Wednesday, 16 October 2019  |   जनता जनार्दन को बुकमार्क बनाएं
आपका स्वागत [लॉग इन ] / [पंजीकरण]   
 

औरों से अलग नहीं 'आप'

औरों से अलग नहीं 'आप' आम आदमी पार्टी में जो कुछ चल रहा, उससे यह उजागर होता है कि हमारे नेताओं में अहम कितना है? और सफलता कैसे इनका दिमाग खराब कर देती है. योगेन्द्र यादव और प्रशान्त भूषण का योगदान 'आप' की दिल्ली की सफलता में किस तरह से अरविन्द केजरीवाल से कम था? कम था भी या नहीं? अगर कम था, तो इन्हें अब तक इतनी भी अहमियत क्यों मिलती रही, इसे समझना थोड़ा मुश्किल है और इस पर राजनीतिक विशेषज्ञ चर्चा करेंगे, पर यहां एक सीधा सा सवाल यह है कि अगर पार्टी की सफलता का श्रेय केवल अरविन्द केजरीवाल को है, तो फिर मई 2014 के लोक सभा चुनावों में 'आप' के उम्मीदवारों की ऐतिहासिक हार, वह भी जमानत जब्ती वाली, की जिम्मेदारी किस पर है? क्यों न इसे भी 'वन मैन शो' के मसीहा माननीय अरविन्द केजरीवाल के ही मत्थे डाली जाए?

भले ही आज अरविन्द केजरीवाल दिल्ली की जनता के भरोसे से मिले प्रचंड बहुमत की दुहाई दे रहे हैं, पर क्या वह यह नहीं जानते कि यही भरोसा तो जनता ने कभी उस कांग्रेस पर भी व्यक्त किया था, जिसके खिलाफ कभी अन्ना की अगुआई में खुद केजरीवाल ने आंदोलन किया था, या फिर यही विश्वास तो जनता ने इस बार के लोकसभा चुनावों में नरेन्द्र मोदी पर भी किया था. पर आज हालात क्या हैं? नरेन्द्र मोदी की भाजपा या फिर सोनिया गांधी और राहुल गांधी की कांग्रेस का दिल्ली का हश्र किससे छिपा है? आखिर इन दिग्गजों के दलों से 'आप' सिर्फ इसलिए ही तो अलग थी कि इसके नेताओं की बात-विचार में पारदर्शिता, ईमानदारी और सत्य के लिए आग्रह झलकता था, जनता की सेवा के लिए ललक दिखती थी...पर आज क्या हो रहा? सत्ता को लेकर, भले ही संगठन में ही सही, जुतम-पैजार वहां भी शुरू हो गई. चापलुसी, एकलौती योग्यता बन गई कहीं भी पहुंचने के लिए, और प्रजातंत्र में सच की ताकत को 'बहुमत' की आवाज से दबा सा दिया गया.

कभी मेरे एक बड़े करीबी वरिष्ठ पत्रकार-आलोचक मित्र ने कहा था कि सर, 'अरविन्द केजरीवाल ईमानदार तो हैं, पर बंदे में घमंड बहुत है.' अरविन्द केजरीवाल की हाल की हरकत को देख- सुनकर तो यही लगता है मित्र की बात सच थीं. प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को 'आप' की पॉलिटिकल अफेयर्स कमिटी से निकाले जाने के बाद राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और महाराष्ट्र से पार्टी के बड़े नेता मयंक गांधी ने ब्लॉग लिखकर यह कहा है कि अरविंद केजरीवाल ने साफ-साफ कह दिया था कि योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण यदि पीएसी में रहते हैं, तो मैं काम नहीं कर पाऊंगा. मयंक को डर है कि इस खुलासे से उन्हें भी इसके नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं.

