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नेपाल भूकंप के सबक, हम लें तो !

जय प्रकाश पाण्डेय , May 05, 2015, 7:20 am IST
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नेपाल भूकंप के सबक, हम लें तो ! कोई भी सभ्यता जब प्रकृति का इस कदर दोहन करने लगती है, तो विनाश निश्चित है. इनसान की अपनी सीमाएं हैं, पर 'मौत' के आने से पहले इसे वह समझता नहीं. अभी नेपाल में भूकंप आया. धरती इस बार कुछ देर तक कांपी और 50 लाख की आबादी वाले काठमांडू से लेकर पूरा उत्तर भारत, जिसमें देश की राजधानी दिल्ली भी शामिल है, कांप उठी. नेपाल तो भरभरा ही गया है.

दुनिया भर से पहुंच रही अरबों रुपए की मदद के बावजूद वह कब तक अपने पैरों पर खड़ा होगा, कहना जरा मुश्किल है. इनसानी जिंदगियों की तो मैं बात ही यहां नहीं कर रहा, क्योंकि हम मीडिया वाले इनकी गिनती 'नंबरों' में करने लगे हैं, जबकि इनसानी जीवन कोई 'इकाई' भर तो नहीं, कि हम यह भर लिख दें कि 10000 मरे, और काम खतम.

इनसानी जीवन अनमोल होता है, मरने वालों में बच्चे, युवा, औरतें, बूढ़े...सबकी अपनी-अपनी जिंदगियां, अपने-अपने अनुभव, सपने और योग्यताएं. कोई इनमें कुछ भी हो सकता है/ था. इन्हें फिर अंकों में क्यों और कैसे आंकना, इनके न होने से होने वाले नुकसान का आंकलन किस तरह संभव है? नेपाल में आए भूकंप की वजह, त्रासदी, नुकसान, पुनर्वास और भविष्य के सबक पर बातें न कर हम यहां केवल यह चर्चा करेंगे कि तरक्की की आड़ में इनसान किस कदर अपनी ही सभ्यता के विनाश की तरफ कदम बढ़ा रहा है.

प्रकृति से छेड़छाड़ की हमें क्या कीमत चुकानी पड़ रही है और आगे क्या पड़ेगी? और कब कहां क्या घट जाएगा, उसका एक नजारा नेपाल ने तो दिखाया ही, उसके बाद आसमान से भी दिखने वाला था, पर हम बाल बाल बच गए. हुआ यह कि रूस का एक उपग्रह अंतरिक्ष में लांच होने के बाद बेकाबू होकर बजाय ऊपर जाने के गुलाटियां खाते नीचे आने लगा. हालांकि इस खबर को भारतीय मीडिया में इतनी जगह नहीं मिली, पर सीएनएन, वाशिंगटन पोस्ट, बीबीसी की ये सबसे बड़ी खबरें थीं, क्योंकि अगर वैज्ञानिक उसे धरती से टकराने से रोक नहीं पाते, तो हमारा वजूद खतम था.

भूकंप, तूफान, बाढ़ और सूखा की कोई सीधी काट सावधानी के सिवा नहीं है. प्रकृति की अपनी प्रक्रिया है. पर हर तबाही के बाद हम केवल बातें करते रह जाते हैं. काठमांडू की ही तरह भारत के सारे बड़े-छोटे शहर बेतरतीब से बसे हुए हैं. अवैध निर्माण, बड़ी बिल्डिंगें, पानी और सीवर की अनियोजित व्यवस्था आदि. उपर से सारा इलाका भूकंप की सबसे खतरनाक पट्टी पर. उस लिहाज़ से देखें तो 7.9 रेक्टर पैमाने के भूकंप से तबाही कम ही हुई, जितनी आशंका थी.

कहने को तो इस आपदा के बाद, भारत में कई संस्थाएं और राज्य सरकारें फिर से हरकत में आ रही हैं. भारतीय मानक ब्यूरो के निदेशक का कहना है कि 2015 के आखिर तक नेशनल बिल्डिंग कोड तैयार कर लिया जाएगा, जिसमें दस साल से कोई बदलाव ही नहीं हुआ है. इसके तहत सेफ्टी सर्टिफिकेट की प्रक्रिया सख्त की जाएगी, सुपर हाइराइज़ बिल्डिंग के लिए सुरक्षा मानक तय किए जाएंगे, निर्माण से जुड़े इंजीनियर, आर्किटेक्ट और बिल्डर की जवाबदेही तय की जाएगी, पर क्या नियम बना देने भर से लोग सुधर जाते हैं?

