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सरकारी विज्ञापन और सुप्रीम कोर्ट

सरकारी विज्ञापन और सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे बड़ी अदालत में इन दिनों देश के दो सबसे ताकतवर धड़े एक हो गए हैं. देश के बड़े राज्यों के तमाम ताकतवर नेता और कई बड़े अखबारों के मालिक! और इन सबकी नुमाइंदगी कर रही हैं, तमिलनाडु की अम्मा जे जयललिता, जो राज्य में अपनी सफल और चर्चित छवि के बावजूद भ्रष्टाचार के आरोपों में अदालतों के चक्कर काटते-काटते इस कदर आतंकित हो चुकी हैं कि अपनी लोकप्रियता बचाने के लिए, उन्हें अब होर्डिंग्स और कट-आउट का सहारा ही काफी नहीं लग रहा, बल्कि उन्हें सरकारी पैसे पर 'केवल' बड़े अखबारों को दिया गया उनकी फोटुओं वाला विज्ञापन भी चाहिए, ताकि उनकी अपनी इमेज तो सुधरे ही, अखबार भी एडवर्टिजमेंट के पैसों के लालच में सरकार की गलत नीतियों को अनदेखा करें और उनके नाम की माला जपते रहें.

शायद यही वजह है कि सरकारी विज्ञापनों में नेताओं की फोटुओं से संबंधित अप्रैल, 2013 के एक मामले में 13 मई, 2015 को जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकारी विज्ञापनों में मुख्‍यमंत्री, मंत्री, गवर्नर समेत किसी भी दूसरे नेता की तस्वीर नहीं लगाई जा सकती, तो जयललिता के इशारे पर तमिलनाडु की सरकार ने इसे बड़ी बेंच में चैलेंज करने का फैसला कर लिया. दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के गैर सरकारी संगठन 'कॉमन कॉज' की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें कहा गया था कि सरकारी विज्ञापनों में सरकार के पैसे का उपयोग नेताओं की अपनी छवि को चमकाने के लिए हो रहा है, इसलिए सबसे बड़ी अदालत इसे रोके.

2013 में इस मामले को सुप्रीम कोर्ट के सामने रखते हुए प्रशांत भूषण ने कहा था कि आए दिन देखने में यह आ रहा कि जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा सत्तारूढ़ दल के नेता सरकारी विज्ञापनों के माध्यम से अपनी निजी छवि चमकाने के लिए कर रहे हैं. जनता के पैसे का इस कदर सरकारी दुरूपयोग, न केवल जनता के भरोसे के साथ छल और कानून की राज्य का उल्लंघन है, बल्कि यह देश की प्रजातांत्रिक व्यवस्था को भी नुकसान पहुंचाने वाला है.

इस मसले को और भी विस्तार से रखते हुए प्रशांत भूषण का कहना था कि सत्तारूढ़ राजनीतिक दल करदाताओं के पैसे को बड़ी ही बेशर्मी से अपनी उपलब्धियों को बताने के बहाने न केवल उड़ा रहे हैं, बल्कि अपनी और अपनी पार्टी  के नए और पुराने नेताओं की छवि चमकाने के लिए फिजूलखर्च कर रहे हैं. ऐसा या तो चुनावों में अपनी बढ़त कायम रखने के लिए किया जा रहा है, या फिर अपने ही दल के बड़े नेताओं की नजर में खुद की वफादारी को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने के लिए. इस स्थिति को किसी भी हालत स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए और हर हाल में रोका जाना चाहिए.'

