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देश की सरकार क्या संघ चला रहा?

देश की सरकार क्या संघ चला रहा? यह अब कोई छिपी बात नहीं है कि एक राजनीतिक दल के रूप में भाजपा का अपना कोई अलग वजूद नहीं, सिवाय इसके कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक राजनीतिक शाखा भर है. संघ ने लाल कृष्ण आडवाणी को किनारे लगा कर 'भाजपा' पर जो बादशाहत कायम की थी, वह नरेंद्र मोदी के उभार से और भी मजबूत हुई है. संघ एक तरह से अब न केवल भाजपा का मुखिया है, बल्कि असंवैधानिक तौर से राष्ट्र की कमान भी उसी के हाथों हैं, तभी तो प्रधानमंत्री सहित सारे बड़े केंद्रीय मंत्री एक-एक करके संघ की दिल्ली बैठक में संघ प्रमुख के सामने दरबार लगा आए.

संघ से अपना कोई नाता नहीं है. यह अलग बात है कि अपनी प्राथमिक शिक्षा के दौरान मैंने संघ से जुड़े 'भारतीय शिशु मंदिर' में तीन-चार सालों तक पढ़ाई की थी, और वह भी इसलिए कि इकलौता लड़का होने के नाते मेरे माता-पिता ने आजमगढ़ के एक सेंट्रल स्कूल और वाराणसी के लिटिल फ्लावर हाउस नामक कॉनवेंट में कुछ समय तक पढ़ाने के बाद पुत्र मोह में मेरा नाम कटवा कर वापस अपने पास बुला लिया, और वह शिशु मंदिर ही तब उस इलाके का ऐसा एकलौता स्कूल था, जहां शिशु कक्षा से ही अंगरेजी पढ़ाई जाती थी.

पर वहां पढ़ने के बावजूद राष्ट्रभक्ति और धर्मनिरपेक्ष माहौल में पलने-बढ़ने के चलते अपने ऊपर कभी संघ का कट्टरपंथी प्रभाव नहीं पड़ा, यहां तक की संघ के लोगों के बीच रहने, उनसे मौके-बेमौके उनके आदर्शों, सिद्धांतों पर बहस करने और संघ की प्रातः कालीन शाखा में एक-दो बार जाने और ध्वज प्रणाम कर आने के बाद भी. इसीलिए, जब सितंबर के पहले हफ्ते में नई दिल्ली के बसंत कुंज इलाके के मध्यांचल में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की तीन दिवसीय 'समन्वय बैठक' में मोदी सरकार की लगभग समूची कैबिनेट दरबार लगाने पहुंची, तो समझ नहीं आया कि जनता ने सरकार चलाने और अपने हितों के लिए भाजपा को चुना था, या संघ को? लेखक दीप सांखला की फेसबुक पर एक टिप्पणी थी, 'मोदी महंगाई, भ्रष्टाचार, कालेधन और विकास के नाम पर प्रधानमंत्री बने या आरएसएस एजेंडे को लागू करने के वास्ते. धोखे की जाजम बिछाई जाने लगी है.'

मान लीजिए देश के सौभाग्य से भले ही ऐसा न हो, पर जब मोदी सरकार अपने कार्यकाल के लगभग 500 दिन पूरा करने के करीब है, तब देश के हालात क्या हैं, सत्तानशीं लोगों को छोड़ कर दूसरों को बताने-समझाने की जरूरत नहीं. इस सरकार ने अब तक अपने बेसिक वादे भी पूरे नहीं किए हैं. सिर्फ बातें की हैं और माहौल बनाया है. आलम यह है कि महंगाई अपने चरम पर है, दाल-चावल और सब्जियां तक आम लोगों की पहुंच से दूर होती जा रही हैं. मजदूर एक दिन की देशव्यापी हड़ताल पर जा चुके हैं, और आगे भी जाएंगे. देश की सुरक्षा करने वाले पूर्व सैनिक अपनी पेंशन में समानता 'वन रैंक वन पेंशन' जैसी साधारण सी मांग के लिए महीनों से दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे हैं और उनकी कोई सुनने वाला नहीं है.