कश्मीर का ही उदाहरण लेते हैं. दुनिया के सबसे ऊंचे इलाके में इस साल मार्च महीने में महज 7 माह बाद ही फिर से भयंकर बाढ़ आ गई. इससे पहले सितंबर, 2014 में पानी के जलजले ने भयानक तबाही मचाई थी. चारों ओर पानी ही पानी. कहीं 10 से 15, तो कहीं-कहीं 20 फीट तक पानी. जम्मू- कश्मीर की इस बाढ ने न केवल समूचे राज्य की व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया था, बल्कि इस बात की पोल भी खोल दी थी कि भारत जैसा बड़ा कहलाने का खम ठोंकने वाला देश भी किसी भी तरह की आपदा से जूझने के लिए किसी भी तरह से तैयार नहीं हैं.

पाकिस्तान का एक बड़ा हिस्सा तो अभी भी बाढ़ से तबाह है. बिहार और उत्तर प्रदेश में आंधी और पंजाब, राजस्थान में पड़े ओलों से हुई तबाही का दर्द भी अभी लंबा खिंचेगा. ऐसे में हम नेपाल की तबाही को लेकर क्या कहें? बेचारा छोटा सा देश. हर बात के लिए पड़ोसियों पर निर्भर. वहां हफ्ते भर बाद भी बचाव कार्य अभी चल ही रहा है.

दुनिया भर से मदद और बचाव दल नेपाल पहुंचा है. पर जम्मू-कश्मीर में अफरातफरी का आलम तब था, जब वहां भारतीय सेना चौबीसों घंटे मुश्तैद रहती है. और सही मायनों में वह भारतीय सेना ही थी जिसके चलते 'धरती का स्वर्ग' आसमान से टपकती तबाही से नरक बनने से बच गया. पर स्थानीय प्रशासन से लोगों की नाराजगी किसी भी तरह कम नहीं हुई थी. उनका आरोप था कि सेना के अलावा उनका कोई सहारा नहीं था. बात सच भी थी, कल्पना कीजिए कि अगर जम्मू-कश्मीर में सेना नहीं होती, तो क्या होता! अभी नेपाल की धरती पर भी सबसे पहले राहत और बचाव के काम में जुटने वालों में भारतीय सैनिक ही थे. भारतीय सेना के इस जज्बे को सलाम.

हालांकि नेपाल में हुई माली तबाही का आंकलन अभी नहीं हुआ है, और जम्मू- कश्मीर में पिछले साल आई बाढ़ से हुए नुकसान का जायजा नहीं लिया जा सका है, तो इस साल हुए नुकसान की क्या बात करें? एसोचेम के मुताबिक तब जम्मू-कश्मीर में अचानक आई बाढ़ से तकरीबन 1,000 करोड़ रुपए की सेब की फसल को नुकसान पहुंचा था. लाखों लोग तबाह हो गए थे और अरबों की सम्पत्ति बरबाद हो गई थी.

नेपाल हो या जम्मू-कश्मीर, कहीं भी प्राकृतिक आपदा में वाकई कितना नुकसान हुआ, उसका सही हिसाब लगाने में काफी वक्त लगता है, फिर इससे हुए मानसिक नुकसान की तो कोई कीमत ही नहीं आंकी जा सकती. फिर भी हम सबक क्यों नहीं सीखते? यह सवाल मौजू है. अमेरिका, चीन, जापान और तरक्की कर चुके योरोपीय देशों में इस तरह के हालातों से निबटने की पूरी चाक-चौबंद व्यवस्था है. पर अपने देश में किसी भी तरह की आपदा से निबटने के बाद उसे भुला देना हमारी आदत का हिस्सा हो गया है.

अभी दो साल पहले उत्तराखंड में आए कहर को ही लें, तो उसके घाव अब तक हरे हैं. आलम यह है कि देश के कई हिस्सों के तमाम लोगों ने उत्तराखंड में गायब हुए अपने अपनों के लौट आने का इंतजार पूरे साल किया और थक-हार कर उनके अंतिम संस्कार में लग गए. उस हादसे का दर्द राज्य सरकार के तमाम प्रयासों के बाद भी कम नहीं हुआ.

