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दीवालिया क्यों हुआ सिकंदर महान का देश

दीवालिया क्यों हुआ सिकंदर महान का देश इंटरनेट जानकारी का समंदर है, बशर्ते, आपको उसके अंदर से मोती निकालना आता हो. लाखों-करोड़ों तरह के विचार और जानकारियां. अब आपको जानना क्या है, और वह जानकारी कहां है, अगर यह पता हो तो राह आसान हो जाती है. ग्रीस के जिस आर्थिक संकट ने समूचे यूरोप और अमेरिका को हिला रखा है, इसकी असली वजह आखिर क्या है? और भारत पर इस संकट का क्या असर होगा, पर बतौर पत्रकार अपनी तीखी नजर तो थी, पर अपने पाठकों को सरल भाषा में अर्थशास्त्र की यह कठिन पहेली कैसे बताई जाए, पर विचार कर ही रहा था कि यह कहानी सामने आ गई. कहानी कुछ यों है.

" ग्रीस की राजधानी एथेंस में एक 'बार' की मालिक थी जूलिया. वह परेशान थी, क्योंकि उसके सभी ग्राहक बेरोजगार शराबी थे. जब उसे लगने लगा कि वह 'बार' को ज्यादा दिन नहीं चला पाएगी, तो उसने एक मार्केटिंग प्लान बनाया. ग्राहकों के लिए खास ऑफर- 'आज पियो, पैसा बाद में दो'. इसी के साथ एक रजिस्टर में वह हिसाब रखने लगी कि कौन सा ग्राहक कितनी शराब पी रहा है. यह ग्राहकों का लोन रजिस्टर भी था.

" जूलिया के ऑफर की जानकारी आग की तरह पूरे एथेंस में फैल गई. नतीजतन उसके 'बार' में ग्राहकों की बाढ़ सी आ गई. जल्द ही जूलिया के 'बार' का सेल्स वॉल्यूम एथेंस के बाकी 'बार' के मुकाबले सबसे बड़ा हो गया. चीजें चमकदार दिखाई देने लगीं. नौकर-चाकर बढ़ गए, नए फर्नीचर आ गए.

" जाहिर है, जब ग्राहकों को बाद में पैसा चुकाने की सुविधा मिल रही थी, तो किसी को क्या आपत्ति हो सकती थी. जूलिया बीच-बीच में उन वाइन, बियर या ड्रिंक्स के दाम बढ़ाती रहती, जिसे लोग ज्यादा कंज्यूम कर रहे थे. इससे न केवल सेल्स वॉल्यूम में इजाफा हुआ, बल्कि प्रॉडक्ट की वैल्यू भी बढ़ गई.

" एक दिन जूलिया की इस कामयाबी की खबर स्थानीय बैंक के वाइस प्रेसिडेंट तक पहुंच गई और उस युवा, डायनामिक बैंकर ने ताड़ लिय कि ग्राहक को मिल रहा लोन उसके अपने बैंक के लिए भी कीमती साबित हो सकता है. उसने जूलिया को सामान खरीदने, ब्रांच खोलने आदि के लिए कर्ज देने की सीमा बढ़ा दी.

" बैंक के कॉरपोरेट हेडक्वार्टर में बैठे एक्सपर्ट्स ने कमाई के और तरीके ढूंढ निकाले. उन्होंने कस्टमर को दिए जा रहे उधार को ड्रिंक बांड और एल्की बांड का नाम दे दिया, ताकि उससे मोटा कमीशन हासिल किया जा सके. इस सिक्योरिटी से अंतर्राष्ट्रीय सिक्योरिटी मार्केट में सौदे कर लिए गए और नए निवेशकों को पता ही नहीं चला कि जिस सिक्योरिटी को 'AAA' बांड कहकर पेश किया गया, वह बेरोजगार शराबियों का कर्ज है.

