डिजिटल 'इंडिया' बनाम रियल 'भारत'

डिजिटल 'इंडिया' बनाम रियल 'भारत' साल में जितने दिन नहीं, उससे ज्यादा त्योहार कम थे क्या कि नरेंद्र मोदी सरकार हर हफ्ते एक नया शगूफा लेकर आ जा रही है, जो जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं. याद करिए, 'स्वच्छ भारत अभियान' के नाम पर उपर से नीचे तक सरकारी पैसों और झाड़ू से चले फोटो सत्र, जो आसपास की गंदगी तो दूर नहीं कर सके, पर हमारी-आपकी कमाई का करोड़ों रुपए स्वाहा हो गया. सरकार ने उस अभियान के नाम पर लाखों करोड़ की दुकान तो खोली, पर सामान...

अभी भी सड़कें, नाले, गली-मोहल्ले, रेलवे लाइनों के किनारे और स्टेशनों की गंदगी साफ-साफ दिखाई पड़ती है! दिल्ली की सड़कें, सरकारी दफ्तर, दिल्ली रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट तक तो साफ नहीं हैं. आपके इलाके में कहीं कुछ साफ हुआ क्या? कम से कम हमें यहां देश की राजधानी में तो नहीं दिखता! ना- ना, केजरीवाल जी को मत कोसिएगा, क्योंकि अगर उन्हीं की जिम्मेदारी थी, तो फिर आपको नारा देने या झाड़ू उठाने की क्या जरूरत थी? जन अभियान चलाते, गांधी बाबा की तरह गांव-गांव घूमते..पर इसमें इमेज कैसे बनती?  

इसीलिए इसका लक्ष्य पूरा भी नहीं हुआ था कि अलग-लग मोरचों पर तेजी से काम करते रहने वाला दिखाई देने के चक्कर में इस के तुरंत बाद आप लेकर आ गए 'मेक इन इंडिया'. इसे उत्सव कहें या नारा, खैर जो भी हो, प्रधानमंत्री जी इसके नाम पर दुनिया भर घुमे, दुनिया भर के पूंजीपतियों को, कंपनियों को बुलावा दिया. बड़े-बड़े समझौते हुए. फिर आगे, जमीन पर क्या हुआ? आम जनता के लिए क्या हुआ? सुना है कि कुछ पूंजीपति दिनदूना रात चौगुना की गति से आगे बढ़ रहे हैं. पर लोग?  वाराणसी के साथी बता पाएं शायद, अपना शहर क्योटो बना क्या? आलम यह है कि खुद प्रधानमंत्रीजी जल-जमाव के चलते इस शहर में अपनी मीटिंग तक ठीक से नहीं कर पाए. पर यह नारा अभी भी जिंदा और बिकाऊ है, बिल्कुल कांग्रेस के 'गरीबी हटाओ' नारे की तरह.

'मेक इन इंडिया' से कितने भारतीयों को काम मिला? मैं आम जनों, छोटे घरानों और इस देश के बहुसंख्यक कामकाजी तबके और मेहनतकशों की की बात कर रहा, उन उद्योगपति- पूंजीपति महानुभावों की नहीं, जिनके लिए सत्ता का हर बदलाव सफलता और व्यावसायिक हितों को साधने की केवल एक सीढ़ी भर होता है. मैं उन लोगों की भी बात नहीं कर रहा जिन प्रमुख, संभ्रांत लोगों की दूरदृष्टि ने 2009 के 'वाइब्रेंट गुजरात' जलसे में ही आज के प्रधानमंत्री जी की काबिलियत को भांप लिया था, और जिसका लाभ उन्हें पिछले 400 दिनों के शासन में भरपूर मिला, मिल रहा है और आगे भी मिलेगा.

मजे की बात यह की इस सरकार में हर शगूफा पहले नारे में तब्दील होता है, फिर माहौल बनाया जाता है, सरकारी ताकत झोकी जाती है और अंततः उसे उत्सव में तब्दील कर दिया जाता है. एक कहानी खत्म नहीं कि दूसरी शुरू, बेचारी जनता, उसके लिए समझना मुश्किल. न बाबू बदला, न ही माहौल बदला, न ही हालात बदले, पर वह इन नारों और उत्सवों को झेले. भाजपा के लिए भारत की तुलना में इंडिया कब से महत्त्वपूर्ण हो गया समझना काफी मुश्किल है.