अभी कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने केदारनाथ तक पैदल यात्रा करके लोगों में भरोसा बढ़ाने की कोशिश की, पर मनोबल बढ़ता उससे पहले ही भूकंप ने सबको थरथरा दिया. इससे पहले के बड़े हादसों को देखें तो, 26 दिसंबर 2004 को दक्षिण भारत पहुंची सुनामी की लहरों ने तकरीबन 26000 से ज्यादा लोगों को लील लिया था.

हो सकता है सरकारी आंकडा शवों के मिलने को ही मौत मानता हो और तबाह हो गए ऐसे लोगों को लापता लोगों की सूची में भी गिनने को राजी न हो, जिनके दुर्भाग्य से उनके गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराने वाला भी कोई न बचा हो. समंदर की गहराई में आए भूकंप की वजह से सुनामी की लहरें हिंद महासागर में 800 किलोमीटर प्रति घंटा के रफ़्तार से बढ़ते हुए भारतीय तट पर पहुंची थीं.

हजारों किलोमीटर दूर आए भूकंप के कुछ घंटे बाद ही ये लहरें बंगाल की खाड़ी तक आ पहुंची थीं. यहां तक पहुंचते-पहुंचते लहरों की रफ़्तार भले ही कम हो गई थी, लेकिन इनकी ऊंचाई बढ़ती गई. आलम यह था कि श्रीलंका तक पहुंचते- पहुंचते सुनामी की लहरें कुछ कमज़ोर ज़रूर पड़ चुकी थीं, लेकिन बावजूद इसके श्रीलंका के तटीय इलाक़ों में इन लहरों का कहर कम नहीं हुआ. करीब 1500 लोगों से भरी एक ट्रेन भी इन लहरों की चपेट में आ गई और उसमें सवार ज़्यादातर लोग डूब कर मर गए.

पर इन हादसों से किसने क्या सबक सीखा समझना मुश्किल है. चार दिन की चर्चा, उतने समय का भय, और फिर सब कुछ नदारद. कल्पना कीजिए कि जो कुछ काठमांडू में हुआ, वही अगर दिल्ली में होता तो क्या होता दिल्ली का...दिल्ली, भारत का दिल ही नहीं, देश की राजधानी भी है, ऐसे में इस पर आ सकने वाले खतरों की चर्चा और भी जरूरी है.

हादसों को लेकर हमारी तैयारी की पोल अगर आसमान से टपकती बारिस की बूंदे भर खोल देती हैं, तो अगर दिल्ली पर कोई आपदा आ जाए, तो क्या होगा? दिल्ली, पश्चिम में थार के रेगिस्तान और दक्षिण में अरावली पर्वत रेंज, जिसे भूकंप के लिए सबसे खतरनाक माने जाने वाले इलाकों में से एक 'दिल्ली-हरिद्वार-रिज' के रूप में जाना जाता है, के बीच बसी है.

यह इलाका 'सिस्मिक जोन-IV' में आता है, जो दुनिया के सबसे खतरनाक भूकंप प्रभावित इलाकों से केवल एक डिग्री कम है. यहां यह बताना जरूरी है कि भूकंप के खतरों के लिहाज से वैज्ञानिकों ने 'धरती' को कुल 5 कैटेगरी में बांटा है. जोन 'V' सबसे अधिक खतरनाक है, जहां आए-दिन भूकंप आते रहते हैं और इससे उपर की कैटेगरी में जीवन संभव ही नहीं.

दिल्ली 'सिस्मिक जोन-IV' का हिस्सा है, इसलिए वैज्ञानिकों के हिसाब से इस तरह के इलाके में 5-6 मैग्निच्युट के भूकंप का आना काफी आम है. पर ऐसे इलाके में कुछ भूकंप 6-7 मैग्निच्युट के भी हो सकते हैं और कभी-कभार यहां 7-8 मैग्निच्युट का भूकंप भी आ सकता है. जैसा कि इस बार नेपाल में आए भूकंप में हुआ.

दक्षिणी हिमालय के अधिकांश इलाकों की तरह ही नेपाल भी भूकंप की आशंका वाला क्षेत्र है. पृथ्वी जब युवा थी, तब से ही इंडियन टेक्नोटिक प्लेट उत्तर की ओर बढ़ रही है. यह प्लेट 5 सेंटीमीटर प्रति वर्ष की दर से खिसक रही है. भौगोलिक संघर्ष ने ही हिमालय की पर्वत माला को यह ऊंचाई प्रदान की है. यही वजह इसे भूकंप की आशंका वाला क्षेत्र भी बनाती है.

