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जो चले गए, उन पर राजनीति क्यों ?

जो चले गए, उन पर राजनीति क्यों ? दुनिया के लगभग सभी धर्म 'जीवन' और 'मृत्यु' को ईश्वर की इच्छा से संचालित घटना मानते हैं. यहां तक की नास्तिक, जिन्हें ईश्वर की सत्ता क्या, उनके वजूद तक पर भरोसा नहीं, वे भी इसे ईश्वर से अलग करने के बावजूद, और कुछ न सही तो 'घटना' तो मानते ही हैं. इसीलिए, जन्म लेने पर खुशी और मौत पर दुख मनाने या मानने की परंपरा कितनी पुरानी है, कहना मुश्किल है. एक तरह से जीवन और मृत्यु पर प्रतिक्रिया इनसान के 'इनसान' बने रहने का सनद तो है ही, वह यह भी जताता है कि इनसानी समाज ने सभ्यता और संवेदनशीलता का कौन सा मुकाम छुआ है.

इसीलिए, जुलाई की 30 तारीख को देश में हुई दो खास मौतों पर जिस तरह सियासत हुई,  सोशल मीडिया और टीवी पर जो उन्माद मचा, उसे पढ़, देख, सुन मन आहत हो गया, कि आखिर किस दिशा में जा रहा है देश, हमारा समाज, हमारे लोग, हमारे नेता और हमारी युवा पीढ़ी...वाकई अभी भी हम इतने असभ्य हैं कि किसी की मौत भी हमारे लिए अवसर हो सकती है. पहले बात करते हैं भारत रत्न, पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम की. कलाम साहब का देहांत 27 जुलाई को शिलांग में भारतीय प्रबंधन संस्थान में एक लेक्चर के दौरान हुआ. वह देश की एक ऐसी संतान थे, जिन्हें सभी धर्मों में समरसता और ईश्वर की सत्ता पर असीम विश्वास था.

उनके इस विश्वास की एक बड़ी वजह भी थी. वह मानते थे कि उनके जीवन काल में उन्हें जो भी मिला वह उनकी योग्यता, प्रयासों या मौकों का प्रतिफल न होकर ईश्वरीय देन था. वह मानते थे कि इनसान के हाथ में कर्म करने के अलावा कुछ भी नहीं है, और इसी से दुनिया को बेहतर बनाया जा सकता है. रहे परिणाम, तो आप प्रयास करते रहिए, वे एक दिन मिलेंगे ही. अपने खुद के जीवन का उदाहरण देते हुए उन्होंने माना था कि वह कोई विशेष प्रतिभाशाली रहे हों, ऐसा नहीं है. उनका जीवन बेहद गरीबी में बीता, यहां तक की परिवार के मछली पकड़ने और अखबार बांटने के व्यवसाय में वह बचपन से ही पढ़ाई के साथ-साथ हाथ बंटाने लगे थे.

तब एक ही मकसद था, जीवन यापन के लिए कोई सरकारी नौकरी. तमाम किशोरों की तरह देशभक्ति का जज्बा उनके मन में भी था, इसलिए उन्होंने एयरफोर्स ज्वाइन करना चहा, पर नौकरी नहीं मिली, और जब वह हताश निराश हो जीवन त्यागना चाहते थे, तब एक साधु के कहने से फिर से हिम्मत जुटाई और डीआरडीओ से जुड़ गए. उसके बाद डॉ भाभा, डॉ साराभाई की टीम का हिस्सा बनने, इंदिरा गांधी द्वारा परमाणु परीक्षण और फिर देश की मिसाइल और परमाणु टीम का हिस्सा और उनकी अगुआई से भारत रत्न होते हुए राष्ट्रपति पद तक पहुंचने की यात्रा किसी अद्भुत घटना, संयोगों और ईश्वरीय कृपा से अलग नहीं.  डॉ कलाम इसे जीवन भर नहीं भूले.

उनकी सरलता, सादगी, कर्म प्रतिबद्धता और सक्रियता एक मिसाल थी और यही उनका संदेश भी था. वह कामचोरी को हद से ज्यादा नापसंद करते थे. उनका मानना था कि उनकी मौत पर छुट्टी न करके ज्यादा काम कर एक संदेश दिया जाए. पर हुआ ठीक उलटा. खूब छुट्टी हुई, और जो जितना बड़ा कामचोर और बहुरुपिया था, उसने उतनी ही तेजी से उनके निधन पर घड़ियाली आंसू बहाए. अपने माता-पिता, सास-श्वसुर, गुरुजनों और बुजुर्गों की अनदेखी करने वाले लोगों ने तो डिजीटल प्लेटफार्म यानी सोशल मीडिया फेसबुक, ट्वीटर, ह्वाट्स एप पर ऐसे-ऐसे संदेश चेपे, जैसे लगा कि इन्होंने डॉ कलाम को एकदम से समझ लिया है, उनकी बातों को मान लिया है, ये लोग वाकई दुखी हैं, और देश डॉ कलाम के ज्वलंत सकारात्मक जीवन संदेशों से चमक उठेगा.

