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गजेंद्र सिंह को किसने मारा

गजेंद्र सिंह को किसने मारा पिछले हफ्ते लिखना तो था कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के नए अवतार पर, लेकिन किसान गजेंद्र सिंह की मौत, जिसे हमारे जैसे लोग हत्या समझते हैं, ने सब कुछ अस्त-व्यस्त कर डाला. राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी, मुलायम सिंह यादव, और अब तो अरविंद केजरीवाल भी, बड़े लोग हैं, इन पर तो लिखा भी खूब जाता है और आगे भी लिखा ही जाएगा, पर बेचारे गजेंद्र सिंह जैसे आम लोगों, किसानों पर कौन कब लिख रहा? इनके पास तो अपने, अपनी समस्याओं और अपनी बातों के बारे में लिखवाने के लिए शायद जान देने के अलावा कोई रास्ता बचा ही नहीं है.

फिर गजेंद्र सिंह ने तो आत्महत्या भी नहीं की. आम आदमी पार्टी की रैली में एक पेड़ पर चढ़ कर चीख-चीख कर वह कहता रहा, मेरी बात सुन लो, नहीं तो मैं जान दे दूंगा. पर वहां मौजूद लोग, जनता, नेता, पुलिस और मीडिया इसे कोई रोमांचक खेल समझकर देखते रहे. कोई मजा लेता रहा, कोई फोटो क्लिक करता रहा, कोई उत्साह बढ़ाने के अंदाज में ताली बजाता रहा, तो किसी के लिए उसकी बातें मजमें के बीच करतब दिखा रहे मदारी से अलग नहीं थीं.

देश की राजधानी दिल्ली के दिल जंतर-मंतर पर आम आदमी पार्टी की रैली के दौरान जिस तरह से गजेंद्र सिंह की जान गई, उससे न केवल देश के किसानों की समस्या, आम आदमी की बेचारगी और उसकी किसी भी तरह से कुछ कर गुजरने की ललक उजागर हुई, बल्कि इससे हमारे नेताओं की संवेदनहीनता, पुलिस की सीमाएं और सरकारी व्यवस्था का लिजलिलापन भी सामने आ गया. मीडिया भी कुछ हद तक इस पाप में हिस्सेदार है, क्योंकि 'सनसनी', चाहे वह जिस भी रूप में हो, को तरजीह देने की उसकी प्रवृत्ति ने न जाने कब -कब, कहां-कहां, कितने हादसे छोड़े, जो गजेंद्र सिंह जैसे थे, असामयिक थे, गैर जरूरी थे.

इस देश का किसान ही क्यों, छात्र, महिला, व्यापारी, या कोई भी आम इनसान आत्महत्या तब करता है, जब उसकी सारी उम्मीदें टूट जाती हैं, सपने ढह जाते हैं, आगे अंधेरा ही अंधेरा दिखता है, और उसके सामने जीने के लिए कोई राह नहीं बचती. हालांकि गजेंद्र सिंह के मामले में यह बात नहीं थी. वह किसान था, गुणी था, सियासत में रूचि थी और भरेपूरे खुशहाल परिवार का सदस्य था. उसके पास अचानक से मौत को गले लगा लेने की कोई वजह नहीं थी, हालात भी नहीं थे. फिर वह मरा क्यों? उसे मारा किसने? कौन था दोषी उसकी मौत का? हमारे एक पत्रकार साथी विमल कुमार ने फेसबुक पर एक कविता लिखी, उन्हीं की वॉल सेः

गजेन्द्र के लिए

वे सब के सब हत्यारे थे
क्योंकि वे सब देख रहे थे
ये दृश्य चुपचाप
लेकिन वे भाषण देने की कला में माहिर थे
दौड़ कर अस्पताल जाने में वे सबसे आगे थे
और उस से भी आगे थे
कैमरे से तस्वीरेंफटाफट खींचने में
फिर उसे चिल्ला चिल्लाकर बेचने में निष्णात

श्रद्धांजलि देने और शोक प्रस्ताव पारित करने में
वे बहुत पारंगत थे
इसलिए वे सब के सब हत्यारे थे
हत्या को आत्महत्या साबित करने में लगे थे

वे उस्तादों के उस्ताद थे
वे जानते थे चुनाव जीतने की कला
वे बेचने की कला में भी हुनरमंद थे

मुझे बस इस बात का खतरा है
कल वे हर साल जंतर मंतर पर
आत्महत्या दिवस मानाने की घोषणाभी न करदें
उस पेड़ के इर्द गिर्द कहीं कोई मंदिर न बना दें

वे हर चीज़ को लूटने में काबिल हैं
वे नए तरह के हत्यारें हैं
नयी तकनॉलजी से सुसज्जित

वे आत्महत्या की पैकेजिंग के भी उस्ताद हैं
वे हत्यारे थे
पर हत्या के मुकदमे के
चश्मदीद गवाह भी बन गए थे

लेकिन सबसे अधिक दुःख इस बात का है

इस हत्या के मुकदमे के वे जज भी बन गए थे
जबकि वे हत्यारे थे
और चिता को आग भी वही दे रहे थे .