जब दबाव बहुत अधिक बढ़ जाता है तब भूकंप आते हैं. हालांकि नेपाल का यह भूकंप अपने आप में बहुत बड़ी त्रासदी था, लेकिन इससे भी बड़े भूकंप की आशंका से कतई इनकार नहीं किया जा सकता,रिक्टर पैमाने पर 9 की तीव्रता का कोई भूकंप अगर आया, तो वह इतनी अधिक तबाही मचाकर जाएगा जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती.

मतलब साफ है कि दिल्ली उस हाई-रिस्क जोन का हिस्सा है, जहां पलक झपकते ही अंतहीन तबाही मच सकती है. 29 मार्च, 1999 को चमोली में आए भूकंप से भी समूची दिल्ली थर्रा उठी थी. बावजूद इसके दिल्ली की सुरक्षा का कोई खास बंदोबस्त नहीं हुआ. पुरानी बिल्डिंगों को छोड दें, तो नई बन रही बिल्डिंगों में से कितनी भूकंप के बडे झटकों को थाम लेंगी? कहना मुश्किल है.

दिल्ली की आबादी का अनुपात, शहर की बनावट, खतरे की गंभीरता और मौजूदा साधनों को देखने पर तो यह कत्तई नहीं लगता की दिल्ली किसी भी तरह के खतरे को झेलने के लिये तैयार है. एक बिल्डिंग कहीं गिरती है, कुछ घंटे कहीं बारिश हो जाती है और किसी दिन शहर में केवल 3-4 वी वीआईपी एक साथ सडकों पर निकल जाते हैं, तो दिल्ली की सांसें थमती सी दिखती हैं, जिसे संभालने में घंटों लग जाते हैं.

घनी आबादी, सडकों पर अवैध कब्जा, खराब बनावट, संसाधनों की कमी और तंग गलियों के अलावा शहर में बडे लोगों की मौजूदगी. कल्पना कीजिये, पूरी दिल्ली अगर कभी किसी बडे भूकंप से थर-थरा जाये, तो फायर ब्रिगेड की गाडियां सबसे पहले किधर भागेंगी? नई दिल्ली की तरफ, जिधर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और दूसरे केंद्रीय मंत्रियों सहित सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश महोदय और दूसरे अफसरशाह रहते हैं. इनके बाद यह दक्षिणी दिल्ली की पॉश कॉलोनियों की तरफ भागेंगी.

बेचारी पूर्वी और पुरानी दिल्ली, जहां के कुछ घरों में एक छत के नीचे दर्जनों लोग, और एक किलोमीटर के इलाके में कई-कई लाख लोग रहते हैं, तक का नंबर आते-आते क्या हो चुका होगा इसे लिखने की जरूरत शायद नहीं है. एक बड़े अखबार की खबर के मुताबिक दिसंबर 2014 में सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि जिस भी इमारत में 100 या 100 से ज्यादा लोग रहते हैं, वहां बाहर एक पट्टी पर लिखा होना चाहिए कि यह इमारत भूकंप की किस श्रेणी के झटके को सहने योग्य है.

हरियाणा के आपदा प्रबंधन मंत्री कैप्टन अभिमन्यु ने कहा कि फरीदाबाद, गुड़गांव में सिज़्मिक ज़ोन चार के अनुसार सारे नियम बने हैं और बिल्डरों को पालन करना पड़ता है. अगर किसी उल्लंघन का पता चलता है तो हम काररवाई करेंगे. पर आपको पता कैसे चलेगा? जब आपके ही कर्मचारी घूस लेकर ये सारे अवैध निर्माण करा रहे हैं, तो?

ट्रिब्यून अखबार ने तो लिखा भी था कि गुड़गांव प्रशासन के पास 1100 ऊंची इमारतों का ज्योग्राफिक इंफॉरमेशन सिस्टम तैयार नहीं है जो भूकंप के बाद बचाव के लिए ज़रूरी होता है. आप समझ सकते हैं कि देश की राजधानी ही किन हालातों में है. यहां अगर हम 26 जनवरी, 2001 को गुजरात में आए भूकंप और 8 अक्टूबर 2005 को कश्मीर में आए भूकंप की बात छोड भी दें, जिससे पूरी दिल्ली हिल उठी थी, तो भी केवल 2 नवंबर, 2013 की एक अकेली रात को ही रात 12.45 से 3.41 तक दिल्ली ने भूकंप के 4 हल्के झटके झेले थे.

