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हम भूल गए कि ये अन्न दाता हैं

हम भूल गए कि ये अन्न दाता हैं हममें से कितने लोग हैं जिन्होंने आपाधापी के इस दौर में किसी दिन यह सोचा है कि किसान अगर अन्न न उपजाए और मजदूर अगर काम न करे तो हमारा क्या होगा? पैसा सिर्फ माध्यम है, न तो साध्य न ही साधन. पैसे से आप अन्न खरीद तो सकते हो पर तभी, जब वह उपजा हो, और उपज के लिए आपको बोना तो अन्न ही पड़ेगा, पैसों की खेती होती नहीं है, हां पैसों के दम पर खेती की और कराई जा सकती है जरूर. इसीलिए दुःख होता है, जब अन्नदाता किसान को अपने हक के लिए धरना, प्रदर्शन और आंदोलन का सहारा लेना पड़ता है.

दिल्ली के जंतर- मंतर पर आजकल यही अन्नदाता किसान आजकल अनशन पर है, तपती धूप में, बरसात में, जाड़े में अपने श्रम से हम सबका पेट भरने वाला आज अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहा है. जंतर- मंतर को अगर आंदोलन की जमीन कहें तो कुछ गलत नहीं होगा. किसी जमाने में वोट क्लब पर लगने वाला जमघट और रामलीला मैदान की रैलियां अब यहीं सिमट आई हैं. तेज माली तरक्की के नाम पर किसानों की जमीन हड़प लेने वाले सरकारी 'भूमि अधिग्रहण बिल' से नाराज किसान यहां धरने पर बैठे हैं. किसानों के यहां आने-जाने का रेला है कि थम ही नहीं रहा है.

जंतर- मंतर और उसके आसपास किसानों की रेलमपेल और माहौल देखकर लगता है कि आने वाले कल में अगर मोदी सरकार ने अपनी नीतियां नहीं बदलीं, तो उसके साथ क्या-क्या घटने वाला है. कुछ लोग इस बिल के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उन सलाहकारों का हाथ मान रहे हैं, जो किसी दौर में उनकी जमीनी ताकत से आतंकित रहे थे, पर बदलते दौर में अपनी आस्थाएं और रूप बदलकर प्रधानमंत्री की नजदीकी पा ली और अब वह गलत-सलत सलाह देकर उन्हें भी अपनी ही तरह जनता से कटा हुआ 'हवाई नेता' बना देना चाहते हैं. ऐसे लोगों में अरुण जेटली और स्मृति ईरानी का नाम अव्वल है.

भारतीय जनता पार्टी के ही किसान सरोकारों से जुड़े कुछ बड़े नेताओं का कहना है कि अगर ऐसा न होता तो आज प्रधानमंत्री इस तरह से अपने ही लोगों की नाराजगी का शिकार न होते. आलम यह है कि केवल किसान, व्यापारी, मजदूर संगठन, संघ और आम आदमी ही नहीं खुद प्रधानमंत्री के अपने सगे भाई भी उनकी नीतियों के विरोध में दिल्ली में हैं. कुछ दिन पहले ही अन्ना हजारे दिल्ली को दो दिनों तक हिलाकर फिर लौटने की धमकी देकर गए हैं. उनके शिष्य रहे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल खुलेआम उनके समर्थन की बात कह कर उनके साथ मंच भी साझा कर चुके हैं.

नरेंद्र मोदी सरकार की किसान और सरकारी वितरण को लेकर बनी नीतियां खुद उसके गले का फांस बन चुकी हैं. एक तरफ कांग्रेस अध्यक्ष और यूपीए की मुखिया सोनिया गांधी 14 पार्टियों को एकजुट कर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के दरवाजे तक गुहार लगा आई हैं, तो दूसरी तरफ जंतर-मंतर पर देश भर से आए किसानों ने डेरा डाल रखा है. पंजाब, बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक, तमिलनाडू, केरल से आए हजारों गंवई लोग भारतीय किसान यूनियन की अगुआई में देश की राजधानी में अपनी मांगों को लेकर पंहुचे हुए हैं.

