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बदलते समय के साथ

अँग्रेज़ों से आज़ादी हासिल करने के साथ ही हमने ना केवल अपने देश को अपने आप चलाने की आज़ादी पाई, बल्कि एक ज़िम्मेदार और संप्रभु राष्ट्र के तौर पर देश के बारे में फ़ैसला करने और निर्भीक रूप से अपने विचारों को व्यक्त करने का अधिकार भी पाया।

प्रजातंत्र का मतलब ही है अपने विचारों को बिना किसी दबाव के स्वच्छन्द रूप से व्यक्त करने का अवसर। ऐसे विचार, जो भविष्य की दिशा तय कर सकें, अतीत के बारे में नकारात्मक ख़यालों को बदल सकें, और वर्तमान को एक अर्थपूर्ण आयाम दे सकें। अरसा लग जाता है किसी एक देश की मानसिकता को एक स्वरूप पाने में।

एक तरफ पुरानी पीढ़ी जहाँ अपने हाथों से फिसल रही सत्ता को मूल्य, धर्म, रीति-रिवाज, मान्यता, जातिवाद, परंपरा, समाज आदि का नाम देकर पकड़े रहना चाहती है, वहीं युवा पीढ़ी में देश और दुनिया की तरक्की के साथ आगे बढ़ने की अजीब सी छटपटाहट देखी जा रही है। नतीजा एक ऐसे टकराव वा भटकाव की शक्ल में सामने आ रहा है, जो चिंतित करता है। देश को जितनी तरक्की अब तक हासिल कर लेनी चाहिए थी, हम अभी उससे पीछे हैं।

आज के दौर में भी हम आरक्षण, स्कूल-कॉलेजों में मोबाइल फ़ोन की मनाही, दहेज हत्या, ऑनर किलिंग, पानी- बिजली, स्कूल- कॉलेज, सड़क आदि की कमी का रोना रोने को मजबूर हैं। भूख, बेरोज़गारी, किसानों की आत्महत्या, नक्सल समस्या, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, सामाजिक और आर्थिक असमानता जैसे मसले किसी भी प्रगतिशील समाज या देश के लिए ठीक नहीं हैं। एक तरफ़ हम चाँद और मंगल पर अपने अंतरिक्ष अभियानों की चर्चा करते नहीं अघाते, तो दूसरी तरफ हमारे कई पिछड़े राज्य कुपोषण, सिर पर मैला ढोने की बुराई और लड़की-लड़के के बीच शर्मनाक स्तर तक बरते जाने वाले भेदभाव के शिकार हैं।

ऐसे वक्त जब दुनिया भर में विकास और बदलाव की गति बहुत तेज है और हमारे शहर तेज़ी से अपने आप को बदलाव की बयार में ढाल चुके हैं, तब मीडिया को अपनी भूमिका बखूबी निभानी होगी। हमें यह देखना होगा की देश का एक तबका तरक्की के 80% हिस्से पर काबिज है तो दूसरे के हिस्से में 20% से भी कम क्यों? अफ़सोस तरक्की के इस दौर से कदमताल कर रहा मीडिया अपनी भूमिका ज़रूरत के अनुरूप में नहीं निभा पा रहा है।

आने वाला दौर निश्चित तौर पर विज्ञान और तकनीक का है। इंटरनेट के इस दौर में एक तरह से हम सूचना विस्फोट के दौर में जी रहे हैं। कंप्यूटर इस्तेमाल करने वालों की तादात हर मिनट बढ़ रही है। 2013 तक भारत सरकार देश के हर गाँव को नेट के तार से जोड़ देगी। फेसबुक, गूगल, ओर्कूट, ट्वीटर अब सुदूर  देहात में भी अनजाने नाम नहीं हैं। इन माध्यमों ने इंसान को जोड़ने की, लोगों से जुड़ने की, जानकारी और ज्ञान के अनंत मौकों का अनुसंधान किया है। पुरातन अख़बार और पत्र-पत्रिकाओं से अलग एक ही मिनट में दुनिया के इस कोने से उस कोने तक की पहुँच ने इस माध्यम को एक विशेष दर्जा दिया है, जो टेलीविजन के पल भर में ख़त्म हो जाने वाले प्रभाव से कहीं ज़्यादा व्यापक है।

ज्ञान के इस अथाह स्रोत तक अग्रेज़ी वालों की पहुँच काफ़ी व्यापक है, पर वहाँ भी सही जानकारी जुटा पाना समंदर में किसी मोती की तलाश से कम नहीं। सही-सटीक जानकारी, उपयोगी समाचार, उम्दा लेख, मनोरंजन के साथ भूत, भविष्य और वर्तमान की सियासी, सामाजिक, दुनियावी हलचल से रूबरू करने से लेकर दुनिया भर के ज्ञान- विज्ञान से अपने पाठकों को अवगत कराना 'फेस एन फॅक्ट्स' का मौलिक उद्देश्य है। अँग्रेज़ी में अपने पाठकों, लेखकों, और सहयोगियों के प्रयास से हमने एक मुकाम हासिल किया है। हिन्दी में भी आपका प्यार निरंतर मिलता रहेगा, इसी कामना के साथ।
प्रीति  प्रकाश
प्रीति  प्रकाश जयपुर के महारानी कॉलेज से अँग्रेज़ी साहित्य में स्नातक, राजस्थान विश्वविद्यालय से इसी विषय में स्नातकोत्तर और कोलकाता से पत्रकारिता की डिग्री हासिल करने वाली प्रीति प्रकाश ने मानवीय और राजनीतिक-सामाजिक विषयों पर खूब लिखा। इंटरव्यू और खोजी पत्रकारिता में विशेष रूचि के चलते कई अख़बारों और पत्रिका समूह से जुड़ी और संप्रति 'फेस एन फॅक्ट्स' समूह की संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स की प्रबंध निदेशक हैं।

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