Monday, 14 October 2019  |   जनता जनार्दन को बुकमार्क बनाएं
आपका स्वागत [लॉग इन ] / [पंजीकरण]   
 

काश, 'आजादी' शब्द को हकीकत में बदल पाते नेता!

काश, 'आजादी' शब्द को हकीकत में बदल पाते नेता! लाल किला से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस पर खोखले शब्दों के जो बम गोले फेंके, उसकी तपिश से भज-भज मंडली से जुड़े भक्तजन भले ही प्रभावित हों, पर जिन्होंने भी सीधे या टेलीविजन पर इसे सुना, वे निराश ही हुए. वजह, प्रधानमंत्री की बातों में न तो वह आत्मविश्वास था, न ही वह साफगोई, दृढ़प्रतिज्ञ संवेदना, जिसकी उनसे उम्मीद थी. उनका यह भाषण उन्हीं के शब्दों में 125 करोड़ की आबादी वाली 'टीम इंडिया' का भाषण न लग कर उस भाजपा नेता का भाषण ज्यादा लगा, जो कांग्रेस के आक्रमणों से बचाव की मुद्रा में है, और जिसका निशाना बिहार चुनाव है.

प्रधानमंत्री शायद भूल गए थे कि वह किसी चुनावी रैली में नहीं हैं. वह दिल से नहीं बोल रहे थे, और उनके आंकड़े भी गलत थे. जनता की नजर में उनके स्वच्छ भारत की कलई खुल चुकी है. महंगाई बढ़ रही है, और प्रधानमंत्री कार्यालय तक लिखापढ़ी के बाद भी लोगों का काम नहीं हो रहा. देश महंगाई, आतंकवाद, असुरक्षा, बेरोजगारी और प्राकृतिक आपदा से हलकान है. गरीबी का प्रतिशत बढ़ रहा है, और अमीर-गरीब के बीच की खाईं भी, ' जस- जस सुरसा बदन बढ़ावा' के अंदाज में दिन-दूना रात चौगुना की तर्ज पर बढ़ती जा रही है. पर हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री, जिन्होंने संसद भवन में प्रवेश करने से पहले अपने को 'प्रधान सेवक' कहा था, के सहित, दूसरे जनप्रतिनिधियों को कोई फर्क नहीं पड़ रहा, चाहे वे किसी भी दल के हों, चाहे किसी भी सदन के, या किसी भी स्तर पर हों.

सभी कमाने खाने में, और अपने आपको आगे बढ़ाने में लगे हैं. और अगर आपका भी पेट भरा है, तो आपको हमारी बातें समझ में नहीं आएंगी, क्योंकि जनसरोकार की बात अब या तो तेजी से खत्म होते जा रहे जन आंदोलनकारियों के हाथों छोड़ दी गई है, या फिर सरकार विरोधी, समाज और व्यवस्था विरोधी नक्सलवादियों के हाथों. पत्रकारों और अखबारों के हाथ में भी अब यह नहीं, क्योंकि उन्हें भी अब इस कदर दबाया और प्रभावित किया जाने लगा है कि अगर उन्हें अपनी पहचान और वजूद बरकरार रखना है, तो वह वही दिखाएं और बताएं, जिसे सरकार या ताकतवर वर्ग देखना-दिखाना, सुनना-सुनाना और जानना - जताना चाह रहा है.

ऐसे में आम आदमी क्या करे? कहां जाए? बताना बड़ा मुश्किल है. सुनने - पढ़ने में शायद अजीब लगे, पर सच तो यही है कि सियासत जनसेवा की जगह, सत्ता पाने और वेतन-भत्ता पाने के साथ-साथ भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डूबकर रुपया छापने वाली इंडस्ट्री में तब्दील हो गई है. ऐसे में इससे टैक्स कलेक्टर और सर्विस प्रोवाइडर से ज्यादा और उम्मीद भी क्या की जा सकती है? शायद यही वजह है कि तमाम बड़ी जरूरतों के बीच संसद का मानसून सत्र बिना बरसे ही केवल गरज कर गुजर गया, और सत्ता पक्ष और विपक्ष चहुंओर कराह रहे देश की चिंता किए बगैर बेशर्मी से अपनी जिम्मेदारी से भागते रहे.

