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हिन्दी वालों से हिन्दी की बात!

हिन्दी वालों से हिन्दी की बात! सरकारी महकमों को इनदिनों 'पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए' की तर्ज पर आयोजनों की बीमारी लग गई है शायद, तभी तो वे किसी भी नाम पर आयोजन का मौका नहीं चूक रहे, फिर यहां तो बात राष्ट्रभाषा बनने के इंतजार में सदियों से खड़ी अपनी कथित 'राजभाषा' हिन्दी का है. भोपाल में विश्व हिन्दी सम्मेलन के नाम पर जो मजमा जमा हुआ, उनमें से कितने हिन्दी का वाकई भला चाहते हैं, कितने दिल से हिन्दी से जुड़े हैं, और कितनों के लिए हिन्दी एक 'दुकान' भर है व्यापार का, बाजार का, दर्शन और भाषण का, समझना कोई मुश्किल काम नहीं. हिन्दी का आज शायद ही कोई ऐसा विद्वान हो, जिसके बच्चे, निकट संबंधी अंगरेजी के स्कूलों में न पढ़ते हों. किसी भाषा को जानना, यों तो कोई बुरी बात नहीं है, पर जब वह ' स्वाभिमान' से ज्यादा आपकी 'हैसियत' , जिसे अंगरेजी में 'स्टेटस सिंबल' कहते हैं, से जुड़ जाए, तो यह आसानी से समझा जा सकता है कि दूसरी भाषाओं के सामने उसे 'चेरी' यानी ' नौकरानी' से ज्यादा बड़ी हैसियत नहीं मिलने वाली. यह अलग बात है कि बिना नौकर- नौकरानी के आज के आधुनिक दौर में किसी मध्यमवर्गीय या अमीर परिवार का घरेलू-बाहरी काम चल ही नहीं सकता.

अफसोस की आजादी के इतने सालों बाद भी भारत में, अपने ही देश में हिन्दी की यही दशा है. बाजार की, व्यापार की, संवाद की भाषा बनने के बावजूद हिन्दी अपने ही देश में 'मालिक' के स्थान पर नहीं है, तभी तो इसे बचाने, संवारने की मुहिम के नाम पर 'दिवस', 'सप्ताह', 'पखवारा' , माह और 'सम्मेलन' जैसे आयोजन होते रहते हैं. जन भाषा और जन स्वीकृति के बावजूद हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाएं आज दोयम दर्जे पर हैं, क्योंकि ये राजकाज की, शासन की, प्रशासन की, धमक की भाषा नहीं बन सकीं हैं,  तभी तो विशुद्ध रूप से हिन्दी और गुजराती जानने वाले अपने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अंगरेजी में संबोधन करना पड़ता है. इससे शिकायत होने के बावजूद यह एक अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री ने भोपाल में आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन में मौजूद करीब 39 देशों के प्रतिनिधियों के समक्ष, इस आयोजन को 'हिंदी का महाकुंभ' करार दिया.

पर महाकुंभ में मेला लगता है, पुण्य बटोरा जाता है, सरकारी कारोबार होता है और फिर इंतजार करना पड़ता है अगले ऐसे ही महाकुंभ के लिए...हिन्दी के साथ भी तो यही हो रहा. आज उसकी लिपी खतरे में है. शेयर बाजार की खबर से लेकर राजधानी दिल्ली की किसी भी सीट पर बैठा कोई बाबू इस भाषा में संवाद, कम से कम लिखित संवाद नहीं करना चाहता. और तो और जिस हिन्दी और भारतीय भाषाओं की फिल्मों की कमाई से कम पढ़े-लिखे हीरो-हिरोइन बड़े-बड़े स्टार बन इतराते हैं, वे भी निजी बातचीत और व्यापार की डीलें अगरेजी में करते हैं. क्रिकेटरों को ही देख लीजिए, स्कूल के बाद कॉलेजों का मुंह भले ही इनमें से ज्यादातर ने न देखा हो, पर हिन्दी में संवाद करने में इन्हें हेटी लगती है.

