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नेताओं पर संकट विश्वसनीयता का!

जय प्रकाश पाण्डेय , Apr 08, 2015, 3:51 am IST
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नेताओं पर संकट विश्वसनीयता का! देश की राजधानी दिल्ली में फिलहाल घोषणाओं का मौसम है. वादों, उद्घाटनों और बड़बोलेपन के दौर ने सियासी पारे को अच्छा-खासा उपर चढ़ा दिया है. यह अलग बात है कि प्रकृति अभी दिल्लीवासियों पर मेहरबान है और यहां का मौसम खुशगवार है. आसमान बादलों से घिरा हुआ है और हवाएं सर्द हैं. पर दिल्ली वालों के साथ मौसम की यह मस्ती बहुत कम समय के लिए रहने वाली है. उन्हें यह पता है सियासत और मौसम के इस 'कारोबार' में उनकी चाहतों का कोई खास मोल नहीं, कि महंगाई से उन्हें राहत नहीं मिलने जा रही, कि सियासी सुकून का पता नहीं? रहा मौसम तो यह भी 'नेताओं' के सुनहले सब्जबाग की तरह केवल बहका रहा है. मौसम विभाग की मानें तो 'पश्चिमी डिस्टर्बेंस' की वजह से यह खुशगवार है, वरना तो गरमी दरवाजे पर है.

....और गरमी का मतलब, यहां के लोगों को देश के दूसरे हिस्से के लोगों से शायद ज्यादा ही पता है. क्योंकि यहां मौसम का 'पारा' कभी-कभार तो महज कुछ ही घंटों के भीतर दहाई से ज्यादा की ऊंची उड़ान भर पसीने निकाल देता है या फिर इतनी तेजी से नीची छलांग लगाता है कि कंपकंपी निकल आती है. पर मौसम और जनता के मिजाज का दिल्ली पर काबिज 'प्रभू वर्ग' पर कोई खास असर नहीं होता. वजह साफ है कि चारों तरफ से पहाड़ और रेगिस्तान से घिरी अरावली की पहाड़ियों पर जब सूरज तपता है, तो राहत के फव्वारे केवल 'रायसिना हिल्स' में सत्ता और धन पर कब्जा जमाए केंद्रों तक सिमट जाता है!

पर ऐसा क्यों होता है? मौसम तो प्रकृति का हिस्सा है, और बदलाव इसकी नियति! पर नेता? वह क्यों बदलता है? विकास और राहत के बड़े-बड़े वादे और दावे सत्ता पाते ही हवा क्यों हो जाते हैं? 'सियासत' नेतृत्व वर्ग के लिए केवल सत्ता पाने की सीढ़ी भर क्यों रह जाती है? यह सवाल हर रोज लोगों को मथ रहा है. लोग! मतलब हमारे आप जैसे लोग! जो मध्य वर्ग का हिस्सा हैं.

मध्य वर्ग, मतलब नौकरी पेशा और आम लोग. इनमें व्यापारी, छात्र, शिक्षक, डॉक्टर, पत्रकार, वकील, सारा मेहनतकश वर्ग शामिल है. वह वर्ग जो अपनी मेहनत से न केवल अपने घर, परिवार की देखभाल करता है, बल्कि उसकी मेहनत और दिमाग से इंडस्ट्री, व्यापार, सरकार सब चलते हैं. इतना ही नहीं, जो अपनी गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा टैक्सों की शक्ल में देकर इस देश के तरक्की की इबारत लिखता है.

यही 'लोग', ऐसे ही 'लोग' आजकल बेहद कन्फ्यूज हैं. हताश, उदास और निराश भी. कहते हैं दिल्ली देश का दिल है. सैकड़ों सालों से दिल्ली का मिजाज यह बतलाता रहा है कि इस देश के लोग आखिर चाहते क्या हैं? कि यह देश जा कहां रहा? आजादी के दिनों में भी और उसके बाद के दिनों में भी दिल्ली की यही ताकत उसे देश के दूसरे शहरों से अलग करती है. उसी दिल्ली के लोग फिलहाल निराश हैं. ये लोग पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से निराश हुए, और बाद में ये संभलते कि अरविंद केजरीवाल ने झटका दे दिया. बेचारे सियासी सर्कस से घबराए हुए लोग कुछ समझते कि मुलायम सिंह की अगुआई में पुराने समाजवादी एक झंडे के नीचे ताल ठोंक कर लोगों को गुमराह करने को तैयार हैं.

शायद इसीलिए भाजपा अपने पूरे तामझाम के साथ खुशगवार मौसम वाले शहर बैंगलुरू चली गई है. पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सिपहसालार अमित शाह के काम करने की शैली से चाटुकारों और अवसर पा चुके लोगों के अलावा कौन खुश है? आम भाजपाई से पूछ लीजिए, कैडर का क्या हाल है? संघ जिसकी बदौलत भाजपा आज सत्ता में है, अगर नाराज न होता, तो अमित शाह की क्लास नहीं लगती. लाल कृष्ण आडवाणी की नाराजगी किसी से छिपी नहीं है. जब घर के बड़े और छोटे ही खुश नहीं हैं, तो बाहर के लोगों का हाल समझ लीजिए. दिल्ली के कारोबारी हलके में अडानी जी और उनकी कंपनी का नाम उससे ज्यादा तेजी से चढ़ रहा है, जितनी तेजी से गुजरात में कभी चढ़ा था. पर भाजपा की बातें उनकी कार्यकारिणी की बैठक के नतीजों और उसके नेताओं पर उसका असर देखने के बाद करेंगे.

