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प्रधानमंत्री जी! सच का सामना करिए

प्रधानमंत्री जी! सच का सामना करिए 64 साल के अपने 'युवा' नरेंद्र मोदी जी को प्रधानमंत्री बने तकरीबन साल भर होने को आए हैं. इस बीच सत्ता, कारोबार, उनकी खुद की पार्टी भाजपा, पूंजीपति जगत और दुनिया भर में 'बाजार' को प्रमुख मानने वाले देशों के बीच उनकी धाक निश्चित रूप से बढ़ी है, पर उस नेता के रूप में नहीं- जो अपने देश में सकारात्मक बदलाव की दिशा में काम कर रहा हो, उस नेता के रूप में नहीं- जिसका मकसद केवल जन कल्याण हो, उस नेता के रूप में नहीं- जो जनहितैषी हो, उस नेता के रूप में नहीं- जिसका मकसद समाज के आखिरी व्यक्ति तक तरक्की, खुशहाली और आजादी की वह रोशनी पहुंचाना हो, जिसका सपना इस देश की शासन व्यवस्था के संचालन के लिए 'संसदीय प्रणाली' को चुनते समय हमारे 'प्रजातंत्र' के पहरूए संविधान निर्माताओं ने देखा था. जरा सोचिए, अगर हमारे संविधान निर्माताओं ने यह व्यवस्था नहीं अपनाई होती, तो भाई नरेंद्र दामोदर दास मोदी जी कहां होते?

इसीलिए कायदे से आजादी के बाद पैदा होने वाले पहले प्रधानमंत्री के रूप में मोदी जी पर सबसे बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिए थी- इस देश के आम आदमी की. यहां मैं अरविंद केजरीवाल वाले आम आदमी की बात नहीं कर रहा. हमारी, आपकी, हम जैसे उन लोगों की बात कर रहा, जिनकी, जिन जैसों की मेहनत से यह देश बन और चल रहा है. हां, तो कायदे से प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी जी की पहली और आखिरी प्राथमिकता यह 'राष्ट्र' और उसमें रहने वाला वह आदमी होना चाहिए था, जिसने बदलाव के प्रतीक के रूप में कांग्रेस को हटा कर एक बड़ी उम्मीद के रूप में उन्हें चुना था. पर अफसोस ऐसा हुआ नहीं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'अच्छे दिन' आएंगे का सपना आम लोगों के लिए अभी भी सपना ही है, हां बड़े लोगों, बड़े कारोबारियों और विदेशियों के लिए जरूर अच्छे दिन आ गए. यह और बात है कि प्रधानमंत्री और उनकी टीम जमीनी हकीकत से बेखबर अब भी कागजी योजनाओं और बड़े प्रचार माध्यमों के सहारे तमाम बड़े वादे और दावे कर रही है, पर देश के हालात और जनता का मूड कुछ और ही कह रहा.

मैं यहां अवसरवादियों और चाटुकारों द्वारा भाड़े पर जुटाई गई भीड़ के नारों, नजरियों और सोशल मीडिया फोरमों पर उनके द्वारा बनाए गए फर्जी माहौल की बात नहीं कर रहा, वह सच्चाई बयान कर रहा, जो आम जनता को गहराई से महसूस हो रही है. वरना चाटुकारों और समर्थकों का यह मजमा तो तमाम बुरे हालातों के बावजूद मायावती और लालू प्रसाद भी लगवा लेते हैं. सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव, नीतीश कुमार और राम विलास पासवान की बात तो जाने ही दीजिए, इनके पास तो कहीं न कहीं, सत्ता भी है, और लोग तो हैं ही.

...तो क्या भाजपा, अमित शाह और मोदी जी भी इसी कतार में लगने को तैयार हैं? क्या इस दिन के लिए आरएसएस भी तैयार है? क्या इन्हीं दिनों के लिए आम चुनावों में संघ ने मोदी को जिताने के लिए अपनी अब तक की साख, संगठन, रणनीति और पूरी ताकत लगा दी थी? अपनी बात के पक्ष में हम ज्यादा पीछे नहीं जाते.

