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आजाद हैं कि सुप्रीम कोर्ट है

जय प्रकाश पाण्डेय , Apr 02, 2015, 3:40 am IST
Keywords: SC judgement  IT act  Article 66A  Hindi article  Social Media  सोशल मीडिया  टाइम पास  आईटी एक्ट धारा 66 ए  सुप्रीम कोर्ट    
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आजाद हैं कि सुप्रीम कोर्ट है सोशल मीडिया है क्या? टाइम पास की जगह या गंभीर विचारों का फोरम? इस पर होना एडवांस होने की निशानी है, और न होना क्या गंवार होना है? या फिर हर वक्त इसके पीछे लगे होना अच्छी आदत है या बुरी, ऐसा होना चाहिए या नहीं? सोशल मीडिया की यह दुनिया कितनी रियल है या कितनी फतांसी? फिलहाल हमारी चर्चा का विषय यह नहीं. इसकी अच्छाइयों और बुराइयों पर हम फिर कभी बातें करेंगे.

यहां हमारा मकसद केवल उन हालातों पर चर्चा करना है, जिसकी वजह से देश की सबसे बड़ी अदालत ने एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला दे दिया, जो आगे के लिए नजीर बनेगा. हुआ यह कि 24 मार्च, 2015 को देश की सबसे बड़ी अदालत ने इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट 2000 की धारा 66 ए को इस आधार पर निरस्त कर दिया कि यह संविधान के मौलिक अधिकारों में शामिल धारा 19 (1) ए का उल्लंघन करती है, जिसके तहत भारतीय नागरिकों को बोलने, विश्वास और अभिव्यक्ति की संवैधानिक गारंटी हासिल है.

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे चेलामेश्वर और रोहिंटन नरीमन ने अपने आदेश में लिखा कि इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट 2000 की धारा 66 ए को पूरी तरह से रद्द किया जाता है. सरकार इस एक्ट का दुरुपयोग कर रही थी.  सुप्रीम कोर्ट का तर्क था कि आईटी एक्ट की यह धारा साफ तौर पर लोगों के जानने के अधिकार का उल्लंघन करती है, फिर यह कानून वैसे भी काफी अस्पष्ट है.

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले से पहले 16 मई, 2013 को भी इस बारे में व्यवस्था दी थी. तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आईटी एक्ट के तहत किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी आईजी या डीसीपी जैसे आला पुलिस अफसरों की मंजूरी के बाद ही की जानी चाहिए. तब धारा 66-ए के दुरुपयोग के खिलाफ अर्जियां मिलने पर सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्प्णी की थी. पर जब सरकारें नहीं चेतीं, तो सुप्रीम कोर्ट को कड़ा रूख अख्तियार करना पड़ा. हालांकि, मई, 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा के तहत किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी पर पूरी तरह रोक लगाने से  इनकार कर दिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताजा फैसले में कहा कि हालांकि सोशल मीडिया में आपत्तिजनक कमेंट करने पर आईपीसी की अन्य धाराओं के तहत कार्रवाई हो सकती है, लेकिन अब किसी भी हालत में सेक्शन 66 ए के तहत मामला नहीं चलाया जा सकेगा. जाहिर है विचारों की आजादी की दिशा में यह फैसला एक मजबूत कदम है.  इस धारा को निरस्त किए जाने से अब कमेंट करने पर तुंरत होने वाली गिरफ्तारियों पर फिलहाल तो रोक लग गई है, बावजूद इसके किसी भी नागरिक को बिना-सोचे समझे कुछ भी कमेंट करने की आजादी नहीं होगें, क्योंकि उसके खिलाफ अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है.

दरअसल सर्वोच्च न्यायालय ने इस मसले को बेहद मानवीय नजरिए से देखा. उसने इस मसले पर देश भर से उठे विवादों की समीक्षा की और यह पाया कि पहले जिन लोगों को अपनी बातों को कहने के लिए अवसर नहीं मिलते थे, फोरम नहीं था, उन सब के लिए सोशल मीडिया एक बड़ी जगह के रूप में सामने आया था, जिसने न केवल लोगों को प्रतिक्रिया देने के लिए प्रेरित किया, बल्कि उनकी बातों का समर्थन और विरोध करने के लिए एक बड़ा वर्ग भी मुहैया कराया.

आलम यह हुआ कि फेसबुक के लाइक और अनलाइक फीचर ने अभिव्यक्ति की इस आजादी को इतनी तीखी धार दे दी कि कई लोग तो आंखें खोलने के साथ ही फेसबुक या ट्वीटर पर होते हैं, और सोने से पहले भी एक बार स्टेटस चेक कर लेना उनकी दिनचर्या का  उसी तरह का हिस्सा है, जैसे भोजन करना. हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ऐसे लोगों में शामिल हैं. पर जब बात बड़े लोगों के खिलाफ होती है, तो मसला आम नहीं रह जाता. आर टी आई एक्ट की तर्ज पर ही अलग-अलग राज्यों की सरकारों ने इस मसले को अपने-अपने हिसाब से देखा.

सर्वोच्च न्यायालय की नजर में भी आईटी एक्ट की धारा 66ए का दुरुपयोग कोई नया नहीं था. यह पुलिस, नेताओं और नौकरशाहों के हाथ में एक ऐसा डंडा था, जिसका इस्तेमाल वह अपने खिलाफ होने वाले किसी भी कमेंट पर या खुन्नस निकालने के लिए करने लगे थे. हुआ यह कि साल 2012 में महाराष्ट्र के शेर बाला साहेब ठाकरे की अंतिम यात्रा को लेकर मुंबई के बंद होने के खिलाफ पालघर की शाहीन ढाडा नाम की एक लड़की ने कमेंट किया.  लड़की ने फेसबुक पर लिखा कि ' रोज हजारों लोग मरते हैं, फिर भी दुनिया अपनी गति से चलती रहती है. लेकिन अब जब कि एक नेता मरा है, वह भी अपनी प्राकृतिक मौत, तो हर कोई बौराया हुआ है... सम्मान अर्जित किया जाता है, न कि दबाव बनाकर लिया जाता है.'

