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इंटरनेट! कब तक आजाद?

इंटरनेट! कब तक आजाद? एक बड़ा सवाल यह है कि सूचना तकनीक के इस दौर में जब समूची दुनिया इंटरनेट की बदौलत आपकी अंगुलियों पर सिमट आई है, तब किसी दिन अगर आपसे यह सुविधा छिन जाए, या फिर इस सुविधा पर पहरे लग जाएं, तो आपका क्या होगा? कैसी प्रतिक्रिया होगी आपकी ? इनदिनों 'नेट न्यूट्रलिटी', मतलब 'इंटरनेट पर सबको/ सबका समान अधिकार', को लेकर जो बहस हो रही है, वह इस मीडियम की ताकत के साथ ही इस पर आने वाले खतरे की ओर भी इशारा कर रही है. वैसे तो किसानों के संकट के मद्देनजर यह कोई उतना बड़ा मसला नहीं है, और शायद इसीलिए आम आदमी सीधे तौर पर तकनीक से जुड़ी इस बहस में अभी शरीक नहीं हुआ है, पर यह मामला उसके भी कल से, तरक्की और अधिकारों से जुड़ा हुआ है. फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'डिजिटल इंडिया' का सपना तो इसके चलते दाव पर है ही.

इतना तो आप सबको पता है कि जैसे बल्ब, पंखा, कूलर, टेलीविजन, एयर कंडीशनर आदि को चलाने के लिए बिजली की जरूरत पड़ती है, और आज के दौर में हम इस कदर इसके आदी हो गए हैं कि इलेक्ट्रिसिटी के बिना आधुनिक तो क्या, सामान्य जीवन की कल्पना करना भी मुश्किल है, उसी तरह कंप्यूटर और इंटरेनेट ने अपने ईजाद के बाद से ही अपनी उपयोगिता के चलते समूची दुनिया को अपनी मुट्ठी में कर लिया है. आज के दौर में अगर इंटरनेट न हो, तो आपकी जिंदगी ही ठहर जाएगी.

अब उसी इंटरनेट की आप तक सीधी और अबाध पहुंच खतरे में है. 'नेट न्यूट्रलिटी', हो या न हो कि इस बहस का नतीजा सरकारी हस्तक्षेप के बाद अब चाहे जो निकले, पर आप पहले यह जान लें कि 'नेट न्यूट्रलिटी' का मतलब है क्या? 'नेट न्यूट्रलिटी' का सामान्य सा मतलब है, इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर की ओर से बिना भेदभाव के सभी वेबसाइट को एक समान सुविधा देना और इंटरनेट यूजर को उसकी मनचाही वेबसाइट पर बिना किसी बाधा के जाने की आजादी देना. यानी फोन लगने पर आप जिस तरह किसी भी नंबर पर कॉल कर सकते हैं, उसी तरह इंटरनेट प्लान लेने पर बिना किसी इंटरनेट डेटा भेदभाव के किसी भी वेब बेस्ड सर्विस तक पहुंच सकते हैं.

ठीक उसी तरह, जिस तरह एक बार बिजली का कनेक्शन लगा लेने के बाद यह आपके उपर होता है कि आप उसका यूज किस चीज को चलाने के लिए कर रहे हैं या उससे क्या-क्या चला रहे हैं. यह और बात है कि आप बिजली का जितना यूज करते हैं, उस हिसाब से पेमेंट करते हैं, ठीक वही व्यवस्था इंटरनेट में भी अब तक रही. पर पिछले दिनों देश में इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध कराने वाली चुनिंदा बड़ी कंपनियों में से एक एयरटेल ने ' एयरटेल जीरो' के नाम से कथित तौर पर 'फ्री इंटरनेट' नाम की एक सुविधा शुरू की.

भारती एयरटेल ने इस प्लान के तहत ग्राहक को कुछ विशेष साइटों के लिए मुफ्त इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध कराने का दावा किया. कंपनी का तर्क था कि ग्राहकों को यह पसंद आएगा, क्योंकि इसके जरिए वे कई एप्लिकेशन्स को बिना किसी डेटा चार्ज के ही इस्तेमाल कर सकेंगे. शुरुआत में यह सुविधा एयरटेल ने सामानों की खरीद-फरोख्त वाले कारोबार से जुड़ी कंपनी 'फ्लिप कार्ट' को मुहैया कराई, जिसके तहत यह व्यवस्था थी कि एयरटेल का कोई भी कस्टमर अगर 'फ्लिप कार्ट' की साइट को यूज करता है, या सामान खरीदता है, तो उसे उसके लिए इंटरनेट का किसी भी तरह का भुगतान नहीं करना होगा.

इंटरनेट की आजादी का मतलब है कि अगर आपने एक बार इंटरनेट कनेक्शन ले लिया, तो हर सेवा को एक जैसा दर्जा मिले. लेकिन अब कुछ टेलिकॉम कंपनियां 'फ्री इंटरनेट' के नाम पर इंटरनेट की आजादी को नए तरह से पेश करना चाहती हैं, जिसमें कुछ सेवाएं मुफ्त हो सकती हैं, तो कुछ के लिए अलग से पैसे भी देने पड़ सकते हैं. इतना ही नहीं कुछ सेवाओं के लिए ज्यादा स्पीड, तो कुछ के लिए कम स्पीड का अधिकार भी कंपनियां अपने पास रखना चाहती हैं. फिर इसमें फ्री इंटरनेट जैसा क्या है? एयरटेल के इस प्लान में ग्राहक केवल उसी वेबसाइट को ब्राउज या डाउनलोड कर सकेंगे, जो एयरटेल के साथ रजिस्टर्ड होंगी. ग्राहक के बदले में वह कंपनी एयरटेल को पेमेंट करेंगी, जिनकी वेबसाइट्स एयरटेल के साथ इस प्लान में रजिस्टर होंगी.

