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बजट! किस का बजट?

बजट! किस का बजट? यह नरेन्द्र मोदी सरकार का पहला पूरा बजट था. इसलिए देश की जनता की उम्मीदें उफान पर थीं, क्योंकि 'अच्छे दिन' लाने का सपना दिखाने वाले पिछली बार 2014 में अंतरिम बजट के समय यह कह कर बच निकले थे कि उनके पास इतने कम वक्त में इससे ज्यादा कुछ कर सकने का मौका ही नहीं था. मतलब साफ था, उन्होंने यूपीए सरकार की बजट नीतियों में सिर्फ कवर की फोटुएं बदली थीं, पर बाकी चीजें वही थीं. इसीलिए इस बार जनता बदलाव के रूप में भगवा परचम फहरा कर दिल्ली की गद्दी पर काबिज और अपने समर्थकों के बीच मसीहा, जननायक, कर्मठ, यशस्वी, दिग्विजयी, परम प्रतापी, परम आदरणीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, उनकी सरकार और उनके चहेते वित्त मंत्री अरुण जेटली का असली बजट देखना चाहती थी.

पर जब बजट आया तो लोगों के होश उड़ गए. खासकर अपने वोटों से भाजपा और टैक्सों से सरकार की झोली भरने वाले मध्यवर्ग की तो हवा ही निकल गई. पहले से ही महंगाई, भ्रष्टाचार और लालफीताशाही के बोझ तले रोजमर्रा की जरूरतों से जूझ रहे इस वर्ग के पहले से ही खस्ताहाल घरेलू बजट का 'बजट' ही इस बजट ने बिगाड़ दिया. आम आदमी पर इस बजट के बोझ का असर यह था कि इसके आने के 6 घंटे के भीतर ही पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ गए. किसी भी मध्यमवर्गीय आय वाले व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान नहीं थी. इस वर्ग की पहली प्रतिक्रिया ही यह थी कि यह अमीरों का बजट है. हालांकि इस बजट में बढ़ाए गए सर्विस टैक्स या फिर रेल बजट में बढ़ाए गए माल भाड़े का असर आना अभी बाकी है, पर दुखी लोगों को वित्त मंत्री का यह बयान भी कि मध्य वर्ग अपना खयाल खुद रख लेगा, काफी चुभा.

वाह साहब! क्या दर्शन है? ख्याल तो हर व्यक्ति अपना रख ही लेता है, तो फिर सरकार, व्यवस्था, प्रशासन की जरूरत क्यों पड़ती है? तानाशाही, राजवाड़ों के दिन क्यों लद गए, और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर टिकी शासन प्रणाली में लोकतांत्रिक व्यवस्था को अहमियत क्यों दी गई? इसीलिए न कि जनता के बीच से चुना गया शासक वर्ग समाज के एक छोटे से छोटे व्यक्ति का ध्यान रखेगा, जहां असहमति के एक अदने से स्वर की भी सुनवाई होगी. पर टेम्पररी शासक वर्ग के मन में सत्ता के इसी तरह के अहंकार और तेवर ने पहले कांग्रेस को  डुबोया था, और इसी ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा की लुटिया भी डुबो दी थी. फिर भी राजनेता चेतते क्यों नहीं? चेतेंगे भी क्यों? क्योंकि जेटली साहब जैसे लोग तो कभी आम आदमी थे ही नहीं, ये जनता के भी कभी आदमी नहीं थे, छात्र राजनीति से ये आए जरूर थे, पर उसके बाद से राज्यसभा की शरण में हैं, लोकसभा का चुनाव मोदी लहर में भी कैसे हारे सभी को पता है....बहरहाल इस बजट को क्या कहा जाए? सरकार जिसकी थी, या शासक वर्ग के लोग जिसके आदमी थे, उन्हीं के भले का बजट में ध्यान रखा गया.

मोदी सरकार के इस बजट को देखते हुए यह लगता ही नहीं कि यह कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर टिकी किसी 'लोकतांत्रिक सरकार' का बजट है. सीधे शब्दों में यह दोहन का, मध्यवर्ग को परेशान और हलकान करने वाला बजट है. जिसमें काम कम, केवल शब्दों की जुगाली भर है या फिर टैक्सों की वसूली. जबकि हकीकत यह थी कि वित्त मंत्री से देश के लोगों को काफी अपेक्षाएं थीं. क्योंकि भारत में बजट केवल सरकारी लेखा-जोखा ही तय नहीं करता, बल्कि इससे सवा अरब लोगों की किस्मत तय होती है.पर जैसे - जैसे इस बजट की समीक्षा हो रही लोगों को निराशा ही हाथ लग रही.

आम बजट किसी भी देश को अगले एक साल तक चलाने का लेखा-जोखा होता है. इसी से तय होता है कि रुपया आएगा कहां से और जाएगा कहां? पर जब मोदी की सरकार ने यह बताया कि वह कहां, कितना खर्च करने वाली है और किसको क्या मिलने वाला है? तो लोग हताश हो गए. क्योंकि इस बजट से यह भी तय कर दिया गया कि अमीर, कैसे और अमीर बनने वाले हैं और गरीब कैसे और गरीब बन जाएगा.

इस बजट में शब्दों की बाजीगरी तो थी, पर जनता के लिए राहत के नाम पर कुछ भी नहीं था. अमीरों के लिए काफी कुछ था. थोड़ा बहुत गरीबों के लिए भी था. पर बाकी देश के लिए केवल आंकड़े भर थे. हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बजट की इतनी ज्यादा तारीफें कीं कि इसे Pro-Poor Budget, Pro-Growth Budget बताया. कहा कि बजट में जन-जन की अपेक्षाओं को पूर्ण करने के लिए, जन-धन से लेकर के जन-कल्‍याण तक का, पूरा मार्ग प्रशस्‍त किया गया है....प्रधानमंत्री ने और भी बहुत कुछ कहते हुए अपने सहयोगी अरुण जेटली को बधाई दे दी, पर विरोधियों ने वही कहा, जो आम लोगों ने महसूसा.

विपक्षी दलों ने इसे कॉरपोरेट घरानों तथा धन्नासेठों को लाभ पहुंचाने वाला करार दिया. कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता कमलनाथ ने कहा कि हम एक ‘ब्लूम बजट की अपेक्षा कर रहे थे, जबकि यह एक ग्लूम बजट निकला. जनता को इससे कुछ भी हासिल नहीं होगा. यह अमीरों का बजट है. वाकई  इस बजट में किसानों नौजवानों, बेरोजगारों और अल्पसंख्यकों के लिए कोई विशेष सुविधा नहीं दी गई है. कहने के लिए तो प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश से सांसद हैं, पर इस राज्य को भी इस बजट से कुछ भी खास नहीं मिला है. बजट कहने के लिए तो भारत का आम बजट था, पर वाकई यह किसका था, वक्त ही बताएगा.
जय प्रकाश पाण्डेय
जय प्रकाश पाण्डेय 14 साल की उम्र से अख़बारों में लेखन शुरू कर देने वाले जय प्रकाश पाण्डेय ने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता सहित 8 विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और पत्रकारिता के अपने जुनून के चलते डॉक्टरेट अधूरा छोड़ दिया। दिल्ली में एक समाचार एजेन्सी के कार्यकारी संपादक, और एक बड़े पत्रिका समूह के प्रकाशकीय संपादक बने। हर विषय पर लिखा और चर्चित हुए। फिलहाल, आन लाइन मीडिया के चर्चित पोर्टल समूह 'फेस एन फैक्ट्स' के प्रबंध संपादक और ड्रीम प्रेस कंसलटेंट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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