Wednesday, 13 November 2019  |   जनता जनार्दन को बुकमार्क बनाएं
आपका स्वागत [लॉग इन ] / [पंजीकरण]   
 

इसी राहुल की तो जरूरत थी

इसी राहुल की तो जरूरत थी राहुल गांधी इस तपती गरमी में चिलचिलाती धूप में पदयात्राएं कर रहे हैं. ऐसे समय में जब हमारे तमाम नेता अपने वातानुकूल कक्ष और बड़ी गाड़ियों से बाहर नहीं निकलना चाहते, तब तेलंगाना राज्य में किसानों का हाल जानने के लिए राहुल ने 14 मई को 15 किलोमीटर की पदयात्रा की. इससे पहले वह महाराष्ट्र के विदर्भ में भी वह लगभग इतने ही किलोमीटर पैदल चले थे. उनका पंजाब के सरहिंद, गोविंदगढ़ और खन्ना के किसानों का हाल जानने के लिए भी पदयात्रा का ही कार्यक्रम था, पर ट्रेन के लेट हो जाने या करा दिए जाने और तब चल रहे संसद-सत्र में समय से पहुंचने की बाध्यता के चलते, ऐसा नहीं हो पाया, हालांकि पंजाब के किसानों का हाल जानने के लिए उन्होंने ट्रेन के लोकल डिब्बे का इस्तेमाल किया था.

राहुल गांधी की इन पदयात्राओं में अगर उत्तराखंड की यात्रा को जोड़ लें, जहां दो साल पहले आई आपदा के बाद राज्य के ध्वस्त हुए धार्मिक टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने 18 किलोमीटर पैदल चलकर केदारनाथ की यात्रा की और न केवल टूरिस्टों का विश्वास बढ़ाया, बल्कि जगह -जगह रुक कर जनता से मेल-जोल भी बढ़ाया, तो लगभग हर हफ्ते वह किसी न किसी राज्य के दौरे पर रह रहे हैं, और जहां भी मौका मिल रहा है, पदयात्रा कर रहे हैं. जनता के बीच में होने की राहुल गांधी की ललक अब साफ- साफ दिख रही है और एसपीजी सुरक्षा का घेरा भी उनकी इस कोशिश में सेंध नहीं लगा पा रहा.

आलम यह है कि कांग्रेस मुख्यालय और उनके बेहद करीबियों को भी राहुल गांधी के अगले कदम की जानकारी आखिरी वक्त पर उनके दौरों के फाइनल हो जाने के बाद मिल रही है. हर विषय पर उनकी तैयारी साफ दिख रही है और उनके विचार न केवल स्पष्ट हैं, बल्कि शब्द धारदार भी. राहुल गांधी का यह रूप न केवल उनके समर्थकों के लिए बल्कि उनके आलोचकों के लिए भी चौंकाने वाला है. लगभग दो महीने की अपनी छुट्टियों से लौटने के बाद संसद के बीते सत्र में उन्होंने किस तरह से अकेले दम पर अपने चुटीले भाषणों से एक ताकतवर विपक्ष की भूमिका निभाई वह राजनीतिक समीक्षकों के लिए भी चौंकाने वाला है. उनके शब्दों का चयन, आत्मविश्वास और विषय पर पकड़ ठीकठाक ढंग से सत्ता पक्ष को परेशानी में डालने वाले हैं.

कम से कम यह वही राहुल गांधी तो कत्तई नहीं हैं, जो कांग्रेस के 10 सालों के शासन के दौरान संसद में केवल 3 बार बोले थे. कहां 10 साल में 3 बार और कहां 3 हफ्तों में कम से कम 5 बार. दरअसल इसी राहुल गांधी की जरूरत देश को थी. जो जनता से जुड़ा हो, उसके बीच में हो, उसके सुख-दुख को जानता हो और उसके लिए लड़े. पता नहीं क्यों औरों से अलग मुझे राहुल गांधी में हमेशा एक अच्छे, ईमानदार 'राजनेता' की संभावना दिखती रही. मेरे पास अपनी इस पसंद के पक्ष में काफी तर्क हैं, पर इस बार उन्हें न देकर यहां मैं केवल राहुल गांधी के हाल में दिए भाषणों के अंश उठाऊंगा, और आप खुद अपने विचार बना सकते हैं.