पर ऐसे लोगों की कलई तुरंत ही खुल गई.  30 जुलाई को ही, जिस दिन तमिलनाडु के रामेश्वरम में डॉ कलाम को सुपुर्दे खाक किया जाना था, उसी दिन सारी मानवीय अपीलों को ठुकरा कर मुंबई बम धमाकों के सह-आरोपी याकूब मेमन को फांसी दे दी गई. मेमन मुंबई बम धमाकों में कितना दोषी था, था भी या नहीं, पर बहस का अब कोई मतलब नहीं, पर इतना तय था कि उसे हमारे सुरक्षा बलों, सरकार या पुलिस ने नहीं पकड़ा था. बल्कि रॉ के एक बड़े अधिकारी के भरोसे के बाद भारतीय न्याय व्यवस्था पर भरोसा करते हुए उसने खुद को गिरफ्तार कराया था. अगर वह नहीं चाहता, तो मुंबई बम धमाकों के असली आरोपियों दाऊद इब्राहिम और टाइगर मेमन की तरह यह भी फरार रहता...

बहरहाल बहस यह नहीं कि इस कांड में याकूब मेमन कितना दोषी था, बल्कि बहस यह कि जिस ढंग से हमने उसकी सजा-ए-मौत को अपनी बेवकूफियों से एक आयोजन बना दिया, वह हमें किस समाज का हिस्सा बनाता है?

आंख के बदले आंख की सजा अब भी कबाईली, असभ्य समाजों में प्रचलित है. तो क्या न्याय के नाम पर राज्य संचालित मौत की सजा जायज है? जब राज्य किसी को जन्म नहीं दे सकता, तो उसकी जान लेने का अधिकार उसे कैसे? दुनिया भर में मौत की सजा खत्म कर दिए जाने पर बह्स हुई है और संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रपट के मुताबिक, 160 देशों ने कानूनन मौत की सजा समाप्त भी कर दी है, और यदि इनमें से कुछ ने सीधे नहीं की, तो व्यावहारिक तौर पर समाप्त कर दी है. हालांकि विकसित और प्रजातांत्रिक होने की दुहाई देने वाले भारत, चीन, अमेरिका और जापान ने इसे अभी तक समाप्त नहीं किया है.

ध्यान देने वाली बात यह है कि पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने मृत्यु दंड को खत्म करने की वकालत की थी. उन्होंने विधि आयोग से कहा था कि वह अपनी पुरानी रिपोर्ट पर फिर विचार करे, जिसमें उसने मृत्यु दंड को बहाल रखने के लिए कहा था. पूर्व राष्ट्रपति कलाम ने कहा था कि राष्ट्रपति के रूप में जिन मामलों में फैसला करने में उन्हें बड़ी तकलीफ के दौर से गुजरना पड़ा, 'मृत्यु दंड' का मामला उन्हीं में से एक है. उन्होंने विधि आयोग को भेजी अपनी राय में लिखा था कि हम सब ऊपर वाले द्वारा बनाए जाते हैं. इनसान द्वारा बनाई गई कोई भी व्यवस्था इस बात के लिए सक्षम नहीं है कि वह बनाए गए साक्ष्यों के आधार पर किसी की जान ले ले. अपने कार्यकाल के दौरान कलाम ही ऐसे राष्ट्रपति रहे, जिन्होंने मौत की सजा से जुड़े 50 मामलों को सरकार के समक्ष पुनर्विचार के लिए भेजा.

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, जो की खुद किसी भी तरह के मृत्यु दंड के खिलाफ थे,  ने कहा था कि मैं मृत्युदंड को अहिंसा के खिलाफ मानता हूं, अहिंसा से परिचालित व्यवस्था हत्यारे को सुधारगृह में बंदकर सुधरने का मौका देगी. अपराध एक बीमारी है, जिसका इलाज होना चाहिए. संविधान के निर्माताओं में से एक डॉ अंबेडकर ने भी कहा था कि मैं मृत्युदंड खत्म करने के पक्ष में हूं. शायद इसी वजह से, महात्मा गांधी के पौत्र गोपालकृष्ण गांधी ने एक सेमिनार में कहा कि जब विधि आयोग में मौत की सजा की वांछनीयता और प्रभावकारिता के बारे में विचार कर रहा है, तब भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मेरी अपील है कि याकूब मेमन को जिंदगी बख्शना राष्ट्रपति कलाम की मानवीय वसीयत को उपयुक्त श्रद्धांजलि होगी.

बहरहाल, अब न तो याकूब है न ही डॉ कलाम. किसी खास मामले में मौत की सजा हो या नहीं, इस पर हर किसी के अपने- अपने विचार हो सकते हैं, पर सूचना तंत्र के प्रभाव ने इन दोनों की मौतों पर जो चर्चा छेड़ी, वह अतिरेक और उन्माद के चलते भले ही अनुचित करार दी जाए, पर यह सबक तो देती ही है कि आपने जिस तरह का जीवन चुना है, वह आपकी मौत के बाद भी आपके नाम के साथ जिंदा ही रहता है. एक अपने कर्मों से भारत रत्न होता है, लाखों आंसू बहाते हैं, तो दूसरे के लिए मौत भी सम्मान नहीं लाती...यह और बात है कि किसी की मौत को उत्सव या उपहास में बदल देना किसी सभ्य समाज का हिस्सा नहीं.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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