Friday, 20 September 2019  |   जनता जनार्दन को बुकमार्क बनाएं
आपका स्वागत [लॉग इन ] / [पंजीकरण]   
 

खामोश क्यों है 56 इंच का सीना

खामोश क्यों है 56 इंच का सीना जंग किसी भी समस्या का न तो हल है, न ही किसी भी हाल में जायज! पर खामोशी को क्या कहना चाहिए? वह भी तब जब दुश्मन हर तरह से तंग कर रहा हो और हर हाल में आप को खत्म करने की नीयत पाले बैठा हो? क्या करें जब वह आए दिन आपको जन, धन और मान का नुकसान पहुंचा रहा हो? जब वह सीमा पर आपके सुरक्षा बल के जवानों के सीने में गोलियां तो दाग ही रहा हो, जब-तब आपकी सीमा में भी घुस जा रहा हो?

क्या करें जब पहले से ही देश के एक बड़े हिस्से को हथियाए बैठे रहने वाले दो अलग- अलग दुश्मन न केवल एक हो जाएं, बल्कि आपके प्रधानमंत्री के उनके देश में दौरे के दौरान भी अपनी हरकतों से बाज न आएं और आपके इलाके को अपना बता कर आपके प्रधानमंत्री के सामने ही आपके देश की सीमाओं और संप्रभुता का अपमान करें? इतना ही नहीं, अब तो उससे भी दो कदम आगे बढ़ कर इन दुश्मनों ने हमारे देश के भीतर हमसे नाराज बैठे हमारे अपने ही लोगों यानी अलगाववादियों से हाथ मिला लिया लगता है, और अब न केवल वे निर्दोष लोगों की, बल्कि हमारी सेना, हमारे सुरक्षा बलों के जवानों की हत्याएं भी करने लगे हैं. मतलब, अब दोनों ही तरफ से हमारे अपने ही लोग मारे जाएंगे.

मणिपुर के चंडेल जिले में 4 जून को भारतीय सेना के दस्ते पर जिस तरह से हमला हुआ और हमारे 18 जवान शहीद हुए. यह पिछले 12 सालों में हमारी सेना पर सबसे बड़ा हमला है. शुरुआती दौर में बिना जांच-पड़ताल के कहा यह जा रहा है कि सेना के दस्ते पर  यह हमला असम राइफल्स द्वारा एक अभियान के दौरान एक स्थानीय महिला की हुई मौत के जवाब में किया गया, पर क्या वाकई यह सच है? क्या इतना बड़ा हमला बिना किसी बड़ी तैयारी और मदद के अंजाम दिया जा सकता है?

फिर आनन-फानन में नतीजे पर पहुंचने वाली हमारी खुफिया एजेंसियां अगर इतनी ही तेज तर्रार थीं, तो हमले से पहले उन्होंने क्यों नहीं सेना और प्रशासन को आगाह कर दिया? फिर पूर्वोत्तर के राज्यों में पिछले तीन महीनों के भीतर सुरक्षा बलों पर यह तीसरा बड़ा हमला था. बताने की जरूरत नहीं कि इस इलाके की सीमाएं म्यांमार और बंगला देश से मिलती हैं, जहां के भारत विरोधी तबके को चीन- पाकिस्तान की भारत विरोधी लॉबी का आर्थिक, कूटनीतिक, सामरिक और सामाजिक सहयोग हासिल है.

फिर हमारी सेना ने काररवाई की और म्यांमार-भारत सीमा पर दुश्मनों के दो ठिकाने बरबाद कर दिए. इस पर सेना कुछ बताती उससे पहले ही भाजपा के सूरमा नेताओं ने क्रेडिट लेना शुरू कर दिया. नतीजतन म्यांमार ने कह दिया हमारी धरती पर कुछ हुआ ही नहीं. फिर भी हमारे प्रधानमंत्री खामोश हैं! क्यों? इसका जवाब थोड़ा मुश्किल है. कहने को दिल्ली की गद्दी पर उन नरेंद्र मोदी जी की सरकार है, जिनका बचपन भारतीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में शाखा बनने के दौरान 'भारत' के जमीन पर बने नक्शे के उन विवादित हिस्सों पर, जिन्हें पाकिस्तान और चीन ने कब्जा रखा है, पर पैर रख कर यह कहते हुए बीता है कि ' हिन्दुस्तान हमारा है'. मोदी की सियासी रुझान भी 'अखंड भारत' की कामना करने वालों के बीच विकसित हुई है. इस लिहाज से सरहद पर झंझट करने वाले पड़ोसी देशों की भारत विरोधी हरकतों पर उन्हें सीधे और कड़े निर्णय लेने चाहिए. पर सरकार पाकिस्तान और चीन के मामलों पर केवल बातें करके और संवेदना प्रकट कर चुप है.