प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी के एकदम ताजा और किसी भी भारतीय मीडिया को दिए गए उनके पहले इंटरव्यू से ही बात शुरू करते हैं, जो उन्होंने एक अंग्रेजी अखबार को फ्रांस, जर्मनी और कनाडा की अपनी वर्तमान यात्रा से ठीक एक दिन पहले दिया है. अपने इंटरव्यू में मोदी ने फिर से चुनावी रैलियों वाले अंदाज में बड़े- बड़े जुमले इस्तेमाल किए हैं. उदाहरण के लिए, कारोबारी जगत की जमीनी हकीकत बहुत ज्यादा न बदलने की हालिया शिकायत पर पीएम ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि 'सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का लाभ उठाने के लिए उद्योग जगत को खुद आगे आना होगा.' उन्होंने दावा किया कि 'यहां यह समझने की जरूरत है कि मेरी सरकार आम आदमी के लिए काम कर रही है. हमारा काम नीतियों के आधार पर काम करने वाली सरकार चलाना है. देश में लालफीताशाही नहीं होनी चाहिए से मेरा मतलब है कि मुकेश अंबानी के लिए लालफीताशाही न हो और आम आदमी के लिए लालफीताशाही हो, ऐसा नहीं चल सकता.'

बात तो ठीक है प्रधानमंत्री जी! पर आम आदमी से मुकेश अंबानी की क्या तुलना? आम आदमी की जरूरतें उसके रोजमर्रा के कामों से जुड़ी है, जबकि मुकेश अंबानी और उन जैसे दूसरे उद्योगपतियों को शिकायत अपने करोड़ों, अरबों के साम्राज्य को लेकर है, जिनके मुकाबले में आप द्वारा संरक्षित और आपकी छत्रछाया में पल बढ़ रहे अडानी जी दिनदूना रात चौगुना की गति से फलफूल रहे, जबकि अंबानी या अंबानी जैसे दूसरों को वह सुअवसर उस रूप में हासिल नहीं हो रहा. अगर यही स्पीड रही तो आपका कार्यकाल पूरा होते-होते अंबानी- अडानी बराबर की हैसियत में होंगे. भले ही यह संयोग हो, पर यह भी सच्चाई है कि अंबानी की सबसे अमीर भारतीय की हैसियत आपके राज में ही छिनी. रही आम आदमी के लिए लालफीताशाही की बात, तो वह बदस्तूर कायम है.

एक छोटा सा उदाहरण देते हैं. अमेरिकी कंपनी याहू के प्रभाव में भारत सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय ने 2010 में ऑन लाइन मीडिया पर प्रचार करने के लिए एक पायलट पालिसी बनाई थी, महज 3 महीनों के लिए. पालिसी 'पायलट' होने के बावजूद एक तरफा थी, लिहाजा मध्यम और छोटे मीडिया समूहों ने एतराज किया. इसके बावजूद कांग्रेस राज में 13 बार और आपके राज में भी अब तक 4 बार बड़े और विदेशी कारोबारी घरानों को लाभ पहुंचाने वाली वह पालिसी जस की तस बरकरार है और लगातार एक्टेंशन पा रही है, वह भी संबंधित मंत्रालय से लेकर खुद आपको, प्रधानमंत्री कार्यालय को तमाम लिखापढ़ी के बावजूद. नतीजा, सैकड़ों मझोले और छोटे भारतीय मीडिया कारोबारियों के सामने भूखमरी की नौबत है.

आपका तर्क है कि 'सरकार को लेकर उद्योग जगत की राय के बारे में मीडिया उन दोनों बातों को जनता के सामने रखे, एक जो कांग्रेस के मेरे मित्र आरोप लगाते हैं और दूसरी जो कारोबारी जगत की सरकार के बारे में राय है. कांग्रेस कहती है कि यह उद्योगपतियों की सरकार है और उद्योगपति कहते हैं कि हमने उनके लिए कुछ नहीं किया.' बात तो सही है प्रधानमंत्री जी! पर एक बात तो बताइए जरा, आपकी इस बात को बड़े घरानों के प्रभुत्व वाला मीडिया समूह क्यों सामने रखेगा?... और छोटों को आपकी नीतियां पनपने नहीं दे रहीं हैं?