...तो ऐसे में हिन्दी बोल कौन रहा? सरकार, मालिक, हुजूर, माई-बाप कहने वाले नौकर...बाकि साहब लोग तो अंगरेजी में ही खांसते तक हैं... तो क्या हिन्दी की अस्मिता, भारतीय भाषाओं की अस्मिता को  लेकर देशवासियों का इंतजार आगे भी जारी रहना है?  इस बार के सम्मेलन में कथित तौर पर 'हिन्‍दी भाषा' पर बल देने का प्रयास किया गया. पर इससे पहले क्या होता रहा है? प्रधानमंत्री खुद तो भाषा की ताकत को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, पर उनके राज में भी दिल्ली में अंगरेजी का दबदबा क्यों है? हिन्दी को वह जगह क्यों नहीं मिल रही, जिसकी वह हकदार है.  दुनिया भर की भूमिका के बाद प्रधानमंत्री हिन्दी को लेकर खुद इस तरह की बातें करते रहे, जैसे वह अतीत की, पुरातत्व की, संग्रहालय की भाषा हो, भविष्य की नहीं.

प्रधानमंत्री यह तो कहते हैं कि, "हर पीढ़ी का दायित्व रहता है, भाषा को समृद्धि देना. मेरी मातृभाषा हिंदी नहीं है, मेरी मातृभाषा गुजराती है, लेकिन मैं कभी सोचता हूं कि अगर मुझे हिंदी भाषा बोलना न आता, समझना न आता, तो मेरा क्या हुआ होता, मैं लोगों तक कैसे पहुंचता, मैं लोगों की बात कैसे समझता और मुझे तो व्यक्तिगत रूप में भी इस भाषा की ताकत क्या होती है, उसका भलीभांति अंदाज है. यहां मैं हिंदी साहित्य की चर्चा नहीं कर रहा हूं, मैं हिंदी भाषा की चर्चा कर रहा हूं. हमारे देश में हिंदी भाषा का आंदोलन किन लोगों ने चलाया, ज्यादातर हिंदी भाषा का आंदोलन उन लोगों ने चलाया है, जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं थी. सुभाषचंद्र बोस हों, लोकमान्य तिलक हों, महात्मा गांधी हों, काका साहेब कालेलकर हों, राजगोपालाचारी हों, सबने, यानी जिनका मातृभाषा हिंदी नहीं थी, उनको हिंदी भाषा के लिए, उसके संरक्षण और संवर्धन के लिए जो दीर्घ दृष्टि से उन्होंने काम किया था, ये हमें प्ररेणा देता है."

प्रधानमंत्री ने अपने चाय बेचने वाले दिनों की भी याद की कि उसने उन्हें हिन्दी सिखा दी. उन्होंने दूसरा उद्धरण प्रवासी भारतीय सम्मेलन का दिया कि पिछले दिनों जब प्रवासी भारतीय सम्मेलन हुआ था, तो अकेले मॉरिशस से 1500 लेखकों द्वारा लिखी गई किताबें और वो भी हिंदी में लिखी गई किताबों का वहां पर प्रदर्शन हुआ था. उनका कहना था कि भाषा सहजता से सीखी जा सकती है. थोड़ा सा प्रयास करें. कमियां रहती हैं,  जीवन के आखिर तक कमियां रहती हैं, लेकिन आत्मविश्वास खोना नहीं चाहिए. आत्मविश्वास रहना चाहिए, कमियां होंगी, थोड़े दिन लोग हंसेंगे लेकिन फिर उसमें सुधार आ जाएगा.

अपने विदेश दौरों का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री का कहना था कि विदेश में जहां भी मेरा जाना हुआ, मैंने देखा है कि कैसे लोग हमारी बातों को समझ रहे हैं, स्‍वीकार कर रहे हैं. मॉरीशस में विश्‍व हिंदी साहित्‍य का सचिवालय शुरू हुआ है. विश्व हिंदी साहित्य का एक केन्द्र वहां हम शुरू कर रहे हैं. उजबेकिस्तान में एक शब्दकोष के लोकापर्ण का अवसर मुझे मिला और वो था, Uzbek to Hindi, Hindi to Uzbek. चीन में हिंदी भाषा के जानने वाले लोगों से मेरी एक अलग मीटिंग हुई थी. मंगोलिया में भी हिंदी भाषा का आकर्षण, हिंदी बोलने वाले लोग हमें नजर आए. रूस में भी हमारी भाषा लोकप्रिय है.