दिल्ली की ही तरह देश की वाणिज्यिक राजधानी मुंबई की मुसीबत कम नहीं है. मुंबई...देश की इकोनॉमिक कैपिटल. भारत की शान. फिल्म स्टारों और पूंजीपतियों का शहर. एक ऐसा शहर, जो कभी सोता नहीं है. जाहिर है ऐसे शहर के कभी रुकने का सवाल ही नहीं खडा होता. पर 26 जुलाई, 2005 की तारीख को शायद ही कोई मुंबईया जीवन भर भूल पाए.

एक तरह से समुची मुंबई उस दिन एक जगह पर ही खडी हो गई थी, और उसे वापस हरकत में आने में लगभग हफ्ते भर का समय लग गया था. हुआ यह था कि 26 तारीख को दोपहर 2 बजे के करीब एक बार जो बरसात शुरू हुई, तो उसने महज कुछ ही घंटे में मुंबई की सडकों को झील में बदल दिया था. अचानक आई इस आपदा ने 5000 लोगों की जान ले ली थी.

मुंबई में आई यह बाढ ठीक एक महीने पहले जून में गुजरात में आई बाढ से भी भयावह थे. अरब सागर से उठे बादलों ने मुंबई में 26 जुलाई को 24 घंटे के भीतर 994 मिलिमीटर बारिश की थी. आलम यह था कि जो जहां था, वहीं खडा रह गया. सडक पर कारें पहले बंद हुईं, फिर डूब गईं.

सडक पर फंसे लोगों के पास खाने के लिये तो दूर पीने तक के लिये पानी नहीं था. लोग कई-कई किलोमीटर पैदल चल कर अपने घरों तक पहुंचे. भारी बरसात के महज 2 घंटे बाद ही 4 बजते-बजते पवई लेक और मीठी नदी भी ओवर फ्लो करने लगी. मुंबई की सडकों का आलम यह था कि लाखों व्हिकल स्टैंड स्टील हो गए, जिन्हें फिर से चलाने और रोड साफ करने में हफ्तों लग गये.

कचरा, सीवेज के सड़क पर आ जाने से लोगों के स्वास्थ्य पर अलग तरह से बन आई थी. डाटा के हिसाब से देखें तो केवल उन 24 घंटों में लगभग 550 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ. 52 लोकल ट्रेनें बरबाद सी हो गईं, 37,000 ऑटोरिक्शा खराब हो गए, 4,000 टैक्सियां किसी लायक नहीं बचीं. 900 बसें डैमेज हो गईं और 10,000 ट्रक और टैंपो जहां के तहां खडे रह गए.

मुंबई की इस मुसीबत की वजह भी बिना किसी योजना के अवैध बिल्डिंगों के बनने, इंक्रोचमेंट,खराब सीवर सिस्टम और प्रकृति के साथ खिलवाड़ को माना गया. मैंग्रोव इकोसिस्टम को खत्म करने से समंदर और मुंबई के बीच का तालमेल बिगड़ गया. नतीजतन बरबादी सिर पर आ गई. पर मुंबई ने इस घटना से कुछ भी सबक लिया होता तो वहां से 'आदर्श सोसाइटी' जैसे घोटाले की खबरें नहीं आतीं.

हालांकि नेपाल के हादसे के पहले हफ्ते में केंद्र और राज्य की सरकारें सक्रिय दिख रही है. हिमाचल प्रदेश ने सभी ज़िलों में अलर्ट जारी कर भीड़ भाड़ वाले इलाके में मॉक ड्रिल करने को कहा है. लेकिन शिमला सहित प्रदेश के कई शहरों में अंधाधुंध निर्माण जारी है. उत्तर प्रदेश सरकार के हाउसिंग के प्रधान सचिव ने कहा है कि भूकंप रोधी नियमों को और सख्त किया जाएगा और इन नियमों का पालन नहीं करने वाले सरकार और प्राइवेट बिल्डरों को निर्माण पूरा होने का सर्टिफिकेट नहीं दिया जाएगा. इसे फायर सेफ्टी नियमों की तरह लागू किया जाएगा, पर नोएडा अथॉरिटी, जहां इंजीनीयर तक अरबपति है, वहां काम कैसे हो सकता है, समझना कोई मुश्किल काम नहीं.