'मेक इन इंडिया' का खुमार अभी जारी ही था कि 'अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस' का जलसा शुरू हो गया. चलो यह आम जनता के हेल्थ से जुड़ी कोशिश थी, पर एक दिन योग करने से क्या लोग स्वस्थ्य रहेंगे? क्या उनकी जरूरतें इस कसरत से पूरी हो जाएंगी? खैर 'योग दिवस' मनाने के नाम पर एनडीए के मंत्री देश के हर कोने पर छा गए. सेना तक को लगा दिया गया. सरकार ने इतनी ताकत संयुक्त राष्ट्र संघ में इस योग दिवस के लिए झोंक दी, कि उतनी तो कभी कश्मीर मुद्दे और चीन से सीमा विवाद पर भी नहीं लगाई गई थी.

बहरहाल योग दिवस का फायदा भूखे आम जनों से ज्यादा फूले पेट वाले बाबुओं और व्यावसायियों को मिलना था, जो मिला भी. नाक बंद कर सांस छोड़ने के इस खेल में मौज ही मौज थी...और अभी अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की खुमारी उतरी भी नहीं थी कि सरकार और उसके उपक्रम 'डिजिटल इंडिया' सप्ताह मनाने लगे.

इस डिजिटल इंडिया सप्ताह में बड़े अखबारों में प्रायोजित परिशिष्ठ छापी जा रही है, या फिर कम पढ़े -लिखे चलताऊ लेखकों को लगाकर उनके अधकचरे ज्ञान से इसका गुणगान कराया जा रहा है, पर चूंकि मैं इस मीडियम से पिछले 6 साल से जुड़ा हूं, इसलिए मुझे पता है कि ' डिजिटल इंडिया' आम भारतीयों के लिए नहीं, उन चंद अरबपतियों को खरबपति बनाने का मौका मुहैया कराने के लिए आया है, जिनके लिए यह सरकार किसी व्यापारी से कम नहीं.

'खूब लगाओ, खूब कमाओ' के इस खेल में भाग भी वही ले सकता है और जीत भी वही सकता है, जिसके पास पूंजी हो. पर आम जन क्या करें, जिन की बुनियादी जरूरतें ही पूरी न हुई हों, और जिन्होंने बड़ी उम्मीदों और सपनों के साथ इस सरकार को चुना हो. वे लोग क्या करें जिनके पास दोनों वक्त की रोटी की जद्दोजेहद हो. यह सरकार चाहती है कि ऐसे लोग खाएं भले ही न, पर मोबाइल से खेलें, इंटरनेट पर आएं, ताकि हवाई बातों से सरकार चलाने और हवा से पैसा बनाने वालों की जुगलबंदी चलती रहे.

यही वजह है कि 'डिजिटल इंडिया' को लेकर बड़ी- बड़ी बातें हो रहीं हैं. खुद प्रधानमंत्री के शब्दों में, 'मेरे मंत्री ने बताया कि मंच पर जो पूंजीपति हैं,  उन्होंने करीब-करीब साढे चार लाख करोड़ रूपए का इन्वेस्टमेंट और करीब-करीब 18 लाख लोगों को रोजगार की बात कही है. इसमें और इजाफा होगा.'पर प्रधानमंत्रीजी को यह हिसाब भी बताना चाहिए कि जो लोग साढे चार लाख करोड़ रूपए लगा रहे हैं, वे खुद इस योजना से कमाएंगे कितना? और उनकी उस कमाई में जनता का हिस्सा क्या होगा? सच तो यह है कि पैसा आम जन की जेब से निकल कर इस खेल में शामिल पूंजीपतियों की तिजोरी में जाना है.

इसी तरह से जब प्रधानमंत्री डिजिटल इंडिया' से 18 लाख लोगों के रोजगार की बात करते हैं, तो वे अपने उसी भाषण में इस्तेमाल किए गए डाटा को भूल जाते हैं. उन्हीं के शब्दों में, "हम सवा सौ करोड़ देश वासी हैं, हम 65 प्रतिशत 35 साल से कम उम्र के हैं, ये गीत गाने से बात बनने वाली नहीं है. ये जो भी विरासत है, जो सामर्थ्‍य है, उसके साथ आधुनिक विज्ञान को, आधुनिक टेक्‍नॉलॉजी को जोड़ना अनिवार्य है." बात ठीक है, पर सवा सौ करोड़ लोगों का 65 प्रतिशत 81 करोड़ होता है, इनमें से सिर्फ 18 लाख लोगों को रोजगार का शगूफा छोड़ बाकी को बाजार में बदल देना किस तरह से ठीक है?

