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माननीय! आप को इसके लिए नहीं चुना गया था

माननीय! आप को इसके लिए नहीं चुना गया था किस ने कब कहा था, याद नहीं आ रहा, पर क्या सटीक कहा था कि 'संसद और विधानसभा गपबाजों का अड्डा है.' वाकई पार्लियामेंट के मानसून सत्र के हालात तो यही बता रहे. हमारे माननीय सांसद जिस काम के लिए चुने गये हैं, उसे छोड़ कर बाकी सब कुछ कर रहे. मीडिया पर बयान जारी है, मुस्करा कर एक -दूसरे का स्वागत जारी है, दैनिक भत्ता जारी है, सरकारी महकमों में पैरवी जारी है, हवाई यात्राएं, सरकारी पार्टियां...मतलब सुख-सुविधा, ताकत, पैसे का हर काम जारी है, सिवाय इसके कि वे देश की सबसे बड़ी चौपाल 'संसद', जिसे संवैधानिक भाषा में विधायिका भी कहते हैं, के विधायी कार्यों से विरत हैं.

कहने के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के पास संसद को चलने और न चलने देने के पक्ष में अपने -अपने तर्क हैं, पर जनता का काम तो उन तर्कों से नहीं चलता, न ही देश चलाने के लिए उसे बिना चर्चा के कानून चाहिए. सरकार अपने काम तो अध्यादेशों से और सरकारी दिशा-निर्देशों से भी कुछ महीनों तक चला सकती है, पर जनता के काम और उसकी जरूरतें रोजमर्रा की हैं. फिर उसके लिए 'संसद' उसकी खुद की समन्वित ताकत का वह प्रतीक है, जो उसके संविधान निर्माताओंं ने प्रजातांत्रिक व्यवस्था अपनाते समय उसे सौंपी थी.

इसीलिए लोगों की उम्मीदें अपने संसदीय जनप्रतिनिधियों से सबसे ज्यादा होती है. पर हाल के दिनों में यह देखा जा रहा है कि उसका यही प्रतिनिधि एक बार चुन लिए जाने के बाद अपने 'अधिकारों' के जाल में इस कदर संलिप्त हो जा रहा है कि अपने ही संसदीय क्षेत्र की जनता के प्रति, साथ ही अपने संसदीय ' दायित्वों और कर्तव्यों' का उसे कोई भान नहीं रह रहा.

अभी ललित मोदी कांड और व्यापम भ्रष्टाचार के मसले पर संसदीय कार्यवाही ठप है. कब तक ठप रहेगी कहना थोड़ा मुश्किल है. सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों अपने-अपने ढंग से अपनी बातों पर अड़े हैं. मोदी सरकार का तर्क है कि सिर्फ आरोपों के चलते उसका कोई भी मंत्री इस्तीफा नहीं देगा. पर यह तो 'पार्टी विद डिफ्रेंस' का कोई उद्धरण नहीं हुआ.

खुद पार्टी के सर्वाधिक वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने पिछले दिनों सियासत में सुचिता और पारदर्शिता पर जोर देते हुए यह कहा था कि नेताओं की असली जवाबदेही जनता के प्रति है, और चूंकि जनता ही किसी को नेता बनाती है, इसलिए नेताओं को भरसक आरोप लगने पर इस्तिफा दे देना चाहिए, और तटस्थ जांच करा कर जांच पूरी हो जाने, और खुद के निर्दोष साबित होने पर ही पद संभालना चाहिए. उन्होंने अपनी बात के पक्ष में हवाला घोटाले में अपना नाम सामने आने पर अपने साथी और वरिष्ठ नेता अटल विहारी वाजपेयी के मना करने पर भी खुद के इस्तीफा देने की घटना का भी जिक्र किया.

पर लगता नहीं कि वर्तमान की भाजपा में आदर्शों और मूल्यों के लिए कोई जगह है.  पिछले संसदीय सत्र का भी एक काफी बड़ा हिस्सा भूमि अधिग्रहण विधेयक और धर्मांतरण के मुद्दे पर हंगामे की भेंट चढ़ गया था. इसके चलते कई अहम विधेयक मंजूरी की बाट जोहते रह गए. इस सत्र में भी अगर वही हाल रहा, तो सरकार की मुश्किलें बढ़ती जाएंगी.

भाजपा का दुर्भाग्य तो यह की एक गैर-जिम्मेदार विपक्ष की तरह कांग्रेस को यह राह उसी ने दिखाई थी, जब यूपीए सरकार के समय राष्ट्रमंडल खेल, दूरसंचार स्पेक्ट्रम, कोयला खदान आबंटन आदि में हुई अनियमितताओं को लेकर भाजपा और उसके सहयोगी दलों संसद के काम में लगातार बाधा पहुंचाई. तब कई सत्र बिना किसी कामकाज के समाप्त हो गए थे. कांग्रेस तब सत्तारूढ़ दल के तौर पर इसकी भुक्तभोगी रही थी, इसीलिए उसे पता है कि इस तरह के संसदीय हंगामे का सरकार के कामकाज पर कैसा प्रतिकूल असर पड़ता है.

कायदे से अपने अतीत के अनुभवों से सबक लेकर, कांग्रेस को संसद को चलने देने में सरकार की मदद करनी चाहिए. कांग्रेस से जनता की यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि बदले की भावना से संसद की कार्यवाही में गतिरोध पैदा करने की बजाय वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत विधायी कामकाज होने दे, पर इसके लिए खुद भाजपा को भी अड़ियल रूख छोड़ना पड़ेगा.