यही वजह है कि नई दिल्ली की खतरनाक खामोशी अब देशवासियों को चुभने सी लगी है. पाकिस्तान द्वारा नियंत्रण रेखा पर युद्ध विराम का उल्लंघन कर सीमा पर लगातार गोलीबारी और तनाव पैदा करने की हरकतें इस बीच इतनी आम हो गई हैं कि खबर भी नहीं बनती. कभी भी कहीं से भी जम्मू- कश्मीर से सटे किसी भी सेक्टर में अचानक ही पाकिस्तानी रेंजरों द्वारा मोर्टार और स्वचालित गनों से गोलियों की बौछार शुरू हो जाती है, जिसमें या तो हमारे जवान मारे जाते हैं, या फिर निर्दोष नागरिक. माली और मवेशियों के नुकसान की तो गिनती ही क्या?

पाकिस्तान ऐसा इसलिए करता है कि वहां के अंदरूनी हालात वहां के सियासतबाजों को भारत विरोधी माहौल में ही मजबूती देते हैं, जिसमें सेना और वहां की खुफिया एजेंसी आईएसआई के साथ-साथ अब वहां की अदालतें भी शामिल हो गईं हैं. तय है, पाकिस्तान में हर वह आदमी महफूज है, जो भारत विरोधी है. चाहे वह दाऊद इब्राहिम हो या जकीउर्रहमान लखवी. अभी हाल में वहां के सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ ने नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी में कैडटों को संबोधित करते हुए कह दिया कि, ‘कश्मीर 1947 में हुए देश विभाजन का ‘अधूरा एजेंडा’ है, और पाकिस्तान और कश्मीर 'अविभाज्य' हैं.'

जाहिर है सीमा पर पिछले एक साल से पाकिस्तानी हरकतों को हम वहां की सरकार से अलग, केवल फौज और आईएसआई की साजिश करार देकर चुप्पी साध जाते हैं, पर राहील के इस बयान के बाद हमें जब उन्हीं के लहजे में करारा जवाब देना चाहिए था, तब भी हमारे रक्षा मंत्री मनोहर परिक्कर ने मसले की गंभीरता को समझे बिना ही मजाक का सहारा लिया और कह दिया कि, ' पाकिस्तान को मिर्ची लगी है, और वह भी आंध्रा वाली तो मैं क्या कहूं. पाकिस्तान किस मसले पर क्या महसूस कर रहा है, इसके बारे में मुझे कुछ भी नहीं कहना.'

जनाब! यह कोई घर की पंचायत नहीं, जहां आप बड़े से बड़े मसले को मजाक में टाल कर अपने रिश्ते या घर को बचाए रखने की कोशिश करते हैं. यह मसला हमारे देश की सीमा, सुरक्षा के साथ-साथ हमारे जवानों की जिंदगी और देश की आन-बान-शान से भी जुड़ा हुआ है. अभी चीन ने पाकिस्तान के साथ 46 अरब डालर से बनने वाले एक 'आर्थिक कॉरीडोर' का समझौता किया है, जो उन भारतीय इलाकों से होकर गुजरेगा, जो विवादास्पद हैं और जिन पर पाकिस्तान और चीन ने अवैध ढंग से जबरन कब्जा कर रखा है.

चीन 'जीवन-यापन परियोजना' कह कर 3000 किलोमीटर लंबी सड़क, रेल और पाइपलाइन बना रहा है, जो पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से भी होकर गुजरेगी. साफ है, अगर भारत प्रसारवादी चीन को इस परियोजना पर काम करने देता है, तो वह इस इलाके पर अपना दावा हमेशा के लिए खो देगा. जबकि चीन एक तरह से भारत की संपूर्ण रूप से व्यावसायिक गतिविधि को, जो दक्षिण चीन समुद्री इलाके में होनी थी, पर पाबंदी लगा चुका है.

