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तरंगों की सवारी छोड़ जमीन पर उतरिए साहेब!

तरंगों की सवारी छोड़ जमीन पर उतरिए साहेब!
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अचानक बिहार पर बहुत मेहरबान हो गए हैं और 25 जुलाई को पटना में उन्होंने राज्य की तरक्की के लिए 3.75 लाख करोड़ रुपए देने की घोषणा कर दी. जबान से किसी को कुछ भी देने में क्या जाता है. फिर भी चुनावों में उनकी इस घोषणा से भाजपा को लाभ मिलेगा ही मिलेगा. पर कहते हैं, जो इतिहास से सबक नहीं सीखते वे मिट जाते हैं, तो क्या भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज इस छोटे से तथ्य से अनजान हैं? होंगे तो नहीं, पर उनकी हालिया हरकतों को देखकर लगता है कि वे बुरी तरह से गुमराह हैं. उन्हें शायद अपने 'नारों', 'जुगाड़', 'माहौल बनाने की क्षमता' और कथित 'वादों' पर 'जमीनी हकीकत' से ज्यादा भरोसा है.

भाजपा के लोग इस छोटी सी बात को समझने को तैयार नहीं कि अगर सत्ता के रथ का इस्तेमाल उन्होंने केवल 'अपने' और 'अपनों' के लिए किया, तो जब भी मौका आयेगा, रथ से उतरते हुए उन्हें देर नहीं लगेगी... और रही बात उनके हमदर्दों की, तो एक बार पैदल हो जाने पर पूछता भला कौन है? फिर देश के लिए कुछ करना और उससे पाना तो छोड़िए, अपना वजूद भी बचाना मुश्किल सा लगता है.

मनमोहन सिंह जी का हाल देखिए, 10 साल तक प्रधानमंत्री थे, उसी कुर्सी पर जिस पर साहेब को बैठे बमुश्किल 15 माह बीते हैं, पर अदालतें तक कोयला घोटाले में उन्हें सम्मन भेजने लगी हैं. फिर भाजपा के बड़ों को इतना 'कन्फ्यूजन' क्यों? इतना 'ईगो' क्यों? वह यह क्यों भूलने लगे कि देश की सत्ता उन्हें उनके उन वादों के चलते भी मिली है, जिसमें जमीनी स्तर पर बदलाव और अच्छे दिनों के वादे थे. फिर क्या वजह है कि जिन कामों के लिए बहुमत से सत्ता संभालते ही पूरा करने के उन्होंने सपने दिखाए थे, उन्हीं को अमल में लाने के लिए अब 25 साल मांगे जा रहे हैं.

आखिर 25 साल का यही समय भाजपा के हुक्मरान पूंजीपतियों के कामों के लिए क्यों नहीं मांग रहे? मजे की बात तो यह की भाजपा के आला नेताओं को छोड़ दें, जो खुद बिना किसी खास योग्यता के सिर्फ 'गणेश परिक्रमा' कर सत्ता की मलाई चाट रहे हैं, तो खुद उसके नेता और कार्यकर्ता भी इस हालात से बेजार होने लगे हैं. भाजपा के इस कदर पूंजीपरस्त तो छोड़िए, व्यक्तिपरस्त होने की कल्पना भी कईयों ने नहीं की थी.

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता, जो अपने दौर में आरएसएस के भी खासमखास थे, ने निजी बातचीत में यह स्वीकारा की पार्टी ने अपने गठन के बाद से चाटुकारिता और मनमानी का ऐसा दौर नहीं देखा. सत्ता अटल जी के समय भी थी, दलाल और पूंजीपति तब भी थे, महाजन, मिश्रा जैसे सलाहकारों का बोलबाला तब भी था, पर तब भी आडवाणी जी या संघ की चलती थी, सत्ता विकेंद्रित थी. पर आज.... सब कु्छ केंद्रीकृत. ऐसे में कैडर कहां जाए? किसके पास जाए? उसकी सुनवाई कहीं नहीं.

ऊपर से खतरनाक तो यह कि यदि कोई सच बोलने लगता है, तो चाटुकार मंडली यह साबित करने में लग जाती है कि चूंकि इन जनाब को कुछ नहींं मिला, इसलिए ये ऐसी बातें कर रहे? पर जनता भी अगर ऐसा ही सोच रही तो इसका जवाब क्या है? सरकार के लोग इसका भी हल ढूंढ लाए हैं. जुमले गढ़ो, डॉटा तैयार करो, माहौल बनाओ, नारे दो, वादे करो और सपनों में उलझा दो. फिर जनता असलीयत देखने की बजाय वह उन आंकड़ों में उलझ जाएगी, जो गणित में अंकों के खेल से इतर कुछ और नहीं.

पर ऐसी ही भूल कभी अटल जी की टीम ने भी 'शाइनिंग इंडिया' के जुनून में की थी. भाजपा में कंप्यूटर, टैब, स्मार्ट फोन आधारित टेक्नोलॉजी का उपयोग शुरू करने और उसे पॉपुलर करने का श्रेय स्वर्गीय प्रमोद महाजन को जाता है. उनकी टेक सेवी टीम ने इस मीडियम का कुछ ऐसा शमां बांधा था कि बिना ग्राउंड रियलिटी जाने 1999 के अक्टूबर में प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी ने अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा होने से 6 महीना पहले ही चुनाव करवा दिया और मई 13, 2004 को ही अपनी कुर्सी से हाथ धो बैठे.

