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कानून से बड़े सलमान

कानून से बड़े सलमान अजीब बात है. सदियों पहले गोस्वामी तुलसी दास ने रामचरित मानस में लिखा था, ' समरथ को नहीं दोष गोसाईं,'  यानी जो सक्षम है, सामर्थ्यवान है, मजबूत है, उसमें कोई दोष नहीं, खराबी नहीं, वह कुछ भी करे, सब जायज है. अभी 13 साल पुराने हिट एंड रन केस में जब 4239 दिन बाद 6 मई को मुंबई की एक सेशंस कोर्ट ने सलमान खान को दोषी करार देते हुए पांच साल की सजा सुनाई, और उसके बाद जिस तरह से देश के सबसे बड़े वकीलों में से एक हरीश साल्वे की दलीलों के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने उन्हें दो दिन की अंतरिम जमानत दे दी और अब सलमान खान परमानेंट जमानत पाकर जेल जाने से बच गए हैं, उससे गोस्वामी जी की बात एक बार फिर से सच साबित हुई है. वाकई कानून की धरती पर न्याय सबके लिए अलग-अलग है.

अजीब प्रजातंत्र है हमारा भी और चमत्कारिक न्याय व्यवस्था. आपके पास पैसे हैं, रसूख है, कानून की अपने हिसाब से व्याख्या करने वाला दिमागदार वकील है, तो फिर आप जैसे चाहो इससे खेल सकते हो. कहने को तो हाईकोर्ट ने 2 दिन बाद 8 मई को फिर से सुनवाई की, पर वह दिखावा थी. यह सुनवाई पीड़ितों को न्याय देने के लिए नहीं सलमान को आराम देने के लिए थी. एक एक्टर, जो लगातार कानून को ठेंगे पर रखता है ,वह पैसे के जोर पर कानून की अपने हिसाब से व्याख्या भी कर और करा सकता है, कम से कम सलमान खान के मामले में यह बात शत प्रतिशत सच साबित होती है.

यहां सवाल सलमान खान, उनकी हीरोगिरी, दयानतदारी, पैसे, शोहरत, समृद्धि और दबंगई का नहीं, उस न्याय-व्यवस्था का है, जो आंखों पर पट्टी बांध कर गरीबों को सालों-साल कोर्ट के चक्कर कटवाती है, तो अमीरों की चेरी बन, उनके लिए राज्य-व्यवस्था और न्याय के सिद्धांतों का मखौल उड़ाती है. बेचारे उस हादसे में मारे गए और घायल हुए गरीब लोग और आपराधिक मामलों में पार्टी के रूप में शामिल 'महाराष्ट्र राज्य', सब ताकते ही रह गए और सलमान खान सेशंस कोर्ट से जेल जाने की बजाय सीधे अपने घर पहुंच गए, और अब तो बाकायदा उन्हें बांबे उच्च न्यायालय का सुरक्षा कवच भी हासिल है. कौन कहता है कि बड़ी अदालतें हमेशा सही न्याय करती ही हैं?

मजेदार बात तो यह की सलमान खान की सजा पर बहस के दौरान सलमान के गुनाह पर बात कम हुई, उनके एक्‍टर होने, रसूखदार होने पर ज्यादा. सरकारी वकील का तर्क था कि सलमान एक्‍टर हैं, उन्‍हें करोड़ों लोग रोल मॉडल मानते हैं, लिहाजा, उन्‍हें अधिकतम दस साल की सजा दी जाए, ताकि लोगों के सामने नजीर हो, जबकि सलमान के वकील का कहना था कि केवल एक्‍टर होने और नजीर पेश करने के मकसद से उनके मुवक्किल को ज्‍यादा सजा नहीं दी जानी चाहिए. उनके वकील ने सलमान की बीमारी का दावंपेंच भी चला और सजा में नरमी की अपील की. पर वह यह नहीं बता पाए कि तथाकथित बीमार सलमान को ऐसी क्या बीमारी थी कि एक दिन पहले तक तो वह कश्मीर में शूटिंग कर रहे थे. फिर सजा सुनने के दौरान ही बीमार क्यों पड़ गए?

