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औरत का सम्मान, संसद और 'इंडियाज डॉटर'

जय प्रकाश पाण्डेय , Mar 15, 2015, 1:32 am IST
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औरत का सम्मान, संसद और 'इंडियाज डॉटर' यह कौन सा समाज है, जिसमें हम रह रहे हैं, और यह कौन सा भारत है, जिसमें 'स्त्री' एक शरीर से इतर कुछ और नहीं? आखिर वह कौन सी वजह है कि महिलाओं को लेकर आम से लेकर खास पुरुषों की सोच केवल 'मर्द' रूपी भेड़ियों जैसी है, जो 'सेक्स' से परे न तो स्त्री को देख रहे, न ही देख पा रहे, न ही देखना चाहते. शर्मनाक तो यह है कि इस मुद्दे पर हमारे माननीय सांसद, विद्वान वकील और जेल में बंद सामूहिक बलात्कारी तक की सोच में कोई अंतर नहीं है. संसद से लेकर, कोर्ट से होते हुए जेल तक पुरुष की सोच बदलती क्यों नहीं? यह न केवल शोध का विषय है, बल्कि आज के दौर में तथाकथित सभ्य समाज के लिए शर्म का विषय भी.

इसीलिए पहले 'इंडियाज डॉटर' डाक्यूमेंटरी को लेकर सरकार के रवैए और बाद में संसद में इंश्योरेंस बिल पर चर्चा के दौरान कभी 'सर्वश्रेष्ठ सांसद' सम्मान से नवाजे गए शरद यादव का महिलाओं के लेकर किए गए कमेंट कि 'दक्षिण भारतीय औरतें सांवली पर खूबसूरत शरीर वाली' होती हैं, पर अचरज नहीं होता. बाद की बहस में उनकी पार्टी के लोगों और उनके दूसरे साथियों ने जो कहा, या फिर संसद के ठहाकों में 'कौरवों के दरबार में द्रौपदी के चीर हरण की तरह' स्त्री की अस्मिता पर कितनी चोट पहुंची, इस पर चर्चा भी बेकार है.

क्योंकि जो समझबूझ कर भी समझना न चाहे, उसका कोई क्या कर सकता है? इसीलिए पहले बात करते हैं डाक्यूमेंटरी 'इंडियाज डॉटर' की. यह कोई आम डाक्यूमेंटरी नहीं थी. 'इंडियाज डॉटर' तेजी से तरक्की करते 'भारत' की वह तसवीर थी, जिसे न तो हमारे हुक्मरान देखना चाहते थे, न ही दिखाना. इसमें हमारे असली भारत का रियल चेहरा था. वह चेहरा, जिसमें 'पुरुष' अपनी मर्दानगी को अपनी सबसे बड़ी विशेषता और उसी के चलते 'स्त्री' को अपनी प्रापर्टी समझता है.  यही नहीं, हमारी जिस संप्रभू सरकार को देशहित के, जनहित के, गरीबों के कल्याणकारी कानून बनाने में सालों-साल लग जाते हैं, उसे एक बड़े मुद्दे पर आधारित डाक्यूमेंटरी पर पाबंदी लगाने में कुछ घंटे भी नहीं लगे. मजे की बात यह कि सरकार ने यह सब कुछ महिलाओं की रक्षा एवं गरिमा को बरकरार रखने के नाम पर किया.

संसद में भी इस बात पर महिला सांसदों ने खूब हंगामा किया कि सरकार की जानकारी में उसकी इजाजत से सामूहिक बलात्कार के तिहाड़ जेल में बंद एक दोषी का इंटरव्यू न केवल एक विदेशी प्रोड्युसर ने लिया, बल्कि उसे दूसरे विदेशी टीवी चैनल बीबीसी को दिखाने के लिए बेच भी दिया. डाक्यूमेंटरी के लिए एक सजायाफ्ता बलात्कारी के साक्षात्कार की अनुमति दिए जाने पर असंतोष जताते हुए फिल्म स्टार और राज्य सभा सांसद जया बच्चन सहित सहित सपा, कांग्रेस, जदयू, वाम दलों की महिला सदस्यों ने जब सदन में हंगामा किया, तब सरकार जागी. सांसदों की इस चिंता और पीड़ा से सहमति जताते हुए गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने सुर में सुर मिलाते हुए कहा कि सरकार इस बात की जांच कराएगी कि किन परिस्थितियों में इस साक्षात्कार की अनुमति दी गई और अगर जरूरत पड़ी, तो इसके लिए जिम्मेदारी तय की जाएगी.