फिलहाल आते हैं आम आदमी पार्टी पर. जो बुरे कारणों से इनदिनों खूब चर्चा में है. आम आदमी पार्टी में घमासान है कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा. सत्ता पाने के बाद 'जन सेवा' की बजाय केजरीवाल को तानाशाह बनने की बीमारी लग गई. लोकतंत्र, भ्रष्टाचार और भाईभतीजावाद के नाम पर बनी पार्टी में ही बोलने की आजादी गायब है. वहां वही नेता है जिसे केजरीवाल और उनकी चाटुकार चौकड़ी चाहे. अरे भाई लोकसभा चुनावों की जमानत जब्ती वाली हार क्या दिल्ली भर की सत्ता पाते ही भूल गए.

'आप' और अरविंद केजरीवाल के पास इस बात का क्या जवाब है कि जब वह सभी पार्टियों को सूचना के अधिकार के तहत लाने की मांग करते रहे हैं तो फिर खुद उनकी अपनी पार्टी अभी तक सूचना के अधिकार के अंदर क्यों नहीं आई? पार्टी की इमेज जितनी योगेंद्र यादव या प्रशांत भूषण के सवालों से नहीं हुई उससे ज्यादा जनता का भरोसा तोड़ा अरविंद केजरीवाल ने, वह भी अपने व्यवहार और अहम के चलते.

आप का अभी पुराण खत्म भी नहीं हुआ है कि सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव मैदान में उतर पड़े हैं. वह जिस तेजी से सियासी खम ठोंक रहे हैं, उसके पीछे सोच यह है कि अगर पहले ये लोग बिहार को भगवा प्रभामंडल और मोदी के प्रभाव से बचा लेंगे, तो शायद यूपी भी भाजपा की गोद में जाने से बच जाएगा. पर ये नेता यह नहीं समझ पा रहे हैं कि केवल अवसर होने से कोई पार्टी एक बड़ी ताकत के रूप में नहीं उभर सकती, उसके लिए संगठन और विचारधारा आवश्यक है. आखिर कोई इनकी बात क्यों सुनेगा? जब खुद मोदी और केजरीवाल जैसे लोगों की कलई खुल चुकी है, तो उनकी तुलना में  मुलायम, नीतीश, लालू और गौड़ा का पूरा गुट ही उन अवसरवादियों की जमात सा है, जो अपने परिवार या फिर जाति से आगे बढ़ कर नहीं सोचते.

इन सब बातों के बीच एक बात साफ है कि दिल्ली के गलियारों में नेताओं को लेकर जनता में  पनप रही नाराजगी और नाउम्मीदी इन सबके लिए एक चेतावनी सी है, जिसे वे जितनी जल्दी पढ़ लें और जितना जल्दी समझ जाएं उनका भला होगा. क्योंकि नाउम्मीदी से भरे ये आम लोग, जिनमें मध्य वर्ग का एक बड़ा हिस्सा शामिल है, सत्ता, प्रभुता, सियासी पार्टियां और उसके नेतृत्व, यहां तक की हर उस बड़े नेता से इस कदर निराश है कि अचरज होता है कि अगर हताशा-निराशा और अविश्वास का यही भाव बना रहा, तो आने वाले कल में क्या होगा इन नेताओं का, दलों का, देश का और अंततः उस आम जनता का? जिसने न जाने कितने अरमानों से कई तथाकथित महान 'नेताओं' को अपने ऊपर शासन करने के लिए चुना था.

आखिर लोग 'नेता' या दूसरे शब्दों में कहें तो 'बहुरूपिया' बन चुके ऐसे सत्ताखोरों से कैसे निबटे? यहां सवाल यह भी है कि आखिर हर तरह के प्रयासों, प्रयोगों और भरोसे के बाद भी जनता ही आखिर बार-बार छली क्यों जा रही है? आखिर वह हाशिए पर क्यों है? क्या हर बार वह इंतजार करे 5 साल? मुझे लगता है कि अगर आम जनता के पास 'राइट टू रिकॉल' होता तो शायद अभी ही मोदी, केजरीवाल को अपनी गद्दी बचाने के लाले पड़ जाते.

नेतृत्व वर्ग यह क्यों भूल जाता है कि कल तक वह भी इसी जमात का हिस्सा था? और यह भी कि कितना भी संचय कर लो 'धन' को तो यहीं रह जाना है. अहंकार, मान अभिमान, धन, संपदा, वैभव...सब यहीं रह जाने हैं, और सत्ता? कभी किसी कि हुई है क्या? किसी के साथ रही है क्या? इन्हीं रायसिना की पहाड़ियों से पूरे देश पर कभी 10 साल तक हुकूमत करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक अदालत से आए सम्मन से सम्मान बचाने के लिए देश की सबसे बड़ी अदालत के सामने वकीलों की बैटरी के साथ उतरना पड़ा.  यानी यह दिन कल किसी के सामने आ सकता है. मोदी और केजरीवाल ने तो अभी शुरुआत की ही है, मुलायम का यह आखिरी दाव है. अगर ये अपनी साख और विश्वसनीयता बचा लेंगे, तो न केवल खुद बच जाएंगे, बल्कि इनकी पार्टी और अंततः देश भी बच जाएगा.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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