इस नीति के लागू होने से पहले, यानी अभी तक सुविधा यह है कि अगर आपके पास स्मार्ट फोन है और आपने उसमें इंटरनेट कनेक्शन ले रखा, तो आप जब भी व्हाट्सएप, फेसबुक, क्विकर, स्नैपडील, गूगल, यू-ट्यूब जैसी इंटरनेट सेवाओं या टाइम्स, आज तक या फेस एन फैक्ट्‍स जैसी न्यूज वेब साइटों का इस्तेमाल करते हैं और हर वेब साइट की स्पीड एक जैसी होती है. इसके लिए आपको अलग से पैसे नहीं देने पड़ते, जितना डेटा यूज होता है, उसका बिजली या टेलीफोन के बिल की तरह भुगतान कर देते हैं.

अगर 'नेट न्यट्रलिटी' को खत्म कर नई व्यवस्था लागू की जाती है, तो 'न्यूट्रलिटी ग्रुप' के मुताबिक फेसबुक, गूगल के लिए आपको अलग से  30-30 रुपए, व्हाट्सएप के लिए 75 रुपए, अमेजन के लिए 50 रुपए और न्यूज एप के लिए का 10 रुपए का बेसिक चार्ज देना होगा.  नई व्यवस्था प्री-पेड और पोस्ट पेड, दोनों कनेक्शन पर लागू होगी. अभी इंटरनेट की तमाम सर्विसेस के लिए एक ही पैक और प्लान मिलता है.

भारत सरकार की दिक्कत यह है कि उसे या तो कुछ पता नहीं या फिर सतही जानकारी है. और यह हाल तब है, जब अपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी इस मीडियम की ताकत को जानते हैं, उन्होंने इसका इस्तेमाल करके ही देश के युवा वर्ग को अपनी तरफ लुभाया था. इसी मीडियम का इस्तेमाल कर अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने दिल्ली के चुनावों में मोदी जी की पार्टी भाजपा को पटखनी दी थी. खुद प्रधानमंत्री के अनुसार सालों साल से उनका सुबह का पहला काम होता है अपने स्मार्ट फोन को चेक करना. भले ही इसके लिए उन्होंने केवल 5 से15 मिनट का समय तय किया है.

यहां इन उदाहरणों का आशय महज इतना है कि हमारे पाठक यह जान लें कि इस मीडियम की ताकत कितनी है.  दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद एक तरफ तो अपने को 'नेट न्यूट्रलिटी' का पक्षधर बताते हैं और तर्क देते हैं कि इंटरनेट इनसानी दिमाग का अब तक के सबसे उम्दा निर्माणों में से एक है, जो एक साथ अंतर्राष्ट्रीय और स्थानीय दोनों है. युवा वर्ग की हिस्सेदारी इस मीडियम में बहुत महत्त्वपूर्ण है, इसलिए उनके मत से इस माध्यम पर सबको समान अवसर मिलने चाहिए. कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी इस मसले पर संसद में चर्चा की नोटिस दी है.

अपने देश का यह हाल तब है, जब बिना इंटरनेट के सरकारी विभागों और मंत्रालयों में कोई हिल नहीं सकता. सरकार के कई मंत्रालय तो पेपरलेस होने की तरफ अग्रसर हैं. नई सरकार सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव है और उसके मंत्री क्या हमारे प्रधानमंत्री तक बड़ी- बड़ी बातें नेट पर ही कहते हैं.  नेट न्यूट्रलिटी होने से एक ही पैक लेकर आप इंटरनेट एक्सेस के साथ ही  डाउनलोड-अपलोड की सुविधा पा जाते हैं, जिससे हर तरह की सर्विस का इस्तेमाल आसान हो जाता है.

यही नहीं, समाज सेवी संस्थाएं, सरकारी विभाग, युवा, शिक्षाविद, डोक्टर्स जैसे प्रोफेशनल किसी भी विषय पर अलग-अलग ग्रुप के लोगों से एक साथ तेजगति से अपने विचार शेयर कर सकते हैं, आपस में बातचीत कर सकते हैं. अगर इन सेवाओं पर अलग से चार्ज लगने लगा तो ग्रुप में होने वाला यह संवाद खत्म हो जाएगा, क्योंकि कोई भी ज्यादा कीमत देकर संवाद करने को प्राथमिकता नहीं देगा.

फिर एक ही सेवा के लिए दो बार अलग से चार्ज देने का कोई अर्थ भी नहीं बनता. नेट न्यूट्रलिटी पर हो रही इस तेज बहस के लिए भी हमें ' इंटरनेट' का ही शुक्रगुजार होना चाहिए, जो सरकार तुरत-फुरत दबाव में आ गई, वरना बेचारी जनता, जब तक समझती है, लेट हो चुका होता. 'नेट न्यूट्रलिटी' को लेकर यह नहीं हो पाया, तो इसका श्रेय तो इस मीडियम को देना ही पड़ेगा. सरकारी नीतियों ने जल, जंगल, जमीन, आसमान और समंदर तो पहले ही बांट लिए हैं, अब हवाओं और तरंगों के बंटने की बारी है, आप सबके, हम सबके प्रयासों से अब यह न हो, सबको समान रूप से नेट पर सर्फिंग की छूट हो. आमीन!
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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