अपनी 56 दिनों की बेहद चर्चित और निजी छुट्टी बिताकर जब राहुल गांधी लौटे, तो पहले हफ्ते में ही उन्होंने न केवल दबे कुचले विपक्ष को एक तरह से अपनी आवाज दी, बल्कि सत्तासीन भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधे निशाना साध कर यह संकेत भी दे दिए कि सरकार के लिए अपनी मनमानी कर पाना उतना सहज नहीं है, जितना सत्ता पाने के बाद समझा गया था. चाहे किसान रैली हो या संसद, मीडिया हो या आम जन, किसानों, युवाओं के बीच राहुल गांधी के बयानों की बानगी अगर उन्हीं के शब्दों में देखें, तो यह साफ हो जाएगा कि फिलहाल अकेले राहुल गांधी ने विपक्ष के नेता की भूमिका अघोषित तौर पर ही सही, कब्जा रखी है.

राहुल गांधी ने अपने भाषणों में मोदी पर हमले के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल किया, उनकी झलक देखिए. "आज देश के लोगों को लग रहा है कि यह सरकार ग़रीबों की नहीं बल्कि उद्योगपतियों की है. मोदी जी ने उद्योगपतियों से हज़ारों करोड़ रुपए का कर्ज़ लेकर चुनाव जीता है. कर्ज़ चुकाने के लिए भारत की नींव को कमज़ोर किया जा रहा है... जब किसान सोता है तो उसे यह नहीं मालूम होता कि कल क्या होने वाला है. उसे यह नहीं मालूम होता कि कब उसकी ज़मीन छीन ली जाएगी.... किसानों की आवाज़ को कभी नहीं दबाया गया और हम इसे कभी नहीं दबने देंगे....विदर्भ में कुछ सालों पहले सूखा पड़ा था. मैंने ज़हर की वो बोतल देखी थी, जिसे पीकर किसान ने आत्महत्या की थी. उसकी बीवी वहां थी, बच्चे वहां थे, लेकिन उसका भविष्य वहां नहीं था," ये शब्द कम से कम पुराने, शर्मीले राहुल बाबा के तो नहीं हैं. एक परिपक्व नेता के तौर पर अब जनता और किसानों से उनका जुड़ाव साफ- साफ दिखता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर राहुल गांधी के कटाक्ष का आलम देखिए, " मोदी जी भारत के प्रधानमंत्री हैं, लेकिन उन्हें भारत की शक्ति नज़र नहीं आती....मोदी जी पिछले 60 साल की गंदगी साफ़ करने का दावा करते रहते हैं, लेकिन उन्हें पिछले 60 साल की किसानों की मेहनत नज़र नहीं आती. प्रधानमंत्री का 'मेक इन इंडिया' कार्यक्रम भी किसान विरोधी है.... नरेंद्र मोदी किसानों के बच्चों को बड़ी कार चलाने वालों का नौकर बनाना चाहते हैं....आप भी जानते हैं, हम भी जानते हैं कि ये कारपोरेट की सरकार है. प्रधानमंत्री कारपोरेट से किए वादे तोड़ें और किसानों से किए वादे निभाएं.... 67 प्रतिशत जनता कृषि पर निर्भर है, देश के जो प्रधानमंत्री हैं, वो राजनीतिक गणित अच्छी तरह समझते हैं, तो फिर इन 67 प्रतिशत लोगों को क्यों नाराज़ करते हैं? मेरे लिहाज़ से इसका जवाब ये है कि हिंदुस्तान के किसान की ज़मीन की क़ीमत तेज़ी से बढ़ रही है, आपके कारपोरेट दोस्त उस ज़मीन को हड़पना चाहते हैं. "