किसी एक गंभीर मसले पर देश के किसी युवा के विचार की जगह शिव सेना ने इसे बाला साहेब ठाकरे के खिलाफ मान लिया था. अभी सेना की प्रतिक्रिया आती उससे पहले ही इस कमेंट को रीनू श्रीनिवासन नाम की लड़की ने लाइक करने के साथ ही कमेंट किया था कि हर कोई जानता है कि ऐसा केवल डर के चलते हुआ है. मैं मानती हूं कि उन्होंने कई अच्छी चीजें की थीं. हम भी उनका सम्मान करते हैं, पर इसका यह मतलब नहीं कि आप सब कुछ बंद करा दीजिए. सम्मान का इजहार किसी और तरह से भी किया जा सकता है. शिवसेना इसी कमेंट और पोस्ट पर नाराज हो गई और उसके दबाव में पुलिस ने धारा 66ए के तहत दोनों लड़कियों को गिरफ्तार कर लिया, जो लगभग 10 दिनों तक पुलिस कस्टडी में रहीं. गिरफ्तारी के कारण रीनू की इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी एक साल तक प्रभावित हुई थी.

अपने परिवार में लॉ की पढ़ाई करने वाली 5 वीं पीढ़ी की नुमाइंदगी करने वाली दिल्ली की 24 साल की कानून की छात्रा श्रेया सिंघल, ने अपनी मां के कहने पर इस धारा के तहत हुई दोनों लड़कियों की गिरफ्तारी को जनहित याचिका दायर कर चैलेंज कर दिया. बावजूद इसके पुलिस इस धारा के गलत इस्तेमाल की मिसाल कायम करती रही.  पुलिस ने राजनीतिक हस्तियों पर कमेंट करने पर इस कानून के तहत दर्जनों सोशल साइट यूजर्स की गिरफ्तारी की थी.

धारा 66 ए की वैधता पर 2013 में राज्यसभा सांसद राजीव चंद्रशेखर ने भी एक जनहित याचिका के तहत सवाल उठाए थे. बावजूद इसके गिरफ्तारियां होती रहीं. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ एक कार्टून बनाने पर पुलिस ने अंबिकेश महापात्रा नाम के एक प्रोफेसर को गिरफ्तार कर लिया था.

सपा के बड़बोले नेता आजम खान के खिलाफ फेसबुक पर एक कमेंट को लेकर उत्तर प्रदेश में पुलिस ने एक छात्र को गिरफ्तार किया था. इसी तरह अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़े रहने वाले असीम त्रिवेदी ने फेसबुक पर केंद्र सरकार के खिलाफ एक कार्टून पोस्ट किया था, जिसके बाद उन्हें इसी धारा के तहत गिरफ्तार किया गया था. बिजनेसमैन रवि श्रीनिवासन की एक नेता के बेटे के खिलाफ आपत्तिजनक ट्वीट करने के मामले में गिरफ्तारी हुई थी.

यह सिलसिला काफी लंबा है. त्रिसूर के श्रीकृष्णा कॉलेज के प्रिंसिपल सहित 11 छात्रों को इस धारा के तहत दोषी बनाया गया था, जिसमें से 9 की गिरफ्तारी भी हुई.  इतना ही नहीं ओडिशा, गुजरात, कर्नाटक , मिजोरम, छत्तीसगढ़, झारखंड, चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश सहित तमाम राज्यों में इस धारा के तहत हुई गिरफ्तारियों को भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने संज्ञान में लिया. यहां तक कि चर्चित लेखिका तसलीमा नसरीन भी इस मुद्दे पर कोर्ट पहुंची थीं.

अब सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले से देश में अभी पहचान बढ़ाने की दिशा में बढ़ रहे सोशल मीडिया को मजबूती मिलेगी. पर सरकार है कि अभी भी इस माध्यम की ताकत से अनजान है. यह मीडिया अभी भी बड़े या विदेशी घरानों के वर्चस्व वाला है. भारतीय वेबसाइटें या तो हैं नहीं, या फिर सरकारी बेरूखी और असहयोग के चलते दम तोड़ रही हैं. सुप्रीम कोर्ट में पहले पहल याचिका दायर करने वाली श्रेया सिंघल का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से संविधान में मिले फ्रीडम ऑफ स्पीच के अधिकार को मजबूती मिलेगी.

बात तो ठीक है, पर श्रेया सिंघल भी इंटरनेट की दुनिया पर सरकारी प्रभाव को पूरी तरह नहीं जानतीं और इसके माली पक्ष से अनजान हैं. सरकारें और प्रभावशाली लोग अभी भी अपने दम पर सोशल मीडिया का रूख मोड़ने की ताकत रखते हैं. इसके लिए जरूरी है कि वेब मीडियम में काम कर रहे भारतीय पब्लिशरों को तवज्जुह दी जाए. ताकि देश में बराबरी का माहौल और विचारों के असली आजादी की बयार बह सके. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट तो अपने इस ऐतिहासिक फैसले के लिए साधुवाद का हकदार तो है ही. शायद उसी की सचेतता के चलते देश के लोकतंत्र के बाकी खंभे अभी भी टिके हुए हैं.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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