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इतने दिन बाद, यहां पर...

जय प्रकाश पांडेय , Mar 25, 2011, 10:52 am IST
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अजीब बात है, हिन्दी वाला होकर भी अपनी ज़बान में आप सबसे पूरे एक साल बाद मुखातिब हूँ। वह भी आन लाइन मीडिया में- क्यों और कैसे, की एक लंबी दास्तान है। विस्तार से फ़ुर्सत में फिर कभी, फिलहाल तो यही कि अब से ठीक एक साल पहले देश में पत्रिकाओं के सबसे बड़े कारोबारी 'दिल्ली प्रेस' में ' प्रकाशकीय संपादक ' की, प्रिंट मीडिया के लिहाज से काफ़ी मोटी पगार वाली नौकरी- सिद्धांत बघारने, पर दोहरा मापदंड अपनाने वाले ' लालाजी ' के दोमुहें बरताव के चलते एक झटके में छोड दी। यों कोई खास बड़ा मसला नहीं था, बात हिन्दी और अँग्रेज़ी विभागों के कर्मचारियों की तनख़्वाह में बढ़ते अंतर, संस्थान में सिद्धांतों की गिरावट और मालिकान से परे चाटुकारिता के अंदाज में नौकरी करने वाले रीढ़हीनों से थी।

लाला को गुरूर था कि वो मालिक हैं, और अपन थे कि उन्हें बेहतर इनसान, उम्दा संपादक, और मीडिया इंडस्ट्री का अगुआ मानने का मुग़ालता पाले बैठे थे। दिल्ली आने और 'दिल्ली प्रेस' से जुड़ने के बाद, एक ट्रेनी से सबसे बड़े संपादकीय पद तक का सफ़र, अपने सिद्धांतों से बगैर समझौता किए अगर मैं कर पाया, तो जाहिर है की मैं, पूरी तरह से ग़लत नहीं था। चाहे यह मेरी काबिलियत थी या लालाजी की चालाकी- संस्थान से हटने के दिन तक, मैनें इससे इतर उनमें कुछ पाया भी नहीं, और जिस दिन नज़र आया, मेरा रास्ता अलग था, बिना अपने कल की सोचे।

अपन ने 3000 रुपये महीने पर दिल्ली प्रेस में 1995-96 में नौकरी शुरू की थी। बनारसी आदमी, वह भी संगत, अपने जमाने के खुर्राट सिद्धांतवादी एस. अतिबल की. भाई लोगों से कई बातें सुनीं, उनमें से एक थी कि यहाँ तो लाला जो चाहता है, वही लिखना पड़ता है, अपन ने तय किया, लिखेंगे वही, जो मन करेगा, दूसरी कहानी थी, बाहर से किसी का फ़ोन नहीं आएगा, सोचा-कोई बंधुआ मज़दूरी तो है नहीं, देखते हैं कौन रोकता है? इसी तरह- वहाँ से निकले चाहे जितने पत्रकार हों, पर दिल्ली प्रेस में रहकर, पत्रकार होने की पहचान किसी की ना थी, साथ ही यह भी सुना की यहाँ तनख़्वाह बढ़ने का कोई नियम नहीं है, लालाजी की मर्ज़ी, कहने को मीडिया हाउस है, पर है, पूरी लाला की दुकान...अपन ने जयशंकर प्रसाद के ' गुंडा' कहानी की तरह गाँठ बाँधी, इनमें से एक भी बात को रहने नहीं देना है.इतना काम करना है, देखते हैं कि लाला की लालागिरी चलती है, या अपन का काम और मेहनत...   

लग गये जी-जान से, इतना काम किया, और मेहनत- कि एक-एक कर चीज़ें बदलती गईं- पत्रकारिता हलके में बिंदी- टीकुली वाली पत्रिकाओं को भी पहचाना जाने लगा, अश्लील समझी जाने वाली पत्रिका को भी तमाम सियासत दाँ संजीदगी से लेने लगे, धीरे-धीरे संस्थान और लालाजी के साथ-साथ अपन का कद भी बढ़ने लगा। संस्थान में अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर सहयोगियों के लिए ढेरों काम कराए. सरिता, गृहशोभा जैसी पत्रिकाओं के प्रभारी बेचारे कार्यकारी उप-संपादक तक नहीं बन पाते थे, नीचे वाले तो, प्रोडक्शन असिस्टेंट से ही, रिटायर समझो, 500 की तरक्की जिसे मिल गई, समझो राज मिल गया, सबकी तनख़्वाह एक बार ही नहीं, कई- कई बार, बाजार का- महेंगाई का-काम का हवाला देकर बढ़वाई, कहाँ बाथरूम जाने तक का टाइम नोट होता था, कहाँ- सब रिपोर्टिंग पर जाने लगे,रात में काम करने वाले संपादकीय स्टाफ को कन्वेंस मिलने लगा, कुछ कामकाज़ियों के पद में भी इज़ाफा हुआ, - कुल मिलाकर बयार ऐसी चली की सब कुछ बदल सा गया....और जब मुझे लगा की वाकई सब-कुछ प्रोफेशनल हो चुका है, तभी असलियत उजागर हो गई।