बड़ी अदालत ने इस मामले को स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार सहित सभी राज्य सरकारों को नोटिस दी और कहा था कि वे अपना पक्ष रखें. जिस पर केंद्र सरकार का तर्क था कि यह मामला न्यायिक अधिकार क्षेत्र में आता ही नहीं, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को इसे देखना ही नहीं चाहिए. सरकारें ऐसे विज्ञापनों से जनता तक अपनी नीतियां पहुंचाती हैं और उन्हें जागरूक करती हैं, इसलिए इसे सरकारों के ऊपर ही छोड़ दिया जाना चाहिए. कोर्ट ने सरकार के इस तर्क के बाद इस मसले पर अप्रैल में एक कमेटी बना दी थी, और दोनों पक्षों के तर्क को सुनने के बाद जो फैसला दिया वह यह था कि सरकारी विज्ञापनों में केवल प्रधानमंत्री, राष्‍ट्रपति और मुख्य न्यायाधीश की तस्वीरें ही इस्तेमाल की जा सकती हैं, और वह भी तब जब विज्ञापनों में प्रकाशन के लिए इन तीनों से इसकी अनुमति ले ली गई हो. कोर्ट ने यह भी कहा कि विज्ञापनों की इस गाइडलाइंस को अमल में लाने के लिए केंद्र एक कमेटी बनाए. कोर्ट के इस फैसले का मतलब साफ है कि आगे से मुख्यमंत्री या अन्य नेताओं की तस्वीरों वाले विज्ञापन गैरकानूनी माने जाएंगे.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कर दिया था कि महापुरुषों से जुड़े अहम दिनों पर उनकी तस्वीरों का उपयोग किया जा सकता है, लेकिन उस विज्ञापन में उनके अलावा किसी दूसरे नेता की फोटो न लगाईं जाएं. कोर्ट के इस फैसले से हड़कंप मचना स्वाभाविक था, जो मचा भी. राज्यों के नेताओं ने एक-दूसरे से संपर्क साधा, वकीलों की राय ली, बड़े अखबारों में इस फैसले के खिलाफ माहौल बनाने के लिए तरह- तरह के तर्क और विचारों का सहारा लिया गया और तय यह किया गया कि इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच के सामने पुनर्विचार के लिए रखा जाएगा. जाहिर है अदालत में जाने के लिए हर कोई स्वतंत्र है, पर इन सारे तर्कों के बीच याचिका कर्ता और बड़ी अदालत दोनों की नजरों से जो बात छिपी रह गई वह थी, ऐसे विज्ञापनों पर बड़े घराने के अखबारों का एकाधिपत्य.

दरअसल, आजादी के दौरान मीडिया की सचेत भूमिका को देखते हुए हमारे संविधानविदों ने जहां अभिव्यक्ति की आजादी को मौलिक अधिकार के क्षेत्र में रखा, वहीं मीडिया की आजादी कायम रह सके, इसके लिए एक मजबूत आर्थिक अवलंबन के तौर पर तमाम तरह की छूट और सुविधाएं दीं. उस दौर में सरकार ने यह भी सुनिश्चित किया कि उसके द्वारा दी जा रही आर्थिक मदद और सुविधाएं केवल कुछ प्रकाशन समूहों तक सीमित न रह जाएं और इनका लाभ हर स्तर के प्रकाशनों को मिले.

इसीलिए कागज का कोटा हो, टेलीफोन लाइनें, पत्रकारों की मान्यता और दूसरी तमाम छूटें जहां प्रसार संख्या के हिसाब से रखीं गईं, वहीं विज्ञापनों का बंटवारा भी बराबर- बराबर हो सके, इसके लिए प्रकाशनों को न केवल बड़े, मझोले और छोटे बल्कि राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और स्थानीय लेवल पर बांटा गया, बल्कि सरकार ने यह भी तय किया कि विज्ञापनों का बंटवारा 33-33-34 के अनुपात में हो. इसका लाभ यह था कि सरकार के संदेश न केवल सभी तक पहुंच जाएं, बल्कि हर स्तर के अखबारों को कुछ न कुछ माली मदद मिल जाए. यही नहीं अखबारों को  अंगरेजी, हिन्दी और भाषाई अखबारों की कैटेगरी में भी बंटा गया और सरकार की सूचना प्रसारण मंत्रालय की विज्ञापन और प्रचार के लिए बनाई गई एजेंसी 'डीएवीपी' को बाकायदा इसके लिए निर्देश भी दिए गए.

तय है, जिस जमाने में यह व्यवस्था की गई, वह लगभग आदर्श थी, और तब न ही समाचार-पत्र, नेता और अफसर इतने भ्रष्ट हुए थे, इसलिए आजादी के 20-30 सालों तक तो सब ठीक-ठाक चला, पर जैसे-जैसे मीडिया, नेता और अफसरों में पैसे और पॉवर की भूख बढ़ी यह व्यवस्था चरमराने लगी. सक्षम समूहों ने अखबारों के अलग-अलग संस्करण इसलिए भी निकाले कि वे अलग-अलग कटेगरी में मिलने वाले लाभों के साथ सरकार पर भी दबदबा बना सकें.