गृह मंत्री राजनाथ सिंह का कहना था कि जिन शर्तों के तहत अनुमति दी गई थी, उसमें दोषियों से साक्षात्कार के लिए पूर्व में लिखित सम्मति लेना और असंपादित फुटेज को जेल अधिकारियों को दिखाना शामिल था, पर डाक्यूमेंटरी के निर्माताओं ने ऐसा नहीं किया. उनका यह भी कहना था कि जेल अधिकारियों ने जब 7 अप्रैल, 2014 को डाक्यूमेंटरी निर्माताओं को एक कानूनी नोटिस भेजा, तो उन्हें साक्षात्कार के असंपादित फुटेज दिखाए गए, जिसमें बलात्कारी सजायाफ्ता ने कुछ बेहद आपत्तिजनक बातें कहीं थीं. जेल अधिकारियों ने तभी डाक्यूमेंटरी निर्माताओं से इसे सार्वजनिक तौर पर नहीं दिखाने को कहा था. पर सरकार को जब यह पता चला कि 8 मार्च, 2015 को बीबीसी इस डाक्यूमेंटरी को प्रसारित करने जा रहा है, तब हमने इस पर रोक लगा दी.

सरकार की ओर से गृह मंत्री ने यह भी दावा किया कि वह इस डाक्यूमेंटरी को किसी भी सूरत में जारी नहीं होने देंगे, चाहे वह इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर हो, वेब मीडिया पर हो या प्रिंट मीडिया में हो. इतना ही नहीं, सरकार ने इस बारे में अदालत से आदेश भी प्राप्त कर लिया था कि इस विवादास्पद डाक्यूमेंटरी को भारत में जारी नहीं किया जाएगा. यहां सवाल यह उठता है कि सरकार अगर फिल्म 'इंडियाज डॉटर' के निर्माताओं पर तय शर्तों को तोड़ने या विश्वास भंग करने का आरोप लगाती, तो शायद देश की जनता से उसे मदद भी मिलती, पर यहां तो मामला ही कुछ का, कुछ और बना दिया गया. आखिर यदि फिल्म बनाने की अनुमति शिक्षा या शोध के लिए ली गई थी, तो सरकार ने डाक्यूमेंटरी निर्माताओं को उसके कामर्शियल इस्तेमाल के मुद्दे पर क्यों नहीं घेरा?

सरकार अगर डाक्यूमेंटरी में उठाए गए मसले पर बहस कराती तो नतीजा देशहित में निकलता और समाज को भी नई दिशा मिलती. पर सरकार ने ऐसा नहीं किया और यह जानते हुए भी कि आज के दौर में जब इंटरनेट ने लोगों के घरों तो दूर, लोगों के हाथ और दिमाग तक में अपनी जगह बना ली है, और जिस पर रोक लगाने और काबू पाने की हिमाकत सर्व सक्षम, सर्व शक्तिमान अमेरिका नहीं कर पा रहा, तो हमारी बिसात ही क्या, उसने डाक्यूमेंटरी 'इंडियाज डॉटर' के प्रसारण पर रोक लगा दी. नतीजा यह निकला कि इसे खूब पॉपुलरिटी मिली और लाखों लोगों ने इसे इंटरनेट से डाउनलोड तो किया ही अखबार, टीवी और दूसरी बहसों में भी यह डाक्यूमेंटरी छाई रही. इसके वर्ल्ड प्रीमियर पर जानी-मानी फिल्मी और चर्चित हस्तियां भी जुटीं.

सरकार ने वही किया, जो उसे नहीं करना चाहिए था. जबकि सांसदों ने सदन में इस मसले को बड़ी गम्भीरता से उठाया था. सांसद अनु आगा ने कहा था कि डाक्यूमेंटरी में शामिल साक्षात्कार में महिलाओं के बारे में जो बातें कहीं गई हैं, वैसी ही मानसिकता समाज में कई पुरूषों की है. लेखक जावेद अख्तर का तर्क था कि एक डाक्यूमेंटरी पर रोक लगाने से क्या होगा, सच तो यह है कि महिलाओं के बारे में आम पुरूषों की भी यही मानसिकता है. इस मानसिकता को बदलने की जरूरत है. कांग्रेस की रजनी पाटिल एवं अंबिका सोनी का तर्क था कि समाज में महिलाओं के बारे में, उनके वस्त्रों के बारे में पुरूषों की जो सोच है, उसे बदले बिना परिस्थितियां नहीं बदली जा सकती.