हुआ यों कि लालाजी को इस बीच अख़बार मालिकों के राजनीति की लत लग गई- पहले तो उन्होंने अपने लेवल से अपनी जगह बनाई, और हरमुसजी एन कामा के गुट में शामिल होकर आई. एन. एस. के डिप्टी प्रेसीडेंट तक बने, पर बाद की खटपट में इनका आगे  बढ़ना रुक गया। उन्होंने अपने स्तर से प्रयास करने की सोची, और लोगों से वोट ( प्रोक्सी ) जुटाने के काम पर लगा दिया। दिन-रात लगे, देश का कोना- कोना छाना, पर लालाजी नहीं जीते, हाँ इतना ज़रूर हुआ की इस भाग-दौड़ के बीच लालाजी को भारतीय भाषाई समाचार संगठन की अध्यक्षी मिल गई। तब से जनाब काबिज हैं, संगठन भले ही तार-तार हो गया। इस बीच पत्रिकाओं की बिक्री तो घटी ही, एडवर्टीज़मेंट के रेट भी गिरे...ये सब कुछ संभालने के चक्कर में, कमान नये मुंसिफ के हाथ सौंपने की तैयारी शुरू हुई।

नये नौजवान मुंसिफ कि हिन्दी की समझ इतनी, क़ि- जहाँ ना पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि- लिखने पर जानना चाहा था, ये रवि कौन है, और उससे हमारी पत्रिकाओं का क्या लेना-देना। बहरहाल, नये मुंसिफ की नज़र में- काबिलियत का मतलब अँग्रेज़ी की गीटपिट थी। लिहाजा, जिस संस्थान में-पत्रिकाओं के संपादकीय प्रभारी ( मेरे अलावा) तक का उप-संपादक पद तक पहुचना बड़ी बात थी, वहाँ नये मुंसिफ के अँग्रेज़ी महकमे में कोई सहायक संपादक से नीचे था ही नहीं, जितनी लालाजी के बड़े-बड़े पहलवानों की तनख़्वाह, उतने का तो इनक्रीमेंट नये मुंसिफ अपना कान खुजाने वाले सींकिए कनखजुरों को दे देते। मामला यहीं तक रहता ,तो गनीमत थी, नये मुंसिफ के निजाम में टेक्स की चोरियाँ भी होने लगीं। कुछ लोगों को 10 का इनक्रीमेंट तो उसमे से 3 सरकार का- और कुछ को 10 का 10 फ्री- यानि कागज पर कुछ और, रजिस्टर पर कुछ और, सरकार के यहाँ कुछ और, कर्मचारी को कुछ और.... 

आख़िर लालाजी से बात की, बताया की ये सब ग़लत है, एक ही संस्थान में दो नियम क्यों? कर्मचारी- कर्मचारी के बीच में ये भेद-भाव क्यों? आख़िर अँग्रेज़ी की टीम में किस शेक्सपियर को रखा है, जो हिन्दी वालों को इतना कमतर समझ रहे- लालाजी भाव खा गये- जानना- समझाना चाहा, देश- दुनिया की उँचनीच समझाया, बताया कि अपने- आप से मतलब रखो, पर अपन के वश में अगर ऐसा कर पाना होता, तो ज़रूर करता। अपन ने सिविल सर्विसेज का ओप्शन छोड कर पत्रकारिता इस लिए नहीं चुनी थी कि- पैसे और तनख़्वाह के लिए मूल्यों से समझौता कर लूँ. झुकना होता तो पहला समझौता अपने घर में करता , दिल्ली आता ही क्यों...? मन में सवाल ही सवाल थे, और जवाब- लालाजी के अलावा किसी के पास नहीं।

लालाजी अपने लेखों में मूल्यों की बात करते हैं, मुझसे निजी बातचीत में भी कभी उन्होंने सिद्धांतों से इतर बात नहीं की। पर हक़ीकत...14 साल की 24 घंटे की नौकरी के बाद भी,  अपनी नज़र में उन्होंने तनख़्वाह चाहे जितनी दे डाली हो, बैंक के खाते में अपन के पास 1 लाख रुपये भी नहीं थे। पत्रकार होकर भी, अपन ना दारू पीते ना ही दलाली करते, कोई दूसरा धंधा भी नहीं कर सकते थे, जिस पद तक पहुँचे थे, और लालाजी की नौकरी के बाद जो अनुभव था, उसमें अलग से कुछ होता नहीं. सो, भविष्य के इस माध्यम में आ गये। अँग्रेज़ी की वकत का जो अनुभव 'दिल्ली प्रेस' में कराया गया था, अपन ने उसी पर दाव खेला। कुछ खास दोस्तों, शुभचिंतकों ने मदद की....और 'फेस एन फैक्ट्स' पहले अँग्रेज़ी में सामने आया।

आप सबके सहयोग से,' फेस एन फैक्ट्स' ने अँग्रेज़ी में एक स्तरीय मुकाम हासिल कर लिया है। अपनी पोज़िशन तमाम धुरंधरों से बेहतर है, जिसमें इंडिया टुडे भी शामिल है। पर अभी लंबा मुकाम बाकी है। उम्मीद है हिन्दी आन-लाइन मीडियम में भी आप सबका प्यार वैसे ही मिलता रहेगा, जैसे प्रिंट में मिलता रहा।

आख़िर में, एक बात और- इतने लंबे अंतराल के बाद निजी अनुभवों से शुरुआत करने के लिए क्षमा चाहूँगा, देश और दुनिया भर की बातों के साथ ही जल्द ही।

जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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