" इस बांड के पास रेटिंग हाउस का सर्टिफिकेट भी था. बांड की कीमत बढ़ती गई और जल्द ही यह सिक्योरिटी देश के ब्रोकरेज हाउसों की पसंदीदा बन गई. एक दिन, जब बांड की कीमत बाजार में बेहद ऊंचाई पर जा चुकी थी, तब बैंक के रिस्क मैनेजर ने तय किया कि अब समय आ गया है, ग्राहकों से उधार वसूल करने का. उसने इस बारे में जूलिया को सूचना भेज दी.

" बैंक के नोटिस के चलते जूलिया अपने शराबी ग्राहकों से अपना उधार चुकाने को कहती है, पर उसके ग्राहक चूंकि बेरोजगार हैं, इसलिए वे पैसे वापस करने में अपनी असमर्थता जताते हैं. इसी के साथ जूलिया की उम्मीद धराशायी हो जाती है. अब चूंकि जूलिया बैंक से लिया हुआ कर्ज नहीं चुका पाती, इसलिए उसे खुद को दीवालिया घोषि‍त करना पड़ता है. वह टूट जाती है. 'बार' बंद हो जाता है. सभी कर्मचारियों की नौकरी चली जाती है. ड्रिंक बांड और एल्की बांड की कीमतें रातोंरात 90 फीसदी तक गिर जाती हैं.

" इस बांड के धाराशायी होते ही बैंक में लिक्विडिटी का संकट आ जाता है. वह नए लोन नहीं इश्यू कर पाता, लिहाजा उसे अपनी क्रेडिट और इकोनॉमिक एक्टिविटी को फ्रीज करना पड़ता है. जूलिया को शराब सप्लाई करने वालों ने पेमेंट के लिए लंबी छूट दी हुई थी. लेकिन, जब उनके पास मौजूद बांड का 90 फीसदी रिटर्न जाता हुआ दिखा, तो उन्हें भी वह लोन बट्टे खाते में डालना पड़ा, और वे सभी सप्लायर्स भी दीवालिया घोषित हो गए. प्लांट बंद करना पड़ा.

" बैंक, ब्रोकरेज हाउस और उसके कर्मचारियों को इस संकट से निकालने के लिए सरकार करोड़ों रुपए का बेलआउट पैकेज देती है. सरकार यह फैसला तब करती है, जब उसके पास खुद नकदी का संकट है. इस बेलआउट पैकेज के लिए, जो फंड चाहिए, वह एक्सट्रा टैक्स लगाकर ही मिल सकता है. पर जो लगेगा नौकरीपेशा लोगों पर, मिडिल क्लास पर, या उन सभी पर जो कभी जूलिया के 'बार' में नहीं गए, कभी शराब भी नहीं पी, मस्ती तो दूर की बात है."

2015 में ग्रीस के संकट का अर्थशास्त्र यही है. दरअसल ग्रीस में इस संकट की आहट लंबे समय से थी, पर पॉपुलरिटी के घोड़े, बाजार की चमक और भ्रष्टाचार में गले तक डूबे हुक्मरानों को समय रहते इसकी आहट नहीं दिखी. 1999 में आए भयंकर भूकंप और 2004 के ग्रीस ओलंपिक की तैयारियों की वजह से ग्रीस की सरकार लगातार कर्ज में डूब रही थी, पर तरक्की और देश के पुनर्निर्माण के नाम पर सरकार ने भारी कर्ज लेकर अंधाधुंध पैसे खर्च किए. इसके बाद कर्ज चुकाने के लिए और कर्ज लिया गया, और फिर तो एक सिलसिला ही चल निकला.