कहने के लिए तो सरकार ने कहा कि इस मामले में वह सदन की भावना से पूरी तरह से सहमत है. पर उसके पास संसद के दूसरे सदस्यों द्वारा उठाए गए सवालों के जवाब नहीं थे, खासकर महिला सदस्यों के. बसपा प्रमुख मायावती का तो यहां तक कहना था कि डाक्यूमेंटरी बनाने की अनुमति देने के मामले की जांच समयबद्ध तरीके से करवाई जानी चाहिए, जबकि माकपा की टी एन सीमा का कहना था कि जब कभी इस तरह की घटनाएं होती हैं, तभी हम क्यों जागते हैं, उससे पहले क्यों नहीं जागते. उन्होंने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा के मामले में हमारी व्यवस्था बिल्कुल काम नहीं कर रही.  निर्भया कोष से एक भी रुपया खर्च नहीं किया गया है. कांग्रेस की विप्लव ठाकुर ने कहा कि अदालतों में बलात्कार के लंबित मामलों की जल्द कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि बलात्कारियों में भय पनपे.

दरअसल इस डाक्यूमेंटरी पर इतना हंगामा क्यों मचा? इसलिए कि 'इंडियाज डॉटर' उस लड़की की कहानी पर बनी थी, जिसे देश की राजधानी में भी आदमी की शक्ल में भेड़िए क्या राक्षस मिले. हुआ यों था कि 23 साल की एक युवती, जिसने मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर राजधानी के ही एक हास्पिटल में प्रशिक्षु के तौर पर काम करना शुरू ही किया था, और जिसकी कुछ ही दिनों में अपने दोस्त से सगाई होने वाली थी, वह अपने उसी  दोस्त के साथ दक्षिणी दिल्ली के एक शॉपिंग माल से शाम के एक सिनेमा का शो देख कर घर वापसी की कोशिश में थी. रात के करीब 8.30 बजे दिल्ली सरकार के परमिट पर प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को लाने-ले जाने का काम करने वाली व्हाइट लाइन बस वहां पहुंची, और उसमें सवार ड्राईवर, कंडक्टर, खलासी ने लड़की और उसके दोस्त को उनके घर की तरफ जाने वाली 'चार्टर्ड बस' बता कर बैठा लिया.

उस चार्टर्ड बस में उस समय इस लड़की और उसके लड़के दोस्त सहित बमुश्किल 8-9 लोग सवार थे. चार्टर्ड बस कुछ ही आगे बढ़ी थी कि उस बस में सवार 18 से 26 साल के लंपटों ने लड़की पर पहले तो फब्तियां कसनी शुरू की और फिर वे छेड़खानी करने लगे. विरोध करने पर लड़की के साथ-साथ उसके साथी की भी लोहे के राड से पिटाई की गई, और फिर शुरू हुआ लड़की के साथ हैवानियत का सिलसिला, एक-एक कर बस में सवार कंडक्टर, ड्राईवर, खलासी और उसके साथियों सहित कुल 6 लोगों ने न केवल लड़की के साथ बहशियाना बलात्कार किया, बल्कि हैवानियत की सारी हदें पार कर दीं. लड़की के नाजुक अंगों में लोहे की राड दाल दी गई और उसे लगभग मरणासन्न हालत में उसके दोस्त के साथ सड़क के किनारे मरने के लिए फेंक दिया गया.

हैवानियत का यह तांडव हुआ था दुनिया भर में मशहूर शहर दिल्ली में, महान भारत देश की राजधानी में. राजधानी की उन्हीं सडकों पर जिस पर देश के भाग्यविधाता, प्रधानमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक, लोकसभा- राज्यसभा अध्यक्ष, चांसलर, वकील,  शिक्षाविद, न्यायाधीश और सेना प्रमुख हर रोज गुजरते हैं. लगभग तीन घंटे तक उसी राजधानी की सड़क पर चलती बस में देश की एक बेटी की अस्मत और जिन्दगी लुटती रही, और हमारे महान भारत की ' दिल्ली पुलिस, हरदम, हमेशा आपके साथ' रहने का नारा देने वाले जाबांजों को हवा तक नहीं लगी. इस बीच बस ने कम से कम आधा दर्जन पुलिसिया बैरिकेड तो पार किए ही, वह दिल्ली के 4-5 महत्त्वपूर्ण पुलिस थानों से होकर भी गुज़री.

