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मीडिया को लेकर मुगालता ठीक नहीं साहेब!

मीडिया को लेकर मुगालता ठीक नहीं साहेब! भारतीय जनता पार्टी के मीडिया मैनेजर इन दिनों बड़ी मुसीबत में हैं, क्योंकि मीडिया को 'मैनेज' कर परिणाम पाने का उनका पुराना नुस्खा बुरी तरह फेल हो चुका है. आलम यह है कि आज महज 13 माह पहले सत्ता में आई नरेंद्र मोदी सरकार की हर अखबार, टीवी चैनल, सोशल मीडिया पर धज्जियां उड़ रहीं हैं, और चाह कर भी उसके प्रवक्ता ललित मोदी-सुषमा-वसुंधरा नेक्सस से उठे सवालों, स्मृति ईरानी डिग्री मामले, सांसद दुष्यंत की कंपनी के घुस कांड या फिर पंकजा मुंडे से जुड़े 206 करोड़ के चिक्की घोटाले से जुड़ी खबरें नहीं दबवा पा रहे हैं.

इतनी बुरी गत तो मनमोहन सिंह की अगुआई वाली यूपीए सरकार की अपने पहले कार्यकाल में पूरे 5 बरस बिताने के बाद भी नहीं हुई थी, जबकि उनका 'मीडिया मैनेजमेंट' जीरो था. फिर क्या वजह है कि भाजपा की यह दुर्गति इतनी जल्दी हो गई? उत्तर बहुत साफ है. इस सरकार ने जीवन की 'सचाई' और 'जरूरतों' की तुलना में 'प्रबंधन' और 'चाटुकारिता' को ज्यादा तरजीह दी. कहने के लिए तो ये लोग देश की 'हकीकत' को समझ कर जनता की हर तरह की मुसीबत को दूर करने का लंबा-चौड़ा वादा करके आए थे, पर सत्ता पाने के बाद सारी बातें और वादे, 'कसमें, वादे, प्यार, वफा सब, बातें हैं, बातों का क्या...' गाने की तर्ज पर हाशिए पर चले गए.

जनता को बहुत जल्दी लगने लगा कि वह छली गई. केवल जबानी जुगाली और मीडिया या प्रचार प्रबंधन, इनसानी जरूरतों की जगह तो नहीं ले सकते. फिर जनता को अगर वक्त ही देना था, तो फिर कांग्रेस में क्या बुराई थी. महंगाई, भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार किसी भी मोरचे पर सिवाय दिल्ली के गलियारों में सत्ता पर काबिज चेहरों के बदलने के, और कुछ भी तो नहीं बदला है. जैसा अहंकार जनहित से जुड़े मसलों पर तब सत्तारूढ़ कांग्रेसियों को था, वैसा ही अभी सत्तारूढ़ भाजपाइयों को है. फिर मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी में आम जनता के लिए क्या फर्क? पहली बार फंसने पर मनमोहन की टीम भी राजा, मारन और कलमाडी के साथ तब तक खड़ी रही, जब तक कि उनकी और यूपीए सरकार की भद्द नहीं पिट गई.

अब मोदी की अगुआई वाली एनडीए सरकार भी सुषमा, वसुंधरा, पंकजा, दुष्यंत और स्मृति के मामले में वही कर रही है. जैसे मनमोहन सिंह तब चुप थे, वैसे ही आज अपने नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी चुप हैं. मोदी टीम यह क्यों भूल रही है कि उनमें खामियां थीं, इसीलिए तो वे इतनी बुरी तरह हारे. फिर आप बख्शे जाएंगे, इसकी क्या गारंटी है.

लोक सभा चुनावों में प्रचार के दौरान मोदी का एक तकिया कलाम था, भ्रष्टाचार पर कोई समझौता नहीं करूंगा, 'न खाऊंगा, ना खाने दूंगा.' कहां गया यह वादा? दिल्ली विधानसभा का चुनाव परिणाम भाजपा के प्रतिकूल गया ही इसीलिए था कि लोगों के सपने और उम्मीदें भाजपा से टूटने लगे थे. यह और बात है कि दिल्ली की जनता को आम आदमी पार्टी को चुन कर भी कोई विशेष लाभ हुआ हो, नहीं लगता.