मुंबई में जनवरी में इंडियन साइंस कांग्रेस में आईआईटी के रिटायर भू वैज्ञानिक वी सुब्रमण्यम ने कहा था कि मुंबई में 23 मंज़िल से ज्यादा ऊंची इमारत नहीं बननी चाहिए. उन्होंने यह भी कहा था कि मुंबई में कागज़ पर तो आपदा प्रबंधन की योजनाएं तैयार दिखती हैं, मगर ज़मीन पर नहीं मिलती हैं. उनका कहना था कि हर ऊंची इमारत की जांच भू-वैज्ञानिक से करानी चाहिए.

सुब्रमण्यम साहब बीस साल से मुंबई के इलाके में झटकों की प्रवृत्ति का अध्ययन कर रहे हैं. उनका कहना है कि मुंबई को जापान के यसाका पगोडा की टेक्निक से सीखना चाहिए. पांच मंज़िला पगोडा भूकंप आने पर सांप की तरह हिलता है. हर मंज़िल एक दूसरे से स्वतंत्र हिलती है और झटके समाप्त होते ही वापस अपनी जगह पर आ जाती है.

हमें पैगोडा बनाने की ज़रूरत तो नहीं है पर इसके सिद्धांतों को हम अपना सकते हैं. नेपाल की इस त्रासदी के बाद हमें यह याद रखना चाहिए कि भारत और उसके पड़ोसी मुल्क बस अपने दिन काट रहे हैं. तबाही किसी भी वक्त आ सकती है. खराब शहरी नियोजन, खराब गुणवत्ता वाला विनिर्माण और नियमन तथा मानकों की कमी हमेशा काम की नहीं रहेगी. नेपाल के भूकंप जैसी त्रासदियों का कोई पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है. हां, इनसे बचाव की तैयारी जरूर की जा सकती है.

जापान जैसे देशों ने जहां इससे बचने के तरीके अपनाए हैं. यही नहीं अपने देश में भी बरबादी से सबक ना सीखने वाले राज्यों के बीच कुछ ऐसे भी राज्य हैं, जिन्होंने प्राकृतिक आपदा से सबक लेकर अपने यहां ऐसी मिसाल कायम की जिसका लोहा न केवल पूरे देश में माना गया, बल्कि युनाइटेड नेशन ने भी जिसकी सराहना की.

साल 1999 में ओडिशा में खतरनाक महाचक्रवात आया था. जिसने पलक झपकते ही ओडिशा के समंदर से सटे इलाकों में भयानक तबाही मचाई थी. उस दौरान तकरीबन 10 हजार लोगों की जान गई थी और हजारों करोड की संपत्ति बरबाद हुई थी. नवीन पटनायक की अगुआई वाली सरकार ने इस हादसे के बाद 'आपदा प्रबंधन' को इस कदर तरजीह दी कि पिछले साल 2013 में आए अब तक के दूसरे सबसे भीषण चक्रवाती तूफान ‘फिलिन’ से राज्य में कोई खास बडा हादसा नहीं हुआ. जबकि फिलिन की स्पीड भी कम नहीं थी.

ओडिशा के साथ ही उत्तरी तटीय आंध्र प्रदेश में मूसलाधार बारिश हुई और 200 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलीं. ओडिशा के तटीय जिलों, खासतौर से गंजाम, जहां का गोपालपुर-आन-सी तूफान का प्रवेश बिंदु था, में चारों तरफ अंधकार था, तूफान के वेग के कारण पेड़ और बिजली के खंभे उखड़ गए.

राजधानी भुवनेश्वर के अलावा राज्य के तटीय जिलों गजपति, खुर्दा, पुरी, जगतसिंहपुर, नयागढ़, कटक, भद्रक और केन्द्रपाड़ा में बहुत भारी बारिश हुई. फिर भी लाखों लोगों की सुरक्षा की जा सकी. किसी भी नेचुरल डिजास्टर से बचाने के लिए करीब दस लाख लोगों को चेतावनी मिलने के 48 घंटे के भीतर सुरक्षित जगह पर पहुंचा देने को रिकार्ड मानते हुए यूएन ने भी ओडिशा सरकार और मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की तारीफ की थी.

जाहिर है, जहां चाह है, वहां राह भी निकल ही आती है, वरना तो हड़प्पा का उदाहरण सामने है ही. सभ्यताएं कैसे धरती में समा जाती हैं, नेपाल का भूकंप तो उसकी एक झांकी भर था.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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