एक तरफ उत्तर प्रदेश के कई जिलों में जहां सूखा पड़ा है, तो दूसरी तरफ 'कोमेन' तूफान के कारण पश्चिम बंगाल और बाढ़ के कारण बिहार, गुजरात, ओडिशा, मध्‍य प्रदेश और राजस्‍थान के कुछ क्षेत्रों में जानमाल की काफी तबाही हुई है. पूर्वोत्तर के मणिपुर के चंदेल जिले में जहां भारी बारिश के कारण भूस्‍खलन से कई लोग मारे गए हैं, वहीं रेल की पटरियां भी जमीन छोड़ लोगों की जान ले रहीं हैं. अभी मध्य प्रदेश में कामायनी एक्सप्रेस और जनता एक्सप्रेस नाम की रेलगाड़ियां दुर्घटनाग्रस्त हो गईं, जिनमें तमाम लोग मारे गए. पर इस हादसे की जिम्मेदारी लेने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ. जिस लेवल पर इस हादसे की चर्चा होनी चाहिए, वह भी नहीं हुआ. रहा पड़ोसी, तो वह आतंक की आग में रोज घी डाल रहा है.

सरहद पर रोज सैनिक मर रहे हैं, और खेतों में किसान. नौजवान बदहाल है, और कामगार तबके को अपना कोई पुरसाहाल नहीं दिख रहा, पर इनकी चिंता किसे है? दरअसल शोरशराबा के इस दौर में संवेदनाएं भोथरी होती जा रही हैं. जनता से सीधे जुड़ाव की जगह 'मशीनी बातचीत' ने ले ली है, जिसमें संवाद एकतरफा और यांत्रिक होता जा रहा है. प्रधानमंत्री को जनता से मिलने की तुलना में ट्वीटर हैंडल अधिक भाता है, क्योंकि यहां परोसी जाने वाली टिप्पणियों के लिए आपकी खुद की मौजूदगी जरूरी नहीं है. आपकी नौकरी करने वाला कोई भी व्यक्ति आपके आदेश पर आपके पासवर्ड और एकाउंट से कोई भी टिप्पणी कर सकता है. और आपकी कृपा की आस में जी रहा मीडिया उसी पर खबर बना कर दिनभर दिखाता, छापता और चलाता रह सकता है.

शायद यही वजह है कि प्रधानमंत्री की देखा देखी उनके बाकी मंत्रियों और मंत्रालयों ने भी जनता से सीधे नाता जोड़ने की जगह अपने को यांत्रिक करना शुरू कर दिया है, और मजे की बात यह है कि यह सब 'डिजीटल इंडिया' के नाम पर हो रहा है. सरकारी मंत्रालयों में पत्रकारों की पहुंच को इस कदर प्रभावित कर दिया गया है कि अगर आप 'खेमे' के नहीं हैं, तो आपके हाथ कुछ भी नहीं लगना. महत्त्वपूर्ण संस्थानों, और विभागों में नियुक्ति का अर्थ अब आपका अनुभव और योग्यता नहीं, बल्कि 'खेमे' से आपकी घनिष्ठता पर तय करता है. एक तरह से अघोषित सी तानाशाही का जो दौर सत्ता केंद्रों की रिपोर्टिंग करने वाले अब देख रहे हैं, वैसा इमरजेंसी लागू होने से ठीक पहले इंदिरा गांधी के शासन काल में भी नहीं देखा गया था.
 
तो आखिर यह सरकार चाहती क्या है? अभी संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ' ईश्वरीय देन' कहा. यह देवकांत बरुआ के 'इंडिया इज इंदिरा और इंदिरा इज इंडिया' के नारे से किस तरह अलग है? सरकार की असलीयत यह है कि यह एकतरफा बड़े घरानों के हित के लिए, केवल उन्हीं को लाभ पहुंचाने वाले काम कर रही है. जितने भी नारे और योजनाएं बन रहीं हैं, सबमें पहले यह देखा जा रहा है कि इससे ज्यादा से ज्यादा अपने फेवर वाले पूंजीपतियों को लाभ कैसे पहुंचे? 'स्वच्छ भारत' से लेकर  'डिजीटल इंडिया' तक के नाम पर यही हो रहा. आलम यह है सूचना और प्रसारण मंत्रालय अमेरिकी कंपनियों के एजेंट की तरह काम करने में लगा है, वरना डिजीटल समाचार मीडिया पर विज्ञापन को लेकर कांग्रेसी शासन के दौरान बनी 'त्रैमासिक योजना' मोदी जी की सरकार में भी पांचवीं बार डीएवीपी द्वारा नहीं बढ़ा दी जाती.

दरअसल इस सरकार, या देश में किसी भी स्तर पर काम कर रही सरकार के लिए मानवीय सरोकारों का अर्थ अब केवल अमीरों का सरोकार भर है. वरना नोएडा के भ्रष्ट इंजीनियर यादव सिंह पर उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार और भगोड़े ललित मोदी पर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार का रवैया एक जैसा नहीं होता. एक जूनियर इंजीनियर से  सीधे राज्य की सबसे कमाऊ प्राधिकरणों के चीफ इंजीनियर के तौर पर कुमारी मायावती और अखिलेश यादव, दोनों की सरकार में अरबों रुपए कमाने वाले यादव सिंह पर सीबीआई बिना हाईकोर्ट के आदेश के छापा तक नहीं मार सकी.