चीन की हरकत से यह साफ है कि वह इस इलाके में अपनी दबंगई और भारत- पाकिस्तान के बीच चल रहे विवाद का फायदा उठाना चाहता है. कहने के लिए यह 'आर्थिक कॉरीडोर' इस इलाके की तरक्की के लिए है, पर चीन की नजर उसकी अति महत्त्वाकांक्षी पुरानी योजना 'सिल्क रुट' को तैयार करने की है, जिससे उसकी सीधी पहुंच योरोपीय देशों तक हो जाए. इसी तरह वह भारत के साथ व्यापारिक और व्यावसायिक संबंध तो बढ़ाना चाहता है, पर किसी भी हाल में भारत से सीमा विवाद को लेकर 'वास्तविक नियंत्रण रेखा' पर बात नहीं करना चाहता.

चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों की इन हरकतों पर नई दिल्ली की बेबसी अब साफ-साफ दिखाई देने लगी है. इन देशों से व्यवसाय के लालच में या फिर अपने देश के बाजार और व्यापारियों के लाभ में हम वह 'स्ट्रांग स्टैंड' नहीं ले पा रहे हैं, जो तीसरी दुनिया की एक बड़ी ताकत के रूप में उभरे भारत जैसे देश को लेना चाहिए. दिक्कत यह है कि एक 'संप्रभू राष्ट्र' के रूप में हम अगर चुप्पी साधेंगे भी, तो कब तक...?

भारत की खतरनाक खामोशी से जुड़े खमियाजे की एक घटना कारगिल युद्ध से जुड़ी है, जो संयोग से उस युद्ध में हमारे नौजवान सैनिकों की बहादुरी और उनकी शहादतों के शोर के चलते दब गई और मीडिया की सुर्खियां नहीं बटोर सकी, वरना दिल्ली के उस समय के हुक्मरानों को जवाब देना मुश्किल हो जाता. कारगिल में घुसपैठ की पहली खबर फरवरी  1999 में एक गड़रिया द्वारा भारतीय फौज को दी गई थी. फौज ने वह सूचना लोकल कमान के साथ-साथ समय रहते ही दिल्ली मुख्यालय को भी भेज दी थी, पर यहां से कोई निर्देश नहीं मिला.

स्थानीय कमान ने कुछ दिन बाद उस सूचना को कन्फर्म कर अपनी टिप्पणी के साथ दोबारा दिल्ली भेजा, पर यहां समझा गया कि वे मामूली घुसपैठिए होंगे. यानी तब भी कोई फैसला नहीं लिया गया. जब पाकिस्तानी फौज ने घुसपैठियों की शक्ल में वहां पक्के बंकर बना लिए, तब हमारी सरकार चेती. उसके बाद का इतिहास सबको पता है. हमारे सैकड़ों नौजवान सैनिक हफ्तों तक मरते रहे...और अंततः इस युद्ध का परिणाम तब आया, जब वायु सेना ने भी युद्ध में हिस्सा लेना शुरू कर दिया और अमेरिका ने हस्तक्षेप किया.

कहने की जरूरत नहीं कि जो इतिहास से सबक नहीं सीखते उन्हें वह कभी माफ नहीं करता. एक तथ्य यह भी है कि उस समय भी केंद्र में भाजपा की अगुआई वाली सरकार थी, और आज भी है. सवाल यह है कि क्या हम एक बार फिर से किसी और कारगिल युद्ध का इंतजार कर रहे हैं? क्या आज का 'भारत' उस तरह के युद्ध के लिए तैयार है? जवाब आप खुद तलाशिए. हां मैं रक्षा हथियारों के स्टॉक पर केंद्रीय महालेखा परीक्षक की टिप्पणियों की याद नहीं दिलाना चाहता.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

वोट दें

क्या विजातीय प्रेम विवाहों को लेकर टीवी पर तमाशा बनाना उचित है?

हां
नहीं
बताना मुश्किल
 
stack