अभी हाल में भाजपा के भीष्म पितामह सरीखे नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने इमरजेंसी के चार दशक पूरे होने पर एक अंग्रेजी अखबार को दिए गए साक्षात्कार में कहा कि, 'संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा होने के बावजूद अभी के समय में वे ताकतें मजबूत हुई हैं, जो लोकतंत्र को कुचल सकती हैं.'  आडवाणी कोई आम नेता नहीं हैं. आप उनसे सहमत हों या असहमत, देश हित से जुड़े मुद्दों और भाजपा के प्रति उनके समर्पण की बात जगजाहिर है.

आडवाणी जी के इंटरव्यू के बाद भाजपा की सहयोगी पार्टी शिवसेना ने अपने मुखपत्र ‘सामना’ के संपादकीय में लिखा भी कि, ‘लालकृष्ण आडवाणी देश के सबसे बड़े नेता हैं, जिन्होंने हर मौसम को देखा है और सभी उतार-चढ़ाव से गुजरे हैं. आज वह भले ही मुख्यधारा की राजनीति में नहीं हों, लेकिन भाजपा नेता और मीडिया यह जानते हैं कि उनको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता... ऐसे में जब आडवाणी ने आपातकाल के फिर से आने को लेकर आशंका प्रकट की है, तो वह निश्चित तौर पर किसी की ओर इशारा कर रहे हैं? अब प्रश्न यह है कि वह कौन व्यक्ति है, जिसकी ओर आडवाणी इशारा कर रहे हैं? उनकी आशंका को कैसे हल्के में लिया जा सकता है?"

आडवाणी के बाद भाजपा के ही एक दूसरे वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने भी मोदी सरकार को उसके रवैयों के लिए नहीं बख्शा. जब सिन्हा से पत्रकारों ने मोदी सरकार के एक साल पूरा होने पर सवाल किया कि नरेन्द्र मोदी और मनमोहन सिंह की व्यवस्थाओं में क्या फर्क है? तो सिन्हा का जवाब था कि सिर्फ इतना कि 26 मई 2014 को 75 साल से ज्यादा की उम्र वालों को दिमागी रूप से मृत घोषित कर दिया गया था.

जाहिर है अगर भाजपा की सफलता का श्रेय अगर नरेंद्र मोदी के माथे है, तो आज उसकी  बैड इमेज की जिम्मेदारी भी उन्हीं के माथे जानी चाहिए. पर जैसा कि हर शासक के साथ होता है, सत्ता पाने के साथ ही 'सिस्टम' और 'पॉवर' उसके सिर चढ़ कर बोलने लगता है, और चाटुकारों की एक लंबी फौज अपने स्वार्थ में ही सही नायक तो क्या उसके खेमे तक को जमीनी हकीकत से दो-चार नहीं होने देती.

फिर धीरे-धीरे होता यह है कि शासक पर 'सर्वशक्तिमान' होने का भ्रम इस कदर सवार होने लगता है कि वह यह भूल जाता है कि लोकतंत्र में जनता की जिस ताकत के चलते वह यहां तक पहुंचा है, और जिसने आजादी के बाद के अब तक के समय में न जाने कितने दिग्गजों को धूल चटा दिया, उसी की अनदेखी करने लगता है. इमरजेंसी के दौरान इंदिरा जी को भी ऐसा ही भ्रम हुआ था, आज के शासक भी शायद इसी मुगालते में हैं.

मीडिया अपने तमाम संकटों और स्वार्थों के बावजूद चिकित्सकीय पेशे की तरह समाज को लेकर अपनी जिम्मेदारियों से परे नहीं हुआ है, इसीलिए देश में उसे हमेशा से लोकतंत्र के चौथे खंभे के रूप में याद किया जाता है. अखबार, टीवी, पत्रकार और अब नए जमाने के मीडिया की अपनी जरूरत हो सकती है, होती भी है, पर उसके लिए आज भी अपना  पाठक और दर्शक सर्वोपरि होता है, जिसे वह किसी के लिए भी दाव पर नहीं लगा सकता.