गजेंद्र सिंह था कौन, कहां का रहने वाला था, चाहता क्या था? इन सवालों के उत्तर तो उसकी मौत के कुछ घंटे बाद ही मिल गए थे, पर उसकी निजी पहचान से बड़ी बात यह है कि वह भी हमारे-आप की ही तरह एक बेटा था, एक पिता था, एक पति था, एक भाई था, और इन सबसे उपर वह शख्स था, जो अपने हितों और अधिकारों को लेकर सचेत था, और जो कुछ करना चाहता था. गजेंद्र सिंह एक किसान ही नहीं, बल्कि एक हुनरमंद भी था. साफा बांधने के हुनर के लिए उसे राष्ट्रीय सम्मान भी मिला था. पर आखिर में हुआ क्या? इस व्यवस्था ने उसे मार डाला.

गजेंद्र सिंह की मौत उस संसद के एक किलोमीटर के दायरे में हुई, जिस पर इस देश का कानून बनाने से लेकर इस देश के लोगों की रक्षा करने और उन्हें जीवन-यापन के लिए बेहतर सुविधाएं मुहैया कराने की जिम्मेदारी है. गजेंद्र सिंह की मौत दिल्ली के उस मुख्यमंत्री के सामने हुई, जिसे लोगों ने लोकसभा चुनावों में सर्वशक्तिमान विजेता के रूप में उभरे भाजपा नेता और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उपर तरजीह देकर चुना था.

मैं बात अरविंद केजरीवाल की कर रहा. गजेंद्र सिंह की मौत की सबसे पहली ' नैतिक' जिम्मेदारी अगर किसी पर आनी है, तो वह शायद केजरीवाल जी ही होंगे, क्योंकि वह उन्हीं की रैली में, उन्हीं के सामने मरा, और फिर भी उनकी रैली चलती रही. अब भले ही वह खेद प्रकट कर चुके हैं कि 'रैली को स्थगित न करना हमारी गलती थी,' पर इससे पहले उन्हें यह तय करना था, कि गजेंद्र सिंह की जान ही न जाती तो कितना अच्छा  होता.

मेरे एक वरिष्ठ साथी पत्रकार मित्र आशुतोष, जो अब आम आदमी पार्टी के बड़े नेता हैं, ने कह दिया कि क्या तब मैं अरविंद केजरीवाल को कह देता कि पेड़ पर चढ़ कर गजेंद्र सिंह को बचाएं? आशुतोष भाई, अगर ऐसा हो भी जाता तो क्या बुरा था? अरविंद कल तक तो आम आदमी ही थे न? अभी भी तो उन्हीं के नाम पर सब कुछ कर रहे हैं. गांधी जी का नाम लेते अरविंद नहीं थकते. बापू  इनसान तो क्या, जानवरों तक के लिए ऐसी संवेदना रखते थे. अरविंद अगर अपने कोअ गांधी जी के समर्थक अन्ना हजारे का शिष्य कहते नहीं अघाते, तो अगर वे गजेंद्र को बचाने के लिए ऐसा कर भी देते तो क्या फर्क पड़ता? उनका कद बढ़ता ही, घटता तो नहीं, इतना आप भी जानते हो.

बहरहाल, ऐसा नहीं हुआ और देश की राजधानी दिल्ली में व्यवस्था को चिढ़ाते हुए गजेन्द्र सिंह ने मीडिया, पुलिस और राजनेताओं के सामने मौत को गले लगा लिया. इस घटनाक्रम का सबसे दुखद पहलू यह था कि आम आदमी पार्टी ने किसानों के लिए यह रैली बुलाई थी, लेकिन इस दर्दनाक वाकिये के बाद भी किसी भी आप नेता ने उसकी सुध नहीं ली. यह व्यक्ति राजस्थान के दौसा से सैकड़ों किलोमीटर दूर चलकर दिल्ली में अपना दर्द बयां करने आया था. पर उसे बयां करने का मौका नहीं मिला.

