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दावं पर मोदी, केजरीवाल मैजिक

दावं पर मोदी, केजरीवाल मैजिक अभी ज्यादा वक्त नहीं बीता है, पर इनकी कलई उतरने लगी है. उत्तर प्रदेश के मथुरा और नई दिल्ली के कनॉट प्लेस में जब प्रधानमंत्री के रूप में भारतीय जनता पार्टी के नेता नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार के 1 साल और दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल ने अपनी सरकार के 100 दिन के कामकाज का ब्योरा पेश किया, तो इनकी आवाज में न तो वह धमक थी, न ही इनमें वह आत्मविश्वास दिखा, जो इन पदों पर आने से पहले दोनों शख्सियतों के व्यक्तित्व में था.

हम यहां, इनके पद से जुड़े तामझाम और उससे प्रभावित होकर इनके तेवर में आए बदलावों की बात नहीं कर रहे, न ही 'भाजपा' और 'आप' के इनके कट्टर समर्थकों की बात कर रहे कि इस अवसर पर उन्होंने मीडिया में, मंचों पर या इन दोनों जनों के प्रिय हलके 'सोशल मीडिया' में क्या-क्या कहा, बल्कि आम जनता के उस नजरीए की बात कर रहे, कि उसने इस दिन क्या महसूसा. लोग इतनी जल्दी अपने को ठगा हुआ महसूस करेंगे, इसके उम्मीद तो किसी को भी नहीं थी.

आम जनता में इनकी सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर निरूत्साह का आलम यह है कि कि इनकी रैलियां और जलसे भी इनकी तमाम कोशिशों और इनकी खुद की मौजूदगी और तमाम मीडिया हाइप के बावजूद वह रंग नहीं जमा सके, जिसकी, जितनी और जिनकी इन्हें उम्मीद थी. यहां तक कि इस अवसर पर केवल बड़े अखबारों को इन दोनों की ओर से अपनी-अपनी सरकारों की उपलब्धियों और कामयाबी को लेकर दिए गए तमाम मंत्रालयों के सरकारी विज्ञापन भी इनके मनोमुताबिक माहौल बनाने में नाकाम रहे.

वजह साफ है, जनता मन बनाती है परिणामों से, रोजमर्रा के उसके जीवन में आए बदलावों से, उसकी जरूरतों के पूरा होने की खुशियों से, जो उसे पिछली सरकार की गलत नीतियों के चलते नहीं मिला था, पर जब नई सरकारों में भी केवल हुक्मरानों के चेहरे बदलने और टीवी डिबेट में चहरे भर बदल जाने के बावजूद हकीकत में कुछ भी न बदले तो, जनता अपने आसपास के माहौल पर उदासी न दिखाए तो क्या करे?

जरा याद कीजिए, चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल को लेकर आम जनता का उत्साह, और आज उन्हें लेकर आम जनों की उदासी. दिल्ली से बनारस तक, सिर्फ बातें हैं और उम्मीदें. शासन पाने के बाद अब ये महानुभाव लोग कहते हैं कि बदलाव के लिए वक्त चाहिए, पर जनता, जो मुसीबतों, महंगाई और भ्रष्टाचार का शिकार होकर, जिंदगी और मौत के बीच हर दिन जूझ रही है, उसके पास इंतजार के लिए वक्त है क्या? भूखों को वादे नहीं, जीने के लिए रोटी चाहिए जनाब !

अभी भाजपा के एक प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने नई दिल्ली के इंडियन वूमेंस प्रेस कोर में महिला पत्रकारों के बीच एक पैनल डिसकसन के दौरान गलती से यह स्वीकार कर लिया कि सरकारी स्तर पर ब्यूरोक्रेसी में केवल उपर के पदों पर बदलावों से काम चलाया जा रहा है, जमीनी लेवल पर न तो अफसरों को बदला गया है, न ही नीतियां बदली गई हैं. फिर जनता को राहत कैसे मिलेगी? केवल निजाम बदला, नीयत तो नहीं बदली. फिर जनता के लिए बदला क्या? मीडिया में माहौल.

पर इस सरकार के दौर में मीडिया भी जितना डिवाइड और डरा हुआ है, उतना पहले कभी नहीं था. छोटे और मझोले अखबारों के समक्ष अपने को बनाए रखने का संकट है. इनके अधिकांश संगठनों में भी या तो बड़े समूहों का दबदबा है, या फिर सरकार की नीतियों ने उन्हें अंगरेजों की तर्ज पर 'फूट डालो और राज करो' वाले अंदाज में बांट रखा है. सत्ता इस कदर केंद्रीकृत होती जा रही है कि खबरें यहां तक आती हैं कि किसी भी सरकारी कंपनी यानी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के विज्ञापन तक की फाइल पहले पास होने के लिए पीएमओ भेजी जाती है.

अब इस तरह के माहौल के बीच, जब उपर से नीचे तक एक ही ऑफिस या व्यक्ति के बनाए हुए सिस्टम को चलना हो, तो फिर केवल बड़े घरानों के मीडिया में दिया गया सरकारी उपलब्धियों वाला विज्ञापन क्या गुल खिला सकता है? बड़ा और सक्षम मीडिया समूह चुनावों के दौरान माहौल तो बना सकता है, पर सामान्य दिनों में वह छोटे और मझोले अखबारों की जगह नहीं ले सकता, क्योंकि ये गली, मोहल्ले की सचाई बताते हैं, पानी, बिजली, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, सार्वजनिक निर्माण से जुड़ी खबरों को जनता के सामने लाते हैं, इसीलिए जनता को उनपर भरोसा भी होता है.