संसद को सुचारु रूप से चलने देना कोई एकतरफा समझौते का मुद्दा नहीं है. प्रजातंत्र में समाज के आखिरी आदमी तक की आवाज की अपनी अहमियत है, फिर यह तो संसद है. यह केवल कांग्रेस बनाम भाजपा, या सत्ता पक्ष बनाम विपक्ष का मसला नहीं. जनप्रतिनिधियों का काम है, जनता की उम्मीदों और कसौटी पर खरा उतरना. इसीलिए  संसद के चलने देने में सत्तापक्ष से ज्यादा लोकतांत्रिक और व्यावहारिक कदम की उम्मीद की जाती है. संसदीय कार्यमंत्री का काम ही यही होता है. फिर प्रधानमंत्री लोक सभा में खुद पार्टी की नुमाइंदगी कर रहे हैं, तो उन्हेंं चुप्पी साधने की बजाय खुलकर बोलना चाहिए. जबकि भाजपा ने इसके ठीक उलट इस मुद्दे पर गंभीरता दिखाने के बजाय अड़ियल रुख अपना रखा है.

संसदीय कार्य मंत्री वेंकैया नायडू ने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 'ईश्वरीय देन' बता कर और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने मानवीय आधार पर ललित मोदी के मदद की बात स्वीकार कर आग में घी डालने का काम किया है. रही सही कसर लोक सभा अध्यक्ष द्वारा सदन से पचीस कांग्रेसी सांसदों के निलंबन ने पूरी कर दी है. सत्ता पक्ष के इस रवैए ने कांग्रेस को सदन के अंदर और बाहर अतिरिक्त उर्जा मुहैया करा दी है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इसे 'लोकतंत्र की हत्या' करार दिया है, तो उपाध्यक्ष राहुल गांधी सुषमा स्वराज पर सीधे पैसा खाकर ललित मोदी की आपराधिक मदद करने का आरोप लगा रहे हैं.

भाजपा कहने के लिए मीडिया में और दिखावे के लिए उपरी मन से संसद में चर्चा की अपील तो कर रही है, पर उसका भाव यही है कि ललित मोदी से सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे की निकटता, व्यापमं घोटाले में शिवराज सिंह चौहान और सार्वजनिक वितरण प्रणाली में अनियमितता में रमन सिंह को दोषी ठहराने के बजाय सदन में केवल उस पर चर्चा की जाए, बातचीत की जाए. कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी और माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी ने ठीक कहा है कि ये मामले आपराधिक हैं. इसलिए इन पर केवल संसद में बहस के जरिए फैसला नहीं सुनाया जा सकता. आरोपी नेताओं को नैतिक आधार पर तब तक अपने पद से अलग रहना चाहिए, जब तक उनसे जुड़े मामलों में अदालत का फैसला नहीं आ जाता.

खुद भाजपा के दूसरे वरिष्ठ नेता शांता कुमार ने भी पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिख कर कुछ ऐसे ही विचार व्यक्त किए हैं. पर भाजपा आलाकमान, जिसका इन दिनों मतलब केवल 'नरेंद्र मोदी' हैं, लगता नहीं कि ऐसी बातें सुनने के पक्ष में हैं. भाजपा को भय है कि अगर इस्तीफों का सिलसिला शुरू हुआ, तो आदरणीय की कठोर नेतृत्वकर्ता की छवि खराब होगी. बिहार आदि राज्यों के विधानसभा चुनावों में पार्टी का जनाधार खिसक सकता है.

पर हालफिलहाल संसद से सड़क तक पार्टी की जो भद्द पिट रही, वह कम नहीं है. कांग्रेस तेजी से अपनी खोई हुई जमीन को वापस पाने में दिन- रात एक किए हुए है. सोशल मीडिया और इंटरनेट, को अगर बदलते वक्त का पैमाना मानें, जिस पर युवा वर्ग को साध कर मोदी जी खुद 2014 सत्ता में पहुंचे थे, तो वहां माहौल बदल रहा है. फेस बुक हो या ट्वीटर, इन दिनों सत्तारूढ़ दल के खिलाफ हो रही चर्चाओं से अटा पड़ा है. भाजपा के पेड समर्थक भी पार्टी के लिए वह माहौल नहीं बना पा रहे जिसकी उसे दरकार है.

भाजपा संसद में भले बहुमत के जोर पर विपक्षी दलों के सवालों पर अपनी दलीलों से खुद को सही साबित करने का प्रयास कर ले, पर इससे जनता की निगाह और दूसरे सार्वजनिक मंचों पर उसकी किरकिरी कम नहीं होने वाली. संसद आखिर मुद्दों पर चर्चा का मंच है, उसे जोर आजमाइश का अखाड़ा क्यों बनाया जाना चाहिए? इसका जवाब आज नहीं तो कल मोदी और उनकी टीम को देना ही होगा. यह प्रजातंत्र है, राज तंत्र नहीं, और इसमें वाकई प्रधानमंत्री अगर प्रधान सेवक बना रहता है, तो लंबा टिकता है, वरना जनता के विश्वास की इमारत एक बार भरभराने लगती है, तो फिर रेत के महल कितनी देर ठहरते हैं?
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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