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आजाद ही तो नहीं हम...

आजाद ही तो नहीं हम... अगस्त जाने वाला है, पर मन में आजादी, उसकी अर्थवत्ता, उसकी हकीकत, उसे लेकर दी गई कुर्बानियां, और उसके मिथ से जुड़े विचारों का बवंडर है कि थमता ही नहीं. अगस्त है यह, उत्सवों का माह. अपने अतीत पर, आजादी पर, जनतंत्र पर, आजादी के उस आंदोलन पर, और हमारी आज की आजादी के लिए उस दौर में जूझने व कुर्बान होने वाले जंगबाजों पर इतराने का माह है यह... और वाकई देश की राजधानी दिल्ली, राज्यों की राजधानियों, जिला मुख्यालयों सहित सरकारी, प्रशासनिक, पुलिस  और सुरक्षा बलों से जुड़े कार्यालयों, संस्थानों में 15 अगस्त के उत्सवों को देखकर तो यह लगता भी है कि वाकई यह गौरव का दिन है, मान और अभिमान का दिन है.

पर देश की आजादी के महज 69 सालों में इस बात पर विचार करने की जरूरत आन पड़ी है कि वाकई यह आजादी किनकी है? किनको है? किससे है? और कितनी है?...और अगर ये सवाल मेरे, आप में, या हम जैसे किसी और के, कुछेक के या बहुत सारे लोगों के मन में हैं, तो फिर यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि 'जश्ने आजादी' के ये महोत्सव कितने आंतरिक हैं और कितने औपचारिक? इन उत्सवों में कितना अपनापा है और कितना दिखावा? जनता से इन उत्सवों का जुड़ाव कितना है? और इस से सरकारी अमला कितना लगाव महसूस करता है?

मुझे याद है कि जब हम छोटे थे, तब हाथों में बाजार से खरीदा, मशीनों से छपा, बना नहीं, खुद से रंगा-बना कागज तिरंगा लेकर स्कूल की प्रभातफेरी में..' ऐ मेरे वतन के लोगों..','दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल...', 'कर चले हम फिदा जानो-तन साथियों...', 'मेरा रंग दे बसंती चोला...' जैसे गीतों से सराबोर, 'भारत माता की जय', 'जय- हिंद', 'हिंदुस्तान जिंदाबाद' और 'महात्मा गांधी अमर रहें'  के नारों के साथ स्कूल के प्रांगण में पहुंच कर जब एक सुर में 'जन-गण-मन' गाते थे, तो राष्ट्रभक्ति का जो रोमांच तन, मन पर छाता था, उसका एक चौथाई आभास भी अब लालकिला के मुख्य समारोह में प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संबोधन सुनकर नहीं आता. तो क्या हमारी राष्ट्रभक्ति में कोई कमी आ गई है? उत्तर है, नहीं! तो फिर इस उदासीनता की वजह?

दरअसल इसी सवाल के उत्तर में छिपी है असली बात. देश 15 अगस्त, 1947 को अंगरेजी शासन से आजाद जरूर हुआ, पर उस व्यवस्था से नहीं, जिसकी आम आदमी गुलामी कर रहा था. मुगलिया सल्तनत से शुरू कर कंपनी बहादुर के शासन से होते हुए ब्रितानी उपनिवेश और फिर आजाद हुए भारत में सिर्फ सत्ता का परिवर्तन भर हुआ, उस का स्वरूप भर बदला, शासन करने वाले चेहरे भर बदले, पर शासकों की मानसिकता, राज-काज चलाने के उनके तौर-तरीके, पैसे और ताकत का दंभ और व्यवस्था का उनकी चेरी बन कर रहना, नहीं बदला.

इसीलिए आम आदमी अब समय बीतते- बीतते आजादी के उत्सव को औपचारिकता मानने लगा है, और उसे लगता है कि हम केवल कहने के लिए आजाद हुए हैं, सिर्फ कागजों पर आजाद हुए हैं, सिर्फ वोट देने की आजादी मिली है, और यह भी कि गोरों की थोपी हुई गुलामी के बदले में हम देशी काले- गोरे शासकों को चुन सकें, जो उन्हीं अंगरेजों की बनाई व्यवस्था से आम आदमियों का, हमारा शोषण करें, हम पर शासन करें. चूंकि अब देश पर हमारा खुद का शासन है, और संसद, हमारी चुनी हुई सरकार ही सर्वोच्च है, इसलिए अब इनके खिलाफ कहीं, कोई सुनवाई भी नहीं. एक बार चुन लिया तो अगले चुनावों तक लुटते -पिटते रहिए.

सच कहें तो तब 1947 में सत्ता पर काबिज चेहरे भर बदले थे, और आज भी हर चुनाव में वही बदलते भर हैं, पर तंत्र और उसे चलाने का तरीका नहीं बदल रहा. गुलामी के दौर में कहा जाता रहा कि अंगरेज भारत को लूट कर पैसा ब्रिटेन भेज रहे हैं, पर वह लूट बंद हो गई है, इसका दावा अब भी कोई नहीं कर सकता. यह और बात है कि पैसा तब ब्रिटेन जाता था, अब स्वीडिश बैंकों में...तुलसीदास के शब्दों में ' समरथ को नहीं दोष गोसाईं' की तर्ज पर सत्ता आज भी धनाड्यों की चेरी है, और अंगरेजों के दौर में भी यही था. आखिर प्रिंसी स्टेट क्या थे? टाटा और बिड़ला का कारोबार गुलामी के दौर में भी रुका नहीं था, राजे-राजवाड़े, रसूख, कमाई, और ताकत और धन का बोलबाला तब भी था, आज भी है. सिर्फ नाम भर बदले, व्यवस्था नहीं बदली. सर और रायबहादुर की जगह पदम पुरस्कारों ने ले ली और वायसराय और गवर्नर जनरल की जगह...हमारे महामहिमों ने. पर आम जनता के लिए क्या बदला?