मोदी जी खुद और अब उनके इशारे पर उनकी सरकार और सांसदों का कहना है कि यह सरकार ग्रामीण इन्फ्रास्‍ट्रक्चर खड़ा करना चाहती है, इन इलाकों में विकास करना चाहती है, इसलिए यह बिल ला रही है. मोदी ने बकायदा अपने सारथी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और पार्टी के भीष्म पितामह सरीखे नेता लाल कृष्ण आडवाणी की मौजूदगी में मंत्रियों और सांसदों की क्लास लेकर कहा है कि बिल को लेकर फैलाए जा रहे भ्रम को जनता के बीच जाकर वे साफ करें. खुद प्रधानमंत्री किसानों से मन की बात कर रहे हैं. पर किसान और व्यापारी हैं कि नाराज हैं. सचाई यह है कि एनडीए सरकार ने भले ही कुछ संशोधनों के साथ इस बिल को लोकसभा में पास करा लिया है, लेकिन इसे राज्यसभा में पेश करने में उसे मुश्किल हो रही है.

नरेंद्र मोदी सरकार पर विकास के नाम पर पूंजीपतियों की तरफदारी करने के आरोप लग रहे हैं. इस मुद्दे पर लगातार स्टैंड बदलने से इस विषय पर सरकार की अस्थिरता लगातार दिख रही है. कॅन्सेन्ट क्‍लॉज को लेकर किसान आहत हो चुके हैं और उन्हें यह अपनी पुश्तैनी जमीनों के मालिकाना अधिकार पर सरकारी हस्तक्षेप सा दिख रहा है.

भारतीय किसान यूनियन के नेता युद्धवीर सिंह का कहना है कि देश की 64000 किलोमीटर रेलवे लाईन, सवा दो से ढाई लाख किलोमीटर नेशनल हाइवे, पांच लाख किलोमीटर स्टेट हाईवे के दोनों तरफ एक-एक किलोमीटर की ज़मीन सरकार ले लेगी. भारतीय किसान यूनियन के राकेश टिकैत का कहना है कि एक परिवार में अगर चार बेटे हों. तो किसको नौकरी दी जाएगी. इस पर परिवार में फूट पड़ जाएगी.

चौधरी कृष्णबीर सिंह जैसे मंजे हुए किसान नेताओ का कहना है कि सरकारी तर्क को अगर मान भी लें कि 4 गुना तक मुआवजा दिया जा सकता है, पर यह कब तक मिलेगा, बिल से ये कुछ साफ नहीं है. इतना ही नहीं अगर ज़मीन लेने पर काम न शुरू हुआ, तो किसान दोनों तरह से मारा जाएग. खास बात तो यह कि चौधरी कृष्णबीर कुद भाजपा से जुड़े हैं और भारतीय कृषक संघ की मार्फत सालों से किसानों के हित पर काम कर रहे हैं और उनके मसले उठाते रहे हैं. बहरहाल मसले कई हैं.

किसानों  के कष्ट की कहानी आज की नहीं है. फिल्म 'मदर इंडिया', 'दो बीघा जमीन' जैसी फिल्मों के साथ ही उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास किसान जीवन के संघर्षों और ग्राम्य जीवन की सचाई पर आज तक रोशनी डाल रहे हैं.  तरक्की की तेज रफ्तार में भारत का किसान उस तेजी से आगे क्यों नहीं बढ़ा यह शोध का विषय हो सकता है, पर हाल के दिनों में जिस तेजी से किसानों पर सरकारी नीतियों का जुल्म बढ़ा है, वैसा अब से पहले कभी नहीं था. 1990 के दशक से भारत में किसानों की आत्महत्या के मामले सुर्खियां बटोरते रहे हैं.