प्रधानमंत्री जी खुद तो मानते हैं कि, "आज हमारे देश में करीब-करीब 25 करोड़-तीस करोड़ इंटरनेट यूजर्स हैं. यूजर्स की संख्‍या में तो दुनिया में ये संख्‍या बहुत बड़ी है, लेकिन जो इससे वंचित है, वो संख्‍या भी दुनिया के हिसाब से बड़ी है. जिनकी अपनी पहुंच थी. जिनकी अपनी ताकत थी. जो खुद कर सकता था, जिसको ज़रूरत थी, उन्‍होंने तो अपना कर लिया. लेकिन जो खुद नहीं कर सकता है, उसको उसके नसीब पर छोड़ देना चाहिए क्‍या?" अगर आप यह जानते हो, तो फिर डिजिटल मीडिया के लिए आपकी कोई पॉलिसी क्यों नहीं है? जो भारतीय पत्रकार, मध्यम लोग इस हलके में सालों से लगें हैं, उन्हें क्यों उन्हीं के हाल पर छोड़ दिया जा रहा है? सरकार तमाम लिखा-पढ़ी के बावजूद ऐसे लोगों के बारे में क्यों नहीं सोचती जो इस मीडियम पर समाचार परोस कर देश के लिए एक बड़ा काम कर रहे हैं? फिर उनके साथ सूचना मंत्रालय के अंडर में काम करने वाला डीएवीपी अपनी मनमानी क्यों कर रहा है?

प्रधानमंत्री जी, एक स्टैंड रखिए कि आप किसके साथ हैं? गरीब के या अमीर के? आम जन के या मुट्ठी भर व्यापारियों के? आप 81 करोड़ लोगों के लिए काम करना चाहते हैं, या 18 लाख लोगों के रोजगार और चंद पूंजीपतियों और बाबुओं के लिए?. सरकार की योजनाओं से किसी को गुरेज नहीं, पर तब, जब देश की बुनियादी जरूरतें पूरी हो जाएं. जरूरतें पूरी कर आप ऐसे जश्न मनाइये. डिजिटल इंडिया से ज्यादा जरूरी दूसरे काम हो सकते हैं, 'सबको भोजन इंडिया', 'सबको रोजगार इंडिया', 'सबको ताकत इंडिया', 'सबको न्याय इंडिया', 'सबको काम इंडिया'. फिर 'डिजिटल इंडिया' लेकर आइये. तय तो करिए की आप को जाना कहां है?

बाबुओं और चाटुकारों के भरोसे मत चलिए. वैसे भी आपकी सरकार में बाबुओं और चाटुकारों की बन आई है, क्योंकि मंत्री हो या संतरी, सभी केवल एक को ही साधने में लगे हैं. साहब सर्वत्र हैं, वही सर्वशक्तिमान हैं, वही सही हैं. वह राजा को रंक और रंक को राजा बना सकते हैं. अर्वाचीन जमाने में जब राजा ईश्वर का प्रतिनिधि होता था, तब भी वह इतना ताकतवर नहीं था कि हर रोज सिर्फ नारों को उत्सव में बदल दे और भूख और अपनी जरूरतों से कराहती जनता, महज तमाशबीन बन देखती रहे.

जाहिर है प्रजातांत्रिक भारत में सत्ता के एकलौते केंद्र के रूप में जिस तरह से आपने अपने कार्यालय को बदल दिया है, उसमें वहां से निकलने वाला हर शब्द 'ब्रह्म वाक्य' की तरह सारे मंत्रालयों के प्रमुख एजेंडे पर है. पर केवल इतने से तो देश बदलने से रहा. आपके पास अभी वक्त है. पहले 'भारत' को देखिए, उसकी जरूरतों को पूरा कीजिए, इंडिया तो अपने आप चमक उठेगा. याद रखिए, आपके पास ऐतिहासिक अवसर है. समय का मान करिए, वरना तो यह किसी को भी छोड़ता नहीं. इससे पहले कि समय आपसे सवाल पूछे....
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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