इसी तरह ललित मोदी पर सुषमा स्वराज का लोकसभा में बयान आया कि, '‘मैंने मोदी को ट्रैवल डॉक्यूमेंट देने के लिए कोई सिफारिश नहीं की, केवल ब्रिटिश सरकार को मौखिक संदेश भिजवाया था और फैसला उन्हीं पर छोड़ा था...मोदी की पत्नी 17 साल से कैंसर से जूझ रही हैं. उन्हें दसवीं बार कैंसर उभरा है. उनका पुर्तगाल में इलाज होना था. उनकी मौत भी हो सकती थी या दोनों किडनी खराब हो सकती थीं. अगर मेरी जगह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी होतीं तो क्या करतीं? अगर ऐसी मदद गुनाह है, तो हां, मैंने गुनाह किया है. इसके लिए सदन जो सजा दे, मैं भुगतने को तैयार हूं.'

वाह, महोदया! क्या जवाब है? और किस स्तर की मानवीयता! हजारों बेरोजगार पत्रकार ईमानदारी से अपनी वेबसाइट चलाते हुए, अखबार निकालते हुए सरकार से अपने जीवन-यापन के विज्ञापन मांग रहे हैं. बिना सरकारी मदद के मरणासन्न हैं, तो उनके लिए नियमावली नहीं है? पैसे नहीं हैं, समय नहीं है, और ललित मोदी के लिए...शायद इसीलिए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने जवाब में कहा कि, 'जब भी चोरी होती है तो बताकर नहीं होती. सुषमा स्वराज ने चोरी छिपे काम किया था. ललित मोदी की मदद करने की बात उन्होंने मंत्रालय या सरकार को क्यों नहीं बताई. विदेश मंत्री देश की जनता को बताएं कि ललित मोदी ने इसके लिए उन्हें और परिवार को मदद के लिए कितना पैसा दिया?'

चिदंबरम का तर्क था कि 'सुषमा स्वराज के प्रश्न का उत्तर है: ललित मोदी की पत्नी को मरने के लिए नहीं छोड़ दिया जाता. उन्हें केवल पुर्तगाल के लिए एक अस्थायी भारतीय यात्रा दस्तावेज के लिए भारतीय उच्चायुक्त से आवेदन करने की सलाह दी जाती.'  सचाई तो यह है कि कांग्रेस हो या भाजपा, सपा हो या बसपा, सबने सियासत को दुधारू गाय समझ लिया है, जिसको पालने पोसने, खिलाने-पिलाने और रक्षा की जिम्मेदारी तो  जनता की है, पर दूध पर अधिकार नेताओं का है. और नेता फिर चाहे उस दूध को जिसे दें. वह कोई भी यादव सिंह, ललित मोदी या व्यापम का कोई हो सकता है. दिनकर के शब्दों में, 'श्वानों को मिलता दूध-वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं.' मेरे पास तो नहीं, क्या आपके पास है इस हालात का कोई विकल्प? जवाब मिल जाए तब मुझे भी बताइयेगा. तब तक बोलिए, जय हिंद! मेरा भारत महान!

विशेषः  आज से ठीक 5 साल पहले आज के  ही दिन समाचार और विचार के ध्वजवाहक के तौर पर आप सबकी पसंदीदा वेब साइट FacenFacts  की शुरुआत हुई थी. एक मिशन, एक आंदोलन के तौर पर. इस संकल्प के साथ की आज के दौर में जब समाचार और मीडिया जगत केवल सूचना और मनोरंजन परोसने का एक व्यवसाय भर रह गया है, तब हम आप के लिए, आप के साथ, आप के सरोकारों से जुड़ कर आपको वह सब कुछ जता बता सकें, जो डिजीटल वर्ल्ड पर कहीं भी उपलब्ध हो...हम अपने इस प्रयास में कितने सफल हुए, यह तो आप को पता होगा, पर आपके स्नेह से हम भी आज 6ठें वर्ष में प्रवेश कर गए. लिहाजा जश्ने आजादी की शुभकामनाओं के साथ, हमारा साथ देने के लिए भी आप सबका आभार, बधाइयां.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

वोट दें

क्या विजातीय प्रेम विवाहों को लेकर टीवी पर तमाशा बनाना उचित है?

हां
नहीं
बताना मुश्किल
 
stack