सेशंस कोर्ट के सम्माननीय जज डी.डब्‍ल्‍यू. देशपांडे ने तब सलमान से पूछा भी था कि- आप पर लगे सारे आरोप साबित होते हैं, आप पर दस साल की सजा बनती है, आपका क्‍या कहना है? सलमान कुछ बोले नहीं. वकील की ओर देखते रहे, उनका चेहरा लाल हो गया. आंखें नम हाे गईं. पर यह सब भी सिनेमा की एक्टिंग की तरह ही था. पहले से ही बड़ा वकील कर लिया गया था, केस की ड्राफ्टिंग तक की जा चुकी थी. सब कुछ सेट हो चुका था, पूरे फिल्मी सेट की तरह. और हुआ भी यही. शूटिंग की जगह बस बदल गई. सेशंस कोर्ट की जगह बांबे हाई कोर्ट ने ले ली.

सेशंस कोर्ट के सम्माननीय जज डी.डब्‍ल्‍यू. देशपांडे ने माना था कि हादसे के वक्‍त सलमान खान शराब पीकर गाड़ी चला रहे थे और उनके पास ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं था. 27 में से 26 गवाह सलमान के खिलाफ रहे थे. एक गवाह ने भी बाद में बयान पलट दिया था. पर जज देशपांडे की दोषी को सजा दिलाने और पीड़ितों को न्याय देने की सारी कोशिश बेकार गई. वजह, आप खुद  समझ सकते हो. जज देशपांडे की अदालत में यह मामला पिछले साल अप्रैल में ही आया था. वह खुद तो सलमान के रसूख और वकीलों की फौज से प्रभावित न हो सके, पर बड़ी अदालत तो फिल्म 'जॉली एल एल बी' के सीन की तरह 30 लखिया एडवोकेट की दलीलों से थर्रा गई, और सलमान साहब को परमानेंट जमानत मिल गई, जेल की सजा स्थगित. हुजूर मौज से घर में रहें, शूटिंग करें, शिकार करें, सड़क के कीड़े-मकोड़ों के लिए भला 'बीइंग ह्यूमन' कोई होता है क्या?

अब जरा सलमान से अलग हट इस हादसे के दूसरे पक्ष की बात करें, तो इस मामले के पांच पीड़ित थे. पहले, नुरुल्लाह शरीफ, जो सलमान की लैंड क्रूजर के नीचे आकर मारे गए. इस हादसे में जो चार लोग घायल हुए थे, वे थे मोहम्मद अब्दुल्ला शेख, मन्नू खान, मोहम्मद कलीम इकबाल पठान और मुसलिम नियामत शेख. ये चारों ही हिल रोड स्थित एक बेकरी में काम करते थे. हादसे के बाद इन सभी को 3-3 लाख रुपए बतौर मुआवजा मिले थे, लेकिन इसमें से उन्हें 1.2 लाख रुपए कानूनी फीस के तौर पर चुकाने पड़े. कानून भी गरीबों की झोली ही नोचता है. इन्हें जरूरत थी, ये घायल थे, हादसे का शिकार थे, पर फीस के मामले में कोई ढील नहीं मिली.

बेचारे शेख ने हादसे के बाद पुरानी बेकरी में नौकरी छोड़ दी थी और बांद्रा की एक बेकरी में काम करने लगे. पीड़ित भी जानते थे कि उन्हें न्याय के रूप में क्या मिलने वाला है, शायद इसीलिए वे फैसला आने को लेकर बहुत ज्यादा आशान्वित नहीं थे. शेख का साफ-साफ कहना था कि, ''यह फैसला मेरी जिंदगी नहीं बदलने वाला है. फिर इस की क्या चिंता करना? अगर मैं अपनी जिंदगी तबाह करने को लेकर सलमान के खिलाफ कुछ बोलता हूं, तो किसे परवाह है? शुरुआत में मेरी उनके प्रति बहुत कड़वी राय थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है. मैं भी नहीं चाहता कि उनको कोई बड़ी सजा हो, क्योंकि इससे मेरी कोई मदद नहीं होगी. हम तो बस यह चाहते हैं कि वह हमारी मदद करें.'