प्रधानमंत्री ने आगे यह कहा कि, "कहने का तात्पर्य ये है कि भाषा के रूप में आने वाले दिनों में हिंदी भाषा का माहात्म्य बढ़ने वाला है. जो भाषा शास्त्री हैं, उनका मत है कि दुनिया में करीब-करीब 6000 भाषाएं हैं और जिस प्रकार से दुनिया तेजी से बदल रही है, उन लोगों का अनुमान है कि 21वीं सदी का अंत आते-आते इन 6000 भाषाओं में से 90 प्रतिशत भाषाओं का लुप्त होने की संभावनाएं दिखाई दे रही हैं. अगर इस चेतावनी को हम न समझें और हम हमारी भाषा का संवर्धन और संरक्षण न करें, तो फिर हमें भी रोते रहना पड़ेगा. इसलिए हमारा दायित्व बनता है कि हम हमारी भाषा को कैसे समृद्ध बनाएं और चीजों को जोड़ें. "

पर यहां प्रधानमंत्री झोंक में वह बात कह गए, जिससे हिन्दी की वाहक देवनागरी लिपी का नुकसान होगा. प्रधानमंत्री का तर्क था कि भाषा की अपनी ताकत होनी चाहिए, जो हर चीज को अपने आप में समेट ले. और इसलिए हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हमारी भाषा को समृद्धि मिले, हमारी भाषा को ताकत मिले. क्योंकि भाषा के साथ ज्ञान का और अनुभव का भंडार भी होता है. बात तो ठीक है, पर चीन ने, इजराइल ने, अरब ने, रोमनों ने क्या अपनी लिपी से खिलवाड़ किया?

मजे की बात तो यह कि  प्रधानमंत्री ने यह तो भांपा कि डिजिटल वर्ल्ड हम सबके जीवन में सबसे बड़ा रोल पैदा कर रहा है और आगे भी करने वाला है, पर उसके लिए वह क्या कर रहे हैं, खुद उनकी, उनकी सरकार की नीतियां साफ नहीं हैं.  प्रधानमंत्री ने यह तो कहा कि बाप-बेटा भी आजकल, पति-पत्‍नी भी Whatsapp पर संवाद करते हैं. Twitter पर लिखते हैं कि शाम को क्‍या खाना खाना है. इस हद तक डिजिटल वर्ल्ड ने हम सबके जीवन में अपना प्रवेश कर लिया है. जो तकनीक के जानकार लोग हैं, उनका कहना है कि आने वाले दिनों में डिजिटल वर्ल्ड में तीन भाषाओं का दबदबा रहने वाला है – अंग्रेजी, चाइनीज़, हिन्‍दी.

प्रधानमंत्री जी, बात तो ठीक है, पर हिन्दी और भारतीय भाषाएं यहां भी गंवारों की भाषा रहने वाली है, क्योंकि बिना सरकारी मदद और प्रश्रय के न तो अमेरिकन कंपनी फेसबुक पनपी न ही ट्वीटर, न ही गूगल, याहू और अमेजॉन. जबकि चीन के वैदू और अलीबाबा ने अमेरिका के इस दबदबे को तोड़ दिया है. आलम यह है कि भारत की सभी सॉफ्ट्वेयर से ले कर ई कॉमर्स से जुड़ी कंपनियों में भी चीनी कंपनी अलीबाबा का निवेश है. अंगरेजी के प्रभाव के चलते भारत में इंटरनेट से जुड़ा कोई भी कारोबार, यहां तक कि समाचार वेब साइट तक गूगल, याहू के रहमोकरम पर जिंदा हैं, और आपकी सरकार की नीतियां उन्हें बरबाद करने पर आमादा हैं. फिर हिन्दी और भारती भाषाओं के लोग क्या करें?   

प्रधानमंत्री यह तो कहते हैं कि "भाषा अभिव्‍यक्‍ति का साधन होती है. हम क्‍या संदेश देना चाहते हैं, हम क्‍या बात पहुंचाना चाहते हैं, भाषा उसकी अभिव्‍यक्‍ति का एक माध्‍यम होती है. हमारी भावनाओं को जब शब्‍द-देह मिलता है, तो हमारी भावनाएं चिरंजीव बन जाती हैं. और इसलिए भाषा उस शब्‍द-देह का आधार होता है. उन शब्‍द-विश्‍व की जितनी हम आराधना करें, उतनी कम है." वाकई प्रधानमंत्री जी, अगर आप ऐसा मानते हैं, तो हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाओं को उत्सवों, आयोजनों तक में मत समेटिए. इसे राज-काज की, सम्मान की, अस्मिता की, पहचान की भाषा बनने दीजिए. फिर देखिए, 'निज भाषा उन्नति अहे, सब उन्नति को मूल' की भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की पंक्तियां कैसे सजीव हो उठती हैं.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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