इसीलिए आज के हुकमरानों को यह बहुत अच्छी तरह से समझने की जरूरत है कि कुछ बड़े घरानों से मीडिया में इन्वेस्ट करा कर, अखबार और टीवी चैनल खरीदवा कर, या फिर सिर्फ बड़े घरानों के अखबारों को सरकारी विज्ञापनों का लॉलीपॉप पकड़ा कर, आप एक छोटे से तबके को साध तो सकते हैं, पर समूचे मीडिया को काबू में नहीं कर सकते. फिर आपके दान से उपकृत वह छोटा सा मीडिया समूह भी जनता की बुनियादी जरूरतों और उसके नजरीयों की लंबे समय तक अनदेखी नहीं कर सकता.

यही नहीं पत्रकारों की हत्या कराकर भी सचाई को दबाया नहीं जा सकता. उत्तर प्रदेश में सोशल मीडिया के पत्रकार जगेंद्र सिंह की हत्या और मध्य प्रदेश में पत्रकार संदीप कोठारी की हत्या ने आर्थिक तंगी से जूझ रहे पत्रकारों और छोटे और मध्यम स्तर के अखबारों को और भी मजबूती प्रदान की है. दिल्ली की मुख्यधारा की मीडिया में भी उनके बलिदान की गूंज है. तथ्यतः इसका जवाब सोशल मीडिया प्रबंधन के लिए पहले से ही काम कर रही सत्तारूढ़ दल की लंबी चौड़ी टीम भी नहीं दे पा रही है. यही नहीं अब फेसबुक, गूगल, ट्वीटर, याहू और माइक्रोसॉफ्ट के मालिकों से मिलकर किए गए वादे और भारतीय मीडिया घरानों के लिए बंद, पर उनके लिए सरकारी दरवाजे खोलकर भी कोई लाभ होता नहीं दिख रहा.

सच तो यह है कि 13 माह पहले सत्ता में आई नरेंद्र मोदी सरकार ने यह सोच लिया था कि 'मैनेजमेंट' हर मर्ज की दवा है, और यहीं वह मात खा गए. मैनेजमेंट तब काम देता है, जब ग्राउंड पर भी काम हो रहा हो. यहां तो सब कुछ ठन-ठन गोपाल. स्वच्छ भारत, योग दिवस, रक्षाबंधन दिवस पेट भरने के बाद के शगल तो हो सकते हैं, पर भूख और जरूरतों का विकल्प नहीं. इसी तरह से मीडिया घरानों को चलने के लिए पैसा तो चाहिए, पर केवल पैसे के जोर पर मेनस्ट्रीम मीडिया के एक छोटे से हिस्से को मैनेज कर, या उन्हें डरा, धमका या खरीदवा कर केवल प्रचार और नारों से तो सत्ता नहीं चलाई जा सकती.

मीडिया को विज्ञापन देने के नाम पर बड़े, मध्यम और छोटे में बांटने की सरकारी नीति अब उल्टी पड़ रही है, क्योंकि देसी मीडिया घरानों की आर्थिक मदद नहीं की जा रही है. सरकारी विज्ञापन जारी करने वाली एजेंसी डीएवीपी बाकायदा स्थानीय, मझोले और छोटे अखबारों के खिलाफ है. नए मीडियम को लेकर भी उसकी नीतियां स्पष्ट नहीं हैं. रहे बड़े मीडिया घराने, तो उन्हें अगर अपना वजूद बचाना है, तो कब तक प्रायोजित परिशिष्ठ छापते रहेंगे, किसी न किसी दिन तो सच तो बताना ही होगा. मोदी सरकार के मामले में यह काम जल्दी शुरू हो गया.

पुनश्चः पत्रकार साथियों पर हमले की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं. उनके सामने नौकरी, विश्वसनीयता, सुरक्षा के साथ-साथ अब जीवन का संकट भी उत्पन्न हो गया है. बातें तो बहुत हैं, संगठन भी कम नहीं, पर सवाल यह है कि पत्रकार भूख से ज्यादा मर रहा, अपमान से, छल से या दलाली से? उत्तर हमको- आप को सबको मिलकर सोचना है.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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