उदाहरण कहीं से भी, किसी भी हलके का उठा सकते हैं. आजादी का अर्थ क्या है? काम करने के समान अवसर? योग्यता के अनुपात में प्राप्य? सबको समान न्याय? संवैधानिक व्यवस्था के हिसाब से सबको विचारों की, अभिव्यक्ति की आजादी. पर क्या वाकई में सभी को यह समान रूप से हासिल है? क्या राज्य, सरकार और कानून की नजर में सभी बराबर हैं? नहीं. उदाहरण के लिए हम इसी साल की घटनाएं लेंगे. अगर कानून और प्रशासन सबके लिए समान होता तो, सलमान खान को सजा मिलने के तीन घंटों के अंदर बड़ी अदालत से राहत नहीं मिल जाती, और वे बिना एक घंटे भी जेल गए बड़ी अदालत से राहत नहीं पा जाते, और देश की सबसे सुरक्षित जेलों में से एक 'तिहाड़' में विचाराधीन कैदी दीपक की 12 अगस्त को दूसरे कैदियों द्वारा हत्या नहीं कर दी जाती.

पुष्टि तो नहीं है, पर कहते हैं कि सलमान ने अपनी इस जमानत के लिए 25 करोड़ रुपए खर्च किए थे. यानी अगर आपके पास 25 करोड़ रुपए खर्च करने और बड़ा वकील रखने की ताकत है, तो आपके लिए देश का कानून कुछ और है, और सामान्य नागरिक के लिए कुछ और. यह तो है आजाद भारत में न्यायपालिका का हाल. अब आते हैं संसद पर. मानसून सत्र का पहला चरण ललित मोदी और व्यापम घोटाले की भेंट चढ़ गया. तथाकथित मानवता के नाम पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज द्वारा ललित मोदी की की गई मदद को मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस नकारती है, और उसका आरोप है कि सुषमा स्वराज ने पैसे लेकर ललित मोदी की मदद की.

जवाब में सुषमा स्वराज मानवता के नाम पर मदद की बात स्वीकारती हैं, और भोपाल गैस त्रासदी के दोषियों और बोफोर्स कांड के जिम्मेदारों की कांग्रेस द्वारा की गई मदद की बात उठाती हैं. अब सुषमा और भाजपा को यह कौन समझाए कि कांग्रेस ने अगर अतीत में गलतियां नहीं की होती, तो जनता उसे सत्ता से हटाती ही क्यों? और अगर लोगों ने कांग्रेस को हटा कर भाजपा को सत्ता सौंपी, तो इसलिए नहीं कि आप से भी उसे वही हासिल हो, जो कांग्रेस से हो रहा था...

यानी आजाद कहें, या भ्रष्ट भारत में संसद को ललित मोदी जैसे लोग हाईजैक कर लेते हैं, और 125 करोड़ लोगों की नुमाइंदगी का दावा करने वाली भारत सरकार की समूची ताकत तार-तार हो जाती है. पैसे वालों के ताकत की बेशर्म नुमाइश वाली यह नौटंकी केवल संसद में ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट में भी दुहराने की कोशिश की गई. यह और बात है कि सर्वोच्च न्यायालय ने उसे पकड़ लिया, और दाल नहीं गली. हुआ यह की व्यापम घोटाले की निष्पक्ष जांच के लिए सीबीआई जांच की पैरवी करने वाले बड़े वकील कपिल सिब्बल ने एक भ्रष्ट इंजीनियर यादव सिंह पर सीबीआई जांच के उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अखिलेश सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में खड़े हो गए और सीबीआई पर भेदभाव करने का आरोप लगाने लगे.

मजबूरन अदालत को उन्हें याद दिलाना पड़ा कि इसी सीबीआई को लेकर व्यापम मसले में उनका स्टैंड क्या था? क्या यह कमाल की बात नहीं की हमारे आजाद भारत दिल्ली की केंद्र सरकार ने संसद का एक पूरा सत्र ललित मोदी जैसे भगोड़े को बचाने जैसे मसले पर बरबाद कर दिया, तो उत्तर प्रदेश की सपा सरकार यादव सिंह जैसों को बचाने के लिए सरकारी खजाना खोल कर अदालत में खुद उसकी पैरोकार बन कर खड़ी है?

कहने की जरूरत नहीं कि आजादी की लौ अभी भी समाज के हाशिए पर खड़े आम आदमी तक नहीं पहुंची है, और जब तक ऐसा नहीं होता, आम जनों के लिए जश्ने-आजादी का मतलब सिर्फ औपचारिकता भर है. फिर भी इतनी आजादी भी कम नहीं कि हम यह लिख और बोल सकें, इसीलिए...जय हिंद!
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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