वैसे बड़े मीडिया घराने के अखबार भी तमाम सरकारी प्रभुत्व और पारितोषिक के बावजूद एक हद तक ही सरकारों का साथ देते हैं और बदलते माहौल के साथ खुद को जनमत के हिसाब से ढाल लेते हैं, और सामान्य तौर पर उन्हीं मसलों को उठाते हैं, जो जनता से जुड़े हों. इसीलिए जो रोज की खबरें हैं, उन्हीं से जनता मिजाज बनाती है, और यह कम दिलचस्प नहीं कि इन अखबारों ने भी वही छापा, जो अपने दलों के ही नहीं, बल्कि देश और दिल्ली के स्वयंभू बन चुके इन महानुभावों ने अपने शासनकाल के दौरान किया. अपने सौभाग्य या दुर्भाग्य से इन लोगों ने जो किया, वह कागजों पर ज्यादा था, जमीन पर नहीं, इसीलिए इन्हें जो चर्चा मिली वह निगेटिव ज्यादा थी.

देश में खेती-किसानी की बदहाली के बावजूद मीडिया में मोदी जी जहां अपनी ताबड़तोड़ विदेश यात्राओं के लिए छाए रहे, वहीं केजरीवाल अपने लोगों से ही लड़ने-झगड़ने और लेफ्टिनेंट गवर्नर से सत्ता सुप्रीमेसी को लेकर कलह के चलते सुर्खियां बटोरते रहे. जनता की आशाओं का इतना जल्दी इन महानुभावों से टूटना किसी भी राजनीति विज्ञानी के लिए शोध का विषय हो सकता है.

दिल्ली, लखनऊ और मुंबई में भाजपा के लोग तक दबे खाने यह स्वीकार करने लगे हैं कि इस सरकार की छवि 'प्रो कैपिटलिस्ट' की बनी है, मोदी जी को हर विदेश यात्रा में अडानी को साथ लेकर नहीं घूमना चाहिए, और चाहे प्रधानमंत्री कितना भी विदेश दौरा क्यों न करें, उन्हें किसानों की सुध लेने गांवों में जरूर जाना चाहिए. हम यहां दूरदराज के गावों और जिलों के लोगों की बात नहीं कर रहे, न ही हर मामले पर तेज निगाह रखने वाले एक्टिविस्टों की बात कर रहे. पर आम जनता का परसेप्शन भी यही है.

यही हाल अरविंद केजरीवाल को लेकर है. आम आदमी पार्टी का कोई भी शुभ चिंतक योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के साथ पार्टी ने जो बरताव किया उसे लेकर खुश नहीं है. वह इस बात को लेकर भी नाराज है कि पार्टी ने जन लोकपाल लाना तो दूर आंतरिक लोकपाल तक को खत्म कर दिया. जहां तक दिल्ली के जनता की बात है वह इस भीषण गरमी में बिजली की कटौती और बढ़े हुए बिलों से हलकान है. उसे इस बात से कोई मतलब नहीं कि दिल्ली का असली मालिक कौन होता है? लेफ्टिनेंट गवर्नर या मुख्यमंत्री?

सच तो यह है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया पर, जिस पर पिछली कांग्रेसी सरकार और नेताओं के भ्रष्टाचार, नाकामी और एरोगेंट वाली छवि के चलते, इन दोनों दलों और नेताओं का दबदबा था, और जिनका इनकी सफलता में काफी बड़ा योगदान भी था, पर भी इस बार वह माहौल नहीं बन सका, जितना होना चाहिए था. यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पर्सनल ट्वीटर हैंडल से लोगों को उन्हीं की भाषा में मिले जवाब के बावजूद. अरविंद केजरीवाल की सोशल मीडिया टीम ने भी जनता को असली मुद्दों से भटकाने की काफी कोशिश की, पर उन्हें भी खास सफलता नहीं मिली.

साफ है, बदले माहौल में आप चाहे किसी भी दल से हों, आपको काम करके दिखाना ही होगा. वह करना होगा जो जनता के भले का हो. यहां एक उदाहरण फतेहपुर सदर के विधायक विक्रम सिंह का है. वह भाजपा के ही टिकट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ही उपचुनावों में जीत कर आए थे. बतौर विधायक उन्होंने अपने एक साल पूरा होने पर एक वेबसाइट बनवाई, जिस पर जनता को अपनी शिकायत दर्ज कराने से लेकर उसे अपनी समस्या का स्टेटस जानने के मौकों के साथ ही विधायक से संपर्क साधने का भी अवसर उपलब्ध कराया गया. यही नहीं सिंह ने इलाके के बीस हजार परिवारों का बीमा भी अपने पास से कराने का भी फैसला किया. विक्रम सिंह लखनऊ या दिल्ली के लोगों के लिए भले ही उपलब्ध न हों, पर अपने लोगों के लिए उनके पास समय की कमी नहीं है.

हर बड़ा नेता, हमेशा से यही करता रहा है. कभी नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल ने भी यही किया था. राहुल गांधी देर से ही सही, अब यही कर रहे हैं. हालांकि मोदी और केजरीवाल के पास अभी लंबा वक्त है, पर जैसा कि सियासत और हमारे समाज का सच है, इमेज बनाने में तो सालों लगते हैं, पर बिगड़ने के लिए कुछ घंटे भी काफी हैं. इसी लिए समय रहते इन दोनों को संभल जाना चाहिए, क्योंकि इन दोनों का पहला इंप्रेसन क्या है....फैसला आप खुद करें, अपने हिसाब से.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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