सरकार के वित्त मंत्री अरुण जेटली कहते हैं कि उनके पास पूर्व सैनिकों की मांग पूरा करने के लिए खजाने में 8293 करोड़ रुपए नहीं हैं, जबकि इन्होंने ही मई में संसद में एक डाटा पेश किया था कि 'इस साल कॉरपोरेट घरानों को 62398 करोड़ की छूट दी गई है.' तय है इन कॉरपोरेट घरानों में हमारे-आप जैसे काम करने वाले छोटे मेहनती प्रकाशक, पत्रकार, व्यापारी शामिल नहीं हैं. इसीलिए बिहार चुनाव से ठीक पहले घरेलू मोर्चों पर बिगड़ते माहौल को देख संघ को समन्वय बैठक बुलानी पड़ी. कहते हैं बैठक के दौरान सरसंघचालक मोहन भागवत की अगुआई में सरकार्यवाह भैय्याजी जोशी, सहसरकार्यवाह कृष्ण गोपाल समेत संघ के विश्व हिंदू परिषद, स्वदेशी जागरण मंच, भारतीय मजदूर संगठन,  सेवा भारती, विद्या भारती, वनवासी कल्याण,  विद्यार्थी परिषद जैसे संघ के 15 सहयोगी संगठनों के लगभग 93 वरिष्ठ पदाधिकारियों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह सहित बड़े मंत्रियों अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह, वेंकैया नायडू, अनंत कुमार, नितिन गडकरी, मनोहर परिक्कर आदि की जम कर क्लास ली.

कहते हैं इस बैठक में आर्थिक सुधार, कृषि से लेकर सड़क और लघु व मध्यम स्तर के उद्योग से लेकर, खदान, कोयला, स्टील प्लांट तक पर चर्चा हुई. संघ ने सरकार को अपनी छवि सुधारने की सलाह देते हुए सुझाव दिया कि विकास का वह फार्मूला अपनाया जाना चाहिए, जिससे सबको जोड़ा जा सके. संघ का तर्क था कि औद्योगिक विकास का लाभ समाज के निचले स्तर के लोगों को भी मिलना चाहिए. इसी क्रम में कृषि आधारित उद्योग की बात कही गई. संघ का सुझाव था कि संगठन के स्तर पर सरकार के काम की पूरी निगरानी होनी चाहिए. इसका ध्यान रखा जाना चाहिए कि सरकार के किस कदम को लेकर समाज में किस तरह के विचार बन रहे हैं या बनाए जा रहे हैं. राष्ट्रीय सुरक्षा, कश्मीर,  नक्सलवाद और उग्रवाद पर संघ ने सरकार के रवैए पर चिंता जताई. संघ ने 'वन रैंक वन पेंशन' मामले के जल्द समाधान, गुजरात मेंं पाटीदार समुदाय का आरक्षण आंदोलन, जनगणना के आंकड़े, श्रम सुधार, संगठन विस्तार, शिक्षा नीति जैसे विषयों पर भी जोर दिया.

जाहिर है, बिहार चुनाव इस बैठक में एक बेहद अहम मुद्दा था. पिछली बार जब दिल्ली में लगातार जीत के जश्न में डूबी भाजपा को अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी से करारी शिकस्त मिली, उसके बाद से संघ ने पार्टी पर अपनी पकड बढ़ा दी थी. इसीलिए संघ इस बार बिहार चुनाव से पहले भाजपा को समझाना चाहता था. समन्वय बैठक में संघ ने भाजपा को बिहार चुनाव के मद्देनजर फिडबैक दिया और लडाई को आसान नहीं समझने की सलाह दी. बिहार में जदूय, राजद और कांग्रेस के सामाजिक गठजोड के खिलाफ भाजपा कैसे अपने गठजोड को सजाए, इस पर संघ ने सीख दी, तो जवाब में भाजपा ने अपनी कूटनीतिक चाल से नीतीश कुमार से मुलायम सिंह यादव और एनसीपी को अलग करा देने की बात कही. पर संघ का तर्क था, भाजपा को यहीं रुकना नहीं है. जाहिर है संघ की चिंता जमीनी स्तर पर भाजपा के लगातार अलोकप्रिय होते जाने की तरफ है.