सच बताइए कि फिर आपके राज में भी किसे है राहत? अपने इंटरव्यू में जब आप खुद भी स्वीकार रहे हो कि 'निजी क्षेत्र अभी भी शासन के परंपरागत मामले से चिपका हुआ था, इसमें कर आतंकवाद, गैर तर्कसंगत शुल्क और खास छूट शामिल है. पर आपकी सरकार ने आम बजट में इनमें से कई मुद्दों पर ध्यान देकर उनमें सुधार किया है, क्योंकि आपकी सरकार यह जानती है कि लाखों भारतीयों के लिए नौकरी और अवसर पैदा करने के लिए ऐसे कदम आवश्यक हैं.'

प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि 'मैं सभी को भरोसा देता हूं कि अगर आप एक कदम आगे बढ़ेंगे, तो हम आपके लिए दो कदम आगे बढ़ेंगे.' पर यह सच तो आप भी जानते हैं प्रधानमंत्री जी कि आप तक संवाद एक तरफा है? आप प्रभू हैं, आप जो कहेंगे जनता को सुनना ही होगा? पर अगर वह चाहे भी तो आप तक पहुंच नहीं सकती.

आप ही बता दो, आप तक आम जन पहुंचे कैसे? अगर वह चिट्‍ठी लिखता है, तो उस पर सुनवाई होती नहीं, और अगर वह आपके दरवाजे तक पहुंच कर फरियाद करना चाहे भी, तो वहां पहुंच नहीं पाएगा. यहां तक कि उसकी आवाज भी आप तक पहुंच नहीं सकती, क्योंकि बड़े घरानों के प्रभुत्व वाले बाजारू हो चुके मीडिया के लिए उसका कोई अस्तित्व बचा ही नहीं है, जैसे कि अफसरानों के लिए भी उसका कोई वजूद नहीं.

अगर ऐसा नहीं है तो 'इंडियन डिजिटल न्यूज मीडिया एसोसिएशन' की बात आपने अब तक क्यों नहीं सुनी? वह भी तमाम चिट्ठियों के बावजूद? आपके सभी मंत्रियों और संबंधित अफसरों तक तमाम लिखापढ़ी के बावजूद? प्रधानमंत्री जी क्या आप यह बता सकते हैं कि आपके राज में भी मध्यम कद वाले भारतीय मीडिया घराने क्यों डूब रहे हैं? पत्रकारों की एक बड़ी जमात बेरोजगार क्यों हो रही? क्या वजह है कि पत्रकार अगर दलाल न हो तो उसके लिए दो वक्त की रोटी कमाना मुश्किल है, कि प्रकाशन व्यवसाय केवल चिट फंडियों, बिल्डरों और बड़े घरानों के वश का धंधा रह गया है, कि ऑन लाइन मीडिया ने इस माहौल से हताश और बेरोजगार हुई एक बड़ी जमात के सामने, जो अवसर खोला था, उस पर पाबंदी लगाने की जो कोशिश कांग्रेस राज में अफसरों ने की थी, वही आपके राज में भी बदस्तूर क्यों जारी है?

किसानों, मजदूरों और मजलूमों की बात तो जाने ही दीजिए, इनकी आत्महत्या की खबरें अब इतनी आम हो चुकी हैं, जैसे रोजमर्रा का हिस्सा हों, और जो बचे हैं, एक तरह से वह सब भगवान भरोसे ही जी रहे हैं. आपके राज का कोई प्रत्यक्ष लाभ इनमें से किसी को मिलता दिखाई तो नहीं देता. बावजूद इसके कि आपके राज में पुरानी योजनाएं ही नए नामों से सामने आ रही हैं, आप का 'स्वच्छ भारत' अभियान लाखों करोड़ के बजट के बाद भी कहीं एक भी शहर या मोहल्ला तक साफ नहीं कर/ करा सका है, फिर भी आप हैं कि उसे एक उपलब्धि बताते नहीं अघा रहे.