दरअसल, इसमें दोष इस मीडियम का नहीं, अटल जी के चाटुकार सलाहकारों का था. जो अपने स्वार्थ में सचाई से आंख मूंदे हुए थे. आज भी हमारे अपेक्षाकृत युवा और उर्जावान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनकी मंडली ही बरबाद कर रही. आम जनता से तो वह गुजरात का मुख्यमंत्री रहने के दौरान ही कट गए थे. पर वहां सफलता पाते रहे, क्योंकि उन्होंने माहौल दिया. गुजरात और गुजरातियों की सफलता में सरकार से ज्यादा हाथ आम गुजरातियों का था, जो स्वभाव से ही व्यापारी होते हैं. यह ठीक है कि बाहर के इन्वेस्टमेंट के लिए सरकार ने माहौल मुहैया कराया, पर अमीर लोगों को सुविधा दिलवाना और बात है, और जरूरतमंद आम लोगों की मदद करना और बात.

प्रधानमंत्री को यह समझना ही होगा कि देश गुजरात नहीं है. कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और कच्छ के रण से लेकर अरुणाचल तक, देश के लोगों की जरूरतें और समस्याएं अलग-अलग हैं, जो केवल जुमलों और नारों से हल होने वाली नहीं. दिल्ली या राज्यों की राजधानियों में गोष्ठी कर लेने, संस्थानों और योजनाओं का नाम बदल देने और रेडियो पर मन  की बात कह देने, या फिर फेसबुक और ट्वीटर हैंडल पर कुछ पोस्ट कर देने भर से आम लोगों तक कोई संदेश नहीं पहुंच रहा.

अभी 15 जुलाई को प्रधानमंत्री ने 'स्किल इंडिया' का नारा दिया. अपने भाषण में हमेशा की तरह उन्होंने बड़ी-बड़ी बातें कहीं, उनका कहना था कि अगर आपको कुछ भी आता है, तो आपको डिग्री की जरूरत नहीं है. आप काम करना चाहते हैं, तो हम आपकी मदद करेंगे. प्रमाण -पत्र देंगे. यही बात उन्होंने  entrepreneur के लिए कही कि हम मौका मुहैया कराएंगे. पर मौके मांगने वाले जाएं कहां? कौन चेक करेगा उनकी स्किल? आज हर क्षेत्र में बाबूशाही का बोलबाला है, उस पर आप रोक कैसे लगाओगे?

आप स्किल की बात करते हो. हजारों पत्रकार न्यू मीडियम के चलते entrepreneur के रूप में अपनी- अपनी वेबसाइटें चला रहे, अखबार निकाल रहे, ब्लॉग लिख रहे, पर आपकी ही सरकार की नीतियां उन्हें मारने की हैं. डीएवीपी के विज्ञापनों से जुड़े महकमें में खुलेआम कहा जा रहा है कि सरकार छोटे अखबारों को खत्म करना चाहती है, बजट में इसके लिए कटौती की गई है, ऊपर से निर्देश हैं. वेबसाइटों पर विज्ञापन की कोई नीति नहीं है, या फिर है तो याहू और बड़े ग्रुप को ध्यान में रखकर.  

मजे की बात तो यह की इस मसले पर खुद प्रधानमंत्री तक को कई बार लिखा गया, पर असर उल्टा हो रहा है. ऐसे में आपके स्किल इंडिया और entrepreneur को बढ़ावा देने का वादा कैसे लोगों तक पहुंचेगा. बड़े तो आपकी बातें छापते नहीं, पर चूंकि उनका कमीशन मोटा है, इसलिए उनको विज्ञापन भी ज्यादा है. अपने सिस्टम की इन खामियों पर आपकी नजर कितनी है, इसी से चीजें स्पष्ट हो पाएंगी.
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सच तो यह है कि अगर वाकई, भाजपा और प्रधानमंत्री जी कु्छ करना चाहते हैं, तो हर एक की बात सुनना होगा. वह सिस्टम बनाना होगा, जिसमें हर व्यक्ति अपने लिए जीने और आगे बढ़ने का अवसर बिना किसी भेदभाव के पा सके. देश इस समय आर्थिक गुलामी की तरफ बढ़ रहा है, जब पूंजी केवल कुछ प्रतिशत लोगों तक सीमित होती जा रही है. तकनीक, मीडिया, अखबार, रेडियो, टेलीविजन, सूचना, संचार और तरक्की के तमाम साधनों पर केवल इस तबके का कब्जा है.

साहेब को कोशिश करनी होगी की इसका बंटवारा आम लोगों, उन व्यापारियों, कारोबारियों, प्रयोगधर्मी उत्साही उद्यमियों तक भी पहुंचे, जो इन हलकों में काम कर रहे हैं. आपकी नीतियों का, सरकारी नीतियों का लाभ भारतीय मध्यवर्ग को भी मिले, जिसने आपको बड़ी उम्मीदों से वोट दिया था, ताकि वह न केवल जिंदा रहे, बल्कि आपके कामों को भी जन-जन तक पहुंचाए.

पुनश्चः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बनारस दौरा 16 जुलाई को लगातार दूसरी बार बारिश के चलते रद्द हो गया था. सोशल मीडिया पर इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं चस्पां थीं. कुछ का कहना था कि भोले भंडारी बाबा विश्वनाथ मोदी से नाराज हैं, इसीलिए वह मोदी को बनारस उतरने नहीं दे रहे. कुछ की टिप्पणी थी, मोदी ने वादा करके गंगा मईया को साफ नहीं कराया, इसलिए गंगा मैया नाराज हैं. कुछ ने मोदी के काशी दौरे को मां अन्नपूर्णा के साथ जोड़ दिया, कि देश में आज भी लोग भूख से हलकान हैं, इसलिए मां मोदी को इशारों - इशारों में समझाना चाह रही कि वह इस तबके के लिए भी कुछ करें. बहरहाल वजह चाहे जो हो, मोदी को बनारस पहुंचना है, तो कुछ न कुछ करना ही होगा.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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