सात साल पहले, जब ग्रीस में संकट के लक्षण पहली बार दिखे, तो यूरोपीय आयोग, यूरोपियन सेंट्रल बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने मिलकर उसे संकट से उबारने का एक पैकेज तैयार किया था. ऐसी संस्थाएं जब कर्ज देती हैं, तो कई तरह की शर्तें लगाती हैं, जैसे वित्तीय घाटे को तेजी से कम करना होगा, वगैरह-वगैरह. इन संस्थाओं की शर्तों को पूरा करने के लिए ग्रीस ने सरकारी खर्चे में तेजी से कटौती की, लेकिन इससे संकट और गहरा गया.

सरकारी खर्चों में कटौती से दो नुकसान एकदम सीधे हुए- एक तो इससे बेरोजगारी बढ़ गई और दूसरे, इससे जनता को मिलने वाली सुविधाएं एकदम से कम हो गईं. इन सबसे असंतोष बढ़ गया. इस बीच नया निवेश कहीं से नहीं हुआ और अर्थव्यवस्था का विकास नहीं हो सका. कर्ज बढ़ता गया, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद, यानी जीडीपी में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई. इसी के चलते अपने इतिहास पर गर्व करने वाला कभी ग्रीक, यूनान और सिकंदर महान के देश के रूप में स्थापित यूरोप का यह देश दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गया.

अमेरिका खुद 2008 में इस तरह के हालात से गुजर चुका है. अमेरिका में क्राइसिस की वजह से एक के बाद एक लेहमन ब्रदर्स, गोल्डमैन सैक्स जैसी सैकड़ों साल पुरानी कंपनियां दिवालिया होने लगीं. आर्थिक संकट का ऐसा चेन रिएक्शन शुरू हुआ, जिससे दुनिया भर में कंपनियां बंद होने लगीं. बाजार धड़ाधड़ गिरने लगे.

साल 2008 के इस आर्थिक संकट की भारतीय रिजर्व बैंक के मौजूदा गवर्नर रघुराम राजन ने 2005 में ही भविष्यवाणी कर दी थी. इस बार फिर पिछले शुक्रवार को लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में दिए गए भाषण में राजन ने चेताया है कि विश्व अर्थव्यवस्था एक बार फिर 1930 जैसी भीषण महामंदी में फंस सकती है.

साल 1930 की महामंदी का आगाज 29 अक्टूबर, 1929 को शुरू हुआ था, जब अमेरिकी शेयर बाजार के गिरने के बाद दुनिया के तमाम बाजार धड़ाम से जा गिरे. . महामंदी के उस दौर में न बाजार बचा, न खरीदार. कहते हैं द्वितीय विश्वयुद्ध की एक बड़ी वजह 1929 से शुरू हुई वह महामंदी भी थी, जो युद्ध शुरू होने के करीब 10 साल बाद तक कायम रही.

ग्रीस के आर्थिक संकट से भारत ही नहीं,  दुनिया के तमाम देशों को यह सबक लेना चाहिए कि मजबूत वित्तीय नीतियों का कोई विकल्प नहीं है, और यह मजबूती पूरे देश में समान रूप से दिखनी चाहिए. आम तौर पर जब हम वित्तीय स्थिरता की बात करते हैं, तो सिर्फ केंद्र सरकार की नीतियों को ही देखते हैं, लेकिन पूरे देश की आर्थिक स्थिति का आकलन करने के लिए हमें इसमें राज्यों की अर्थव्यवस्था और उनकी नीतियों को भी शामिल कर लेना चाहिए.

पर भारत के हालिया हुकूमत के पिछले 14 माह इस बात की गवाही देते हैं कि वह इन घटनाओं से कोई सबक नहीं ले रही और देश की मजबूत माली व्यवस्था को 'प्लास्टिक' आधारित पूंजी व्यवस्था में बदलने पर आमादा है, जिससे पूंजीपतियों और बड़े व्यापारियों को तो फायदा हो, पर आम आदमी दिवालिया होता चला जाए. माली मजबूती के लिए पूरे देश का विकास जरूरी है, और देश का मतलब केवल सरकारें और पूंजीपति ही नहीं, उसके नागरिक भी होते हैं.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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