नेताओं और भ्रष्ट अफसरों के लिए भी सैकड़ों प्रकाशकों से डील करने की बजाए केवल कुछ बड़े घरानों से डील करना आसान था. जिसका नतीजा यह निकला कि सरकारी विज्ञापनों के दम पर बड़े अखबार और भी बड़े बनते गए और मझोले पारंपरिक प्रकाशन अपने- अपने इलाके में सिमटने के लिए मजबूर हो गए. इस व्यवस्था उपजे आर्थिक संकट से जूझने के लिए जब छोटे अखबारों ने मारामारी शुरू की, तो उन्हें दलाल कहा जाने लगा, जबकि इस व्यवस्था का पक्षपोषण बड़े प्रकाशन घराने कर रहे थे. पेड न्यूज की व्यवस्था भी प्रकाशन समूहों के केंद्रीकृत हो जाने और पत्रकारों की पेशागत अस्थिरता और आर्थिक तंगी की देन है.

आज आलम यह है कि सरकार की विज्ञापन नीति को पलीता लग चुका है. एक तरफ बड़े घरानों के अखबार हैं की अपनी कमाई दिन दूना रात चौगूना करते जा रहे हैं, वहीं बाकी प्रकाशकों के पास अपने को जिंदा रखने की मुश्किलें हैं. केंद्र और राज्य सरकारों में विज्ञापनों के वितरण से जुड़ा महकमा धीरे -धीरे छोटे प्रकाशनों के खिलाफ रिपोर्टें और माहौल बना कर अपने राजनीतिक आकाओं को  लगातार भेज रहा है, क्योंकि बड़े घरानों से रकम भी बड़ी मिलती है और उनके लिए बड़े राजनीतिबाजों और मंत्रियों का इशारा भी मिल जाता है. फिर हर विज्ञापन के प्रकाशन के लिए सरकारी नीति भी कुछ ऐसी है कि बड़े अखबार तो अपनी कैटेगरी में गिनती के अखबारों के चलते सारे विज्ञापन पा जाते हैं, जबकि मझोले और छोटे अखबार गिनती में ज्यादा होने के चलते रोटेशन व्यवस्था का शिकार हो जाते हैं...

हालांकि बड़ी अदालत के सामने ये पहलू नहीं रखे गए थे, पर इन सबके बीच एक अच्छी बात यह हुई कि केंद्र में सूचना और प्रसारण मंत्रालय के साथ-साथ वित्त और कॉरपोरेट मामले के मंत्रालय को देख रहे मंत्री अरुण जेटली ने अपनी तरफ से पहल करते हुए प्रकाशन उद्योग के बदलते स्वरूप में उसकी चुनौतियों का जिक्र करते हुए इस पेशे के आर्थिक संकट का उल्लेख एक सेमिनार में किया. जेटली का कहना था कि मीडिया के हलके में वित्त संसाधन का कोई टिकाऊ मॉडल न होने से विसंगतियां पैदा होती हैं और यह स्थिति वितरण की ऊंची लागत, दर्शक खींचने की होड़ और प्रसारित सामग्री की गुणवत्ता में समझौते की ओर ले जाती है. पेड न्यूज इसी की देन है. ऐसे माहौल के चलते ही टीवी पर होने वाली बहस शोर में बदलती जा रही है.

डिजीटल मीडिया का खास तौर से उल्लेख करते हुए जेटली ने साफ कहा कि कोई आर्थिक मॉडल न होने के चलते अपनी तमाम ताकत के बावजूद यह मीडिया देश में अभी भी संघर्ष ही कर रहा है. हालांकि जेटली ने विश्वास जताया कि इन सब विपरीत हालातों के बावजूद मीडिया के सामने पाठकों और दर्शकों के बीच तथ्यों के आधार पर सूचना और खबर पहुंचाने का अवसर बरकरार है, और वह अपनी भूमिका सही ढंग से निभाएगा. बात सही है मंत्री जी! पर जब आप यह जानते हैं कि मीडिया व्यवसाय आर्थिक संकट से जूझ रहा है, तो आप सरकार हैं, क्यों नहीं ऐसी व्यवस्था बनाते कि इस देश में बड़ों के साथ-साथ छोटे भी जी सकें. केवल गूगल और फेसबुक की ही नहीं उनकी भी बात हो जो इस देश की माटी में पल बढ़ कर अपने लोगों की सेवा में लगे हैं. ऐसे लोगों का हक केवल इसलिए न मारा जाए कि सरकार की नीतियां नहीं हैं, या फिर वे अफसरानों तक मोटी हुंडी पहुंचाने या बड़ा जैक लगवाने में सक्षम नहीं.  सरकार अगर इस तरह विचार कर ले तो फिर अदालत में कोई जाए ही क्यों?
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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