मयंक गांधी ने आगे विस्तार से खुलासा करते हुए यह लिखा कि जब योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण स्वेच्छा से हटने के लिए तैयार थे, तो उन्हें हटाने का प्रस्ताव सार्वजनिक रूप से लाने से मैं स्तब्ध था. उन्होंने लिखा है, 'मैं दो कारणों की वजह से वोटिंग से बाहर रहा. अरविन्द पीएसी में अच्छे से काम कर सकें, इसके लिए मैं इस बात से सहमत था कि प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव पीएसी से बाहर रह सकते हैं और कुछ दूसरी महत्त्वपूर्ण भूमिका ले सकते हैं. मैं उन्हें सार्वजनिक रूप से बाहर रखने के प्रस्ताव के विरोध में था, खासकर तब जब कि वे खुद अलग होना चाहते थे. इसके अलावा उन्हें हटाने का यह फैसला दुनिया भर के कार्यकर्ताओं की भावनाओं के खिलाफ है.

सच तो यह है कि मयंक गांधी के खुलासे के बाद अरविन्द केजरीवाल एक लोकतान्त्रिक नेता की बजाय, एक तानाशाह नौकरशाह के रूप में अधिक दिखने लगे हैं. आखिर अगर मयंक की बात को सच मान लें तो फिर फर्क क्या रहा दूसरे दलों में और 'आप' में? अरविन्द में और दूसरी वन मैन पार्टियों, लालू, नीतीश, ममता, मायावती, मुलायम, बादल, जयललिता, करुणानिधि, नायडू आदि के दलों में? मोदी की वर्किंग स्टाइल और कांग्रेस के हाई कमान कल्चर और केजरीवाल की कथित चम्पू कोर कमेटी, जिसे वे पोलिटिकल अफेयर कमेटी कहते हैं, में आखिर क्या फर्क है फिर? सोनिया जी अब भी जिसे चाहती हैं, वह नहीं निकालतीं, कांग्रेस वर्किंग कमेटी ही फैसला करती है, इसी तरह भाजपा में आडवाणी जी का दौर मोदी समर्थकों ने इसी तरह की वर्किंग कमेटी में खत्म किया था, और बदले में आज मोदी जी के सामने उस कमेटी का हाल क्या है, किसी से छिपा है क्या? अमित शाह और नरेन्द्र भाई मोदी की जोड़ी ने भाजपा का जो हाल किया है वह उसके कार्यकर्ताओं को तो छोड़िए, नेताओं तक से पूछ सकते हैं? मोदी की टीम का बड़ा हीरो वही है, जो उनकी नजर में बड़ा हो, जमीन और पार्टी में हो या नहीं.

 'आप' जिन्हें केजरीवाल समर्थक और विरोधी के बीच वर्चस्व की लड़ाई बता रही थी, दरअसल वह चाटुकार टोली और एक सैद्धांतिक मसले के बीच की लड़ाई थी, जिसमें केजरीवाल के इशारे पर, चाटुकारिता फिलहाल जीत गई है और सिद्धान्त हार गया है. पर यहां यह याद रखना होगा कि आज भले ही योगेन्द्र यादव और प्रशान्त भूषण को कमेटी से बाहर कर दिया गया हो, पर उनके उठाए गए मसले एकदम से बेबुनियाद नहीं थे. जाहिर है यह हालात किसी भी तरह से न तो 'आप' के हित में है, न ही लोकतंत्र के हित में. फिर यह तो दिल्ली की जनता के हित में भी नहीं है. 'आप' और केजरीवाल इस बारे में सोचेंगे, ऐसी उम्मीद है.

आखिरी बातः कांग्रेस के सहयोग से जम्मू-कश्मीर में मुफ्ती मुहम्म्द सईद ने राज्य के 12वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ तो ले ली, पर जिस तरह से उन्होंने राज्य में सफल चुनाव के लिए पाकिस्तान और अलगाववादियों को धन्यवाद देकर राज्य की लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था रखने वाली जनता और निर्वाचन आयोग सहित सुरक्षा बलों के योगदान का अनादर किया है, वह कोई अच्छे संकेत नहीं हैं. पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद राज्य की तरक्की की राह का वह कैंसर है, जिसने उस इलाके की जनता की खुशियां छीन ली हैं और जिसे किसी भी तरह से तरजीह नहीं मिलनी चाहिए. उम्मीद है नए निजाम इसको समझेंगे.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

वोट दें

क्या विजातीय प्रेम विवाहों को लेकर टीवी पर तमाशा बनाना उचित है?

हां
नहीं
बताना मुश्किल
 
stack