिर अनजाने में सत्ता के केंद्रीकरण के चलते, पर सच यही है कि पिछले तकरीबन डेढ़ सालों में चाहे चुनाव स्थानीय निकायों के हों, ग्राम पंचायतों, जिला परिषदों के, या फिर संसदीय और विधायी कमेटियों के, यहां तक कि छात्र संघ के चुनाव भी उसी मानिंद लड़े जा रहे, जैसे अभी नहीं तो कभी नहीं, या कि पहली बार देश को कोई खलीफा मिला है, जो सबकुछ बदल देगा, या कि अगर हमें वोट नहीं दिया, तो तुम्हारा कुछ भी न होगा, या कि हर जगह बस एक ही नारा, एक जैसा ही नारा...

क्या है यह? कौन सा दौर है यह? किसी भी प्रजातांत्रिक व्यवस्था के लिए ये हालात एक बेहद खतरनाक संकेत हैं. क्योंकि देश 'व्यक्ति' चाहे कितना भी बड़ा हो, केवल उससे नहीं बनता, बल्कि इसके नागरिकों से बनता है, और भारत में यह गिनती सवा अरब लोगों के ऊपर बैठती है.  तो क्या देश का प्रजातंत्र, कथित 'टीम इंडिया' के बहाने केवल 'वन मैन शो' का गिरवी होने की तरफ अग्रसर हो रहा है? और इससे मिलेगा क्या? अच्छे दिनों की बात करने वालों के दौर में महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, और तो और बाबूशाही खूब बढ़ी है. भ्रष्ट नौकरशाह अपने मंत्रियों तक को कुछ समझ नहीं रहे, क्योंकि 'गणेश परिक्रमा' की तर्ज पर उन्हें केवल एक जगह दरबार लगाना है. आलम यह है कि देश अघोषित तौर पर  चापलूसी के कांग्रेस वाले इमरजेंसी के दौर को बहुत पहले ही काफी पीछे छोड़ चुका है.

यही वजह है कि बिहार विधानसभा का इस बार का चुनाव कहने के लिए तो पाटलीपुत्र की धरती पर हो रहा है, पर इसकी सारी चालें, और मोहरें बाहर से चली जा रहीं हैं. यह और बात है कि बिहार के लोग 'गैर बिहारी' ताकतों के इस खेल सफल होने देंगे या नहीं कहना मुश्किल है. इस बार का चुनाव पांच चरणों में हो रहा है. सीटों का बंटवारा, और रैलियों, वादों के साथ चुनाव अभियान की शुरुआत हो चुकी है. यहां तक कि चुनावी सर्वे भी आने लगे हैं. पर भाजपा की अगुआई वाले एनडीए की तमाम कोशिशों के बावजूद शुरुआती सर्वे
नीतीश कुमार की अगुआई वाले महागंठबंधन को बढ़त बनाते दिखा रहे हैं.

इन सर्वे की मानें तो नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव व कांग्रेस का गंठबंधन मौजूदा हाल में बिहार में 115 से 135 सीटें जीत सकता है, जबकि भाजपा के नेतृत्व में लोजपा, आरएलएसपी व हम 93 से 108 सीटें जीत सकते हैं, जबकि दूसरे गंठबंधन या दल 16 से 23 सीटें जीत सकते हैं. मजे की बात तो यह कि मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश कुमार अब भी लोगों की सबसे बड़ी पसंद हैं. िसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि भाजपा ने मुख्यमंत्री पद के लिए कोई नाम आगे नहीं किया है, और वे यहां भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम पर ही लड़ रहे.

यह सर्वविदित है कि बिहार में मोदी के ही हमजातीय सुशील कुमार मोदी ने काफी मेहनते की है. राज्य की भाजपा में ही कई ऐसे चेहरे हैं, जो आगे आ सकते हैं. यही नहीं सुशील की बड़े मोदी जी से काफी करीबी भी है. खुद इस स्तंभकार ने गुजरात के विधानसभा चुनावों में सुशील मोदी को नरेन्द्र भाई मोदी के लिए वोट मांगते देखा है. फिर क्या वजह है कि भाजपा सुशील मोदी तो दूर, अपने किसी भी नेता को भी मुख्यमंत्री के तौर पर आगे नहीं बढ़ाना चाहती, और लोकसभा चुनावों के बाद हुए हर चुनाव की तरह ही बिहार के चुनाव को भी नरेन्द्र मोदी के नाम पर ही लड़ रही, लड़ना चाह रही है. अंदरखाने की खबरें यह हैं कि 'साहब' छत्तीसगढ़ में रमन सिंह, मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और राजस्थान में वसुंधरा राजे के कद के चलते उनके राज्यों में चाह कर भी उतना दखल नहीं दे पा रहे, जितना वे और उनकी मुंहलगी नौकरशाही चाहती है. इसके चलते गाहे -बगाहे इन नेताओं को सीबीआई आदि का भय दिखा कर बैलेंस तो कर लिया जा रहा है, पर वह मनमानी नहीं कराई जा पा रही.