महाराष्ट्र को उदाहरण मानें तो किसानों का समर्थन कर रहे समूहों का कहना है कि अनाज की वास्तविक कीमतें किसानों को नहीं मिलतीं और उन्हें जीएम कंपनियों से कपास के काफी महंगे बीज और खाद खरीदने होते हैं. इन समूहों के मुताबिक जीएम बीज को खरीदने में कई किसान गहरे कर्ज में डूब जाते हैं. जब फसल की सही कीमत नहीं मिलती है, तो आत्महत्या कर लेना ही उनके लिए एकमात्र विकल्प नजर आता है.भारत सरकार के नेशनल क्राईम रिकार्ड ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों में माना गया था कि 1995 से लेकर अब तक 2,96,438 किसान आत्महत्या कर चुके हैं.

समस्या केवल इतनी ही नहीं है. किसान-परिवार का मुखिया अगर आत्महत्या करता है, तो इसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है. कर्ज की विरासत ढो रहे उसके परिवार का कोई अन्य सदस्य अगर आर्थिक तंगहाली में आत्महत्या करता है, तो भी इसकी गणना सरकारी आंकड़े में नहीं होती. ठीक इसी तरह नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े में बंटाईदारी पर खेती करने वाले किसानों की आत्महत्या कृषक-आत्महत्या के रुप में दर्ज नहीं की जाती.

पिछली सरकार ने इस संकट के समाधान के लिए मूलतः कर्ज से सीमित छुटकारा दिलाने की नीति अपनाई थी. बाद में केंद्र और राज्य सरकारों ने कर्जमाफी और मुआवजे की रकम के रुप में राहत देने की कोशिश की गई. इसका लक्ष्य था किसानों की आत्महत्या के सर्वाधिक संभावित कारण यानी कर्जदारी से उन्हें छुटकारा दिलाना. लेकिन, चूंकि किसानी के संकट से जूझ रहे कई परिवार किसान की सरकारी परिभाषा से बाहर पड़ते है, इसलिए वे सरकार की राहत-योजना का लाभ पाने से वंचित रहे.

सरकारी परिभाषा के अनुसार जो किसान है, उनके लिए सरकारी मदद पर्याप्त साबित नहीं हो रही है, क्योंकि एक तो उनका कर्ज सरकारी मदद से ज्यादा है, दूसरे पारिवारिक सदस्य की आत्महत्या के बाद की स्थितियों में यह मदद खास कारगर नहीं हो पा रही है.

दरअसल भारत में खेती उदारीकरण की नीतियों के बाद गुजरे दो दशक से वैश्विक बाजार की शक्तियों के असर में है. खेती का खर्चा बढ़ा है, लेकिन किसान की आमदनी कम हुई है. छोटे किसान आर्थिक तंगहाली की सूरत में कर्ज के दुष्चक्र में पड़े हैं. जिस साल फसल मारी जाती है, उस साल उन्हें खेती की लागत भी वसूल नहीं हो पाती, कर्ज चुका पाना तो असंभव है.

होता यह भी है कि किसान की आत्महत्या के बाद पूरा परिवार उसके असर में आ जाता है. बच्चे स्कूल छोड़कर खेती-बाड़ी के कामों में हाथ बंटाने लगते हैं, परिवार को कर्ज की विरासत मिलती है और इस बात की आशंका बढ़ जाती है कि बढ़े हुए पारिवारिक दबाव के बीच परिवार के कुछ अन्य सदस्य कहीं आत्महत्या ना कर बैठें.

तय है कि ऐसे माहौल में जब खेती फायदे का सौदा नहीं है, और जमीन पर किसान का पुश्तैनी मालिकाना हक उस का एकलौता संबल है, तब अगर मोदी जी की सरकार वह हक भी छीनने पर आमादा होगी, तो किसान हैरान-परेशान हो आंदोलन तो करेगा ही. क्या यह बेहतर नहीं है कि सरकार पहले किसानों की समस्याओं का समाधान करे, उनकी जरूरतें पूरी करे, और फिर उनकी सहमति से, उनकी मांगो को ध्यान में रखते हुए कोई बिल लाए.... और जब तक ऐसा नहीं होगा अन्न दाता नाराज रहेगा, और अगर वह नाराज रहा तो न तो व्यवस्था बचेगी, न ही व्यापार, और अगर ये ढहे तो सरकार और विकास का क्या होगा आसानी से समझा जा सकता है.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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