प्रधानमंत्री मोदी जिस डिजीटल इंडिया की बदौलत सत्ता में आए, वहां भी वह कमजोर पड़ते जा रहे हैं. इंटरनेट पर विज्ञापन की कोई नीति न होने से छोटी और मझोली वेबसाइटों से छोटे कसबों और शहरों तक सरकार के कामकाज की बात नहीं पहुंच रही है. यही गलती कभी मनमोहन सरकार ने भी की थी और नतीजा भुगता. आलम यह है कि डिजीटल फोरम पर इन दिनों ऐसी टिप्पणियां आम हैं.

" आज 'मोदी सरकार' का '....; वां दिन है. ये वो सरकार है जो आपसे 100 करोड़ रुपये की गैस सब्सिडी ख़त्म करवाने के लिए...250 करोड़ के विज्ञापन दे चुकी है. * इस सरकार के 'स्वच्छता अभियान' के विज्ञापन का बजट भी 250 करोड़ था लेकिन दिल्ली के सफाई कर्मियों की सालाना तनख़्वाह के लिए ज़रूरी 35 करोड़ रुपए इनके पास नहीं हैं. * 'किसान टीवी' पर सालाना सौ करोड़ रुपए का ख़र्च दे सकते हैं, क्योंकि इस चैनल के सलाहकार समेत आधे कर्मचारी आरएसएस के किसी न किसी संगठन से हैं...मगर किसानों की खाद सब्सिडी छीन ली.*  इस सरकार के पास 'योगा डे' के लिए 500 करोड़ रुपए और योग गुरू रामदेव के पतंजलि को हरियाणा के स्कूलों में योग सिखाने के लिए सालाना 700 करोड़ रुपए देने के लिए हैं...मगर इन्होंने प्राथमिक शिक्षा के बजट में 20% कटौती की, क्योंकि इनके पास आम स्कूलों के लिए पैसे नहीं हैं.

" *  इस सरकार के पास कॉरपोरेट घरानों को 62398 करोड़ रुपए टैक्स छूट देने के लिए हैं, मगर आत्महत्या कर रहे किसानों का क़र्ज़ चुकाने को 15 हज़ार करोड़ रुपए नहीं हैं. * यह सरकार स्किल इन्डिया के लिए 200 करोड़ का विज्ञापन बजट बनाती है, मगर युवाओं की छात्रवृत्ती में 500 करोड़ रुपए की कटौती करती है.*  ये वो सरकार है जो विदेशियों को 17-26 रुपए प्रति किलो प्याज बेचकर 45 रुपए प्रति किलो खरीदेगी, जो ट्रांसपोर्ट आदि के खर्चे जोड़कर वापस 50 रुपए प्रति किलो मिलेगा. * यही वो सरकार है, जिसने विपक्ष और किसानों के दबाव में आकर भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर घुटने टेके, चौतरफा विरोध से घिरी. काला कानून वापिस लेने का निर्णय लिया.आख़िरकार किसानों की जीत हुई. मोदी और उनके आकाओं की हार. * कहने के लिए सरकार घाटे में है. ओएनजीसी को बेच रही है. रेलवे की ज़मीनें बेचने का टेंडर पास कर दिया है. मगर अडानी के लिए 22000 करोड़ रुपए देने को हैं. "

कह नहीं सकते कि ये आंकड़े कितने सही हैं या गलत, पर जो भी हैं, ऐसी चर्चाओं से ही हवा बनती है, और जनता के मन पर इस का क्या असर होता है, इसे भाजपा, मोदी और संघ से बेहतर कोई नहीं समझ सकता.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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