यह ठीक है कि विदेश संबंध के मोरचे पर आपकी सरकार ठीकठाक काम कर रही, पर इसका श्रेय सुषमा स्वराज के खाते में भी जाना चाहिए न कि केवल आपके? जबकि आप के विदेशी दौरों का आलम यह है कि आप देश से ज्यादा परदेस में रहना पसंद कर रहे हैं. हाल के विदेशी दौरे पर भी आपने सकारात्मक परिणामों की उम्मीद जताई है और तर्क दिया है कि 'हमारी विकास प्रक्रिया और वृद्धि से कनाडा, जर्मनी और फ्रांस, जहां आप जा रहे, का गहरा संबंध है. कनाडा हाइड्रोकार्बन और अन्य प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न है. जर्मनी मैन्यूफैक्चरिंग और कौशल विकास की पहचान है और फ्रांस एक भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार है.'

प्रधानमंत्री जी आपका तर्क है कि अपने आधिकारिक दौरे में आप एक साथ कई देशों की यात्रा करना पसंद करते हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लाभ हासिल किया जा सके. आपके ही शब्दों में, 'मैं अहमदाबाद का रहने वाला हूं, जहां एक पंथ-दो काज की कहावत काफी प्रचलित है.' सुनने में बात ठीक लगती है, पर जब घर के हालात ही खराब हों, घर में ही दीया जलाने को तेल न हो, तो फिर मंदिर के दीयों की कौन सोचे?

विदेशी रिश्तों का असर होने और दिखने में सालों लगते हैं. फिर दूसरे देशों के अपने-अपने इंटरेस्ट हैं. पाकिस्तान, चीन आपकी तमाम कोशिशों के बावजूद व्यवसाय करने और भारतीय रुपया लूटने के लिए तो तैयार हैं, पर सीमा मसलों और शांति कायम करने की बातों पर उनके तेवर बार्डर पर तैनात हमारे जवानों से पूछिए.

इसी तरह प्रधानमंत्री जी! आप जब संपन्न वर्ग को एलपीजी सब्सिडी छोड़ने की सलाह के साथ यह तर्क देते हैं कि 'यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह गरीबों पर ध्यान दे. सब्सिडी का मसला सिर्फ आर्थिक ही नहीं बल्कि मानवीय भी है. हमारे देश की संस्कृति देने की रही है, न कि दूसरों से जुड़ी वस्तुओं को बटोरने की,' तो सुनने में काफी अच्छा लगता है, पर हकीकत यह है कि दिल्ली जैसे शहर में तीन-तीन महीनों से लोगों को सब्सिडी का पैसा नहीं मिला है, जिसके बारे में जवाब देने वाला कोई नहीं. फिर इस देश में ऐसे भी गांव हैं, जहां के लोग मीलों पैदल चलकर पहले पूरा पैसा देकर सिलिंडर लेते हैं, फिर अपने ही पैसों की वापसी के लिए बैंक के चक्कर लगाते हैं.

प्रधानमंत्री जी! छोटे लोगों की जरूरतें भी छोटी होती हैं और वह संतुष्ट भी बहुत कम में हो जाते हैं. बड़े लोगों के लिए आप जो भी करना चाहते हैं करिए, पर छोटों को भूलिए मत...और यह भी मत भूलिए कि जब किसान अनचाही बारिश और ओलों से अपनी फसल की तबाही का रोना रो रहा था, तब आप विदेशी मामलों या फिर उद्योगपतियों, या फिर अपनी योजनाओं और पार्टी मसलों में व्यस्त थे, जबकि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी राज्य-राज्य पहुंच कर उनके दुःखों में शिरकत कर रही थी...और उम्मीद है आप इतना तो जानते ही होंगे कि प्रजातंत्र तो क्या, राजतंत्र में भी जनता के बीच होने और उनके दुःखों में शिरकत करने के क्या अर्थ होते हैं.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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