पर दुनिया की नजर में दयालुता की मूरत बने सलमान की असलियत शेख के शब्दों में ही उजागर हो जाती है. शेख के मुताबिक, 'शुरुआत में मैं सलमान को बहुत भला-बुरा कहता था, लेकिन धीरे-धीरे उनके प्रति मेरी बुरी भावना खत्म होती गई. हालांकि, जब भी उस एक्सीडेंट का जिक्र होता है, तो ऐसा लगता कि किसी ने दुखती रग दबा दी हो. पर धीरे-धीरे मैंने इस सच्चाई को कबूल कर लिया है कि वे बड़े लोग हैं. हम उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते. हमने सलमान के बारे में अपने गांव और मुंबई में बहुत कुछ अच्छा भी सुना है. मैंने सुना है कि वह गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करते हैं. पर, उन्होंने हमारे लिए कुछ नहीं किया. पहले मैं सोचता था कि वह मेरे परिवार के पास आएंगे और हमारी मुश्किलों को समझते हुए मदद करेंगे, लेकिन अब तो यह सपने जैसा ही लगता है. मुझे लगता है कि सलमान द्वारा मदद करने से जुड़ी खबरें झूठी हैं. पैसे देकर प्रचार कराया जाता है उनका.'

शेख सच कह रहे. हादसे में घायल होने के बाद वह कुछ महीने अस्पताल में रहे, इसके बाद यूपी में अपने गांव चले गए. जब वापस लौटे, तो पुरानी बेकरी के मालिक ने नौकरी देने से इनकार कर दिया. इसके बाद उन्होंने दूसरी बेकरी में नौकरी शुरू की. यहां उनके साथी शेख को चिढ़ाने के लिए अखबार में छपी सलमान की फोटो उनके काम करने वाली जगह पर चिपका देते थे. शेख की जिंदगी मजाक बन गई है. मीडिया को सलमान से सहानुभूति है, पर शेख जैसों के लिए कौन सोचे. उनके जैसे लोग पूरी जिंदगी अपनी रोजी-रोटी कमाने और परिवार की गुजर-बसर करने में बिता देते हैं. उनके पास न तो पैसा है न ही समय कि अपने केस पर नजर रखें या फैसले का इंतजार करें, वैसे भी इससे उन्हें मिलना क्या?

कहने के लिए सलमान के पक्ष में भी ढेरों तर्क हो सकते हैं, पर यह तर्क पैसे वालों के पक्ष में ही क्यों आते हैं, इस पर विचार किया जाना बहुत जरूरी है. अदालत के फैसले के बाद फिल्मी गवैये अभिजीत ने सलमान के समर्थन में जिस तरह से यह तर्क दिया कि ‘कुत्ता सड़क पर सोएगा तो कुत्ते की मौत ही मरेगा’, उससे पता चलता है कि समाज के धनी वर्गों में गरीब तबकों के खिलाफ कैसी संवेदनहीनता गहराई से पैठी हुई है. कहां हैं मेनका गांधी? क्या कुत्ते जीव नहीं होते? सड़क क्या केवल अमीरों के लिए बनती है? जनाब यह कोई रनवे तो नहीं, जिस पर केवल जहाज उड़ने होते हैं.

आखिर किसे के सिर पर छत नहीं है, कोई ईमानदारी से मेहनत करके भी दो वक्त की रोटी नहीं जुटा पा रहा, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है? यहां यह समझना मुश्किल नहीं है कि कोई व्यक्ति फुटपाथ पर सोता है, तो वह हमारी ही सामाजिक और सरकारी व्यवस्था की अवहेलना का शिकार है और लाचारी की हालत में ऐसा करता है. अगर कोई सुविधाओं से लैस जिंदगी जी रहा है, तो क्या उसे नशे में किसी गरीब की जान लेने की छूट मिल जाती है?  न्याय का सिद्धांत कहता है कि किसी बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए, पर सलमान जैसे लोग जो न्याय से खेलते हैं, उन पर न्याय का सिद्धांत क्या कहता है? शायद इसका उत्तर गढ़ा जाना अभी बाकी है.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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