हालांकि बाद में आम आदमी पार्टी ने गजेंद्र सिंह के परिवार को 10 लाख रुपए का मुआवजा देने का ऐलान किया, पर उस दिन तो 'आप' नेता भाषण ही देते रहे और रैली की सफलता पर इठलाते रहे. भीड़ देख खुश होते रहे. आलम यह था कि शुरू में तो आम आदमी पार्टी ने इस मामले का राजनीतिकरण करने में भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. मंच से कहा गया कि रैली के बाद केजरीवाल और सिसोदिया अस्पताल जाएंगे, पर केजरीवाल के अस्पताल जाने से पहले ही युवक की जान जा चुकी थी.

सवाल यह उठता है कि आप की रैली बड़ी या किसान की जान! जिन किसानों के हित के लिए रैली का आयोजन किया गया था, उन्हीं का एक साथी, भाई, हमराही एक ओर दम तोड़ रहा था तो दूसरी ओर किसानों के जख्मों पर मरहम लगाने के नाम पर उस पर नमक छिड़का जा रहा था.  यहां बात केवल आम आदमी पार्टी की ही नहीं है, बल्कि इस घटना ने पूरी राजनीतिक बिरादरी को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है.

ऐसे में यह सवाल और भी लाजिमी है कि गजेंद्र सिंह की असामयिक मौत का असली जिम्मेदार किसे माना जाए? पर पहली बात तो हम यह सवाल पूछने वाले हैं कौन? और दूसरी बात हम जानते हैं कि इस सवाल का उत्तर जानने में हमारी सरकारों, पुलिस और नेताओं को कोई रुचि नहीं है. वैसे भी इस तरह के सवालों से जूझने के लिए उनको अपनी आत्मा की गहराइयों में झांकना होगा, जिससे ये लोग काफी पहले ही दूर हो चुके हैं. वैसे भी वे जितना ही इस सवाल की गहराई में उतरेंगे, उंगलियां उन्हीं की तरफ अपराधी होने का इशारा करती मिलेंगी, इसे भी वे लोग जानते हैं.

ऐसे में भला अपराधी होना कौन चाहेगा. कुछ दिनों का शोरशराबा, बाकी सब शांत. इसीलिए जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह कहा कि 'गजेंद्र की खुदकुशी से देश पीड़ा में है. किसानों को असहाय नहीं छोड़ा जाएगा. किसान खुद को अकेला न समझें. हम सब किसान का जीवन बेहतर बनाने के लिए एकजुट हैं. हमें ये देखना होगा कि पिछली और इस सरकार से क्या गलती हुई है. जो भी सुझाव आएंगे सरकार उसपर कदम उठाने को तैयार हैं.' तो लोगों को उन पर भरोसा नहीं जमा. सारी बातें खोखली हैं.

प्रधानमंत्री जी के कार्यालय में रोज सैकड़ों लोग बहुत उम्मीद से चिट्ठियां भेजते हैं. शुरू-शुरू में लोगों को इन चिट्ठियों की पावती की सूचना मिलती थीं, पर बाद में वे भी बंद हो गईं. उन पर कहीं कोई काररवाई हो रही हो, या उन चिट्ठियों की कोई मानिटरिंग हो ऐसा नहीं लगता. जब राजा के पास प्रजा के लिए फुरसत ही न हो, तो उसके पास विकल्प सीमित होते जाते हैं. इस देश के आम जनों, मजदूरों, किसानों का किसी से कोई विरोध नहीं. बड़े लोग और आगे बढ़ें, इससे भला किसी को क्या एतराज, पर छोटों को, मेहनतकशों को भी सम्मान के साथ जीने के लिए दो रोटी मिल सके , इससे भला किसी को क्या एतराज.
 
दुःख इस बात का है कि आम आदमी के मसले पर नेताओं के पास जबानी जुगाली से अलग कुछ और है ही नहीं. इस मसले पर सभी हमाम में नंगे हैं. यहां तक कि आम आदमी पार्टी भी. चाहे आप हो, भाजपा हो या कांग्रेस, नेता किसी भी पार्टी का हो उसकी कथनी और करनी में अंतर पहले कम था, पर अब साफ-साफ और अकसर देखा जाने लगा है. यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है. सवाल यह नहीं कि क्या नेताओं की आत्मा मर चुकी है? क्या उनमें मानवीय संवेदनाओं के लिए कोई जगह नहीं बची है? सवाल यह भी है कि हम जा कहां रहे हैं?

किसी शायर ने कभी लिखा थाः

उस पूरी व्यवस्था को ही आग लगा दो, जिसको किसी गरीब के आंसू का गम नहीं,
सिक्कों पे तौल देती जो अपने जमीर को, संसद भी किसी खास तवायफ से कम नहीं.

देश की नक्सल घटनाएं शायद ऐसी ही सोच का परिणाम हैं. पूरे देश के हालात बिगड़ें, इससे पहले ही हम चेत जाएं, तो सबके लिए बेहतर होगा. यही शायद गजेंद्र के लिए सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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