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने केवल किसानों के मसले पर ही नहीं लोकसभा में नेट न्यूट्रैलिटी के मुद्दे पर भी सरकार को घेरा था. राहुल ने लोकसभा की स्पीकर को प्रश्नकाल स्थगित कर नेट न्यूट्रैलिटी पर चर्चा करने की नोटिस दी थी और जब बोलने का मौका मिला तो कहा, "देश के हर नागरिक को इंटरनेट का अधिकार होना चाहिए....मोदी सरकार इंटरनेट को देश के बड़े-बड़े उद्योगपतियों को बांट रही है." भाजपा पर उनके शब्द थे, " बीजेपी का तरीक़ा यही है, यहां कुछ बोलो, वहां कुछ बोलो और फिर कहो कि तीनों एक ही बात कर रहे हैं."  प्रधानमंत्री के 'मन की बात' कार्यक्रम पर राहुल का कटाक्ष कुछ यों था, " मैं प्रधानमंत्री को सुझाव देता हूं कि क्यों नहीं पीएम जाकर अपनी आंखों से देख लें, जहां लोगों के दिल में दर्द है, वहां जाकर उनसे बात कर लें. पर नहीं, यह नहीं हो रहा. किसान उर्वरक लेने जा रहा है, तो उसे वहां लाठियां मिल रही हैं."

विपक्ष की सीट से संसद के अपने पहले भाषण से लेकर लैंड बिल पर चली बहस के आखिरी संबोधन तक में राहुल ने यह साफ कर दिया कि भाजपा के लिए आने वाला कल उतना आसान नहीं है, जितना उसने समझा था. राहुल गांधी के ही शब्दों में, "यह बात गलत है कि कांग्रेस सरकार के लैंड बिल को आप सुधार रहे हो. हमने दो साल की मेहनत करके लैंड बिल बनाया था जिसका आपने भी समर्थन किया था. हमने कहा था कि किसानों की जमीन उनसे पूछकर ली जाएगी, आपने कहा कि उनसे पूछे बगैर ज़मीन ली जाएगी. यह कहकर आपने उनके पांवों पर पहली कुल्हाड़ी मारी. हमने कहा सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट (SIA) होगा, आपने कहा, नहीं होगा, यह कहकर आपने दूसरी कुल्हाड़ी मारी. हमने कहा, पांच साल में अगर ज़मीन पर काम नहीं हुआ, तो वह किसानों को वापस की जाएगी, आपने तीसरी कुल्हाड़ी मारते हुए इस प्रावधान को भी रद्द कर दिया."

राहुल गांधी के तीखे कटाक्ष का तेवर उनके इन शब्दों में भी देखिए, "सुना था कि चोर सिर्फ रात को आते हैं, छिपकर आते हैं, खिड़की के अंदर से कूद कर आते हैं, लेकिन सबसे बड़े चोर दिन-दहाड़े आते हैं, सबके सामने आते हैं, और सूट पहनकर आते हैं.... हमने आपकी फाइनेंस मिनिस्ट्री से पूछा, बताइए जमीन के कारण कितने प्रोजेक्ट रुके हैं. आपकी फाइनेंस मिनिस्ट्री ने कहा कि 100 में से केवल 8 प्रोजेक्ट जमीन की वजह से रुके हैं. केंद्र सरकार के पास जमीन पड़ी है, लेकिन आप किसान की जमीन के पीछे पड़े हैं. मैं पूछता हूं आप किसान से उसकी जमीन क्यों छीनना चाहते हो? "

साफ है यह पहले वाले राहुल गांधी नहीं हैं. विपक्ष के नेता के तौर पर आने वाले हर दिन के साथ उनके शब्दों का पैनापन बढ़ता जा रहा है. संसद से सड़क तक उनके निशाने पर सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनकी सरकार और उनकी पार्टी भाजपा है. वह जानते हैं कि बिना इनपर निशाना साधे, जनता के बीच में इनकी बात किए, इन्हें तोड़ा नहीं जा सकता, इसीलिए वह इनपर हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे. इसके लिए राहुल गांधी जनता के बीच हैं, सड़क पर हैं, मुखर हैं. लोकतंत्र में जनता को एक नेता से इससे इतर चाहिए भी क्या?
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

वोट दें

क्या विजातीय प्रेम विवाहों को लेकर टीवी पर तमाशा बनाना उचित है?

हां
नहीं
बताना मुश्किल
 
stack