आगे सरकारी और पुलिसिया रवैये से इस हादसे में एक-एक करके और भी शर्मनाक घटनाएं जुड़ती चलीं गईं. बलात्कार की शिकार उस लड़की को इन्साफ दिलाने और दोषियों को सख्त से सख्त सजा दिलाने की मांग पर देश की नौजवान पीढ़ी में इतना गुस्सा आया कि वह बिना किसी के बुलाए इंडिया गेट पर जुटने लगी. जमावड़ा इतना बढ़ा की पुलिस घबड़ा गई और उसने शांतिपूर्ण ढंग से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से मिलकर अपनी बात रखने की कोशिश करने वाले युवाओं पर दिल्ली की हाड़ कंपा देने वाली ठंड में पानी की बौछारें फेंकी और लाठियां बरसाईं. जब 'वी वांट जस्टिस' का नारा लगाने वाले इससे भी नहीं भागे तो उन पर अश्रु गैस के गोले छोड़े गए. इस मसले पर तब दिल्ली में 'सरकार और जनता' दो अलग-अलग छोर पर खड़े हो गए थे. इस बीच वह दुर्भाग्यशाली लड़की दिल्ली के एक अस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच जूझती रही. पर देश के तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपनी जबान खोलने में हफ्ते भर लग गए, यही हाल राष्ट्रपति महोदय का था, जो 5 से भी ज्यादा दशक तक खुद सामाजिक और सियासी जीवन से गुजर कर महामहिम बने थे.

डाक्यूमेंटरी 'इंडियाज डॉटर' इस बात की भी याद दिलाती है कि जब समूचा देश उस बेटी को 'दामिनी', 'निर्भया' और 'अमानत' कह उसके हक़ में खड़ा था, और उस जैसी दूसरी मां, बहन, बेटियों की इज्जत के लिए इन्साफ मांग रहा था, तब महामहिम के बेटे, जो खुद भी सांसद हैं, ने 'दामिनी' के हक़ में किए जा रहे आन्दोलन को दिशाहीन छात्रों और लिपस्टिक पुती महिलाओं का आन्दोलन करार दिया था. लोगों का गुस्सा जब इन सब बातों से ज्यादा भड़क गया तब जाकर प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और यूपीए की चेयर पर्सन सोनिया गांधी बोलीं. सरकार ने तेजी दिखाई, पर  'दामिनी' को बचाया नहीं जा सका. सरकार ने उसे अपने खर्चे पर इलाज के लिए सिंगापुर भी भेजा, पर तब तक काफी देर हो चुकी थी. 29 दिसंबर, 2013 को देश की एक बेटी ने सुदूर देश की धरती पर आख़िरी सांसें छोड़ीं.

देश का कानून उस लड़की का नाम उजागर करने की इजाजत नहीं देता, पर उसके जाने से जिस तरह का क्षोभ अन्याय का विरोध करने को लेकर लोगों के मन में उपजा था, और न्याय के पक्ष में खड़े होने की जैसी अलख समाज के युवाओं और सरकार में तब जगी थी, वह समय के साथ मद्धिम पड़ती गई. आज लोग उस घटना को भी भूलने लगे हैं. अपराधी कानून की दावंपेंच का लाभ ले रहे हैं. जेल में भी सुरक्षा के नाम पर उनकी मौज है. उन्हें अपनी करनी का कोई भय नहीं. जो उनके बचाव की बात कर रहे, उनके बारे में क्या कहना?

आज महिलाओं को लेकर हमारे लोगों की सोच जहां की तहां है. पिता, पति, भाई, बेटा, दोस्त होने के बावजूद 'पुरुष' केवल तथाकथित 'मर्द' की तरह सोच रहा है. सोशल मीडिया में भी 'स्त्री के विचारों' की जगह उसकी फोटुओं को लाइक्स ज्यादा मिलती है. यह काफी शर्मनाक है कि सभ्यता के नाम पर हम अभी भी असभ्य हैं. 'इंडियाज डॉटर' अगर भारत में भी दिखाई जाती, तो महिलाओं के अधिकारों को लेकर चल रही बहस को एक नई दिशा मिलती. यहां तक कि इस मसले पर काम कर रहे पुरुषों को भी बल मिलता, और स्त्री को दोयम दर्जे का मानने, अपनी जागीर समझने वालों की सोच पर कुछ समय के लिए ही सही लगाम जरूर लगती. पर यह केवल आदर्श स्थिति है. संसद तक में महिलाओं को लेकर जो सोच है, उससे लगता है कि अभी भारतीय समाज की मानसिकता बदलने में सदियों लगेंगे. तब तक केवल इंतजार ही किया जा सकता है या फिर संघर्ष.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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