इसीलिए बाद के चुनावों में महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा आदि में स्थानीय नेताओं के पर करीने से कतर दिए गए, और बिना मुख्यमंत्री का नाम घोषित किए हर चुनाव सीधे साहब के नाम पर लड़ा गया, और कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेतृत्व की कामयाबी का सेहरा 'साहब' के माथे थोप कर उनके प्यादों को रहनुमाई सौंप दी गई. यही खेल अब बिहार में भी आजमाया जा रहा. शायद इसीलिए अब तक के हुए सर्वे में लोकप्रिय होने के बावजूद भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी मुख्यमंत्री की पसंद के रूप में नीतीश से काफी पीछे केवल बीसेक प्रतिशत लोगों द्वारा ही पसंद किए गए. पांच प्रतिशत से भी कम लोगों ने लालू प्रसाद व शत्रुघ्न सिन्हा के पक्ष में समर्थन जताया. वह तो अच्छा है कि इन सर्वे में अमित शाह व अनंत कुमार का नाम नहीं था, वरना भाई लोग उन्हें ही बिहार का मुख्यमंत्री बनवा देते.

याद रहे कि 2010 के चुनाव में भाजपा, जदयू का गंठबंधन राज्य में 206 सीटें जीतने में सफल हुआ था. उस समय लालू प्रसाद व रामबिलास पासवान एक साथ थे, जो कुल मिला कर मात्र 25 सीटें जीत सके थे. वहीं, जब 2014 का लोकसभा चुनाव हुआ, तो जदयू भाजपा से अलग हो चुका था, ऐसे में वह अकेले चुनाव मैदान में कूदा और दो सीटों तक सीमित रह गया. 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा, लोजपा व आरएलएसपी के गंठबंधन ने 174 विधानसभा सीटों पर बढत बनायी थी. जबकि लालू व नीतीश अलग-अलग लडे थे और दोनों मात्र 51 विधानसभा सीट पर बढत बनाने में कामयाब हो सके थे. पर यह गणित नए गठबंधन के जातीय वोट बैंक और केंद्र में भाजपा सरकार की असफलता और आम जनों की बदहाली के चलते बदल सी रही है, कम से कम सर्वे तो यही बता, जता रहे.

शायद यही वजह है कि भाजपा, प्लान बी पर काम कर रही है, यानी वोटर को भ्रम में डाल दो, विरोधी खेमे के वोटों में बंटवारा करा दो, और बीच से निकल कर बाजी मार लो. लोकसभा चुनावों में कई जगहों से डमी मुस्लिम उम्मीदवार भाजपा की शह पर, उसके धन बल की सहायता से खड़े किए गए थे, ताकि धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले वोटों का बंटवारा हो सके. बिहार में भी कई अनाम ताकतें जोर लगा रही हैं. समझना मुश्किल नहीं कि हार्दिक पटेल और ओवैसी फैक्टर के पीछे कौन है?

नेताजी, यानी मुलायम सिंह यादव और एनसीपी किसके इशारे पर बिहार में तीसरा मोर्चा खड़ा करने का खम ठोंक रहे, यह सभी जानते हैं. यानी वह हर काम किया जा रहा, जिससे नीतीश-लालू-कांग्रेस गठबंधन को  नुक़सान पहुंचे. चुनावी जंग में नेकनीयती और ईमानदारी की बातें करना अब बेमानी है. यह सभी जानते हैं कि अगर मुसलमानों और पिछड़े वर्ग के वोट कटे, तो इसका फायदा केवल भारतीय जनता पार्टी को होगा. पर भाजपा में बिहार को लेकर जो भी रण्नीति बना रहे, सभी बिहार के बाहर के हैं. भाजपा  अध्यक्ष अमित शाह से लेकर जगत प्रकाश नड्डा और पीयूष गोयल, जो बिहार चुनाव अभियान के सर्वेसर्वा हैं, का राज्य से क्या नाता है? समझना मुश्किल नहीं.

इसलिए जो कहा जा रहा और जो सतह पर है, दोनों में काफी अंतर है. कहते हैं, दिल्ली के टीवी दफ्तरों में चुनावी जंग की समीक्षा से लेकर गेस्ट बुलाने तक में पैसे का खेल चल रहा है. इसी तरह अखबारों में प्लांटेड खबरें चल रही. अमेरिकी नेतृत्व और मालिकाना हक वाली इंटरनेट कंपनियों और सोशल मीडिया से प्रधानमंत्री का लगाव जग जाहिर है. अपने देश के इंटरनेट मीडिया के लिए कांग्रेसी जमाने में क्लर्कों द्वारा पिछले चार सालों से चले आ रहे पायलट प्रोजेक्ट को हटवाने में प्रधानमंत्री की कोई रूचि नहीं, पर फेसबुक के मालिक का अतिथि बनने का मोह वह नहीं छोड़ पा रहे. इसीलिए बिहार में वोटिंग के दिन से पहले यह मत मान बैठिए कि यह जंग पटना में लड़ी जा रही. इस बार पाटलीपुत्र के जंग की बिसात इंद्रप्रस्थ में बिछाई गई है, और चालें चलने वाले भी यहीं बैठे हैं. मोहरे भले ही बिहार की हैं, इसलिए शह और मात भी उसी की होनी है.  
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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